शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

उपवास क्यों करते हैं?

   


     उपवास का धार्मिक, आध्यात्मिक और वैदिक महत्व तीनों ही है। उपवास वासना से निवृति का अकाट्य साधन है। इन्द्रियों व मन पर विजय पाने के लिए जिताहार होनेकी आवश्यकता होती है। चूंकि अन्न में मादकता होती हैं। इसमें एक प्रकार का नशा होता है। जिससे भोजन के पश्चात, हम प्रायः आलस्य अनुभव करते हैं। पके हुए अन्न के नशे में एक प्रकार की पार्थिव तामस शक्ति होती है जो पार्थिव शरीर का संयोग पाकर दुगनी हो जाती हैं।

    उपवास से न केवल शारीरिक विकृति दूर होती है वरन मन और आत्मा भी शुद्ध होती हैं।

     कुछ लोग उपवास को नकारते हैं लेकिन उपवास भूख लगने पर समाप्त होने का नाम हैं। उपवास से मन प्रार्थना की और तीव्रता से जाता है अर्थात उपवास से मन ईश्वर की ओर होता है। लेकिन उपवास का शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक लाभ उठाने के लिए उसकी कला का ज्ञान भी आवश्यक है।

    आपने स्वयं अनुभव किया होगा ज्वर होने पर डॉक्टर, वैद्य भोजन का निषेध कर देते है. पशु-पंक्षी रोगी होने पर स्वयं ही आहार बंद कर देते हैं और एक ओर विश्राम की मुद्रा में पड़े रहते है। इस प्रकार हमे पता चलता है कि उपवास में रोगरोधक शक्ति है। उपवास का नियम पालन हो तभी उसका अनुकूल परिणाम मिलता है लेकिन प्रतिकूल स्थिति में इससे शरीर को कष्ट हो जाता है. ऐसा देखने में आया है कि अल्पाहार करने से दुर्बलता आती है जबकि उपवास से नहीं।

 

   धार्मिक दृष्टि से उपवास में भी अलग-अलग खान-पान का महत्व है. किसी में फलाहार है तो किसी में पानी तक मना है. किसी में केवल मिष्ठान खाया जाता है तो किसी में खट्टा का निषेध किया जाता है. वास्तव में यह सब नियम प्रकृति के संतुलन के लिए बनाए गये है. आयुर्विज्ञान में इसको वैज्ञानिक स्तर पर विभाजित किया गया हैं.

    यह उपवास निम्न प्रकार से है –

  •  प्रातःकालीन

  • सायंकालीन

  • रसोपवास

  • एकाहारोपवास

  • फलोपवास

  • दुग्धोपवास

  • मठोपवास

  • पूर्णोपवास

  • साप्ताहिक उपवास

  • लघु उपवास

  • कड़ा उपवास

  • दूर उपवास

  • व्यायाम उपवास

        वास्तव में उपवास शरीर शुद्धि का एक सशक्त माध्यम है। स्वास्थ्य एवं धर्म दोनों ही दृष्टि से उपवास का एक विशेष महत्व है। शरीर को साधना अनुकूल स्वस्थ रखना भी धर्म है।

उपवास रखने के लाभ 

   वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो उपवास करने के कई स्वास्थ लाभ है-

  • उपवास से एकाग्रता बढती है और किसी कार्य को एकाग्र होकर करने की शक्ति भी बढ़ती है.

  • उपवास शरीर को निरोग बनाता हैं।

  • उपवास के दौरान जो भी भोजन बचता है उसे किसी सतपात्र व्यक्ति को दान में दे। इससे आप सुख की अनुभूति करेंगे और यह एक पुण्य का कार्य है।

  • उपवास से शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता हैं जो हमारे कार्यो को सफ़ल बनाने में मदत करता है।

सावधानिया 

  • यदि आप बीमार या कमजोर है तो उपवास न करें. ऐसी स्तिथि में वैद्य व डॉक्टर की सलाह से ही उपवास रखे।

  • शारीरिक रूप से कमजोर होने पर या चक्कर आने पर उपवास न रखे।

जीवन के ये 5 रहस्य









 भगवान शिव ने पार्वती को बताए थे जीवन के ये 5 रहस्य,   भगवान शिव ने देवी पार्वती को समय-समय पर कई ज्ञान की बातें बताई हैं। 

जिनमें मनुष्य के सामाजिक जीवन से लेकर पारिवारिक और वैवाहिक जीवन की बातें शामिल हैं। भगवान शिव ने देवी पार्वती को 5 ऐसी बातें बताई थीं जो हर मनुष्य के लिए उपयोगी हैं, जिन्हें जानकर उनका पालन हर किसी को करना ही चाहिए-


 1. क्या है सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा पाप

देवी पार्वती के पूछने पर भगवान शिव ने उन्हें मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धर्म और अधर्म मानी जाने वाली बात के बारे में बताया है। भगवान शंकर कहते है-


 श्लोक- नास्ति सत्यात् परो नानृतात् पातकं परम्।।


अर्थात- मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धर्म है सत्य बोलना या सत्य का साथ देना और सबसे बड़ा अधर्म है असत्य बोलना या उसका साथ देना।

इसलिए हर किसी को अपने मन, अपनी बातें और अपने कामों से हमेशा उन्हीं को शामिल करना चाहिए, जिनमें सच्चाई हो, क्योंकि इससे बड़ा कोई धर्म है ही नहीं। असत्य कहना या किसी भी तरह से झूठ का साथ देना मनुष्य की बर्बादी का कारण बन सकता है।


  2. काम करने के साथ इस एक और बात का रखें ध्यान


 श्लोक- आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनुस्तु शुभाशुभे।


 अर्थात- मनुष्य को अपने हर काम का साक्षी यानी गवाह खुद ही बनना चाहिए, चाहे फिर वह अच्छा काम करे या बुरा। उसे कभी भी ये नहीं सोचना चाहिए कि उसके कर्मों को कोई नहीं देख रहा है।

कई लोगों के मन में गलत काम करते समय यही भाव मन में होता है कि उन्हें कोई नहीं देख रहा और इसी वजह से वे बिना किसी भी डर के पाप कर्म करते जाते हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और ही होती है। मनुष्य अपने सभी कर्मों का साक्षी खुद ही होता है। अगर मनुष्य हमेशा यह एक भाव मन में रखेगा तो वह कोई भी पाप कर्म करने से खुद ही खुद को रोक लेगा।



 3. कभी न करें ये तीन काम करने की इच्छा


श्लोक-मनसा कर्मणा वाचा न च काड्क्षेत पातकम्।


अर्थात- आगे भगवान शिव कहते है कि- किसी भी मनुष्य को मन, वाणी और कर्मों से पाप करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य जैसा काम करता है, उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है।

यानि मनुष्य को अपने मन में ऐसी कोई बात नहीं आने देना चाहिए, जो धर्म-ग्रंथों के अनुसार पाप मानी जाए। न अपने मुंह से कोई ऐसी बात निकालनी चाहिए और न ही ऐसा कोई काम करना चाहिए, जिससे दूसरों को कोई परेशानी या दुख पहुंचे। पाप कर्म करने से मनुष्य को न सिर्फ जीवित होते हुए इसके परिणाम भोगना पड़ते हैं बल्कि मरने के बाद नरक में भी यातनाएं झेलना पड़ती हैं।


4. सफल होने के लिए ध्यान रखें ये एक बात

संसार में हर मनुष्य को किसी न किसी मनुष्य, वस्तु या परिस्थित से आसक्ति यानि लगाव होता ही है। लगाव और मोह का ऐसा जाल होता है, जिससे छूट पाना बहुत ही मुश्किल होता है। इससे छुटकारा पाए बिना मनुष्य की सफलता मुमकिन नहीं होती, इसलिए भगवान शिव ने इससे बचने का एक उपाय बताया है।


श्लोक-    दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते। 

अनिष्टेनान्वितं पश्चेद् यथा क्षिप्रं विरज्यते।।


अर्थात- भगवान शिव कहते हैं कि- मनुष्य को जिस भी व्यक्ति या परिस्थित से लगाव हो रहा हो, जो कि उसकी सफलता में रुकावट बन रही हो, मनुष्य को उसमें दोष ढूंढ़ना शुरू कर देना चाहिए। सोचना चाहिए कि यह कुछ पल का लगाव हमारी सफलता का बाधक बन रहा है। ऐसा करने से धीरे-धीरे मनुष्य लगाव और मोह के जाल से छूट जाएगा और अपने सभी कामों में सफलता पाने लगेगा।



5. यह एक बात समझ लेंगे तो नहीं करना पड़ेगा दुखों का सामना


श्लोक-नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्।

सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते।।


अर्थात- आगे भगवान शिव मनुष्यो को एक चेतावनी देते हुए कहते हैं कि- मनुष्य की तृष्णा यानि इच्छाओं से बड़ा कोई दुःख नहीं होता और इन्हें छोड़ देने से बड़ा कोई सुख नहीं है। मनुष्य का अपने मन पर वश नहीं होता। हर किसी के मन में कई अनावश्यक इच्छाएं होती हैं और यही इच्छाएं मनुष्य के दुःखों का कारण बनती हैं। जरुरी है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं में अंतर समझे और फिर अनावश्यक इच्छाओं का त्याग करके शांत मन से जीवन बिताएं।

 




मंगलवार, 15 अगस्त 2023

क्या ईश्वर हर जगह है?

 

हां वह सर्वव्यापी हैं, इसमें ज़रा भी संदेह नहीं हैं और पृथ्वी पर ऐसा कोई भी प्राणी जो चेतना युक्त चाहें वह आस्तिक अथवा

नास्तिक क्यों न हों उसकी अनुभूति जीवन में अवश्य करता है| पर यह बात दूसरी हैं की , वह उसे क्या नाम देता हैं।

आई ये इस प्रसंग से उसे समझते हैं |

15 नवंबर 1884 को इंग्लैंड में "जॉन ली" को एक महिला के कत्ल में दोषी मानते हुए कोर्ट ने फाँसी की सजा सुनाई। सजा सुनाई जाने पर जॉन ली कोर्ट में चिल्लाता रहा कि वो बेकसूर है, अगर कहीं भगवान है तो वो मेरी मदद ज़रूर करेंगे। 23 फरवरी 1885 यही वो दिन था जब जॉन को फाँसी की सजा दी जानी थी।


फांसी देने से पहले फांसी के फंदे, रस्सी और तख्त की मजबूती को जांचा तथा परखा गया, ताकि फांसी में किसी भी प्रकार की रुकावट ना आए। अब जॉन ली को फांसी के तख्त पर लाया गया। जल्लाद ने जॉन ली के चेहरे को काले कपड़े से ढक, गले में फांसी का फंदा डाल दिया। आदेश मिलते ही……


जल्लाद ने हेंडल को दबाया लेकिन तख्त नहीं खुला। बार-बार हैंडल दबाया गया, लेकिन तख्त नहीं खुल पाया। और फांसी एक दिन के लिए टाल दी गई । इसके बाद जांच शुरू हुई तथा आजमाइश के तौर पर जॉन ली के समान वजनी पुतले को फांसी पर लटकाया गया। तख्त खुल गया।


दूसरे दिन जॉन ली को फिर से फांसी के लिए लाया गया, और उस दिन भी तख्त नहीं खुला। जॉन खुशी से चिल्लाया कि, हे! ईश्वर आप सर्वत्र है। निसंदेह आप मेरे साथ है। फांसी एक बार फिर टल गई । पुतला फिर से लाया गया, लटकाया गया और तख्त खुल गया।।


तीसरी बार फिर से जॉन को फांसी के तख्त पर लाया गया। जल्लाद ने लिवर दबाया लेकिन तख्त आज भी नही खुला। यह देख जल्लाद भावुक होकर हमेशा के लिए वहां से चला गया। मौजूद कर्मचारी हक्केबक्के रह गए। फांसी फिर से टल गई।


केस अब हाई अथॉरिटी के हाथों में था। हर एक चीज की गहराई से जांच पड़ताल की गई कि आखिर एक शख्स का तीन-तीन बार फांसी से बच निकलना कैसे मुमकिन है ? इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था। लेकिन जांच में कुछ नही मिला। और मान लिया गया की लॉक के अटक जाने से ऐसे होता रहा होगा।


क्या जॉन ली को शूट किया जाना चाहिए ? जज ने हर पहलू पर पूरी गंभीरता से विचार किया । और माना कि जब-जब जॉन को फांसी दी गई होगी, तब-तब वह पल पल, हर पल मरा होगा। जज ने यह भी माना कि कानून ने जॉन को फांसी पर चढ़ाकर तीन तीन बार मारा है।


कानून भी ईश्वर के आगे नतमस्तक हो गया था। और जॉन ली को छोड़ दिया गया। जॉन ली को लगाए गए उस फंदे को हमेशा के लिए उतार दिया गया और म्यूजियम सुरक्षित रखा गया । ब्रिटिश कानून असफल रहा, क्योंकि उन्हें ईश्वर की ताकत और जॉन ली के बेकुसूर होने का आभास हो चुका था।


रिहा होने के बाद जॉन ली परिवार के साथ लंदन चला गया। अक्सर लोगों द्वारा सवाल पूछे जाने पर जॉन ली यही कहता था कि, फांसी के वक्त वह एक अद्भुत दिव्य प्रकाश(रोशनी) की अनुभूति करता था। यह प्रकाश काला कपड़ा हटने के बाद ही अदृश्य होता था। इसके बाद जॉन ली समाज सेवा और चैरिटी से जुड़ता चला गया। 80 वर्ष की आयु में जॉन ली का निधन हुआ।


जॉन ली के खिलाफ पुलिस को प्राप्त हुए वो सारे झूठे साक्ष्य जो जॉन ली को फांसी तक ले गये थे, उसके ही दोस्त जोनाथन के षड्यंत्र का हिस्सा थे। यह जॉन ली के गांव वालों का कहना था। जॉन ली की रिहाई वाले दिन ही उसके धोखेबाज दोस्त जोनाथन को लकवा मार गया था । महज 29 वर्ष की आयु में जोनाथन की मृत्यु हो गई ।। इसी तरह हर किसी का अलग अलग अनुभव होता ही है | इसीलिए ---


दुनिया माने या न माने आप क्या मानते हो ये बात मायने रखती है.


ईश्वर सर्व जगह है , पर ये बात हम बचपन से सुनते आ रहे है.


कण कण में भगवान - ये बात तो आप ने जरूर सुनी होगी.


ये विषय श्रद्धा का है. मानो तो है, न मानो तो नहीं है.


अध्यात्म विषय ये स्वयं के लिए है न की दूसरों के लिए.


ये सारी सृष्टि , ये निसर्ग जो नियमबद्ध रीति से काम करते आ रहा है, ये किसकी वजह से हो रहा है?


पृथ्वी एक ही दायरे में घूम रही है, सारे ग्रह तारे अपनी अपनी कक्षा में चलन कर रहे है, उसका कोई तो नियंता होगा?


हम किसी चित्र को देखते है तो हमें पता होता है की उसके पीछे किसी चित्रकार की मेहनत होती है.


निसर्ग का चित्र तो हर क्षण बदलता दिखायी देता है. कौन इसका चित्रकार है? ब्रह्माण्ड में जो क्षण क्षण में बदलाव आ रहा है,

वह किसके कारण है?


उसे ही सनातन संस्कृति में ईश्वर कहा गया है.|


अलग अलग  संस्कृतियों में उसे  अलग अलग  नाम से जाना जाता है.|



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