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गुरुवार, 9 मई 2024

श्रेष्ठ साधक कैसे बनें ?


         मनुष्य आज इतनी-इतनी परेशानियों, समस्याओं और चिंताओं के बोझ से लदा रहता है कि कहाँ सत्संग सुने ?... कब सत्संग को विचारे ?... किस तरह जीवन में उतारे ?... लेकिन बिना सत्संग, जप, अनुष्ठान, सेवा, स्मरण के जीव की सद्गति सम्भव नहीं है । आज ये विचारणीय प्रश्न हैं कि कैसे उसे सांसारिक झंझटों के बीच परमात्म-शांति की अनुभूति हो ? कैसे वह अपने नित्यकर्म में संलग्न रहकर परमात्मा की आराधना से अंतःकरण को पावन करता रहे ?


यह सत्य है कि हम संसार में रहते हैं इसलिए संसार को छोड़ पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है किंतु यह भी तो उतना ही वजनदार सत्य है कि हमारा अमूल्य मनुष्य-जन्म संसार में उलझकर गँवाने के लिए तो कतई नहीं हुआ है । न जाने कितनी-कितनी माताओं के शरीर से, पिताओं के शरीर से गुजरकर, असहनीय यातनाओं को सह के हमने यह अनमोल मानव-शरीर पाया है । अपने सच्चे नाथ का साक्षात्कार करने का दुर्लभ अवसर पाया है । ऐसे सुखद संयोग के बाद भी हम लापरवाह रहे तो कैसे चलेगा ? जरा तो सोचिये कि परमात्मा को, गुरु को क्या मुँह दिखायेंगे ! अतः मनुष्य-जन्म की सार्थकता इसीमें है कि हम अपने सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार करके जीते-जी मुक्त हो जायें ।


जो परम तत्त्व को उपलब्ध होना चाहते हैं, उनके लिए कुछ युक्तियों से और प्रभु की कृपा से यह सहज हो जायेगा । आप एक श्रेष्ठ, सात्त्विक साधक बननेभर का लक्ष्य बना लें । एक उन्नत, जिज्ञासु साधक बननेभर का संकल्प आपको उस अनुभूति से सम्पदावान बना देगा, जो आपकी अपनी विरासत है । एक श्रेष्ठ साधक में कौन-से गुण होने चाहिए, इस बात को गम्भीरतापूर्वक समझ लें । यदि आप एक श्रेष्ठ साधक बनने का लक्ष्य अपने जीवन में रखते हैं तो आप परम तत्त्व के अधिकारी भी बन सकते हैं क्योंकि शुद्ध, सात्त्विक, श्रद्धासम्पन्न अंतःकरण में परमात्म-माधुर्य और ज्ञान स्फुरित होता है । आप थोड़ा चलेंगे तो ईश्वरीय सत्ता आपकी मदद करेगी, बिल्कुल पक्की बात है । ज्यों-ज्यों आप साधना के पथ पर एक-एक कदम आगे बढ़ाते चलेंगे, त्यों-त्यों आपमें उस आनंदस्वरूप को जानने की उत्सुकता बढ़ती जायेगी । उत्सुकता जब तीव्र होगी, लालसा जोर पकड़ेगी तो फिर आप उस यार (परमात्मा) से कहाँ दूर रह पायेंगे !


सर्वप्रथम परमात्म-सुख पाने का लक्ष्य निर्धारित करें । प्रतिदिन का नियम निश्चित करें । एक बार संकल्प ले लें कि ‘मुझे रोज इतनी मालाएँ करनी हैं । माह में इतने दिन मौन रहना है । इतने महीने में मुझे एक अनुष्ठान करना है । प्रतिदिन इतने समय सत्संग सुनना है । सत्शास्त्रों का मनन-अध्ययन करना है । इतना समय सेवा करनी है और व्यवहारकाल में रहते हुए भी मुझे निरंतर सुमिरन करना है ।’ ऐसे आप अंतर्यामी ईश्वर के साथ अनन्यरूप से जुड़ जायेंगे । आरम्भ में ५ मिनट भगवन्नाम लेना शुरू करो । फिर ६, ७, ८, ११ मिनट का नियम ले लो । ‘मैं जैसा-तैसा हूँ, तुम्हारा हूँ । तुम मेरे अंतरात्मा हो, सर्वव्यापक हो । दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं हो, पराये नहीं हो । मेरे अपने हो मेरे प्रभु ! मैं आपको नहीं जानता हूँ लेकिन आप तो मुझे जानते हो । ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ...’



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सोमवार, 6 मई 2024

चित्त और आत्मा: सत्य की खोज में अंतर्मन का सफर

 




आत्मा, हिन्दू धर्म की अगम्य सत्ता है। इसे व्यक्ति का अंतर्यात्मा कहा जाता है, जो कि शारीरिक और मानसिक संरचनाओं से पृथक है। यह नाशवान नहीं है और न तो यह उत्पन्न होता है और न ही मरता है। आत्मा अज्ञेय होने के कारण इसका वास्तविक स्वरूप मनुष्य के द्वारा समझा और अनुभव किया जाना कठिन है।


आत्मा का अंतर्मुखी स्वरूप उसकी अज्ञेयता के कारण लोगों के लिए अक्षरशः अदृश्य होता है। वेदान्त और योगदर्शन में, आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है, जो सर्वव्यापी, अज्ञेय, और अविकारी है। यह चेतना का निरंतर स्रोत है और सभी जीवों का आधार है।


अत: आत्मा सब को सदा प्राप्त है, इसमें कोई भेदभाव नहीं है। यह जीवन का आधार है, जिससे सभी संजीवी प्राणियों का संबंध है। परन्तु, मानव चित्त की माया में इसको समझना और अनुभव करना विशेष गंभीरता की जरूरत है।


चित्त का स्वभाव विचारों, भावनाओं, और इच्छाओं का धारण करना है। यह ज्ञान और अज्ञान का केन्द्र है, जो मनुष्य को उसके आत्मा से दूर कर देता है। माया की भ्रांति में, चित्त संसार के मोह में डूब जाता है और अपना स्वरूप भूल जाता है।


इस प्रकार, आत्मा को पहचानने की आवश्यकता है, जो मानव के स्वभाविक धर्म है। योग, ध्यान, और आत्मा की अध्ययन से मनुष्य अपने स्वरूप को पहचान सकता है और चित्त को नियंत्रित करके आत्मा से जुड़ सकता है। इससे मनुष्य अपने असली स्वरूप को समझता है और जीवन में उद्धारण की दिशा में आगे बढ़ता है।


आत्मा को समझना मानव जीवन का उद्धारण है। यह आत्म-संयम, सच्चे ध्यान, और निस्वार्थ भावना के माध्यम से संभव है। आत्मा का अनुभव करने से मनुष्य अपने चित्त को शांति, संतुलन, और आनंद में बदल सकता है और इस प्रकार समृद्ध और समर्पित जीवन जी सकता है।

शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

उपवास क्यों करते हैं?

   


     उपवास का धार्मिक, आध्यात्मिक और वैदिक महत्व तीनों ही है। उपवास वासना से निवृति का अकाट्य साधन है। इन्द्रियों व मन पर विजय पाने के लिए जिताहार होनेकी आवश्यकता होती है। चूंकि अन्न में मादकता होती हैं। इसमें एक प्रकार का नशा होता है। जिससे भोजन के पश्चात, हम प्रायः आलस्य अनुभव करते हैं। पके हुए अन्न के नशे में एक प्रकार की पार्थिव तामस शक्ति होती है जो पार्थिव शरीर का संयोग पाकर दुगनी हो जाती हैं।

    उपवास से न केवल शारीरिक विकृति दूर होती है वरन मन और आत्मा भी शुद्ध होती हैं।

     कुछ लोग उपवास को नकारते हैं लेकिन उपवास भूख लगने पर समाप्त होने का नाम हैं। उपवास से मन प्रार्थना की और तीव्रता से जाता है अर्थात उपवास से मन ईश्वर की ओर होता है। लेकिन उपवास का शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक लाभ उठाने के लिए उसकी कला का ज्ञान भी आवश्यक है।

    आपने स्वयं अनुभव किया होगा ज्वर होने पर डॉक्टर, वैद्य भोजन का निषेध कर देते है. पशु-पंक्षी रोगी होने पर स्वयं ही आहार बंद कर देते हैं और एक ओर विश्राम की मुद्रा में पड़े रहते है। इस प्रकार हमे पता चलता है कि उपवास में रोगरोधक शक्ति है। उपवास का नियम पालन हो तभी उसका अनुकूल परिणाम मिलता है लेकिन प्रतिकूल स्थिति में इससे शरीर को कष्ट हो जाता है. ऐसा देखने में आया है कि अल्पाहार करने से दुर्बलता आती है जबकि उपवास से नहीं।

 

   धार्मिक दृष्टि से उपवास में भी अलग-अलग खान-पान का महत्व है. किसी में फलाहार है तो किसी में पानी तक मना है. किसी में केवल मिष्ठान खाया जाता है तो किसी में खट्टा का निषेध किया जाता है. वास्तव में यह सब नियम प्रकृति के संतुलन के लिए बनाए गये है. आयुर्विज्ञान में इसको वैज्ञानिक स्तर पर विभाजित किया गया हैं.

    यह उपवास निम्न प्रकार से है –

  •  प्रातःकालीन

  • सायंकालीन

  • रसोपवास

  • एकाहारोपवास

  • फलोपवास

  • दुग्धोपवास

  • मठोपवास

  • पूर्णोपवास

  • साप्ताहिक उपवास

  • लघु उपवास

  • कड़ा उपवास

  • दूर उपवास

  • व्यायाम उपवास

        वास्तव में उपवास शरीर शुद्धि का एक सशक्त माध्यम है। स्वास्थ्य एवं धर्म दोनों ही दृष्टि से उपवास का एक विशेष महत्व है। शरीर को साधना अनुकूल स्वस्थ रखना भी धर्म है।

उपवास रखने के लाभ 

   वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो उपवास करने के कई स्वास्थ लाभ है-

  • उपवास से एकाग्रता बढती है और किसी कार्य को एकाग्र होकर करने की शक्ति भी बढ़ती है.

  • उपवास शरीर को निरोग बनाता हैं।

  • उपवास के दौरान जो भी भोजन बचता है उसे किसी सतपात्र व्यक्ति को दान में दे। इससे आप सुख की अनुभूति करेंगे और यह एक पुण्य का कार्य है।

  • उपवास से शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता हैं जो हमारे कार्यो को सफ़ल बनाने में मदत करता है।

सावधानिया 

  • यदि आप बीमार या कमजोर है तो उपवास न करें. ऐसी स्तिथि में वैद्य व डॉक्टर की सलाह से ही उपवास रखे।

  • शारीरिक रूप से कमजोर होने पर या चक्कर आने पर उपवास न रखे।

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

प्रणव’ (ॐ) की महिमा





            सूतजी ने ऋषियों से कहा : ‘‘महर्षियो ! ‘प्र’ नाम है प्रकृति से उत्पन्न संसाररूपी महासागर का । प्रणव इससे पार करने के लिए (नव) नाव है । इसलिए इस ॐकार को ‘प्रणव’ की संज्ञा देते हैं । ॐकार अपना जप करनेवाले साधकों से कहता है - ‘प्र-प्रपंच, न-नहीं है, वः-तुम लोगों के लिए ।’ अतः इस भाव को लेकर भी ज्ञानी पुरुष ‘ॐ’ को ‘प्रणव’ नाम से जानते हैं । इसका दूसरा भाव है : ‘प्र-प्रकर्षेण, न-नयेत्, वः-युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणवः । अर्थात् यह तुम सब उपासकों को बलपूर्वक मोक्ष तक पहुँचा देगा ।’ इस अभिप्राय से भी ऋषि-मुनि इसे ‘प्रणव’ कहते हैं । अपना जप करनेवाले योगियों के तथा अपने मंत्र की पूजा करनेवाले उपासकों के समस्त कर्मों का नाश करके यह उन्हें दिव्य नूतन ज्ञान देता है, इसलिए भी इसका नाम प्रणव - प्र (कर्मक्षयपूर्वक) नव (नूतन ज्ञान देनेवाला) है ।
           उन मायारहित महेश्वर को ही नव अर्थात् नूतन कहते हैं । वे परमात्मा प्रधान रूप से नव अर्थात् शुद्धस्वरूप हैं, इसलिए ‘प्रणव’ कहलाते हैं । प्रणव साधक को नव अर्थात् नवीन (शिवस्वरूप) कर देता है, इसलिए भी विद्वान पुरुष इसे प्रणव के नाम से जानते हैं अथवा प्र - प्रमुख रूप से नव - दिव्य परमात्म-ज्ञान प्रकट करता है, इसलिए यह प्रणव है ।
           यद्यपि जीवन्मुक्त के लिए किसी साधन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह सिद्धरूप है, तथापि दूसरों की दृष्टि में जब तक उसका शरीर रहता है, तब तक उसके द्वारा प्रणव-जप की सहज साधना स्वतः होती रहती है । वह अपनी देह का विलय होने तक सूक्ष्म प्रणव मंत्र का जप और उसके अर्थभूत परमात्म-तत्त्व का अनुसंधान करता रहता है । जब शरीर नष्ट हो जाता है, तब वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूप शिव को प्राप्त कर लेता है - यह सुनिश्चित है । जो अर्थ का अनुसंधान न करके केवल मंत्र का जप करता है, उसे निश्चय ही योग की प्राप्ति होती है । जिसने इस मंत्र का ३६ करोड़ जप कर लिया हो, उसे अवश्य ही योग प्राप्त हो जाता है । ‘अ’ शिव है, ‘उ’ शक्ति है और ‘मकार’ इन दोनों की एकता है । यह त्रितत्त्वरूप है, ऐसा समझकर ‘ह्रस्व प्रणव’ का जप करना चाहिए । जो अपने समस्त पापों का क्षय करना चाहते हैं, उनके लिए इस ह्रस्व प्रणव का जप अत्यंत आवश्यक है ।
           वेद के आदि में और दोनों संध्याओं की उपासना के समय भी ॐकार का उच्चारण करना चाहिए ।’’
भगवान शिव ने भगवान ब्रह्माजी और भगवान विष्णु से कहा : ‘‘मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ॐकार के रूप में प्रसिद्ध है । वह महामंगलकारी मंत्र है । सबसे पहले मेरे मुख से ॐकार (ॐ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूप का बोध करानेवाला है । ॐकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ । यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है । प्रतिदिन ॐकार का निरंतर स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है ।
            मुनीश्वरो ! प्रतिदिन दस हजार प्रणवमंत्र का जप करें अथवा दोनों संध्याओं के समय एक-एक हजार प्रणव का जप किया करें । यह क्रम भी शिवपद की प्राप्ति करानेवाला है ।
            ‘ॐ’ इस मंत्र का प्रतिदिन मात्र एक हजार जप करने पर सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है ।
    प्रणव के ‘अ’, ‘उ’ और ‘म्’ इन तीनों अक्षरों से जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन होता है - इस बात को जानकर प्रणव (ॐ) का जप करना चाहिए । जपकाल में यह भावना करनी चाहिए कि ‘हम तीनों लोकों की सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, पालन करनेवाले विष्णु तथा संहार करनेवाले रुद्र जो स्वयंप्रकाश चिन्मय हैं, उनकी उपासना करते हैं । यह ब्रह्मस्वरूप ॐकार हमारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों को, मन की वृत्तियों को तथा बुद्धि की वृत्तियों को सदा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले धर्म एवं ज्ञान की ओर प्रेरित करे ।’ प्रणव के इस अर्थ का बुद्धि के द्वारा qचतन करता हुआ जो इसका जप करता है, वह निश्चय ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । अथवा अर्थानुसंधान के बिना भी प्रणव का नित्य जप करना चाहिए ।’’
    (‘शिव पुराण’ अंतर्गत विद्येश्वर संहिता से संकलित) 




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