सोमवार, 10 अक्टूबर 2022

सहजावस्था

 




भारत वर्ष संतों की भूमि है | नजाने कितने अपने जीवन ज्योति को जलाकर भावी पीढ़ी के ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग प्रसस्त कर गये हैं | इन में से यह एक प्रसिद्द पंक्ति है की -

“अभी, यहाँ, इसी वक्त जो सुखी नहीं है वो कहीं जाकर, कुछ पा कर, कुछ बन कर सुखी नहीं हो सकता |”
     यह बात कुछ समझ नहीं आता  |  क्यूँ की अपने सारे जीवन करने, पाने, लेने,देने में ही बिता रहे  हैं इसलिए ये बात समझ में नहीं आता | हम सोचते हैं की कुछ करने से सुख मिलेगा | तो करने वालों को देखो क्या वो सुखी हैं ? कर कर के मर रहे हैं | तो क्या करें , कुछ न करें ? नहीं नहीं होनें दें | जैसे एक बालक के अनायास प्रयास होते हैं | भूख लगी है तो स्वास्थ्य अनुकूल  खा लें , नींद आये तो सो ले | परन्तु अगर हम ऐसा चाहिए वेसा चाहिए में लगे रहेंगे तो सुख दुःख में उलझे रहेंगे  सहज जीवन की अनुभूति से बंचित रह जायेंगे |

बस हर काम में अन्दर से सहज रहने की कोशिश करे फिर प्रत्येक काम में आनंद आने लगेगा! ध्यान का अभ्यास इसके लिए अच्छा उपाए है, जब भी समय मिले कुछ देर के लिए आँखे बंद कर आराम से बिना कोई कल्पना किये ध्यान में बैठ जाए !

   भीतर से ठहर जाना ही सहजता है, बाहर भले पूरी तरह व्यस्त हो लेकिन अन्दर से शांत रहे,  जब भीतर से शांत होंगे तो मुश्किल से मुश्किल काम भी आसानी से कर सकते है लेकिन यदि अन्दर से अशांत है तो आसान काम में भी मुश्किल खड़ी कर देते है !
तो सहज जीवन कैसे  जिए - हाँ ये तो काम की बात है | इसके लिए सबसे आसान तरीका ये है | जैसा बनना चाहते हैं उसका संग करें, संग से ही रंग लायेगा | सौभाग्य है की हमारे देश में ऐसे जीवन की एक बहुत बड़ी श्रुंखला है | भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर आदि आदि | चलो … आप सोचेंगे की हम इतने बड़े हो नहीं सकते हैं, तो फिर अभी के हि देख लेते हैं | रामकृष्ण, विवेकानन्द, कवीर, मीरा, ज्ञानेश्वर, नामदेव, रमण महर्षि और भी कितने नाम लें | इन के राह पर चलने वाले कई प्रसिद्द, अप्रसिद्ध जीवन अब भी जी रहे हैं | सहज जीवन की झलक तो उनके जीवन में मिलेगा ही मिलेगा | अगर इन के जीवन में दोष दिख रहा है  तो समझ लो हमारे दुःख के दीन अब गये नहीं | सहज जीवन के तो बात क्या क्या करें ?

सहज  हमारी स्वाभाविक अवस्था है ! लेकिन हम दिनभर अनेक ऐसी बेकार की बातों में उलझे रहते है जिनका हमारी ज़िन्दगी में  कोई मतलब नहीं |

उदहारण - उसका क्या हुआ , इसका क्या हुआ, नफा, नुकसान, दुनिया दारी के सुचना इकठ्ठा करते करते थक जाते हैं फुर्सत नहीं मिलती, तो सहजता कैसे मिलेगा ? तो फिर आप बोलोगे की स्मार्ट कैसे रहें, अपडेट कैसे रहें | हाँ - यही तो बात है , अब तो बताओ इसे आप को मिलता क्या है ? सुख ? कभी नहीं - आप को तो ये डायबेटिक्स, हाई बिपि, लो बिपि टेंशन और भी नजाने क्या क्या दे जाते हैं | और अंत में तो पूछो ही मत सब छोड़ कर जय राम जी की सब स्वाहा | कहाँ से आया था कहाँ गया कोई पता नहीं |
यदि सहजता जीवन में उतर जाए तो मन शांत रहेगा और हम जीवन को जी पायेंगे अन्यथा हम जीवन काटते है जीते नहीं !

तिनोगुणों की प्रभाब




भारत देश के ऋषियों ने जो अदभुत खोजें की हैं, वैसी खोजें विश्व में कहीं भी नहीं हुई हैं। मनुष्य का स्वभाव तीन गुणों के प्रभाव से संचालित होता है। उनमें से रजो-तमोगुण मनुष्य को अत्यंत दुःखद अनुभव करवाकर उसके वर्तमान जीवन को निकृष्ट बना देता है और फिर वृक्ष, पशु, पक्षी जैसी तुच्छ योनियों में ले जाता है। सत्त्वगुण वर्तमान जीवन को दिव्य बनाता है और स्वर्ग एवं ब्रह्मलोक आदि उच्च लोकों में पहुँचाता है। इसमें भी यदि ब्रह्मवेत्ताओं का प्रत्यक्ष सान्निध्य एवं सत्संग मिले तो तीनो गुणों से पार अपने असली आनंदधन आत्मा को जानकर जीव जीवन्मुक्त हो सकता है।
चलो, अब रजो-तमोगुण के कुप्रभाव एवं सत्त्वगुण के सुप्रभाव को निहारें।

तमोगुण

तमोगुणी मानव वर्ग आलसी-प्रमादी होकर, गंदे विषय-विकारों का मन में संग्रह करके बैठे-बैठे या सोते-सोते भी इन्द्रियभोग के स्वप्न देखता रहता है। यदि कभी कर्मपरायण हों तो भी यह वर्ग हिंसा, द्वेष, मोह जैसे देहधर्म के कर्म में ही प्रवृत्त रहकर बंधनों में बँधता जाता है। मलिन आहार, अशुद्ध विचार और दुष्ट आचार का सेवन करते-करते तमोगुणी मानव पुतले को आलसी-प्रमादी रहते हुए ही देहभोग की भूख मिटाने की जितनी आवश्यकता होती है उतना ही कर्मपरायण रहने का उसका मन होता है।

रजोगुण

रजोगुणी मनुष्य प्रमादी नहीं, प्रवृत्तिपरायण होता है। उसकी कर्मपरंपरा की पृष्ठभूमि में आंतरिक हेतु रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, दंभ आदि सब भरा हुआ होता है। सत्ताधिकार की तीव्र लालसा और देहरक्षा के ही कर्म-विकर्मों के कंटकवृक्ष उसकी मनोभूमि में उगकर फूलते-फलते हैं। उसके लोभ की सीमा बढ़-बढ़कर रक्त-संबंधियों तक पहुँचती हैं। कभी उससे आगे बढ़कर जहाँ मान मिलता हो, वाहवाही या धन्यवाद की वर्षा होती है, ऐसे प्रसंगों में वह थोड़ा खर्च कर लेता है। ऐसे रजोगुणी मनुष्य का मन भी बहिर्मुख ही कहलाता है। ऐसा मन बड़प्पन के पीछे पागल होता है। उसका मन विषय-विलास की वस्तुओं को एकत्रित करने में लिप्त होकर अर्थ-संचय एवं विषय-संचय करने के खेल ही खेलता रहता है।

सत्त्वगुण

इन दोनों ही वर्गों के मनुष्यों का मन स्वच्छंदी, स्वार्थी, सत्ताप्रिय, अर्थप्रिय और मान चाहने वाला होता है और कभी-कभार छल-प्रपंच के समक्ष उसके अनुसार टक्कर लेने में भी सक्षम होने की योग्यता रखता है। ऐसे मन की दिशा इन्द्रियों के प्रति, इन्द्रियों के विषयों के प्रति और विषय भोगों के प्रति निवृत्त न होने पर भोगप्राप्ति के नित्य नवीन कर्मों को करने की योजना में प्रवृत्त हो जाती है। ऐसा मन विचार करके बुद्धि को शुद्ध नहीं करता अपितु बुद्धि को रजोगुण से रँगकर, अपनी वासनानुसार उसकी स्वीकृति लेकर – ‘मैं जो करता हूँ वह ठीक ही करता हूँ‘ ऐसी दंभयुक्त मान्यता खड़ी कर देता है।

ऐसे आसुरी भाव से आक्रान्त लोगों का अनुकरण आप मत करना। राजसी व्यक्तियों के रजोगुण से अनेक प्रकार की वासनाएँ उत्पन्न होती हैं अतः हे भाई ! सावधान रहना। रजो-तमोगुण की प्रधानता से ही समस्त पाप पनपते हैं। जैसे हँसिया, चाकू, छुरी, तलवार आदि भिन्न-भिन्न होते हुए भी उनकी धातु लोहा एक ही है ऐसे ही पाप के नाम भिन्न-भिन्न होने पर भी पाप की जड़ रजो-तमोगुण ही है।
संसार में बहुमत ऐसे वर्ग का ही है। ऐसा वर्ग प्रवृत्तिपरायण कहलाता है। इसके कर्म में मोक्षबुद्धि नहीं होती। अतः यदि इस वर्ग को स्वतंत्र रूप से व्यवहार करने दें तो समाज में ऐसी अव्यवस्था उठ खड़ी होती है जिसके फलस्वरूप सर्वत्र स्वार्थ और दंभरूपी बादल छा जाते हैं, कपट एवं प्रपंच की आँधी चलने लगती है तथा सर्वत्र दुःख और विपत्तियों के प्रहार होने से प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार उठती है। ये दो वर्ग ही यदि परस्पर टकराने लगे तो हिंसा, द्वेष, स्वार्थ और भोगबुद्धि के कर्मों में ही प्रजा लिप्त रहने लगती है और युद्ध की नौबत आ जाती है। प्रत्येक युग एवं प्रत्येक देश में ऐसे ही संहार होता रहता है।
यह उन्नति का मार्ग नहीं है। अवनति की ओर जाते मानव के लिए आत्मोन्नति के आनंद की ओर चलने के लिए बुद्धि के शोधन की, उसकी विचार शक्ति में विवेक के सूर्य का उदय करने की आवश्यकता है। मन एवं इन्द्रियों को विषयों के स्मरण, चिन्तन, प्राप्ति एवं भोग की जन्म-जन्मांतरों की जो आदत पड़ी हुई है, उनमें असारता का दर्शन होने पर मन उनसे विमुख होता है तब बुद्धि को अपने से भी परे आत्मा की ओर अभिमुख होने की रूचि एवं जिज्ञासा होती है, आत्सरस पीने का सौभाग्य प्राप्त होता है, संसार की मायाजाल से बचने का बल मिलता है।
जब बुद्धि को आत्मनिरीक्षण के लिए विचार करने की भोगमुक्त दशा प्राप्त होती है तब वह प्रत्येक कर्म में विवेक का उपयोग करती है। उस वक्त उसके अन्तःकरण में आत्मा का कुछ प्रकाश पड़ता है, जिससे विषयों का अंधकार कुछ अंश में क्षीण होता है। यह है नीचे से ऊपर जाने वाला तीसरा, आंतर में से प्रकट होने वाला स्वयंभू सुख की लालसावाला, बुद्धि के स्वयं के प्रकाश का भोक्ता – सत्त्वगुण। इस सत्त्वगुण की प्रकाशमय स्थिति के कारण बुद्धि का शोधन होता है। कर्म-अकर्म, धर्म अधर्म, नीति-अनीति, सार-असार, नित्य-अनित्य वगैरह को समझकर अलग करने एवं धर्म, नीति, सदाचार तथा नित्य वस्तु के प्रति चित्त की सहज स्वाभाविक अभिरूचि करने की शक्ति इसी से संप्राप्त होती है।
एक ओर मानवीय जीवन के आंतर प्रदेश में आत्मा (आनंदमय कोष) एवं बुद्धि (विज्ञानमय कोष) है तो दूसरी ओर प्राण (प्राणमय कोष) तथा शरीर (अन्नमय कोष) है। इन दोनों के बीच मन (मनोमय कोष) है। वह जब बहिर्मुख बनता है तब प्राण तथा शरीर द्वारा इन्द्रियाँ विषय-भोगों में लिप्त होकर वैसे ही धर्म-कर्म में प्रवृत्त रहती हैं। यही है मानवीय जीवन की तामसिक एवं राजसिक अवस्था की चक्राकार गति।
परंतु उसी मन (मनोमय कोष) को ऊर्ध्वमुख, अंतर्मुख अथवा आत्माभिमुख करना – यही है मानव जीवन का परम कल्याणकारी लक्ष्य। ऋषियों में परम आनंदमय आत्मा को ही लक्ष्य माना है क्योंकि मनुष्य के जीवनकाल की मीमांसाकरने पर यह बात स्पष्ट होती है कि उसकी सब भाग दौड़ होती है सुख के लिए, नित्य सुख के लिए। नित्य एवं निरावधि सुख की निरंतर आकांक्षा होने के बावजूद भी वह रजो-तमोगुण एवं इन्द्रियलोलुपता के अधीन होकर हमेशा बहिर्मुख ही रहता है। उसकी समस्त क्रियाएँ विषयप्राप्ति के लिए ही होती हैं। उसकी जीवन-संपदा, शारीरिक बल, संकल्पशक्ति आदि का जो भी उसका सर्वस्व माना जाता है वह सब जन्म मृत्यु के बीच में ही व्यर्थ नष्ट हो जाता है।
परंतु उसी मन(अंतःकरण) पर यदि सत्त्वगुण का प्रकाश पड़े तो उसे स्वधर्म-स्वर्म की, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की सूक्ष्म छानबीन करने का सूझता है। सुख-दुःख के द्वन्द्व में उसे नित्य सुख की दिशा सूझती है। दुराचार के तूफानी भँवर में से उसे शांत, गंभीर सत्त्वगुणी गंगा के प्रवाह में अवगाहन करने की समझ आने लगती है। विचार-सदविचार की कुशलता आती है। विचार, इच्छा, कर्म आदि में शुभ को पहचानने की सूझबूझ बढ़ती है। जिससे शुभेच्छा, शुभ विचार एवं शुभकर्म होने लगते हैं।
जन्म मरण जैसे द्वन्द्वों के स्वरूप अर्थात् संसार-चक्र एवं कर्म के रहस्य को समझाते हुए एवं उसी को अशुभ बताते हुए गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।
तरो कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।
‘वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभांति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात् कर्मबन्धन से मुक्त हो जाएगा।’
(गीताः 4.16)
धर्म के, पुण्य के नाम अलग-अलग हैं किन्तु उनका मूल है सत्त्व। सत्त्वगुणरूपी जड़ का सिंचन होने से जो विशाल वृक्ष होता है उसमें मीठे फल लगते हैं। वे ही फल आंतरिक सुख, स्वतंत्र सुख, मुक्तिदायी सुख का मार्ग खोल देते हैं। यह जीव गुणों के थपेड़े से बचकर ही अपने गुणातीत स्वरूप में स्थिर हो सकता है एवं आत्म-साक्षात्कार कर सकता है। जिसके ध्यान से ब्रह्माजी, भगवान विष्णु एवं साम्बसदाशिव भी सामर्थ्य एवं अनोखा आनंद पाते हैं उसी चैतन्यस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिए आपका जन्म हुआ है इसका निरंतर स्मरण रखना।
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रविवार, 9 अक्टूबर 2022

सब लोग किस को चाहते है?





जो व्यक्ति अच्छा व्यवहार करता है, ईमानदार है, सच्चा है तो उसे सब पसंद करते हैं । उसके पास बैठने में, उससे बात करने में हमें आनंद मिलता है । नम्रता, सहनशीलता, साहस, कार्य में लगन, आत्मविश्वास, विश्वासपात्रता, दयालुता, ईमानदारी, दृढ़ निश्चय, तत्परता, सत्यनिष्ठा इत्यादि अनेक उत्तम गुण हैं, जिनके मेल से मनुष्य का चरित्र बनता है । चरित्र का धन कोई साधारण धन नहीं है । इनमें से कुछ गुणों को भी पूरी तरह धारण करने से मनुष्य का जीवन सफल हो जाता है ।
चरित्र-निर्माण कब और कैसे ?
चरित्र-निर्माण का सबसे अच्छा समय है बचपन । उस समय अच्छी आदतें सीखना आसान होता है । ये आदतें जीवनभर काम आती हैं । बालकों को जो बातें बतायी या सिखायी जाती हैं, वे उनके मन पर पक्की हो जाती हैं । गुरुजनों का, सद्गुरु का सम्मान करने से और उनकी आज्ञा मानने से विद्या प्राप्त होती है । अर्जुन ने इसी प्रकार गुरु से धनुर्विद्या प्राप्त की थी । भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने गुरु वसिष्ठजी के आज्ञापालन से ही आत्मविद्या पायी थी ।
मनुष्य के जीवन की नींव है चरित्र । शब्दों में नहीं बल्कि व्यवहार में प्रकट होते हैं चरित्र के गुण । दिखावट-बनावट से मनुष्य कुछ समय के लिए भले ही किसीको धोखे में रख ले परंतु ज्यादा समय तक धोखे में नहीं रख सकता । लोग चरित्रवान व्यक्ति की बात का विश्वास करते हैं । उसे उपयोगी तथा हितकारी मानते हैं । चरित्रवान दूसरों को धोखा नहीं देता, किसीको नीचे गिराने की कोशिश नहीं करता । वह ऐसी बात का प्रण नहीं करता, जिसे वह पूरा न कर सके ।
उत्तम चरित्र क्या है ?
सच्चरित्रवान बनने के लिए मन, वाणी तथा शरीर से किसीको कष्ट मत दो । सच बात को भी प्रिय शब्दों में कहो । किसीकी चीज न चुराओ, निंदा न करो । मान की लालसा मत करो । स्नान से शरीर की तथा ईर्ष्या-द्वेष, वैर-विरोध छोड़ने से मन की शुद्धि होती है । सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख सहते हुए अपने कर्तव्य को करो । सत्साहित्य का अध्ययन करते रहो । इन्द्रियों और मन को वश में रखकर अपने स्वभाव को सरल बनाओ । दुःखियों की सेवा करो । पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘परमात्मा से दूर ले जानेवाली जो दुष्ट वासनाएँ हैं, वे सब दुश्चरित्र हैं । जब हम दुश्चरित्रों से दूर होते हैं तो हम सच्चरित्र होते हैं । सच्चरित्रता से पुण्य होते हैं और पुण्य से हमको सत्संग, संत के दर्शन और परमात्मा में रुचि होती है ।
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता ।’’ (संत तुलसीदासजी)
चरित्रवान के लक्षण 
चरित्रवान मनुष्य बहुत अधिक चतुर बनने का प्रयत्न नहीं करता । सीधा-सच्चा व्यक्ति लोगों को अधिक प्रिय होता है । चरित्रवान अपने कार्यों की बड़ाई करके दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयत्न नहीं करता । वह धैर्यवान तथा सहनशील होता है । वह दूसरों के मत को ध्यान एवं धैर्य से सुनता है । चाहे उसे दूसरे का मत ठीक न लगता हो फिर भी सुनने का धैर्य उसमें होता है । यदि वह किसीको उसकी भूल बताता है तो बड़ी नरमी से, तरीके से और उसके सुधार के लिए बताता है । चरित्रवान किसीका उत्साह भंग नहीं करता, वह किसीका दिल नहीं तोड़ता, वह सभीको नेक काम करने की सलाह देता है एवं उत्साहित करता है । वह स्वयं भी हिम्मत नहीं हारता । चरित्रवान मनुष्य सुख और दुःख में सम रहता है । विपत्ति के समय में वह सगे-संबंधियों या मित्रों को धोखा नहीं देता । ऐसी ही मित्रता श्रीकृष्ण ने सुदामा के प्रति निभायी थी । मित्रता निभाना भी सच्चरित्रता की निशानी है ।
चरित्र : मानव की एक श्रेष्ठ सम्पत्ति 
जो अपना कल्याण चाहता है उसे चरित्रवान बनना चाहिए । यदि हम चरित्रवान हैं, सत्कृत्य करते हैं तो हमारी बुद्धि सही निर्णय लेती है, हमें सन्मार्ग पर प्रेरित करती है । सन्मार्ग पर चलकर हम परमात्मप्राप्ति के लक्ष्य को आसानी से पा सकते हैं ।
चरित्र मानव की श्रेष्ठ सम्पत्ति है, दुनिया की समस्त सम्पदाओं में महान सम्पदा है । मानव-शरीर के पंचभूतों में विलीन होने के बाद भी जिसका अस्तित्व बना रहता है, वह है उसका चरित्र । चरित्रवान व्यक्ति ही समाज, राष्ट्र व विश्व-समुदाय का सही नेतृत्व और मार्गदर्शन कर सकता है । अपने सच्चारित्र्य व सत्कर्मों से ही मानव चिरआदरणीय हो जाता है । जब हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य सत्स्वरूप ईश्वर होता है तो सच्चरित्रता में हम दृढ़ होते जाते हैं । सच्चरित्रवान बनने के लिए अपना आदर्श ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों को बनाना चाहिए ।
जिसके पास सच्चरित्र नहीं है वह बाहर से भले बड़ा आदमी कहा जाय परंतु उसे अंदर की शांति नहीं मिलेगी एवं उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं होगा । जिसके पास धन, सत्ता कम है परंतु सच्चारित्र्य-बल है, उसे अभी चाहे कोई जानता, पहचानता या मानता न हो परंतु उसके हृदय में जो शांति रहेगी, आनंद रहेगा, ज्ञान रहेगा वह अद्भुत होगा और उसका भविष्य परब्रह्म-परमात्मा के साक्षात्कार से उज्ज्वल होगा ।
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