व्यक्ति आध्यत्मिक होने से क्या लाभ?प्रथम लाभ अमरता की प्राप्ति - मनुष्य जब आध्यत्मिक होता है वह अपना संमंध आत्मा परमात्मा से जोड़ता है,
और आत्मा अविनाशी है जरा मरण से रहित है यह भलीभांति समझ लेता है।
अतः स्वयं की अविनाशी स्वरुप का बोध होता है | और अमर हो जाता है |द्वितीय लाभ चिरंतन सुख और आनंद की प्राप्ति - जब मनुष्य स्वयं को अमर जान लेता है उसी समय संसार का क्षणभंगुर स्वरूप को भी जान लेता है |
वस्तु व्यक्ति परिस्थिति सभी अस्थायी जान कर उससे प्रभावित नहीं होता ,
उन सब का उपयोग कर सदा सुखी रहता है, ममता रहित हो कर समता में प्रतिष्टित होता है |
सारा संसार को स्वयं का लीला समझ कर सदा आनंद में रहता है|
जैसे की सागर में तरंग, फेन, बुलबुले शोभायमान होते हैं |
ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आने वाला भी सुख और शांति का प्रसाद पा लेता है |तृतीय लाभ व्यक्ति सदा निर्भय रहता है , दुःख और कष्ट से रहित होता है- जब स्वयं अविनाशी और संसार क्षण भंगुर जान लेता है
उसे फिर किस बात का भय होगा ? अतः सदा निर्भय रहता है |
दुःख और कष्ट उसे प्रभावित नहीं कर पाते |चतुर्थ लाभ संताप रहित हो जाता है - षड्विकार काम , क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन को और इन के कारणों को भलीभांति जान लेने से
मन में यह विकार ताप उत्पन्न नहीं कर पाते और संताप रहित हो जाता है |
गुणों के प्रभाव से विकार ग्रस्त हो भी जाए तो भी उसे शीघ्र ही उपराम हो जाता है |
पंचम लाभ वह सर्वज्ञ हो जाता है -
सृष्टि का आधार स्वरुप परमात्मा को जान कर वह सर्वज्ञ हो जाता है |छठा लाभ दैवी गुण संपन्न होता है - उद्यम ,साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम, दया, करुणा, क्षमाशील, विद्या , विनय, विवेक आदि गुणों से सु शोभित होता है |सातवां लाभ वसुधैव कुतुम्वकम -
सारा श्रृष्टि को अपना स्वरुप जान लेने से
वह सभी को पोषण करता है जैसे मनुष्य अपना शरीर और परिवार का मनुष्य पालन पोषण और सुरक्षा करता है|
वस्तुवादी होने से क्या नुक्सान ?
अपने को एक शरीर का पुतला मानता है और वह जरा व्याधि मृत्यु के भय से प्रभावित रहता है | स्वार्थी , भयातुर , कामातुर, क्रोधी, लोभी, मोहि, अशांत, रुग्ण, खिन्न , रहता है | पुत्र,परिवार, समाज, संसार सभी का शोषण करता है, संग्रही होताहै, सदा दुखी रहता है, पीड़ित रहता है | विलाशिता , भोगी आदि दुर्गुण से प्रभावित रहता है | अंततो गत्वा वह पुनः मनुष्य शरीर को प्राप्त न होकर तिर्यक योनी जैसे किट, पतंग, पशु, पक्षी, जलचर , पेड़ पौधे आदि शरीर पाकर दुःख कष्ट पीड़ा भोगता रहता है |
मानव जीवन बहुत दुर्लभ है वो भी भारत जैसे देश में अत्यंत दुर्लभ है। यहाँ जन्म लेने के लिए देवता लोग भी तरसते हैं । क्यों की स्वर्ग तथा अन्य लोक में केवल पुण्य फल का ही भोग भोगते हैं परंतु मानव जन्म में मनुष्य सभी देव, गन्धर्व, किन्नर और सभी लोकों के पूजनीय आत्मतत्त्व कहो, ब्रह्मतत्व कहो या फिर परमपद को प्राप्त कर सकता है। जो की अन्य किसी भी योनि में नहीं प्राप्त कर सकता है। इस लिए देवता लोग भी यहाँ जन्म लेने के लिए तरस ते हैं ।
पर हम संसार में इतने उलझे हुए हैं कि इतनी बड़ी कीमती जीवन हमे बोझ लग रहा है। हम से सरकता जा रहा है। हमे पता ही नहीं चल रहा है। जैसे वह भिकारी की कथा है। कि जीवन भर रास्ता किनारे गड़े हुए सोना की खजाना के ऊपर बैठ कर एक एक पैसा के लिए हात फैलाते फैलाते जीवन पूरा होगया जब गाड़ने के लिए खोदे तो सोना का खजाना निकाला। ऐसे ही हमारा उस सोने से भी कीमती जीवन व्यर्थ के सांसारिक चीजो को संभालने में खो देंगे और आत्मधन से वंचित रह जायेंगे। पता ही नहीं चल रहा है कि कैसे कल का बचपन, जवानी बीत गया और आगे की समय भी सरकता जा रहा है। चलो जबतक पता नहीं था तब तक तो ठीक है । अब जब पता चला तब तो संभल जाएं। नहीं तो व्यर्थ ही जीवन खोना पड़ेगा। यहाँ प्रकृति माता की बड़ी विचित्र लीला है। अब इस को समझें।
प्रकृति माता हमारे सभी जीवों के माता है। हमारे पालन पोषण में हमेशा ही अनादि काल से निमग्न है, आनंदित है। हमे इस शरीर रूपी कपड़ा पहना कर बेटा, बेटी, पोता, पोती, हाथी, घोड़ा, सोना, चाँदी आदि खिलौना दे रखा है। कि हम इस में ही खेलते ही रहें । हम अच्छे खेलते हैं तो हमे राजा,मंत्री, ऑफीसर, धनी, पंडित, देवता, गन्धर्व के शरीर रूपी कपड़ा पहना कर अच्छा अच्छा खिलौना देता है। अगर हम कीचड़ खेलते हैं तो हमे अच्छा कपड़ा नहीं देती जैसे एक साधारण माँ भी करती है। फिर हमें ग़रीब ला चार रूपी साधारण कपड़ा देती है। और नरक, दरिद्र, बीमारी रूपी तालाब में डाल कर रगड़ रगड़ कर धोती है और टूटी फूटी खिलौना देती है या तो वो भी नहीं देती है। हम सुधर जाएँ ऐसी शिक्षा देती है। हम जब इस खिलौना खेल खेल कर ऊब जाते हैं उसी को ही पुकारते हैं तब हमें गुरु रूपी गोद में लेकर संत,भक्त,जोगी, तपि का शरीर रूपी कपड़ा पहना कर ज्ञान, भक्ति रूपी स्तनों से आनंद रूपी दुग्धामृत का पान कराती है। और उसकी गोद में सुलाती है । जिसको सभी ज्ञानी जन मुक्ति, शांति, निर्वाण आदि नाम से जानते हैं।
यही रहस्य को जानने से राजपुत्र सिद्धार्त गौतम बुद्ध बन गए और कोई विस्वामित्र,व्यास, वाल्मीकि,बनगए तो कोई भीमभोई । ऐसे कई हज़ार कई करोड़ लोग अनादि काल से प्रकृति माता के गोद में आकर गए हैं।
संत भक्त लोग यह भी बताकर गये हैं कि सभीलोग वही परम पद को पाने की अधिकारी हैं । सभी पा सकते हैं। बस उस रास्ते में पैर रखने की देर है। जो की हमको करना है कोई जबर्दस्ती हमे धकेल नहीं सकता अगर धकेलेगा तो भी हम चल नहीं सकते जबतक हमारा इच्छा नहीं होगी। इस में हम स्वतंत्र हैं। जो चल पड़ा वो सतभागी है। चलने के लिए सभी को कहीं जंगल में जाना नहीं है। किसी सड़क पे चलना नहीं है। अपना मन को ही किसी सद्गुरु के बताये अनुसार चलाना है। इस के लिए प्रारम्भ में कोई मंत्र तंत्र की आवश्यकता नहीं है। बस समय निकाल कर अकेले में घर में कहीं बैठ कर उसी को ही मन ही मन पुकारना है । 10 मिनिट से ले कर जितने अधिक हो सके।एक बार से ले कर दिन में दो ,पांच सात बार जैसे भाव आता है ऐसा ही पुकारे वो सभी भाषा समझता है। संसारी बिकार, राग द्वेष, झगड़ा, से जितने अपने को बचाएंगे उतना ही हमे अधिक लाभ होगा।
भगवान एक हैं जो जिस किसी रूप में भी पूजा करे तो भी उस तक पहुचेगा। इसके लिए कोई बंधन नहीं है। फिर भी पंचदेव(विष्णु, शिव, शक्ति, गणपति, सूर्य ) में से किसी को भी पूजना अपना हिन्दू संस्कृति में कहा गया है सभी कल्याणकारी हैं।
भगवान सर्वव्यापी है अर्थात यहाँ भी हैं। सर्व काल में हैं अर्थात अभी भी हैं । पूर्ण रूप में हैं अर्थात पूर्ण समर्थ के साथ हैं । और सर्व सुलभ हैं। वो कोई पैसा या और कोई चीजों से नहीं मिलते । बस मन से ही पुकारने की देर है। हम जब एक कदम उसके और चलते हैं तो वो हजार कदम अपने और दौड़ कर आता है जैसे एक माँ अपने छोटे बच्चे की तरफ आता है।
वास्तव में आप है कौन?मनुष्य में जो बुद्धि होता है,मन होता है, सुक्ष्म शरीर की क्षमताएं होती हैं ,वो पशु शरीर में नहीं होती ,लेकिन मनुष्य शरीर में जो 'मैं' है..आत्मा है वही उस पशु शरीर में है ,यह ज्ञान सुनने में तो थोड़ा कठिन लगेगा ,लेकिन यह सुना तो आपने हजार हजार यज्ञ कर लिये,हजार हजार तीर्थ कर लिए,हजार हजार तप कर लिए...ये ऐसा ज्ञान है।
...अपने प्यारे अर्जुन को भगवान सुना रहे हैं ,युद्ध के मैदान में ..
...देहधारी के इस मनुष्य शरीर में जैसे बालकपन,जवानी ,वृद्धावस्था होती है ऐसे ही देहांतर् की प्राप्ति हो जाती है ....जैसे यह तीन अवस्था आ जाती है, चार अवस्था आ जाती है ऐसे ही मृत्यु के बाद दूसरे शरीर की अवस्था आ जाती है, तो जो धीर है...इन अवस्थाओं को 'मैं' नहीं मानता..इस अवस्था वाले शरीर को 'मैं' नहीं मानता वो अपनी आत्मा में धीर है, वह धीर पुरुष फिर इनमें विचलित नहीं होता... अपने आप अवस्थाओं के बाप,
तो वह अवस्थाओं में विचलित नहीं होता तो गुणों में भी विचलित नहीं होता ..।
...प्रकासम् च प्रवृत्तिम् च मोहम् एव च पांडवा न सम् प्रवृत्तानि न निवृत्तानि आकांक्ष्यति....
प्रकाश मतलब सात्विकता आई सत्संग आया दान पुण्य आनंद आया ,प्रवृत्ति मतलब लेना-देना आपाधापी हुई ,मोह मतलब निद्रा आई ....लेकिन वह ज्ञानी न निद्रा की इच्छा करता है न आपाधापी की इच्छा करता है,वो स्वाभाविक आ रहा है जा रहा है... सृष्टि का क्रम है ,ज्ञानी किसी परिस्थिति की इच्छा, वासना,आकांक्षा नहीं करता ..इसीलिए बोलते हैं जीवनमुक्त ..वो जीते जी मुक्त है ,हम लोग इच्छा करते हैं धन मिल जाए सत्ता मिल जाए यह मिल जाए वह मिल जाए,मैं मरू नहीं ...मरू नहीं...नहीं करके सब मर रहे हैं ,बुड्ढा होउ नहीं ....सभी हो रहे हैं,मै बालक ही रहुं...फिर भी जवान हो जाते हैं, मैं जवान रहूं ....तो जवानी तो छूट जाती है ,फिर क्यों प्रपंच में रहना
मैं जो हूं वहां कुछ बदलाव नही,जहां बदलाव है वह मैं नहीं हूं ,मन तु ज्योति स्वरूप.....
मैं सब को जानने वाला ज्ञान स्वरूप आत्मा हूं ,इसको जानकर वो तो दृढ़ हो जाता है गुरुकृपा में...गुरु के अनुभव में टीक जाता है।
बाल्यकाल और जवानी में नींद से जितनी ताकत और स्फुर्ति मिलती है बुढ़ापे में उतनी नींद भी नहीं आती और उतनी स्फूर्ति भी नहीं आती ...तो मानना पड़ेगा कि कारण सरीर भी बदलता है ,स्थूल शरीर भी बदलता है, सूक्ष्म शरीर भी बदलता है ,फिर भी कोई है जो नहीं बदलता है ... जवानी में मुझे ज्यादा नींद आती थी ,बुढ़ापे में काक चेष्टा जैसी नींद आती है ,जवानी मे नींद के बाद ज्यादा स्फूर्ति आती थी बुढ़ापे में जरा ऐसे ही रहता है,मै बालक ही रहुं...फिर भी जवान हो जाते हैं, मैं जवान रहूं ....तो जवानी तो छूट जाती है ,फिर क्यों प्रपंच में रहना
मैं जो हूं वहां कुछ बदलाव नही,जहां बदलाव है वह मैं नहीं हूं ,मन तु ज्योति स्वरूप.....
मैं सब को जानने वाला ज्ञान स्वरूप आत्मा हूं ,इसको जानकर वो तो दृढ़ हो जाता है गुरुकृपा में...गुरु के अनुभव में टीक जाता है।
बाल्यकाल और जवानी में नींद से जितनी ताकत और स्फुर्ति मिलती है बुढ़ापे में उतनी नींद भी नहीं आती और उतनी स्फूर्ति भी नहीं आती ...तो मानना पड़ेगा कि कारण सरीर भी बदलता है ,स्थूल शरीर भी बदलता है, सूक्ष्म शरीर भी बदलता है ,फिर भी कोई है जो नहीं बदलता है ... जवानी में मुझे ज्यादा नींद आती थी ,बुढ़ापे में काक चेष्टा जैसी नींद आती है ,जवानी मे नींद के बाद ज्यादा स्फूर्ति आती थी बुढ़ापे में जरा ऐसे ही रहता है
तो उसको जानने वाला तू बुढ़ापे से अलग है न, ,जवानी से अलग है न..तो स्थूल शरीर बदला उसको भी तू जानता है, सुक्ष्म शरीर बदला उसको भी तू जानता है, क्योंकि रात को सपना आया ..आप जवान होते हैं तो जवान होने का सपना आता है ,तो सपना तो सूक्ष्म शरीर में आता है ,बुड्ढे हो तो बुड्ढा होने का सपना आता है,अब बालक हो तो बाल्यकाल का सपना आता है तो सपना सुक्ष्म शरीर में आता है ,तो सुक्ष्म शरीर बदलता है क्योंकि सपने बदलते हैं.... इसीलिए सूक्ष्म शरीर बदलता है,
..कारण शरीर बदलता है क्योंकि बचपन की नींद जवानी की नींद बुढ़ापे की नींद बदलती है...तो कारण शरीर भी बदलता है और यह शरीर तो बदलता ही है.. दिखता है ..तो आपकी तीनों शरीर बदलते हैं ,आप नहीं बदलते लेकिन बेवकूफी के कारण ऊंचा सत्संग ..ब्रह्मज्ञान का सत्संग नहीं मिला इसलिए मान बैठे हैं कि कोई उधर है ...ऐसा है वैसा है ,भक्ति भाव करते हैं लेकिन ह्रदय का अज्ञान नहीं मिटता ,जरा से दुख में दुखी हो जाते हैं ,जरा से सुख मे सुखी हो जाते हैं, जरा से मान में अहम भर जाता है,जरा से अपमान में वैर भर जाता है ..तो अहम और वैर सुक्ष्म में शरीर में होता है,राग देश सूक्ष्म शरीर में बुद्धि में होता है ...मान अपमान का सुख दुख सुक्ष्म में शरीर में होता है ,बीमारी तंदुरुस्ती स्थूल शरीर में होता है तो बीमारी तंदुरुस्ती आई उसको भी जाना और गई उसको भी जाना ,मान अपमान आया और गया उसको भी तुम जानते हो ..तो तुम स्थूल शरीर नहीं हो.. लाला.. लालियाँ...बिटिया तुम स्थूल शरीर नहीं हो ,देवीयाँ देवता तुम सुक्ष्म शरीर नहीं हो ,तुम कारण शरीर नहीं हो ...मरने के बाद भी जो नहीं मरता है वह तुम अमर आत्मा हो ,हमें अपने आप अवस्थाओं के बाप ...
धीरस्य तत्र न मोहती.... जो धीर है वह मोहित नहीं होता ...
गड़ोदिया सेठ थे ,उनकी बैंक चलती थी गड़ोदिया बैंक..राजस्थान में,उसमें मेरे पिताजी का खाता था और मैं पैसे निकलवाने भी गया था गड़ोदिया से मुझे पक्का याद है ...गया जी में गए , रात्रि को सोए तो एक सेठ हीरालाल नाई सपने में दिखा, बोला सेठ जी आप अपने कुटुंब का श्राद्ध कराने आए हो ,मैं आपके गांव का हूं, मैं भटक रहा हूं ,अन्नदाता कुछ कीजिए ...बोले अरे तू तो मोहन नाई है रे इधर कैसे ..बोले मैं मर गया हूं ..
सेठ सपने से जागा ,सुबह को ब्राह्मणों को बुलाकर जो कुछ अपने पिंडदान करने थे किये लेकिन.....लेकिन हमारे गांव का मोहन नाई उसके लिए भी हम पिंडदान करते हैं ..ऐसा भी किये...उसकी सद्गति के लिए प्रार्थना करके किए ,
...दूसरे दिन सेठ जी के सपने में फिर से नाई आया..बड़ा प्रसन्नचित ,सेठ जी आपने मेरी सद्गति कर दी ,इस पुण्य कर्म से आपका यश रहेगा, अब सेठ को पता ही नहीं कि बापु जी बोलेंगे और करोड़ों लोगों तक मेरा नाम जाएगा ,कईयों को पता नहीं गड़ोदिया भी कोई परिवार था गड़ोदिया भी कोई बैंक थी ....
...जय राम जी की ...
लेकिन मेरे को पूरा पक्का है रेवड़ी बाजार अहमदाबाद में गड़ोदिया ....
भारत वर्ष संतों की भूमि है | नजाने कितने अपने जीवन ज्योति को जलाकर भावी पीढ़ी के ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग प्रसस्त कर गये हैं | इन में से यह एक प्रसिद्द पंक्ति है की -
“अभी, यहाँ, इसी वक्त जो सुखी नहीं है वो कहीं जाकर, कुछ पा कर, कुछ बन कर सुखी नहीं हो सकता |”
यह बात कुछ समझ नहीं आता | क्यूँ की अपने सारे जीवन करने, पाने, लेने,देने में ही बिता रहे हैं इसलिए ये बात समझ में नहीं आता | हम सोचते हैं की कुछ करने से सुख मिलेगा | तो करने वालों को देखो क्या वो सुखी हैं ? कर कर के मर रहे हैं | तो क्या करें , कुछ न करें ? नहीं नहीं होनें दें | जैसे एक बालक के अनायास प्रयास होते हैं | भूख लगी है तो स्वास्थ्य अनुकूल खा लें , नींद आये तो सो ले | परन्तु अगर हम ऐसा चाहिए वेसा चाहिए में लगे रहेंगे तो सुख दुःख में उलझे रहेंगे सहज जीवन की अनुभूति से बंचित रह जायेंगे |
बस हर काम में अन्दर से सहज रहने की कोशिश करे फिर प्रत्येक काम में आनंद आने लगेगा! ध्यान का अभ्यास इसके लिए अच्छा उपाए है, जब भी समय मिले कुछ देर के लिए आँखे बंद कर आराम से बिना कोई कल्पना किये ध्यान में बैठ जाए !
भीतर से ठहर जाना ही सहजता है, बाहर भले पूरी तरह व्यस्त हो लेकिन अन्दर से शांत रहे, जब भीतर से शांत होंगे तो मुश्किल से मुश्किल काम भी आसानी से कर सकते है लेकिन यदि अन्दर से अशांत है तो आसान काम में भी मुश्किल खड़ी कर देते है !
तो सहज जीवन कैसे जिए - हाँ ये तो काम की बात है | इसके लिए सबसे आसान तरीका ये है | जैसा बनना चाहते हैं उसका संग करें, संग से ही रंग लायेगा | सौभाग्य है की हमारे देश में ऐसे जीवन की एक बहुत बड़ी श्रुंखला है | भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर आदि आदि | चलो … आप सोचेंगे की हम इतने बड़े हो नहीं सकते हैं, तो फिर अभी के हि देख लेते हैं | रामकृष्ण, विवेकानन्द, कवीर, मीरा, ज्ञानेश्वर, नामदेव, रमण महर्षि और भी कितने नाम लें | इन के राह पर चलने वाले कई प्रसिद्द, अप्रसिद्ध जीवन अब भी जी रहे हैं | सहज जीवन की झलक तो उनके जीवन में मिलेगा ही मिलेगा | अगर इन के जीवन में दोष दिख रहा है तो समझ लो हमारे दुःख के दीन अब गये नहीं | सहज जीवन के तो बात क्या क्या करें ?
सहज हमारी स्वाभाविक अवस्था है ! लेकिन हम दिनभर अनेक ऐसी बेकार की बातों में उलझे रहते है जिनका हमारी ज़िन्दगी में कोई मतलब नहीं |
उदहारण - उसका क्या हुआ , इसका क्या हुआ, नफा, नुकसान, दुनिया दारी के सुचना इकठ्ठा करते करते थक जाते हैं फुर्सत नहीं मिलती, तो सहजता कैसे मिलेगा ? तो फिर आप बोलोगे की स्मार्ट कैसे रहें, अपडेट कैसे रहें | हाँ - यही तो बात है , अब तो बताओ इसे आप को मिलता क्या है ? सुख ? कभी नहीं - आप को तो ये डायबेटिक्स, हाई बिपि, लो बिपि टेंशन और भी नजाने क्या क्या दे जाते हैं | और अंत में तो पूछो ही मत सब छोड़ कर जय राम जी की सब स्वाहा | कहाँ से आया था कहाँ गया कोई पता नहीं |
यदि सहजता जीवन में उतर जाए तो मन शांत रहेगा और हम जीवन को जी पायेंगे अन्यथा हम जीवन काटते है जीते नहीं !
भारत देश के ऋषियों ने जो अदभुत खोजें की हैं, वैसी खोजें विश्व में कहीं भी नहीं हुई हैं। मनुष्य का स्वभाव तीन गुणों के प्रभाव से संचालित होता है। उनमें से रजो-तमोगुण मनुष्य को अत्यंत दुःखद अनुभव करवाकर उसके वर्तमान जीवन को निकृष्ट बना देता है और फिर वृक्ष, पशु, पक्षी जैसी तुच्छ योनियों में ले जाता है। सत्त्वगुण वर्तमान जीवन को दिव्य बनाता है और स्वर्ग एवं ब्रह्मलोक आदि उच्च लोकों में पहुँचाता है। इसमें भी यदि ब्रह्मवेत्ताओं का प्रत्यक्ष सान्निध्य एवं सत्संग मिले तो तीनो गुणों से पार अपने असली आनंदधन आत्मा को जानकर जीव जीवन्मुक्त हो सकता है।
चलो, अब रजो-तमोगुण के कुप्रभाव एवं सत्त्वगुण के सुप्रभाव को निहारें।
तमोगुण
तमोगुणी मानव वर्ग आलसी-प्रमादी होकर, गंदे विषय-विकारों का मन में संग्रह करके बैठे-बैठे या सोते-सोते भी इन्द्रियभोग के स्वप्न देखता रहता है। यदि कभी कर्मपरायण हों तो भी यह वर्ग हिंसा, द्वेष, मोह जैसे देहधर्म के कर्म में ही प्रवृत्त रहकर बंधनों में बँधता जाता है। मलिन आहार, अशुद्ध विचार और दुष्ट आचार का सेवन करते-करते तमोगुणी मानव पुतले को आलसी-प्रमादी रहते हुए ही देहभोग की भूख मिटाने की जितनी आवश्यकता होती है उतना ही कर्मपरायण रहने का उसका मन होता है।
रजोगुण
रजोगुणी मनुष्य प्रमादी नहीं, प्रवृत्तिपरायण होता है। उसकी कर्मपरंपरा की पृष्ठभूमि में आंतरिक हेतु रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, दंभ आदि सब भरा हुआ होता है। सत्ताधिकार की तीव्र लालसा और देहरक्षा के ही कर्म-विकर्मों के कंटकवृक्ष उसकी मनोभूमि में उगकर फूलते-फलते हैं। उसके लोभ की सीमा बढ़-बढ़कर रक्त-संबंधियों तक पहुँचती हैं। कभी उससे आगे बढ़कर जहाँ मान मिलता हो, वाहवाही या धन्यवाद की वर्षा होती है, ऐसे प्रसंगों में वह थोड़ा खर्च कर लेता है। ऐसे रजोगुणी मनुष्य का मन भी बहिर्मुख ही कहलाता है। ऐसा मन बड़प्पन के पीछे पागल होता है। उसका मन विषय-विलास की वस्तुओं को एकत्रित करने में लिप्त होकर अर्थ-संचय एवं विषय-संचय करने के खेल ही खेलता रहता है।
सत्त्वगुण
इन दोनों ही वर्गों के मनुष्यों का मन स्वच्छंदी, स्वार्थी, सत्ताप्रिय, अर्थप्रिय और मान चाहने वाला होता है और कभी-कभार छल-प्रपंच के समक्ष उसके अनुसार टक्कर लेने में भी सक्षम होने की योग्यता रखता है। ऐसे मन की दिशा इन्द्रियों के प्रति, इन्द्रियों के विषयों के प्रति और विषय भोगों के प्रति निवृत्त न होने पर भोगप्राप्ति के नित्य नवीन कर्मों को करने की योजना में प्रवृत्त हो जाती है। ऐसा मन विचार करके बुद्धि को शुद्ध नहीं करता अपितु बुद्धि को रजोगुण से रँगकर, अपनी वासनानुसार उसकी स्वीकृति लेकर – ‘मैं जो करता हूँ वह ठीक ही करता हूँ‘ ऐसी दंभयुक्त मान्यता खड़ी कर देता है।
ऐसे आसुरी भाव से आक्रान्त लोगों का अनुकरण आप मत करना। राजसी व्यक्तियों के रजोगुण से अनेक प्रकार की वासनाएँ उत्पन्न होती हैं अतः हे भाई ! सावधान रहना। रजो-तमोगुण की प्रधानता से ही समस्त पाप पनपते हैं। जैसे हँसिया, चाकू, छुरी, तलवार आदि भिन्न-भिन्न होते हुए भी उनकी धातु लोहा एक ही है ऐसे ही पाप के नाम भिन्न-भिन्न होने पर भी पाप की जड़ रजो-तमोगुण ही है।
संसार में बहुमत ऐसे वर्ग का ही है। ऐसा वर्ग प्रवृत्तिपरायण कहलाता है। इसके कर्म में मोक्षबुद्धि नहीं होती। अतः यदि इस वर्ग को स्वतंत्र रूप से व्यवहार करने दें तो समाज में ऐसी अव्यवस्था उठ खड़ी होती है जिसके फलस्वरूप सर्वत्र स्वार्थ और दंभरूपी बादल छा जाते हैं, कपट एवं प्रपंच की आँधी चलने लगती है तथा सर्वत्र दुःख और विपत्तियों के प्रहार होने से प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार उठती है। ये दो वर्ग ही यदि परस्पर टकराने लगे तो हिंसा, द्वेष, स्वार्थ और भोगबुद्धि के कर्मों में ही प्रजा लिप्त रहने लगती है और युद्ध की नौबत आ जाती है। प्रत्येक युग एवं प्रत्येक देश में ऐसे ही संहार होता रहता है।
यह उन्नति का मार्ग नहीं है। अवनति की ओर जाते मानव के लिए आत्मोन्नति के आनंद की ओर चलने के लिए बुद्धि के शोधन की, उसकी विचार शक्ति में विवेक के सूर्य का उदय करने की आवश्यकता है। मन एवं इन्द्रियों को विषयों के स्मरण, चिन्तन, प्राप्ति एवं भोग की जन्म-जन्मांतरों की जो आदत पड़ी हुई है, उनमें असारता का दर्शन होने पर मन उनसे विमुख होता है तब बुद्धि को अपने से भी परे आत्मा की ओर अभिमुख होने की रूचि एवं जिज्ञासा होती है, आत्सरस पीने का सौभाग्य प्राप्त होता है, संसार की मायाजाल से बचने का बल मिलता है।
जब बुद्धि को आत्मनिरीक्षण के लिए विचार करने की भोगमुक्त दशा प्राप्त होती है तब वह प्रत्येक कर्म में विवेक का उपयोग करती है। उस वक्त उसके अन्तःकरण में आत्मा का कुछ प्रकाश पड़ता है, जिससे विषयों का अंधकार कुछ अंश में क्षीण होता है। यह है नीचे से ऊपर जाने वाला तीसरा, आंतर में से प्रकट होने वाला स्वयंभू सुख की लालसावाला, बुद्धि के स्वयं के प्रकाश का भोक्ता – सत्त्वगुण। इस सत्त्वगुण की प्रकाशमय स्थिति के कारण बुद्धि का शोधन होता है। कर्म-अकर्म, धर्म अधर्म, नीति-अनीति, सार-असार, नित्य-अनित्य वगैरह को समझकर अलग करने एवं धर्म, नीति, सदाचार तथा नित्य वस्तु के प्रति चित्त की सहज स्वाभाविक अभिरूचि करने की शक्ति इसी से संप्राप्त होती है।
एक ओर मानवीय जीवन के आंतर प्रदेश में आत्मा (आनंदमय कोष) एवं बुद्धि (विज्ञानमय कोष) है तो दूसरी ओर प्राण (प्राणमय कोष) तथा शरीर (अन्नमय कोष) है। इन दोनों के बीच मन (मनोमय कोष) है। वह जब बहिर्मुख बनता है तब प्राण तथा शरीर द्वारा इन्द्रियाँ विषय-भोगों में लिप्त होकर वैसे ही धर्म-कर्म में प्रवृत्त रहती हैं। यही है मानवीय जीवन की तामसिक एवं राजसिक अवस्था की चक्राकार गति।
परंतु उसी मन (मनोमय कोष) को ऊर्ध्वमुख, अंतर्मुख अथवा आत्माभिमुख करना – यही है मानव जीवन का परम कल्याणकारी लक्ष्य। ऋषियों में परम आनंदमय आत्मा को ही लक्ष्य माना है क्योंकि मनुष्य के जीवनकाल की मीमांसाकरने पर यह बात स्पष्ट होती है कि उसकी सब भाग दौड़ होती है सुख के लिए, नित्य सुख के लिए। नित्य एवं निरावधि सुख की निरंतर आकांक्षा होने के बावजूद भी वह रजो-तमोगुण एवं इन्द्रियलोलुपता के अधीन होकर हमेशा बहिर्मुख ही रहता है। उसकी समस्त क्रियाएँ विषयप्राप्ति के लिए ही होती हैं। उसकी जीवन-संपदा, शारीरिक बल, संकल्पशक्ति आदि का जो भी उसका सर्वस्व माना जाता है वह सब जन्म मृत्यु के बीच में ही व्यर्थ नष्ट हो जाता है।
परंतु उसी मन(अंतःकरण) पर यदि सत्त्वगुण का प्रकाश पड़े तो उसे स्वधर्म-स्वर्म की, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की सूक्ष्म छानबीन करने का सूझता है। सुख-दुःख के द्वन्द्व में उसे नित्य सुख की दिशा सूझती है। दुराचार के तूफानी भँवर में से उसे शांत, गंभीर सत्त्वगुणी गंगा के प्रवाह में अवगाहन करने की समझ आने लगती है। विचार-सदविचार की कुशलता आती है। विचार, इच्छा, कर्म आदि में शुभ को पहचानने की सूझबूझ बढ़ती है। जिससे शुभेच्छा, शुभ विचार एवं शुभकर्म होने लगते हैं।
जन्म मरण जैसे द्वन्द्वों के स्वरूप अर्थात् संसार-चक्र एवं कर्म के रहस्य को समझाते हुए एवं उसी को अशुभ बताते हुए गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।
‘वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभांति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात् कर्मबन्धन से मुक्त हो जाएगा।’
(गीताः 4.16)
धर्म के, पुण्य के नाम अलग-अलग हैं किन्तु उनका मूल है सत्त्व। सत्त्वगुणरूपी जड़ का सिंचन होने से जो विशाल वृक्ष होता है उसमें मीठे फल लगते हैं। वे ही फल आंतरिक सुख, स्वतंत्र सुख, मुक्तिदायी सुख का मार्ग खोल देते हैं। यह जीव गुणों के थपेड़े से बचकर ही अपने गुणातीत स्वरूप में स्थिर हो सकता है एवं आत्म-साक्षात्कार कर सकता है। जिसके ध्यान से ब्रह्माजी, भगवान विष्णु एवं साम्बसदाशिव भी सामर्थ्य एवं अनोखा आनंद पाते हैं उसी चैतन्यस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिए आपका जन्म हुआ है इसका निरंतर स्मरण रखना।