शनिवार, 1 जून 2024

बीमारी और चिंताओं से मुक्ति

 


  • शरीर में बीमारी  एवं मन में चिंताएं  कैसे उत्पन्न होती हैं?"

मन की इच्छा-वासनाओं  से चिंता उत्पन्न होती हैं एवं वात, पित्त, तथा कफ इन दोषों के असंतुलन से बीमारी  उत्पन्न होती है।"

हमारे शरीर में हजारों सामान्य वाहिनियाँ  हैं। उनमें अन्न रस आदि की अत्यंत अधिकता अथवा न्यूनता से सामान्य रोग होते हैं एवं सौ मुख्य वाहिनियाँ  है जिनमें विलासिता एवं अन्य मानसिक कारणों से मलिनता भरने से बड़े रोग होते हैं। चिंता  यह मन का रोग है  एवं बीमारी  तन का रोग है। यह जीव कभी चिंता  अर्थात् मन की चिंता, भय, शोक आदि से तो कभी बीमारी  से दुःख पाता रहता है। दुःख के रूपान्तरण को ही वह बेचारा सुख मान लेता है जिससे पुनः सुख के नाम पर दुःख ही भोगता रहता है।

तन की बीमारी  और मन की चिंता  कम-ज्यादा मात्रा में सभी को रहती है परंतु जो परम पुरुषार्थी चिंता -बीमारी  की जड़ को ढूँढकर उसे उखाड़ देता है उसकी चिंता -बीमारी  लंबे समय तक नहीं टिक सकती । अमुक वस्तु, अमुक स्थिति, अमुक धन, रूप-लावण्य, पद-प्रतिष्ठा वगैरह की इच्छा से मन में चिंता  आती है, मन चिंतित होता है। सामान्य चिंतित होता है तो सामान्य नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है और विशेष चिंतित होता है तो विशेष नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है। जीव जब अग्नि से पकाया हुआ भोजन ग्रहण करता है तब जठराग्नि उसे पुनः भीतर पकाती है एवं उसमें से बनने वाला रस रसवाहिनियों एवं रक्तवाहिनियाँ ग्रहण करती हैं तथा शरीररूपी यंत्र को चलाती हैं किन्तु जब मन में चिंता, भय, शोक होते हैं तब नाड़ियों में क्षोभ होता है जिससे नाड़ी-समूह अपनी कार्यक्षमता खो बैठता है। यही कारण है कि पशु अथवा दुर्बल मन के मनुष्यों को जब भय होता है तो उनकी वाहिनियाँ  अपनी कार्यक्षमता खो बैठती हैं एवं उनके मल-मूत्र का विसर्जन हो जाता है।

अंतःकरण में नश्वर वस्तुओं के राग को वासना कहते हैं। यह वासना ही आसक्ति एवं प्रियता का रूप धारण करके बंदर की तरह आठ प्रकार के सुखों की आशा, तृष्णा एवं ममता में कूदती रहती है। जीव अपने वास्तविक स्वरूप को न जानने के कारण इन चिंता यों का कई जन्मों से शिकार होता आया है।

कई बार प्रदोषकाल में किये गये भोजन, मैथुन आदि से, अशुद्ध अन्न, अपवित्र संपर्क से अथवा ऋतु के बदलने से बीमारी  उत्पन्न होती है। जो चिंता  का शिकार हो उसे बीमारीयाँ ज्यादा सताती हैं। कई बार पहले बीमारी  होती है फिर चिंता  होती है और कई बार चिंता  के कारण बीमारी  होती है। कइयों के जीवन में तो दोनों साथ ही डेरा डालकर बैठी होती हैं।

जो बीमारी याँ चिंता  के बिना उत्पन्न होते हैं उन्हें आयुर्वेदिक उपचार, होम्योपैथी, प्राकृतिक उपचार, मंत्र, आशीर्वाद, जप, ध्यान, प्राणायाम, योगासन आदि से दूर किया जा सकता है। चिंता  को ईश्वरार्पित कर्मों से, संत्संग से एवं साधु-समागम से कम किया जा सकता है। शरीर के रोगनिवारण के लिए तो अनेकों चिकित्सालय, औषधालय, डॉक्टर, हकीम, वैद्यादि की व्यवस्था मिल जाती है किन्तु मन के रोग को दूर करने के लिए ऐसी जगह बड़ी मुश्किल से कहीं-कहीं ही प्राप्त होती है। चिंता  एवं बीमारी  जिस अविद्या अर्थात् आत्मा के अज्ञान से उत्पन्न होती है उस अविद्या को निवृत्त करने का स्थल तो उससे भी दुर्लभ है, विरला है। शरीर की बीमारी  तो एक बार मिटती है तो पुनः हो जाती है, मन की चिंता  भी मिटकर पुनः हो जाती है किन्तु इन दोनों का कारण आत्म-अज्ञान यदि मिटता है तो यह जीव अपने शिव स्वभाव का अनुभव करके मुक्ति का आनंद पा सकता है। फिर उसे चिंता  नहीं सताती और बीमारी  भी बहुत नहीं होती। कभी प्रारब्ध वेग से शरीर में बीमारी  आ भी गयी हो तो वह उसके चित्त पर प्रभाव नही डाल पाती, जैसे कि रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि जैसे जीवन्मुक्त महापुरुषों के चित्त पर दर्दनाक रोग का भी प्रभाव न पड़ा।

शरीर की बीमारी  मिटाने के लिए जितनी सतर्कता जरूरी है उसकी चिंता  सतर्कता मन के रोग को निवृत्त करने की हो तो तन-मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। उससे भी कम मेहनत यदि चिंता -बीमारी  में फँसाने वाली अविद्या को मिटाने के लिए की जाय तो जीव सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

अज्ञान के कारण अपने मन-इन्द्रियों पर संयम नहीं रहता, फलस्वरूप चित्त भी रात-दिन राग-द्वेष से प्रेरित होकर 'यह मिला...... यह न मिला.....' करके मोहग्रस्त हो जाता है। अनेक इच्छाओं के उत्पन्न होने से, अविद्या से, चित्त को न जीतने से, अशुद्ध आहार के सेवन से, संध्याकाल एवं प्रदोषकाल में भोजन तथा मैथुन करने से, श्मशान आदि खराब स्थानों पर घूमने से, दुष्ट कर्मों का चिंतन करने से, दुर्जनों के संग से, विष, सर्प, सिंह आदि का भय होने से, नाड़ियों में अन्न-रस न पहुँचने अथवा अधिक पहुँचने से उत्पन्न कफ-पित्तादि दोषों से, प्राणों के व्याकुल होने से एवं इसी प्रकार के अन्य दोषों से शरीर में बीमारी याँ उत्पन्न होती हैं।

  •  चिंता  और बीमारी  किस तरह नष्ट हो सकती हैं - 

चिंता  दो प्रकार की होती हैः एक सामान्य एवं दूसरी जटिल। भूख-प्यास एवं स्त्री-पुत्रादि की इच्छा आदि से उत्पन्न चिंता  सामान्य मानी जाती है एवं जन्मादि विकार देने वाली वासनामय चिंता  जटिल कहलाती है। अन्न जल एवं स्त्री-पुत्रादि इच्छित वस्तु मिल जाने से सामान्य चिंता  नष्ट हो जाती है एवं चिंता यों के नष्ट हो जाने से मानसिक रोग भी नष्ट हो जाते हैं। जिस प्रकार रज्जु में अज्ञान से हुई सर्प की भ्रांति रज्जु के वास्तविक ज्ञान हुए बिना नहीं मिटती वैसे ही आत्मज्ञान के बिना जन्म-मरण को उत्पन्न करने वाली जटिल वासनामय चिंता  भी नहीं मिटती। जिस प्रकार वर्षा ऋतु की नदी किनारे के सभी वृक्षों को उखाड़ देती है वैसे ही यदि जन्म-मरण की जटिल चिंता  नष्ट हो जाय तो वह सब चिंता -बीमारी यों को जड़ मूल से उखाड़ फेंकती है।

कई बार चिंता  के द्वारा बीमारी  उत्पन्न होती है। कैसे ? चित्त यदि विषाद, चिंता, भय आदि से ग्रस्त हो तो उसका असर शरीर पर भी पड़ता है, परिणामस्वरूप शरीर में बीमारी याँ उत्पन्न हो जाती हैं।

इन्द्रियाणां मनोनाथः मननाथस्तु मारूतः।

इन्द्रियों का स्वामी मन है। मन का स्वामी प्राण है। प्राण यदि क्षुभित होते हैं तो वाहिनियाँ  अपनी कार्यक्षमता खो बैठती हैं, जिससे बीमारी याँ उत्पन्न होती हैं। ऐसी बीमारीयों को दूर करने में मंत्रजाप, साधुसेवा, पुण्यकर्म, तीर्थस्नान, प्राणायाम, ध्यान, सत्कृत्य आदि सहायक है। इनसे चिंता   दूर होती हैं एवं चिंता  के दूर होने से उनसे उत्पन्न बीमारीयां भी मिट जाती हैं।

शांत चित्त में सत्त्वगुण बढ़ने से तन एवं मन के रोग दूर होते हैं। सुख की लालसा एवं दुःख के भय से मन अपवित्र होता है। सुखस्वरूप परमात्मा का ध्यान किया जाय एवं दुःखहारी श्रीहरि की शरण सच्चे हृदय से ग्रहण की जाय तो चिंता  बीमारी  की चोटें ज्यादा नहीं लगतीं। प्रेम ईश्वर से करे एवं इच्छा संसार की रखे अथवा प्रेम संसार से करे एवं इच्छा ईश्वर की रखे ऐसा मनुष्य उलझ जाता है परंतु जो बुद्धिमान है वह ईश्वर-प्राप्ति की इच्छा से ही ईश्वर को प्रेम करता है। उसकी सांसारिक परिस्थितियाँ प्रारब्धवेग से चलती रहती हैं। लोकदृष्टि से सब प्रवृत्तियाँ करते हुए भी उसकी गौण एवं मुख्य दोनों वृत्तियाँ ईश्वर में ही रहती हैं। वह ईश्वर को ही प्रेम करता है एवं ईश्वर को ही चाहता है। ईश्वर नित्य है अतः उसे विनाश का भय नहीं होता। ईश्वर सदा अपने आत्मरूप है अतः उस विवेकी को वियोग का संदेह भी नहीं रहता। अतः आप भी ईश्वर की इच्छा करें एवं ईश्वर से ही प्रेम करें, इससे भय एवं संदेह निश्चिंतता एवं शुद्ध प्रेम में परिणत हो जायेंगे।

जैसे हाथी के पानी में गिरने पर क्षोभ के कारण पानी उछलता है, जैसे बाण से बिंधा हुआ हिरण मार्ग में गति करने लगते हैं। सब वाहिनियाँ  कफ-पित्तादि दोषों से भर जाने के कारण विषमता को प्राप्त होती हैं। प्राणों के द्वारा नाड़ीतंत्र के क्षुब्ध होने पर कई वाहिनियाँ  अन्न-रस से पूरी भर जाती हैं तो कई वाहिनियाँ  बिल्कुल खाली रह जाती हैं। प्राण की गति बदल जाने से या तो अन्न-रस बिगड़ जाता है या अन्न न पचने के कारण अजीर्ण हो जाता है अथवा अन्न-रस अत्यंत जीर्ण हो जाता है, सूख जाता है जिससे शरीर में विकार उत्पन्न होता है।

जैसे नदी का प्रवाह लकड़ी, तिनखों आदि को सागर की ओर ले जाता है वैसे ही प्राणवायु खाये गये आहार को रसरूप बनाकर भीतर अपने-अपने स्थानों में पहुँचा देती है। परंतु जो अन्न प्राणवायु की विषमता के कारण शरीर के भीतरी भाग में कहीं अटक जाता है वह स्वाभाविक रूप से कफ आदि धातुओं को बिगाड़कर बीमारी याँ उत्पन्न करता है।

इस प्रकार चिंता  से बीमारी याँ उत्पन्न होती हैं और चिंता  के मिट जाने पर बीमारीयाँ भी नष्ट हो जाती हैं।

 

जैसे हरड़े स्वभाव से ही जुलाब लगा देती है वैसे मंत्रादि के उच्चारण से, आरोग्य-मंत्र का श्रद्धा पूर्वक जप करने से चिंता -बीमारी याँ नष्ट हो जाती हैं। जैसे कसौटी पर कसने से स्वर्ण अपनी निर्मलता प्रगट कर देता है वैसे ही शुभकर्म या पुण्यकर्म करने से तथा सत्पुरुषों की सेवा करने से चित्त निर्मल हो जाता है। जैसे पूर्ण चंद्र का उदय होने से जगत में प्रकाश बढ़ता है वैसे ही चित्त शुद्ध होने से आरोग्य एवं आनंद बढ़ने लगता है। चित्त के शुद्ध रहने से प्राणवायु अपने क्रमानुसार ही संचार करती है एवं आहार को ठीक से पचा देती है जिससे नष्ट होती है।"

हमें यही दृष्टिगोचर होता है कि हम बाह्य उपचारों में ही अपने समय-शक्ति का ह्रास कर देते हैं फिर भी बीमारी यों से निवृत्त होकर आनंद एवं शांति प्राप्त नहीं कर पाते। जबकि चित्तशुद्धि के मार्ग से बीमारीयों के दूर होने पर आनंद एवं शांति प्राप्त होती है। देश के लोग यदि  इन उपायों को अमल में लायें तो कितनी श्रम-शक्ति बच जाय एवं मनुष्य आरोग्य एवं दीर्घायु प्राप्त कर सके !


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गुरुवार, 30 मई 2024

मन

 






आजमुझे किसीने पूछा की “मन मेरा बेचैन है में क्या करूँ ?“

मुझे लगा ये तो हर एक इन्सान के प्रश्न है , हर एक के जीवन में कभी कभी आता है , क्यूँ न इस के ऊपर एक लेख लिखा जाए जिसका आधार अपना अनुभव हो, शास्त्रोक्त हो और लाभकारी हो |

ऐसे तो “मन” के ऊपर बहुत सारे ग्रन्थ , रचनाएँ , और विडियो भी हैं | पर वही तथ्य हमें जीवन में असर डालती है, जो हमारे लायक हो अर्थात हमारे समस्या का निदान कर सके | उस प्रश्न कर्ता के साथ आप और हमारे बिच भी एक चर्चा हो जाये और सभी को लाभ भी मिले | इससे अधिक और क्या हो सकता है?

अभी इस विषय को शुरू करते हैं -

मनुष्य मात्र “मन” से परेशान हैं जो इसका उपयोग नहीं जानते, और जो जानते हैं वो मजे में हैं-

मनुष्य का मन एक ऐसी गुत्थी है, जिसे सुलझाना हर किसी के बस की बात नहीं। यह एक ऐसा चमत्कारी उपकरण है जो हमें अनंत संभावनाओं की ओर ले जा सकता है, लेकिन केवल तब जब हम इसे सही तरीके से उपयोग करना जानते हों।

मन की उलझनें और परेशानियाँ

जो लोग मन की शक्ति को नहीं पहचानते, वे अक्सर इसकी उलझनों में फंस जाते हैं। उनके लिए मन एक ऐसा भूलभुलैया बन जाता है, जिसमें वे बार-बार भटकते रहते हैं। नकारात्मक विचार, असंतोष, और अशांति उनके मन के साथी बन जाते हैं।

मन का सही उपयोग

दूसरी ओर, जो लोग मन की शक्ति को समझते हैं और उसका सही उपयोग करते हैं, वे जीवन के हर पल का आनंद उठाते हैं। वे अपने मन को सकारात्मक दिशा में ले जाने का कौशल जानते हैं। उनके लिए मन एक अनमोल खजाना है, जिसकी मदद से वे अपने सपनों को साकार करते हैं।

मन की महत्ता

मनुष्य का मन उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह हमारे विचारों, भावनाओं, और क्रियाओं को नियंत्रित करता है। जब हम इसे सही तरीके से पहचान लेते हैं, तो हम अपने जीवन को एक नई दिशा दे सकते हैं।

निष्कर्ष

अंत में, यह कहा जा सकता है कि मनुष्य का मन उसके जीवन का एक अनमोल रत्न है। जो इसका सही उपयोग जानते हैं, वे जीवन में सफलता और खुशियों की ओर अग्रसर होते हैं, जबकि जो इसे नहीं समझते, वे परेशानियों में उलझे रहते हैं। इसलिए, हमें अपने मन को समझना चाहिए और उसे सही |

मंगलवार, 28 मई 2024

सारा विश्व मेरा अविनाशी स्वरूप का अभीव्यक्ति

        



         सारा विश्व मेरा अविनाशी स्वरूप का अभीव्यक्ति है।  अत्यंत गहन और दार्शनिक है।  उद्धृत वाक्य “सारा विश्व मेरा अविनाशी स्वरूप का अभी व्यक्ति है” यह दर्शाता है कि   एक ऐसे विचार की ओर इशारा कर रहे हैं जो आत्मा और ब्रह्मांड के अविनाशी स्वरूप को समझने की कोशिश करता है। इस विचार को  शब्दों में परिभाषित कर एक विस्तृत विवेचना की मांग करता है, जिसमें आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का समावेश हो।

  इस विषय पर एक संक्षिप्त निबंध प्रस्तुत कर  , जो इस विचार को विस्तार से समझाने का प्रयास करेगा।   यह निबंध एक   विचार का प्रतिबिंब होगा और इसमें विभिन्न दार्शनिक और आध्यात्मिक विचारधाराओं के तत्व शामिल होंगे।

 

    अविनाशी स्वरूप: विश्व का अभिन्न अंग-


        जब हम विश्व को एक अविनाशी स्वरूप के रूप में देखते हैं, तो हम एक ऐसे दृष्टिकोण की ओर अग्रसर होते हैं जो समस्त जीवन को एक अखंड और अटूट शक्ति के रूप में मानता है। यह विचार विभिन्न दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराओं में पाया जाता है, जहाँ ब्रह्मांड को एक चेतना का प्रतिबिंब माना जाता है जो स्वयं में अविनाशी है।


    आध्यात्मिक दृष्टिकोण-


        आध्यात्मिकता में, अविनाशी स्वरूप को अक्सर आत्मा या ब्रह्म के रूप में वर्णित किया जाता है। यह वह शक्ति है जो न तो जन्म लेती है और न ही मृत्यु को प्राप्त होती है; यह निरंतर और अविचल है। इस दृष्टिकोण में, सारा विश्व इस अविनाशी शक्ति का एक व्यक्तित्व है, जो विभिन्न रूपों और आकारों में प्रकट होता है।


    दार्शनिक विचार-


        दार्शनिकों ने भी इस अविनाशी स्वरूप को विभिन्न तरीकों से समझाया है। कुछ ने इसे अनंत चेतना के रूप में देखा है, जबकि अन्य ने इसे विश्व की अंतर्निहित एकता के रूप में माना है। यह विचार कि सभी चीजें एक ही स्रोत से उत्पन्न होती हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाती हैं, विभिन्न दार्शनिक प्रणालियों में प्रमुख है।


    वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य-


        विज्ञान भी इस अविनाशी स्वरूप के विचार को अपने तरीके से समझता है। भौतिकी में, ऊर्जा का संरक्षण का नियम बताता है कि ऊर्जा न तो सृजित की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है; यह केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है। इसी तरह, ब्रह्मांड के अविनाशी स्वरूप को भी एक अनंत चक्र के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ सब कुछ निरंतर परिवर्तनशील है लेकिन फिर भी एक समग्रता में बना रहता है।



        इस प्रकार, अविनाशी स्वरूप का विचार हमें एक ऐसे दृष्टिकोण की ओर ले जाता है जो जीवन और ब्रह्मांड की एकता को स्वीकार करता है। यह हमें यह समझने की ओर प्रेरित करता है कि हम सभी एक ही अविनाशी शक्ति के अभिन्न अंग हैं, जो विभिन्न रूपों में प्रकट होती है और जिसका अस्तित्व सदैव बना रहता है।





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गुरुवार, 23 मई 2024

मनुष्य जन्म का उद्देश्य क्या है?

 




       भारत देश के ऋषियों ने जो अदभुत खोजें की हैं, वैसी खोजें विश्व में कहीं भी नहीं हुई हैं। मनुष्य का स्वभाव तीन गुणों के प्रभाव से संचालित होता है। उनमें से रजो-तमोगुण मनुष्य को अत्यंत दुःखद अनुभव करवाकर उसके वर्तमान जीवन को निकृष्ट बना देता है और फिर वृक्ष, पशु, पक्षी जैसी तुच्छ योनियों में ले जाता है। सत्त्वगुण वर्तमान जीवन को दिव्य बनाता है और स्वर्ग एवं ब्रह्मलोक आदि उच्च लोकों में पहुँचाता है। इसमें भी यदि ब्रह्मवेत्ताओं का प्रत्यक्ष सान्निध्य एवं सत्संग मिले तो तीनो गुणों से पार अपने असली आनंदधन आत्मा को जानकर जीव जीवन्मुक्त हो सकता है।


        चलो, अब रजो-तमोगुण के कुप्रभाव एवं सत्त्वगुण के सुप्रभाव को निहारें।

        तमोगुणी मानव वर्ग आलसी-प्रमादी होकर, गंदे विषय-विकारों का मन में संग्रह करके बैठे-बैठे या सोते-सोते भी इन्द्रियभोग के स्वप्न देखता रहता है। यदि कभी कर्मपरायण हों तो भी यह वर्ग हिंसा, द्वेष, मोह जैसे देहधर्म के कर्म में ही प्रवृत्त रहकर बंधनों में बँधता जाता है। मलिन आहार, अशुद्ध विचार और दुष्ट आचार का सेवन करते-करते तमोगुणी मानव पुतले को आलसी-प्रमादी रहते हुए ही देहभोग की भूख मिटाने की जितनी आवश्यकता होती है उतना ही कर्मपरायण रहने का उसका मन होता है।

        रजोगुणी मनुष्य प्रमादी नहीं, प्रवृत्तिपरायण होता है। उसकी कर्मपरंपरा की पृष्ठभूमि में आंतरिक हेतु रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, दंभ आदि सब भरा हुआ होता है। सत्ताधिकार की तीव्र लालसा और देहरक्षा के ही कर्म-विकर्मों के कंटकवृक्ष उसकी मनोभूमि में उगकर फूलते-फलते हैं। उसके लोभ की सीमा बढ़-बढ़कर रक्त-संबंधियों तक पहुँचती हैं। कभी उससे आगे बढ़कर जहाँ मान मिलता हो, वाहवाही या धन्यवाद की वर्षा होती है, ऐसे प्रसंगों में वह थोड़ा खर्च कर लेता है। ऐसे रजोगुणी मनुष्य का मन भी बहिर्मुख ही कहलाता है। ऐसा मन बड़प्पन के पीछे पागल होता है। उसका मन विषय-विलास की वस्तुओं को एकत्रित करने में लिप्त होकर अर्थ-संचय एवं विषय-संचय करने के खेल ही खेलता रहता है।

        इन दोनों ही वर्गों के मनुष्यों का मन स्वच्छंदी, स्वार्थी, सत्ताप्रिय, अर्थप्रिय और मान चाहने वाला होता है और कभी-कभार छल-प्रपंच के समक्ष उसके अनुसार टक्कर लेने में भी सक्षम होने की योग्यता रखता है। ऐसे मन की दिशा इन्द्रियों के प्रति, इन्द्रियों के विषयों के प्रति और विषय भोगों के प्रति निवृत्त न होने पर भोगप्राप्ति के नित्य नवीन कर्मों को करने की योजना में प्रवृत्त हो जाती है। ऐसा मन विचार करके बुद्धि को शुद्ध नहीं करता अपितु बुद्धि को रजोगुण से रँगकर, अपनी वासनानुसार उसकी स्वीकृति लेकर - 'मैं जो करता हूँ वह ठीक ही करता हूँ' ऐसी दंभयुक्त मान्यता खड़ी कर देता है।

        ऐसे आसुरी भाव से आक्रान्त लोगों का अनुकरण आप मत करना। राजसी व्यक्तियों के रजोगुण से अनेक प्रकार की वासनाएँ उत्पन्न होती हैं अतः हे भाई ! सावधान रहना। रजो-तमोगुण की प्रधानता से ही समस्त पाप पनपते हैं। जैसे हँसिया, चाकू, छुरी, तलवार आदि भिन्न-भिन्न होते हुए भी उनकी धातु लोहा एक ही है ऐसे ही पाप के नाम भिन्न-भिन्न होने पर भी पाप की जड़ रजो-तमोगुण ही है।

        संसार में बहुमत ऐसे वर्ग का ही है। ऐसा वर्ग प्रवृत्तिपरायण कहलाता है। इसके कर्म में मोक्षबुद्धि नहीं होती। अतः यदि इस वर्ग को स्वतंत्र रूप से व्यवहार करने दें तो समाज में ऐसी अव्यवस्था उठ खड़ी होती है जिसके फलस्वरूप सर्वत्र स्वार्थ और दंभरूपी बादल छा जाते हैं, कपट एवं प्रपंच की आँधी चलने लगती है तथा सर्वत्र दुःख और विपत्तियों के प्रहार होने से प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार उठती है। ये दो वर्ग ही यदि परस्पर टकराने लगे तो हिंसा, द्वेष, स्वार्थ और भोगबुद्धि के कर्मों में ही प्रजा लिप्त रहने लगती है और युद्ध की नौबत आ जाती है। प्रत्येक युग एवं प्रत्येक देश में ऐसे ही संहार होता रहता है।

        ह उन्नति का मार्ग नहीं है। अवनति की ओर जाते मानव के लिए आत्मोन्नति के आनंद की ओर चलने के लिए बुद्धि के शोधन की, उसकी विचार शक्ति में विवेक के सूर्य का उदय करने की आवश्यकता है। मन एवं इन्द्रियों को विषयों के स्मरण, चिन्तन, प्राप्ति एवं भोग की जन्म-जन्मांतरों की जो आदत पड़ी हुई है, उनमें असारता का दर्शन होने पर मन उनसे विमुख होता है तब बुद्धि को अपने से भी परे आत्मा की ओर अभिमुख होने की रूचि एवं जिज्ञासा होती है, आत्सरस पीने का सौभाग्य प्राप्त होता है, संसार की मायाजाल से बचने का बल मिलता है।

        जब बुद्धि को आत्मनिरीक्षण के लिए विचार करने की भोगमुक्त दशा प्राप्त होती है तब वह प्रत्येक कर्म में विवेक का उपयोग करती है। उस वक्त उसके अन्तःकरण में आत्मा का कुछ प्रकाश पड़ता है, जिससे विषयों का अंधकार कुछ अंश में क्षीण होता है। यह है नीचे से ऊपर जाने वाला तीसरा, आंतर में से प्रकट होने वाला स्वयंभू सुख की लालसावाला, बुद्धि के स्वयं के प्रकाश का भोक्ता – सत्त्वगुण। इस सत्त्वगुण की प्रकाशमय स्थिति के कारण बुद्धि का शोधन होता है। कर्म-अकर्म, धर्म अधर्म, नीति-अनीति, सार-असार, नित्य-अनित्य वगैरह को समझकर अलग करने एवं धर्म, नीति, सदाचार तथा नित्य वस्तु के प्रति चित्त की सहज स्वाभाविक अभिरूचि करने की शक्ति इसी से संप्राप्त होती है।

        एक ओर मानवीय जीवन के आंतर प्रदेश में आत्मा (आनंदमय कोष) एवं बुद्धि (विज्ञानमय कोष) है तो दूसरी ओर प्राण (प्राणमय कोष) तथा शरीर (अन्नमय कोष) है। इन दोनों के बीच मन (मनोमय कोष) है। वह जब बहिर्मुख बनता है तब प्राण तथा शरीर द्वारा इन्द्रियाँ विषय-भोगों में लिप्त होकर वैसे ही धर्म-कर्म में प्रवृत्त रहती हैं। यही है मानवीय जीवन की तामसिक एवं राजसिक अवस्था की चक्राकार गति।

        परंतु उसी मन (मनोमय कोष) को ऊर्ध्वमुख, अंतर्मुख अथवा आत्माभिमुख करना – यही है मानव जीवन का परम कल्याणकारी लक्ष्य। ऋषियों में परम आनंदमय आत्मा को ही लक्ष्य माना है क्योंकि मनुष्य के जीवनकाल की मीमांसाकरने पर यह बात स्पष्ट होती है कि उसकी सब भाग दौड़ होती है सुख के लिए, नित्य सुख के लिए। नित्य एवं निरावधि सुख की निरंतर आकांक्षा होने के बावजूद भी वह रजो-तमोगुण एवं इन्द्रियलोलुपता के अधीन होकर हमेशा बहिर्मुख ही रहता है। उसकी समस्त क्रियाएँ विषयप्राप्ति के लिए ही होती हैं। उसकी जीवन-संपदा, शारीरिक बल, संकल्पशक्ति आदि का जो भी उसका सर्वस्व माना जाता है वह सब जन्म मृत्यु के बीच में ही व्यर्थ नष्ट हो जाता है।

        परंतु उसी मन(अंतःकरण) पर यदि सत्त्वगुण का प्रकाश पड़े तो उसे स्वधर्म-स्वर्म की, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की सूक्ष्म छानबीन करने का सूझता है। सुख-दुःख के द्वन्द्व में उसे नित्य सुख की दिशा सूझती है। दुराचार के तूफानी भँवर में से उसे शांत, गंभीर सत्त्वगुणी गंगा के प्रवाह में अवगाहन करने की समझ आने लगती है। विचार-सदविचार की कुशलता आती है। विचार, इच्छा, कर्म आदि में शुभ को पहचानने की सूझबूझ बढ़ती है। जिससे शुभेच्छा, शुभ विचार एवं शुभकर्म होने लगते हैं।

        जन्म मरण जैसे द्वन्द्वों के स्वरूप अर्थात् संसार-चक्र एवं कर्म के रहस्य को समझाते हुए एवं उसी को अशुभ बताते हुए गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।

तरो कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।

'वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभांति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात् कर्मबन्धन से मुक्त हो जाएगा।'

(गीताः 4.16)


            धर्म के, पुण्य के नाम अलग-अलग हैं किन्तु उनका मूल है सत्त्व। सत्त्वगुणरूपी जड़ का सिंचन होने से जो विशाल वृक्ष होता है उसमें मीठे फल लगते हैं। वे ही फल आंतरिक सुख, स्वतंत्र सुख, मुक्तिदायी सुख का मार्ग खोल देते हैं। यह जीव गुणों के थपेड़े से बचकर ही अपने गुणातीत स्वरूप में स्थिर हो सकता है एवं आत्म-साक्षात्कार कर सकता है। जिसके ध्यान से ब्रह्माजी, भगवान विष्णु एवं साम्बसदाशिव भी सामर्थ्य एवं अनोखा आनंद पाते हैं उसी चैतन्यस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिए आपका जन्म हुआ है इसका निरंतर स्मरण रखना।






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बुधवार, 15 मई 2024

बुधवारी अष्टमी - BUDHVARI ASHTAMI





 बुधवारी अष्टमी को किये गए जप, तप, मौन, दान व ध्यान का फल अक्षय होता है ।

मंत्र जप एवं शुभ संकल्प हेतु विशेष तिथि -

 – ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं। इनमें किया गया जप-ध्यान, स्नान , दान व श्राद्ध अक्षय होता है ।

(शिव पुराण, विद्यश्वर संहिताः अध्याय 10)



बुध अष्टमी व्रत की प्रक्रिया:-

इस दिन, भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं | और गंगाजल मिश्रित जल से निवृत्त होकर दैनिक पूजा संपन्न करते हैं। एक कलश में गंगाजल भरकर चौकी पर रखा जाता है और गणेशजी, शिवजी, मां पार्वती का आह्वान करते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है। बुध ग्रह की मूर्ति या चित्र स्थापित करके उसका पूजन किया जाता है। विभिन्न रंगों के पुष्पों और पांच प्रकार के हरे पत्ते, जैसे आम, अशोक, पीपल, बड़, केले और दूर्वा के साथ पूजन किया जाता है। बुध को मूंग के दाल के पकवानों का भोग लगाया जाता है और बुध के मंत्र 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:' की एक माला जाप की जाती है।




 बुध अष्टमी का महत्व-


बुध अष्टमी का महत्व और इसकी पूजा की प्रक्रिया हिंदू धर्म में बहुत गहराई से निहित है। यह व्रत और पूजा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह व्यक्तिगत और आध्यात्मिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है।


आध्यात्मिक महत्व:-

बुध अष्टमी का व्रत और पूजा आध्यात्मिक शुद्धि और संतुलन के लिए की जाती है। यह व्यक्ति को उसके जीवन में आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने में मदद करती है।


ज्योतिषीय महत्व:-

ज्योतिष के अनुसार, बुध ग्रह बुद्धि, संचार, व्यापार, वाणी और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है। बुध अष्टमी का व्रत रखने से बुध ग्रह के दोषों का निवारण होता है और इससे जुड़े जीवन के क्षेत्रों में सुधार होता है।


सामाजिक महत्व:-

बुध अष्टमी का व्रत समाज में एकता और सामूहिक भावना को बढ़ावा देता है। इस दिन लोग सामूहिक रूप से पूजा और अनुष्ठान करते हैं, जिससे समाज में सामंजस्य और शांति की भावना बढ़ती है।


पारिवारिक महत्व:-

बुध अष्टमी के दिन परिवार के सदस्य एक साथ आते हैं और पूजा में भाग लेते हैं। यह परिवार के बीच संबंधों को मजबूत करता है और पारिवारिक सद्भाव को बढ़ाता है।


स्वास्थ्य महत्व:-

व्रत रखने से शारीरिक और मानसिक शुद्धि होती है। यह शरीर को आराम देने और आंतरिक शक्ति को बढ़ाने का एक अवसर प्रदान करता है।


इस प्रकार, बुध अष्टमी का महत्व विभिन्न पहलुओं में देखा जा सकता है और यह हमारे जीवन में एक सकारात्मक और संतुलित प्रभाव डालता है। यह व्रत और पूजा हमें आत्मिक शांति और संतोष की ओर ले जाती है और हमारे जीवन को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करती है।

बुध अष्टमी का वैज्ञानिक विश्लेषण -

बुध अष्टमी, जिसे हिंदू धर्म में बुधवार को पड़ने वाली अष्टमी तिथि के रूप में मनाया जाता है, इसका वैज्ञानिक विश्लेषण करने पर हमें इसके धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व के साथ-साथ इसके मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभावों को भी समझने का अवसर मिलता है।


ज्योतिषीय दृष्टिकोण:-

ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को बुद्धि, संचार, व्यापार, वाणी और शिक्षा का कारक माना जाता है। बुध अष्टमी के दिन विशेष पूजा और व्रत करने से माना जाता है कि बुध ग्रह के दोषों का निवारण होता है और इससे जुड़े जीवन के क्षेत्रों में सुधार होता है।


मनोवैज्ञानिक पहलू:-

व्रत और पूजा की प्रक्रिया में शामिल ध्यान और मंत्रोच्चारण से मन की एकाग्रता और शांति मिलती है। यह तनाव को कम करने और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक होता है।


सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव:-

बुध अष्टमी के दिन समाज में एकता और सामूहिकता की भावना को बढ़ावा मिलता है। लोग एक साथ आकर पूजा करते हैं, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं और सामाजिक सद्भाव बढ़ता है।


स्वास्थ्य संबंधी लाभ:-

व्रत रखने से शरीर को आराम मिलता है और पाचन तंत्र को सुधारने में मदद मिलती है। यह शरीर को डिटॉक्सीफाई करने और ऊर्जा के स्तर को बढ़ाने में भी सहायक होता है।


इस प्रकार, बुध अष्टमी का वैज्ञानिक विश्लेषण हमें इसके विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करता है और यह दिखाता है कि कैसे प्राचीन परंपराएं और अनुष्ठान आधुनिक जीवन में भी प्रासंगिक और लाभकारी हो सकते हैं।




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शनिवार, 11 मई 2024

सत्संग


सत्संग का अर्थ है 'सत्य की संगति' या यूं कहें की जो नश्वर संसार है उसके बदले जो अविनाशी तत्व है उस का संग। यह भारतीय दर्शन में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो आत्मिक उन्नति और दुखों से मुक्ति के लिए आवश्यक मानी जाती है। दुःख होता क्यों है? क्यों की, जो भी साथ है उस चीज वस्तु और सम्मंधो का छूटने का भय। और संसार की नियम यह है की, जो मिली हुई चीज है वह एक दिन छूटेगा ही। जो जन्म लिया है वो मरेगा भी। इस लिए जो कभी न छूटे वह है ईश्वर, किसी भी प्रकार उस का संग होना ही सत्संग है।

सत्संग का महत्व 
सत्संग का महत्व इस बात में है कि यह हमें सकारात्मक ऊर्जा और विचारों से भर देता है। जब हम अच्छे लोगों के साथ होते हैं, तो हमारे अंदर भी अच्छाई की भावना जागृत होती है। सत्संग में बैठकर, हम जीवन के उच्च आदर्शों और मूल्यों को समझ सकते हैं और उन्हें अपने जीवन में उतार सकते हैं।
दुखों से मुक्ति
दुखों से मुक्ति का मार्ग अक्सर आत्म-ज्ञान और आत्म-सुधार से होकर जाता है। सत्संग हमें इस दिशा में ले जाने में मदद करता है। जब हम अपने आपको अच्छे और सकारात्मक विचारों से घेरते हैं, तो हमारे अंदर के दुख और नकारात्मकता कम होने लगती है।
आत्मिक उन्नति
आत्मिक उन्नति के लिए सत्संग एक ऐसा माध्यम है जो हमें अपने आत्मा की गहराइयों से जोड़ता है। यह हमें अपने अंदर की शक्तियों को पहचानने और उन्हें विकसित करने का अवसर देता है।

सत्संग की उपस्थिति में जीवन
सत्संग की उपस्थिति में जीवन अधिक सार्थक और उद्देश्यपूर्ण हो जाता है। यह हमें जीवन के उच्च लक्ष्यों की ओर ले जाता है और हमें एक बेहतर इंसान बनाता है।
निष्कर्ष
सत्संग के माध्यम से हम अपने जीवन को एक नई दिशा और नई ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं। यह हमें न केवल दुखों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि हमें आत्मिक उन्नति की ओर भी ले जाता है। इसलिए, सत्संग को जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिए।

सत्संग के फायदे 
सत्संग के अनेक फायदे हैं, जो व्यक्ति के जीवन को सकारात्मक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाते हैं। यहाँ कुछ मुख्य फायदे दिए गए हैं:
1. चेतना में परिवर्तन:
 सत्संग में बैठने से व्यक्ति की चेतना में सकारात्मक परिवर्तन होता है, जिससे उत्साह और स्फूर्ति का अनुभव होता है।
2. भक्ति और आध्यात्मिक विकास: 
सत्संग के माध्यम से भक्ति और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा मिलता है, जिससे व्यक्ति अधिक भक्तिमय और आध्यात्मिक रूप से जागरूक होता है।
3. मानसिक शांति: 
सत्संग से मानसिक शांति मिलती है और व्यक्ति अपने जीवन में अधिक संतुलित और शांत रह पाता है।
4. सामाजिक संबंधों में सुधार: 
सत्संग के द्वारा व्यक्ति समाज में अच्छे संबंध बना पाता है और समाज के प्रति अधिक जागरूक होता है।
5. आत्म-सुधार:
 सत्संग से व्यक्ति आत्म-सुधार की ओर अग्रसर होता है। अपने अंदर झांकता है। अपने सद्गुण को बढ़ाता है और दुर्गुणों को नाश कर । परम सत्य की और अग्रसर होता है।
6. विवेक का विकास: 
सत्संग से विवेक जाग्रत होता है, जिससे व्यक्ति अच्छे और बुरे का भेद समझ पाता है और जीवन में सही निर्णय ले पाता है।
7. आत्म-ज्ञान: 
सत्संग से आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे व्यक्ति अपने असली स्वरूप को पहचान पाता है।
8. संसार के मोह से मुक्ति: 
सत्संग के माध्यम से व्यक्ति संसार के मोह-माया से दूर होकर आध्यात्मिक जीवन की ओर अग्रसर होता है।
9. साधना में सहायता: 
सत्संग से प्राप्त सात्त्विकता साधना में सहायक होती है और व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।
10. आनंद का अनुभव:
 सत्संग से व्यक्ति आनंदित रहता है और जीवन को पूर्णता से जी पाता है।
11. पापों का नाश: 
सत्संग से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और वह अधिक नैतिक और धार्मिक जीवन जी पाता है।
12. मानसिक समस्याओं की चिकित्सा
सत्संग मानसिक समस्याओं की चिकित्सा का कार्य करता है, जिससे व्यक्ति के मन में शांति और संतोष का अनुभव होता है।

ये लाभ व्यक्ति को एक संतुलित, सार्थक और आनंदमय जीवन जीने में सहायता करते हैं। सत्संग के इन लाभों को अपने जीवन में उतारकर व्यक्ति अपने आपको और अपने समाज को उत्थान की ओर ले जा सकता है।

सत्संग के विभिन्न प्रकार 

1. सतसंगति:
 इस प्रकार का सत्संग उस सभा या समूह की संगति है जहाँ परम सत्य की चर्चा होती है, जैसे कि ध्यान, प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन, और उनके अर्थों पर चर्चा¹।
2. गुरु की संगति
 यह सत्संग गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक के साथ होता है, जहाँ व्यक्ति गुरु से ज्ञान और मार्गदर्शन प्राप्त करता है।
3. सदाचारी व्यक्तियों की संगति
यह सत्संग उन व्यक्तियों के साथ होता है जो सत्य को सुनते, बोलते और आत्मसात करते हैं¹।
4. भक्ति और ज्ञान की संगति
इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और सदाचार का वर्णन करने वाले शास्त्रों का अध्ययन और मनन शामिल है।
5. कीर्तन और प्रवचन
धार्मिक कीर्तन, प्रवचन, या आध्यात्मिक ग्रंथों का वाचन भी सत्संग का एक रूप है।
6. तीर्थ और देवालय:
 तीर्थस्थानों में निवास या देवालयों में जाना भी सत्संग का ही एक भाग माना जाता है⁴।
7. भगवान के प्रेमी भक्तों का संग:
 यह सत्संग उन भक्तों के साथ होता है जो परमात्मा के प्रति अगाध प्रेम रखते हैं और उनकी भक्ति में लीन रहते हैं।
8. जीवनमुक्त पुरुषों का संग
इस प्रकार का सत्संग उन जीवनमुक्त संतों के साथ होता है जो आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके हैं और अपने ज्ञान को दूसरों तक पहुँचाते हैं।
9. दुखी होने पर प्रभु का स्मरण:
 जब व्यक्ति दुखी होता है और प्रभु का स्मरण करता है, जैसे कि द्रौपदी और गजेंद्र ने किया था, वह भी सत्संग का ही एक रूप है।
10. शास्त्रों का स्वाध्याय:
 भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और सदाचार का वर्णन करने वाले शास्त्रों का अध्ययन और मनन भी सत्संग का ही एक भाग है।

इन सभी प्रकारों का अपना-अपना महत्व है और ये सभी व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाने में सहायक होते हैं। सत्संग के इन प्रकारों के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को अधिक सार्थक और आनंदमय बना सकता है।

शुक्रवार, 10 मई 2024

निर्गुण-निराकार परमात्मा का दर्शन





संत कबीर से किसी ने पूछाः

“हम निर्गुण-निराकार परमात्मा को तो नहीं देख सकते, फिर भी देखे बिना न रह जायें ऐसा कोई उपाय बताइये।”

कबीर जी ने कहाः

अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह।

लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह।।




    “परमात्मा को देखने के लिए ये चर्मचक्षु काम नहीं आते। फिर भी यदि तुम परमात्मा को देखना ही चाहते हो तो जिनके हृदय में परमात्माकार वृत्ति प्रकट हुई है, जिनके हृदय में समतारूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, जिनके हृदय में अद्वैतज्ञानरूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, ऐसे हृदय वाले किन्हीं महापुरुष को तुम देख सकते हो। उनको देखते ही तुम्हें परमात्मा की याद आ जायेगी। जिनके दिलों में ईश्वर निरावरण हुआ है, ऐसे संत-महापुरुषों को तुम देख सकते हो।”

साधु का ही देह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें तुम उस अलख पुरुष परमात्मा के दर्शन कर सकते हो। अतः यदि अलख पुरुष को देखना चाहते हो तो ऐसे किन्हीं परमात्मा के प्यारे संतों के दर्शन करने चाहिए।




शुद्ध हृदय से, ईमानदारी से उन महापुरुषों का चिंतन करके हृदय को धन्यवाद से भरते जाओगे तो तुम्हारे हृदय में परमात्मा प्रकट होने में देर नहीं लगेगी। परमात्म-प्राप्ति इतनी सरल होने पर भी लोग उसका फायदा तो नहीं उठाते हैं, वरन् संतों के बाह्य व्यवहार को देखकर अपनी क्षुद्र मति से उन्हें तौलने लगते हैं और अपनी ही हानि कर बैठते हैं।

धन्य है ऐसे शिष्यों को कि जो अलख पुरुष की आरसी के समान ब्रह्मवेत्ता संतों को श्रद्धा-भक्ति से निहारते हैं और उनके साथ अंत तक निभा पाते हैं। वे धनभागी हैं जो निंदा अथवा कुप्रचार के शिकार होकर अपनी शांति का घात नहीं करते। उन्हीं के लिए यह कथन फलित होता हैः

अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह। लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह।।

ईश्वर प्राप्ति ही अक्षय है

"ईश्वर प्राप्ति ही अक्षय है, अन्य जो कुछ भी प्राप्त होगा सब कुछ क्षय है" यह एक प्राचीन भारतीय कहावत है जो धार्मिक और आध्यात्मिक तत्त्वों को व्यक्त करती है। इस कथन का अर्थ है कि ईश्वर का अनुभव करना ही अटल है, जबकि अन्य सारी वस्तुएं अनित्य हैं। 

धार्मिक दृष्टिकोण से, ईश्वर की प्राप्ति को सबसे उच्च ध्येय माना जाता है। यह एक ऊँचे स्तर की साधना है जो आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाती है। इस प्रकार, जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य ईश्वर का अनुभव होता है। इसमें कोई विनाश नहीं है और यह एक अविनाशी स्थिति है।

यहां एक व्यक्ति को सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर भी अर्थ मिलता है। अनित्यता के संदर्भ में, संबंधों, संपत्ति और संप्रदाय आदि सभी वस्तुओं की क्षय होती है। जीवन में विभिन्न प्रकार की संघर्ष और संघर्षों के बावजूद, ये सब अनित्य हैं और अंततः नष्ट हो जाते हैं। इसके बावजूद, विश्वासी व्यक्ति अपने जीवन को धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित करता है, जिससे वह अविनाशीता की ओर बढ़ता है।

इसके अतिरिक्त, यह कथन जीवन की अनित्यता और व्यक्तिगत सुख-दुःख के महत्व को भी समझाता है। अनित्यता का अनुभव करने के बाद, व्यक्ति समझता है कि सभी सुख और दुःख अस्थायी हैं। इसलिए, अपने जीवन को एक समय के लिए ही नहीं, बल्कि एक अध्यात्मिक समृद्धि के लिए भी समर्पित करना चाहिए। 

धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं में, अनंतता का अनुभव केवल ईश्वरीय सम्बन्ध के माध्यम से होता है। यह अंततः एक अविनाशी अनुभव है, जो संसारिक माया के प्रभाव से परे होता है। 

समाज में, यह विचार लोगों को अपने वास्तविक स्वार्थों के परे उच्चतम ध्येय की ओर प्रोत्साहित करता है। इसका अर्थ है कि संबंध, सम्पत्ति, और स्थिति आदि सभी क्षय हो जाते हैं, लेकिन धार्मिक और आध्यात्मिक समृद्धि अविनाशी है। 

गुरुवार, 9 मई 2024

श्रेष्ठ साधक कैसे बनें ?


         मनुष्य आज इतनी-इतनी परेशानियों, समस्याओं और चिंताओं के बोझ से लदा रहता है कि कहाँ सत्संग सुने ?... कब सत्संग को विचारे ?... किस तरह जीवन में उतारे ?... लेकिन बिना सत्संग, जप, अनुष्ठान, सेवा, स्मरण के जीव की सद्गति सम्भव नहीं है । आज ये विचारणीय प्रश्न हैं कि कैसे उसे सांसारिक झंझटों के बीच परमात्म-शांति की अनुभूति हो ? कैसे वह अपने नित्यकर्म में संलग्न रहकर परमात्मा की आराधना से अंतःकरण को पावन करता रहे ?


यह सत्य है कि हम संसार में रहते हैं इसलिए संसार को छोड़ पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है किंतु यह भी तो उतना ही वजनदार सत्य है कि हमारा अमूल्य मनुष्य-जन्म संसार में उलझकर गँवाने के लिए तो कतई नहीं हुआ है । न जाने कितनी-कितनी माताओं के शरीर से, पिताओं के शरीर से गुजरकर, असहनीय यातनाओं को सह के हमने यह अनमोल मानव-शरीर पाया है । अपने सच्चे नाथ का साक्षात्कार करने का दुर्लभ अवसर पाया है । ऐसे सुखद संयोग के बाद भी हम लापरवाह रहे तो कैसे चलेगा ? जरा तो सोचिये कि परमात्मा को, गुरु को क्या मुँह दिखायेंगे ! अतः मनुष्य-जन्म की सार्थकता इसीमें है कि हम अपने सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार करके जीते-जी मुक्त हो जायें ।


जो परम तत्त्व को उपलब्ध होना चाहते हैं, उनके लिए कुछ युक्तियों से और प्रभु की कृपा से यह सहज हो जायेगा । आप एक श्रेष्ठ, सात्त्विक साधक बननेभर का लक्ष्य बना लें । एक उन्नत, जिज्ञासु साधक बननेभर का संकल्प आपको उस अनुभूति से सम्पदावान बना देगा, जो आपकी अपनी विरासत है । एक श्रेष्ठ साधक में कौन-से गुण होने चाहिए, इस बात को गम्भीरतापूर्वक समझ लें । यदि आप एक श्रेष्ठ साधक बनने का लक्ष्य अपने जीवन में रखते हैं तो आप परम तत्त्व के अधिकारी भी बन सकते हैं क्योंकि शुद्ध, सात्त्विक, श्रद्धासम्पन्न अंतःकरण में परमात्म-माधुर्य और ज्ञान स्फुरित होता है । आप थोड़ा चलेंगे तो ईश्वरीय सत्ता आपकी मदद करेगी, बिल्कुल पक्की बात है । ज्यों-ज्यों आप साधना के पथ पर एक-एक कदम आगे बढ़ाते चलेंगे, त्यों-त्यों आपमें उस आनंदस्वरूप को जानने की उत्सुकता बढ़ती जायेगी । उत्सुकता जब तीव्र होगी, लालसा जोर पकड़ेगी तो फिर आप उस यार (परमात्मा) से कहाँ दूर रह पायेंगे !


सर्वप्रथम परमात्म-सुख पाने का लक्ष्य निर्धारित करें । प्रतिदिन का नियम निश्चित करें । एक बार संकल्प ले लें कि ‘मुझे रोज इतनी मालाएँ करनी हैं । माह में इतने दिन मौन रहना है । इतने महीने में मुझे एक अनुष्ठान करना है । प्रतिदिन इतने समय सत्संग सुनना है । सत्शास्त्रों का मनन-अध्ययन करना है । इतना समय सेवा करनी है और व्यवहारकाल में रहते हुए भी मुझे निरंतर सुमिरन करना है ।’ ऐसे आप अंतर्यामी ईश्वर के साथ अनन्यरूप से जुड़ जायेंगे । आरम्भ में ५ मिनट भगवन्नाम लेना शुरू करो । फिर ६, ७, ८, ११ मिनट का नियम ले लो । ‘मैं जैसा-तैसा हूँ, तुम्हारा हूँ । तुम मेरे अंतरात्मा हो, सर्वव्यापक हो । दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं हो, पराये नहीं हो । मेरे अपने हो मेरे प्रभु ! मैं आपको नहीं जानता हूँ लेकिन आप तो मुझे जानते हो । ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ...’



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बुधवार, 8 मई 2024

ईश्वर की नीति


 




"यह ईश्वरीय विधान है कि मार खाकर भी आदमी को सुधरना पड़ता है। डण्डे खाकर भी सुधरना पड़ता है और अगर मर गये तो नर्कों में जाकर या इतर योनियों में जाकर भी सुधार की प्रक्रिया तो चालू ही रहती है। आगे बढ़ो… आगे बढ़ो… आगे बढ़ो नहीं तो जन्मों और मरो… मरो और जन्मो…..। पुण्य क्या है? पाप क्या है?

 समझो, कोई बालक पाँच साल का है। वह पहली क्लास में है तो पुण्य है। बड़ा होने पर भी फिर-फिर से पहली क्लास में ही रहता है तो वह पाप हो जाता है। जिस अवस्था में तुम आए हो उस अवस्था के अनुरूप उचित व्यवहार करके उन्नत होते हो तो वह पुण्य है। इससे विपरीत करते हो तो तुम दैवी विधान का उल्लंघन करते हो। जिस समय जो शास्त्र-मर्यादा के अनुरूप कर्त्तव्य मिल जाय उस समय वह कर्त्तव्य अनासक्त भाव से ईश्वर की प्रसन्नता के निमित्त किया जाय तो वह पुण्य है। घर में महिला को भोजन बनाना है तो ‘मैं साक्षात मेरे नारायण को खिलाऊँगी‘ ऐसी भावना से बनाओगी तो भोजन बनाना पूजा हो जायगा। झाड़ू लगाना है तो ऐसे चाव से लगाओ और चूहे की नाई घर में भोजन बनाते रहो, कूप-मण्डूक बने रहो। सत्संग भी सुनो, साधना भी करो, जप भी करो, ध्यान भी करो, सेवा भी करो और अपना मकान या घर भी सँभालो। जब छोड़ना पड़े तब पूरे तैयार भी रहो छोड़ने के लिए। 


अपने आत्मदेव को ऐसा सँभालो। किसी वस्तु में, व्यक्ति में, पद में आसक्ति नहीं। सारा कासारा छोड़ना पड़े तो भी तैयार। इसी को बोलते हैं अनासक्ति योग। जीवन में त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। सब कुछ त्यागने की शक्ति होनी चाहिए। जिनके पास त्यागने की शक्ति होती है वे ही वास्तव में भोग सकते हैं। जिसके पास त्यागने की शक्ति नहीं है वह भोग भी नहीं सकता। त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। यश मिल गया तो यश के त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए, धन के त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए, सत्ता का त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। सत्ता भोगने की इच्छा है और सत्ता नहीं मिल रही है तो आदमी कितना दुःखी होता है! सत्ता मिल भी गई दो-पाँच साल के लिए और फिर चली गई। कुर्सी तोडो-पाँच साल की और कराहना जिन्दगी भर। यही है बाहरी सुख का हाल। विकारी सुख तो पाँच मिनट का और झंझट जिन्दगी भर का। सत्ता मिली तो सत्ता छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। दृश्य दिखा तो बार-बार दृश्य देखने की आसक्ति को छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। धन मिला तो धन का सदुपयोग करने के लिए धन छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। यहाँ तक कि अपना शरीर छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। जब मृत्यु आवे तो बैठे नहीं हरे। चलो, मृत्यु आयी तो आयी, हम तो वही हैं चिदघन चैतन्य, चिदाकाश स्वरूप…. सोऽहं… सोऽहम्। 

ऐसे त्यागी को मरने का भी मजा आता है और जीने का भी मजा आता है। पापी आदमी के प्राण नीचे के केंद्रों से निकलते हैं, गुदा, द्वार आदि से। मध्यम आदमी के प्राण नाभि आदि से निकलते हैं। कुछ लोगों के प्राण मुख, आँख, कण्ठ आदि से निकलते हैं। योगेश्वरों के प्राण निरुद्ध होकर तालू से निकलते हैं। आप जप करते हैं, ध्यान करते हैं तो आपके मन और प्राणों को ऊपर के केंद्रों में जीने की आदत पड़ जाती है। प्राण ऊपर के केंद्रों से निकलते हैं तो उन्नत हो जाते हैं। अगर काम-विकार में रहते हैं, भोग-भोगने में और खाने-पीने में रहते हैं और खाए पिए हुए पदार्थ छोड़ने के अंगों में ही आसक्ति है तो फिर वृक्ष आदि की योनि में जाओ जहाँ नीचे से ऊपर की ओर खींचने की प्रवृत्ति होती है। वृक्ष अपना भोग पदार्थ नीचे से उठाकर ऊपर ले जाते हैं। पशु आदि सामने से लेते हैं और पीछे फेंकते हैं। मनुष्य है जो भोग-पदार्थों को ऊपर से लेता है, नीचे को फेंकता है और स्वयं ऊपर उठ जाता है।

 अर्थात भोगों को नीचे गिराकर आप योग करो। आसक्ति को, पुरानी आदत को नीचे छोड़कर आप ऊपर उठो। यह है विधान का आदर। ईश्वरीय विधान चाहता है कि तुम ईश्वरीय स्वभाव में जग जाओ। बार-बार गर्भ में जाकर माताओं को पीड़ा मत दो, अपने को पीड़ा मत दो, समाज को पीड़ा मत दो। मुक्त हो जाओ। आपको जो बुद्धि मिली है उसका विकास करो। ईश्वरीय विधान तुमसे यह भी अपेक्षा करता है कि हर परिस्थिति में तुम सम रहने की कोशिश करो। आपमें और ईश्वर में क्या दूरी है, वह जरा खोज लो। आप ईश्वर से मिल लो। कब तक बिछड़े रहोगे? कितना सुंदर है ईश्वरीय विधान! उसमें प्राणिमात्र के हित के सिवाय और कुछ नहीं होता। विधान जितना-जितना व्यापक होता है उतना-उतना बहुजन हिताय होता है। 

अपने भाग्य के हम आप विधाता होते हैं। रेल की पटरियाँ बनीं, फिर रेल का भाग्य बन गया कि वह दूसरी जगह नहीं जा सकती। पटरियाँ उसका भाग्य हैं, गति कम या ज्यादा होना यह उसका पुरुषार्थ है। पटरियाँ जब बन रही थीं तब चाहे जिधर की बना सकते थे। पूर्व के जो संबंध आपने बना लिये, जो मान्यताएँ बना लीं, वे पटरियाँ आपने ही तो डाली। अब नयी जगह पर दूसरी पटरियाँ भी डाल सकते हो और पुरानी पटरियों का सदुपयोग भी कर सकते हो। “क्या करें महाराजश्री! अपने भाग्य में लिखा हो तभी संतों के द्वार जा सकते हैं।“ बात ठीक है। संतों के द्वार तक जाने की पटरियाँ तो बन गई हैं लेकिन कितनी गति से जाना यह आपके हाथ की बात है। पटरियाँ तो फिट हो गई हैं। अपनी जीवन की गाड़ी उस पर चलाते हो कि नहीं, यह भी देखना पड़ेगा। आपके आज का कर्म कल का प्रारब्ध बन जाता है। कल का अजीर्ण आज के उपवास से ठीक हो जाता है। कल का कर्जा आज चुका देने से मिट जाता है। कल की कमाई आज के भोग-विलास से नष्ट भी हो जाती है। मनुष्य के जीवन में उसके कर्मों के अनुसार उतार-चढ़ाव आते हैं। इसलिए दैवी विधान को दृष्टि समक्ष रखकर कर्म किए जाते हैं तो मजा आता है। पुरुषार्थ के साथ साथ दैवी विधान को भी ध्यान में रखना चाहिए।

 बड़ा आदमी वह होता है जो समय और परिस्थिति के अनुसार अपने आप को बदल लेता है। यदि परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदलता है, तो परिस्थितियाँ उसे बदल डालती हैं। जो अदान-प्रदान करता है, उसकी मूल्यवान निगाह का ध्यान रखता है, जिसके संपर्क में आता है, उसके संपर्क में आता है, उसका मनोबल वृद्धि करता है, उसकी प्रार्थना सुनता है, उसके कल्याण में तत्पर होता है, उसके निराशा दूर करता है, उसका भविष्य के नियम को बनाने वाला होता है। 

इसलिए ध्यान में रखिए कि आप क्या कर रहे हैं, आप क्या चाहते हैं, आपके मन का स्वास्थ्य कैसा है, क्या आप संतुष्ट हैं, क्या आप पूर्णता के साथ काम कर रहे हैं, क्या आप ईश्वर के साथ एकत्र जा रहे हैं, क्या आप परिस्थितियों का सामना कैसे कर रहे हैं, क्या आप उनसे डरते हैं, या स्वीकार कर रहे हैं, क्या आपके अधिकारी स्वयं से प्यार करते हैं, या उनकी उपाधियों को, आपके बाजु में आपके पुत्र, या आप उनके बाजु में, क्या आप विश्वासघात कर रहे हैं, या आप विश्वासघात के लिए तैयार हैं, क्या आप खुद को अपने परिवार से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, या आप अपने परिवार को अपने से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, आपके कर्म, आपकी सोच, आपके विचार, आपकी भावनाएं, आपकी आचरण, आपका असर और प्रभाव, आपकी सभी प्रकार की प्रतिक्रियाएँ। कैसा योग्य बन रहे हो। जिस योग्यता के लिए प्रयास कर रहे हो। उसके लिए आपका आत्मा आपका साथ दे। यह है दैवी विधान। यह है उन्नति का मार्ग। यह है विश्व की नीति। यह नीति तो ईश्वर की ही नीति है।"



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मंगलवार, 7 मई 2024

मरम्मत करो !



    
        


         एक साधक ने श्री रामकृष्णदेव से पूछा कि : “महाशय, मै इतना प्रभु नाम लेता हूँ, धर्म चर्चा करता हूँ, चिंतन-मनन करता हूँ, फिर भी समय-समय पर मेरे मन में कुभाव क्यों उठते है?”

     श्री रामकृष्णदेव साधक को समझाते हुए बोले : “एक आदमी ने एक कुत्ता पाला था। वह रात-दिन उसी को लेकर मग्न रहता, कभी उसे गोद में लेता तो कभी उसके मुँह में मुँह लगाकर बैठा रहेता था।
    
     उसके इस मूर्खतापूर्ण आचरण को देख एक दिन किसी जानकार व्यक्ति ने उसे यह समझाकर सावधान किया कि कुत्ते का इतना लाड-दुलार नहीं करना चाहिए, आखिर जानवर की ही जात ठहरी, न जाने किस दिन लाड करते समय काट खाए।

    इस बात ने उस आदमी के मन में घर कर लिया। उसने उसी समय कुत्ते को गोद में से फेंक दिया और मन में प्रतिज्ञा कर ली कि अब कभी कुत्ते को गोद में नहीं लेगा। पर भला कुत्ता यह कैसे समझे! वह तो मालिक को देखते ही दौड़कर उसकी गोद पर चढ़ने लगता। आखिर मालिक को कुछ दिनों तक उसे पीट-पीट कर भगाना पड़ा तब कही उसकी यह आदत छूटी।
     तुम लोग भी वास्तव मे ऐसे ही हो। जिस कुत्ते को तुम इतने दीर्घ – काल तक छाती से लगाते आये हो उससे अब अगर तुम छुटकारा पाना भी चाहो तो वह भला तुन्हें इतनी आसानी से कैसे छोड़ सकता है?

    अब से तुम उसका लाड करना छोड़ दो और अगर वह तुम्हारी गोद में चढाने आए तो उसकी अच्छी तरह से मरम्मत करो। ऐसा करने से कुछ ही दिनों के अन्दर तुम उससे पूरी तरह छुटकारा पा जाओगे।”


सेवा तत्वज्ञान की झलक

 



        हां, मैं इस कथन से सहमत हूं कि हमने तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को कितना आत्मसात किया है, वह हमारी सेवा कार्य से झलकता है। तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु हमें जीवन के अर्थ, उद्देश्य और हमारे रिश्ते को ईश्वर से समझने में मदद करते हैं। जब हम इन शिक्षाओं को आत्मसात करते हैं, तो हम दूसरों की सेवा करने के लिए अधिक प्रेरित और सक्षम होते हैं।

हमारे सेवा कार्य से पता चलता है कि हम कितने दयालु, करुणामय और समझदार हैं। यह हमें दूसरों के दर्द और पीड़ा को महसूस करने और उन्हें मदद करने की इच्छा देता है। जब हम दूसरों की सेवा करते हैं, तो हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करने में मदद करते हैं और अपने जीवन को अर्थ और उद्देश्य देते हैं।

बेशक, सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने का एकमात्र तरीका नहीं है। हम अपने विचारों, शब्दों और कार्यों के माध्यम से भी इन शिक्षाओं को प्रतिबिंबित कर सकते हैं। हालांकि, सेवा कार्य एक महत्वपूर्ण तरीका है कि हम दूसरों को दिखा सकते हैं कि हमने क्या सीखा है।

यहां कुछ उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने से जुड़ा हो सकता है:

  • एक व्यक्ति जो तत्वज्ञान को आत्मसात करता है कि सभी जीवन पवित्र है, वह दूसरों के साथ दयालु और करुणामय व्यवहार करेगा।
  • एक व्यक्ति जो सत्संग के माध्यम से दूसरों के अनुभवों से सीखता है, वह दूसरों की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकेगा और उनकी मदद करने के लिए अधिक प्रेरित होगा।
  • एक व्यक्ति जो ईश्वर में विश्वास करता है, वह दूसरों की सेवा को ईश्वर की इच्छा को पूरा करने के रूप में देखेगा।
  • एक व्यक्ति जो गुरु के मार्गदर्शन का पालन करता है, वह दूसरों की सेवा के लिए अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग करने के लिए अधिक इच्छुक होगा।

कुल मिलाकर, मैं मानता हूं कि सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। यह हमें दूसरों को दिखाने का एक तरीका है कि हमने क्या सीखा है और हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करने में मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।