भारतीय सनातन दर्शन, उपनिषदों और वेदांत के अनुसार "मनुष्य मात्र का परम कार्य" केवल सांसारिक गतिविधियों (रोजी-रोटी, परिवार पालन या भौतिक उपलब्धियों) तक सीमित नहीं है, क्योंकि ये कार्य अन्य योनियों (पशु-पक्षियों) में भी प्राकृतिक रूप से होते हैं।
मनुष्य जीवन का 'परम कार्य' (सर्वोच्च उद्देश्य और परम कर्तव्य) है — "अज्ञान के बंधन से मुक्त होकर अपने वास्तविक सच्चिदानंद स्वरूप (आत्म-तत्व/ब्रह्म) को जानना और उसमें स्थित होना।" इसे दार्शनिक और शास्त्रीय दृष्टि से निम्नलिखित चरणों और आयामों में विस्तार से समझा जा सकता है:
1. परम पुरुषार्थ की सिद्धि: मोक्ष (मुक्ति)
शास्त्रों में मानव जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं:
धर्म (सदाचार, कर्तव्य और व्यवस्था)
अर्थ (आजीविका, धन-संसाधन)
काम (इच्छाएं और सांसारिक सुख)
मोक्ष (परम स्वतंत्रता और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति
धर्म, अर्थ और काम साधन हैं, साध्य नहीं। वे जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रारंभिक सीढ़ियां हैं।
मनुष्य का वास्तविक और परम कार्य 'मोक्ष' की प्राप्ति है—अर्थात समस्त दुःखों, अभावों, भय और जन्म-मरण के बंधनों से सदा के लिए निवृत्त हो जाना।
2. आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization)
अज्ञानवश मनुष्य स्वयं को पंचमहाभूतों से बना यह 5-6 फीट का नश्वर शरीर और चंचल मन मान बैठता है। इस भ्रम के कारण वह जन्म, मृत्यु, रोग, सुख और दुःख में खुद को बंधा हुआ पाता है।
मनुष्य का परम कार्य यह विवेक जगाना है कि:
वह शरीर, इंद्रिय या मन नहीं है।
वह इन सबका प्रकाशक, निर्लेप और नित्य 'साक्षी चेतन' (आत्मा) है।
उपनिषद वाक्य: "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (बृहदारण्यक उपनिषद)
अर्थात: आत्मा ही जानने, सुनने, मनन करने और निरंतर ध्यान करने योग्य एकमात्र परम सत्य है।
3. कर्त्ताभाव से मुक्त होकर निष्काम भाव से जीना (जीवनमुक्ति)
संसार में रहते हुए कर्म करना अनिवार्य है, किंतु कर्मों का उद्देश्य अहंकार की तृप्ति न होकर चित्त-शुद्धि होना चाहिए।
मनुष्य का परम कर्तव्य यह सीखना है कि बाहर से संसार के प्रति अपने दायित्व (सेवा, परोपकार, धर्म) पूरी निष्ठा से निभाए, परंतु भीतर से यह बोध रखे कि:
"प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥" (भगवद्गीता 3.27)
अर्थात: सब कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, अज्ञानी मनुष्य अहंकारवश स्वयं को कर्त्ता मान लेता है।
कर्ताभाव मिटाकर साक्षीभाव में टिकना ही कार्य का चरम संतुलन है।
4. सर्वत्र एकात्म भाव का दर्शन (वसुधैव कुटुम्बकम् और अभय)
जब साधक को आत्म-ज्ञान होता है, तो उसका संकीर्ण दायरा ("मैं और मेरा परिवार") टूट जाता है।
वह समस्त प्राणियों में उसी एक ईश्वर/चेतना का दर्शन करता है:
"ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्" (ईशोपनिषद)
जब सब में अपना ही रूप दिखाई दे, तब न किसी से द्वेष रहता है, न भय और न ही स्वार्थ। समस्त सृष्टि के प्रति करुणा और प्रेम से जीना मनुष्य के परम कार्य का व्यावहारिक प्रकटीकरण है।
5. इस परम कार्य को साधने का व्यावहारिक मार्ग (साधना चतुष्टय)
इस परम कार्य को सिद्ध करने के लिए शास्त्रों ने 3 स्पष्ट सोपान बताए हैं:
श्रवण: सद्गुरु और शास्त्रों से सत्य का ज्ञान सुनना कि 'तुम शरीर नहीं, ब्रह्म हो'।
मनन: सुने हुए ज्ञान पर तर्क, विवेक और आत्म-निरीक्षण द्वारा निरंतर विचार करना और संशय दूर करना।
निदिध्यासन: उस जाने हुए सत्य में निरंतर टिके रहना, जिससे मन का कर्त्ता भाव शांत होकर 'स्वरूप-विश्राम' में बदल जाए।
मनुष्य मात्र का एकमात्र परम कार्य यह है कि वह इस अमूल्य मानव चोले का सदुपयोग करते हुए अपनी मूल चेतना (ब्रह्म) को पहचाने और जीते-जी पूर्ण, स्वतंत्र और मुक्त होकर रहे।