शरीर में बीमारी एवं मन में चिंताएं कैसे उत्पन्न होती हैं?"
मन की इच्छा-वासनाओं से चिंता उत्पन्न होती हैं एवं वात, पित्त, तथा कफ इन दोषों के असंतुलन से बीमारी उत्पन्न होती है।"
हमारे शरीर में हजारों सामान्य वाहिनियाँ हैं। उनमें अन्न रस आदि की अत्यंत अधिकता अथवा न्यूनता से सामान्य रोग होते हैं एवं सौ मुख्य वाहिनियाँ है जिनमें विलासिता एवं अन्य मानसिक कारणों से मलिनता भरने से बड़े रोग होते हैं। चिंता यह मन का रोग है एवं बीमारी तन का रोग है। यह जीव कभी चिंता अर्थात् मन की चिंता, भय, शोक आदि से तो कभी बीमारी से दुःख पाता रहता है। दुःख के रूपान्तरण को ही वह बेचारा सुख मान लेता है जिससे पुनः सुख के नाम पर दुःख ही भोगता रहता है।
तन की बीमारी और मन की चिंता कम-ज्यादा मात्रा में सभी को रहती है परंतु जो परम पुरुषार्थी चिंता -बीमारी की जड़ को ढूँढकर उसे उखाड़ देता है उसकी चिंता -बीमारी लंबे समय तक नहीं टिक सकती । अमुक वस्तु, अमुक स्थिति, अमुक धन, रूप-लावण्य, पद-प्रतिष्ठा वगैरह की इच्छा से मन में चिंता आती है, मन चिंतित होता है। सामान्य चिंतित होता है तो सामान्य नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है और विशेष चिंतित होता है तो विशेष नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है। जीव जब अग्नि से पकाया हुआ भोजन ग्रहण करता है तब जठराग्नि उसे पुनः भीतर पकाती है एवं उसमें से बनने वाला रस रसवाहिनियों एवं रक्तवाहिनियाँ ग्रहण करती हैं तथा शरीररूपी यंत्र को चलाती हैं किन्तु जब मन में चिंता, भय, शोक होते हैं तब नाड़ियों में क्षोभ होता है जिससे नाड़ी-समूह अपनी कार्यक्षमता खो बैठता है। यही कारण है कि पशु अथवा दुर्बल मन के मनुष्यों को जब भय होता है तो उनकी वाहिनियाँ अपनी कार्यक्षमता खो बैठती हैं एवं उनके मल-मूत्र का विसर्जन हो जाता है।
अंतःकरण में नश्वर वस्तुओं के राग को वासना कहते हैं। यह वासना ही आसक्ति एवं प्रियता का रूप धारण करके बंदर की तरह आठ प्रकार के सुखों की आशा, तृष्णा एवं ममता में कूदती रहती है। जीव अपने वास्तविक स्वरूप को न जानने के कारण इन चिंता यों का कई जन्मों से शिकार होता आया है।
कई बार प्रदोषकाल में किये गये भोजन, मैथुन आदि से, अशुद्ध अन्न, अपवित्र संपर्क से अथवा ऋतु के बदलने से बीमारी उत्पन्न होती है। जो चिंता का शिकार हो उसे बीमारीयाँ ज्यादा सताती हैं। कई बार पहले बीमारी होती है फिर चिंता होती है और कई बार चिंता के कारण बीमारी होती है। कइयों के जीवन में तो दोनों साथ ही डेरा डालकर बैठी होती हैं।
जो बीमारी याँ चिंता के बिना उत्पन्न होते हैं उन्हें आयुर्वेदिक उपचार, होम्योपैथी, प्राकृतिक उपचार, मंत्र, आशीर्वाद, जप, ध्यान, प्राणायाम, योगासन आदि से दूर किया जा सकता है। चिंता को ईश्वरार्पित कर्मों से, संत्संग से एवं साधु-समागम से कम किया जा सकता है। शरीर के रोगनिवारण के लिए तो अनेकों चिकित्सालय, औषधालय, डॉक्टर, हकीम, वैद्यादि की व्यवस्था मिल जाती है किन्तु मन के रोग को दूर करने के लिए ऐसी जगह बड़ी मुश्किल से कहीं-कहीं ही प्राप्त होती है। चिंता एवं बीमारी जिस अविद्या अर्थात् आत्मा के अज्ञान से उत्पन्न होती है उस अविद्या को निवृत्त करने का स्थल तो उससे भी दुर्लभ है, विरला है। शरीर की बीमारी तो एक बार मिटती है तो पुनः हो जाती है, मन की चिंता भी मिटकर पुनः हो जाती है किन्तु इन दोनों का कारण आत्म-अज्ञान यदि मिटता है तो यह जीव अपने शिव स्वभाव का अनुभव करके मुक्ति का आनंद पा सकता है। फिर उसे चिंता नहीं सताती और बीमारी भी बहुत नहीं होती। कभी प्रारब्ध वेग से शरीर में बीमारी आ भी गयी हो तो वह उसके चित्त पर प्रभाव नही डाल पाती, जैसे कि रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि जैसे जीवन्मुक्त महापुरुषों के चित्त पर दर्दनाक रोग का भी प्रभाव न पड़ा।
शरीर की बीमारी मिटाने के लिए जितनी सतर्कता जरूरी है उसकी चिंता सतर्कता मन के रोग को निवृत्त करने की हो तो तन-मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। उससे भी कम मेहनत यदि चिंता -बीमारी में फँसाने वाली अविद्या को मिटाने के लिए की जाय तो जीव सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
अज्ञान के कारण अपने मन-इन्द्रियों पर संयम नहीं रहता, फलस्वरूप चित्त भी रात-दिन राग-द्वेष से प्रेरित होकर 'यह मिला...... यह न मिला.....' करके मोहग्रस्त हो जाता है। अनेक इच्छाओं के उत्पन्न होने से, अविद्या से, चित्त को न जीतने से, अशुद्ध आहार के सेवन से, संध्याकाल एवं प्रदोषकाल में भोजन तथा मैथुन करने से, श्मशान आदि खराब स्थानों पर घूमने से, दुष्ट कर्मों का चिंतन करने से, दुर्जनों के संग से, विष, सर्प, सिंह आदि का भय होने से, नाड़ियों में अन्न-रस न पहुँचने अथवा अधिक पहुँचने से उत्पन्न कफ-पित्तादि दोषों से, प्राणों के व्याकुल होने से एवं इसी प्रकार के अन्य दोषों से शरीर में बीमारी याँ उत्पन्न होती हैं।
चिंता और बीमारी किस तरह नष्ट हो सकती हैं -
चिंता दो प्रकार की होती हैः एक सामान्य एवं दूसरी जटिल। भूख-प्यास एवं स्त्री-पुत्रादि की इच्छा आदि से उत्पन्न चिंता सामान्य मानी जाती है एवं जन्मादि विकार देने वाली वासनामय चिंता जटिल कहलाती है। अन्न जल एवं स्त्री-पुत्रादि इच्छित वस्तु मिल जाने से सामान्य चिंता नष्ट हो जाती है एवं चिंता यों के नष्ट हो जाने से मानसिक रोग भी नष्ट हो जाते हैं। जिस प्रकार रज्जु में अज्ञान से हुई सर्प की भ्रांति रज्जु के वास्तविक ज्ञान हुए बिना नहीं मिटती वैसे ही आत्मज्ञान के बिना जन्म-मरण को उत्पन्न करने वाली जटिल वासनामय चिंता भी नहीं मिटती। जिस प्रकार वर्षा ऋतु की नदी किनारे के सभी वृक्षों को उखाड़ देती है वैसे ही यदि जन्म-मरण की जटिल चिंता नष्ट हो जाय तो वह सब चिंता -बीमारी यों को जड़ मूल से उखाड़ फेंकती है।
कई बार चिंता के द्वारा बीमारी उत्पन्न होती है। कैसे ? चित्त यदि विषाद, चिंता, भय आदि से ग्रस्त हो तो उसका असर शरीर पर भी पड़ता है, परिणामस्वरूप शरीर में बीमारी याँ उत्पन्न हो जाती हैं।
इन्द्रियाणां मनोनाथः मननाथस्तु मारूतः।
इन्द्रियों का स्वामी मन है। मन का स्वामी प्राण है। प्राण यदि क्षुभित होते हैं तो वाहिनियाँ अपनी कार्यक्षमता खो बैठती हैं, जिससे बीमारी याँ उत्पन्न होती हैं। ऐसी बीमारीयों को दूर करने में मंत्रजाप, साधुसेवा, पुण्यकर्म, तीर्थस्नान, प्राणायाम, ध्यान, सत्कृत्य आदि सहायक है। इनसे चिंता दूर होती हैं एवं चिंता के दूर होने से उनसे उत्पन्न बीमारीयां भी मिट जाती हैं।
शांत चित्त में सत्त्वगुण बढ़ने से तन एवं मन के रोग दूर होते हैं। सुख की लालसा एवं दुःख के भय से मन अपवित्र होता है। सुखस्वरूप परमात्मा का ध्यान किया जाय एवं दुःखहारी श्रीहरि की शरण सच्चे हृदय से ग्रहण की जाय तो चिंता बीमारी की चोटें ज्यादा नहीं लगतीं। प्रेम ईश्वर से करे एवं इच्छा संसार की रखे अथवा प्रेम संसार से करे एवं इच्छा ईश्वर की रखे ऐसा मनुष्य उलझ जाता है परंतु जो बुद्धिमान है वह ईश्वर-प्राप्ति की इच्छा से ही ईश्वर को प्रेम करता है। उसकी सांसारिक परिस्थितियाँ प्रारब्धवेग से चलती रहती हैं। लोकदृष्टि से सब प्रवृत्तियाँ करते हुए भी उसकी गौण एवं मुख्य दोनों वृत्तियाँ ईश्वर में ही रहती हैं। वह ईश्वर को ही प्रेम करता है एवं ईश्वर को ही चाहता है। ईश्वर नित्य है अतः उसे विनाश का भय नहीं होता। ईश्वर सदा अपने आत्मरूप है अतः उस विवेकी को वियोग का संदेह भी नहीं रहता। अतः आप भी ईश्वर की इच्छा करें एवं ईश्वर से ही प्रेम करें, इससे भय एवं संदेह निश्चिंतता एवं शुद्ध प्रेम में परिणत हो जायेंगे।
जैसे हाथी के पानी में गिरने पर क्षोभ के कारण पानी उछलता है, जैसे बाण से बिंधा हुआ हिरण मार्ग में गति करने लगते हैं। सब वाहिनियाँ कफ-पित्तादि दोषों से भर जाने के कारण विषमता को प्राप्त होती हैं। प्राणों के द्वारा नाड़ीतंत्र के क्षुब्ध होने पर कई वाहिनियाँ अन्न-रस से पूरी भर जाती हैं तो कई वाहिनियाँ बिल्कुल खाली रह जाती हैं। प्राण की गति बदल जाने से या तो अन्न-रस बिगड़ जाता है या अन्न न पचने के कारण अजीर्ण हो जाता है अथवा अन्न-रस अत्यंत जीर्ण हो जाता है, सूख जाता है जिससे शरीर में विकार उत्पन्न होता है।
जैसे नदी का प्रवाह लकड़ी, तिनखों आदि को सागर की ओर ले जाता है वैसे ही प्राणवायु खाये गये आहार को रसरूप बनाकर भीतर अपने-अपने स्थानों में पहुँचा देती है। परंतु जो अन्न प्राणवायु की विषमता के कारण शरीर के भीतरी भाग में कहीं अटक जाता है वह स्वाभाविक रूप से कफ आदि धातुओं को बिगाड़कर बीमारी याँ उत्पन्न करता है।
इस प्रकार चिंता से बीमारी याँ उत्पन्न होती हैं और चिंता के मिट जाने पर बीमारीयाँ भी नष्ट हो जाती हैं।
जैसे हरड़े स्वभाव से ही जुलाब लगा देती है वैसे मंत्रादि के उच्चारण से, आरोग्य-मंत्र का श्रद्धा पूर्वक जप करने से चिंता -बीमारी याँ नष्ट हो जाती हैं। जैसे कसौटी पर कसने से स्वर्ण अपनी निर्मलता प्रगट कर देता है वैसे ही शुभकर्म या पुण्यकर्म करने से तथा सत्पुरुषों की सेवा करने से चित्त निर्मल हो जाता है। जैसे पूर्ण चंद्र का उदय होने से जगत में प्रकाश बढ़ता है वैसे ही चित्त शुद्ध होने से आरोग्य एवं आनंद बढ़ने लगता है। चित्त के शुद्ध रहने से प्राणवायु अपने क्रमानुसार ही संचार करती है एवं आहार को ठीक से पचा देती है जिससे नष्ट होती है।"
हमें यही दृष्टिगोचर होता है कि हम बाह्य उपचारों में ही अपने समय-शक्ति का ह्रास कर देते हैं फिर भी बीमारी यों से निवृत्त होकर आनंद एवं शांति प्राप्त नहीं कर पाते। जबकि चित्तशुद्धि के मार्ग से बीमारीयों के दूर होने पर आनंद एवं शांति प्राप्त होती है। देश के लोग यदि इन उपायों को अमल में लायें तो कितनी श्रम-शक्ति बच जाय एवं मनुष्य आरोग्य एवं दीर्घायु प्राप्त कर सके !
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