Spiritual devlopment is the bunch of collection of spiritual satsang, story, tricks and yoga.
गुरुवार, 30 मई 2024
मन
मंगलवार, 28 मई 2024
सारा विश्व मेरा अविनाशी स्वरूप का अभीव्यक्ति
सारा विश्व मेरा अविनाशी स्वरूप का अभीव्यक्ति है। अत्यंत गहन और दार्शनिक है। उद्धृत वाक्य “सारा विश्व मेरा अविनाशी स्वरूप का अभी व्यक्ति है” यह दर्शाता है कि एक ऐसे विचार की ओर इशारा कर रहे हैं जो आत्मा और ब्रह्मांड के अविनाशी स्वरूप को समझने की कोशिश करता है। इस विचार को शब्दों में परिभाषित कर एक विस्तृत विवेचना की मांग करता है, जिसमें आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का समावेश हो।
इस विषय पर एक संक्षिप्त निबंध प्रस्तुत कर , जो इस विचार को विस्तार से समझाने का प्रयास करेगा। यह निबंध एक विचार का प्रतिबिंब होगा और इसमें विभिन्न दार्शनिक और आध्यात्मिक विचारधाराओं के तत्व शामिल होंगे।
अविनाशी स्वरूप: विश्व का अभिन्न अंग-
जब हम विश्व को एक अविनाशी स्वरूप के रूप में देखते हैं, तो हम एक ऐसे दृष्टिकोण की ओर अग्रसर होते हैं जो समस्त जीवन को एक अखंड और अटूट शक्ति के रूप में मानता है। यह विचार विभिन्न दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराओं में पाया जाता है, जहाँ ब्रह्मांड को एक चेतना का प्रतिबिंब माना जाता है जो स्वयं में अविनाशी है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण-
आध्यात्मिकता में, अविनाशी स्वरूप को अक्सर आत्मा या ब्रह्म के रूप में वर्णित किया जाता है। यह वह शक्ति है जो न तो जन्म लेती है और न ही मृत्यु को प्राप्त होती है; यह निरंतर और अविचल है। इस दृष्टिकोण में, सारा विश्व इस अविनाशी शक्ति का एक व्यक्तित्व है, जो विभिन्न रूपों और आकारों में प्रकट होता है।
दार्शनिक विचार-
दार्शनिकों ने भी इस अविनाशी स्वरूप को विभिन्न तरीकों से समझाया है। कुछ ने इसे अनंत चेतना के रूप में देखा है, जबकि अन्य ने इसे विश्व की अंतर्निहित एकता के रूप में माना है। यह विचार कि सभी चीजें एक ही स्रोत से उत्पन्न होती हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाती हैं, विभिन्न दार्शनिक प्रणालियों में प्रमुख है।
वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य-
विज्ञान भी इस अविनाशी स्वरूप के विचार को अपने तरीके से समझता है। भौतिकी में, ऊर्जा का संरक्षण का नियम बताता है कि ऊर्जा न तो सृजित की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है; यह केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है। इसी तरह, ब्रह्मांड के अविनाशी स्वरूप को भी एक अनंत चक्र के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ सब कुछ निरंतर परिवर्तनशील है लेकिन फिर भी एक समग्रता में बना रहता है।
इस प्रकार, अविनाशी स्वरूप का विचार हमें एक ऐसे दृष्टिकोण की ओर ले जाता है जो जीवन और ब्रह्मांड की एकता को स्वीकार करता है। यह हमें यह समझने की ओर प्रेरित करता है कि हम सभी एक ही अविनाशी शक्ति के अभिन्न अंग हैं, जो विभिन्न रूपों में प्रकट होती है और जिसका अस्तित्व सदैव बना रहता है।
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गुरुवार, 23 मई 2024
मनुष्य जन्म का उद्देश्य क्या है?
भारत देश के ऋषियों ने जो अदभुत खोजें की हैं, वैसी खोजें विश्व में कहीं भी नहीं हुई हैं। मनुष्य का स्वभाव तीन गुणों के प्रभाव से संचालित होता है। उनमें से रजो-तमोगुण मनुष्य को अत्यंत दुःखद अनुभव करवाकर उसके वर्तमान जीवन को निकृष्ट बना देता है और फिर वृक्ष, पशु, पक्षी जैसी तुच्छ योनियों में ले जाता है। सत्त्वगुण वर्तमान जीवन को दिव्य बनाता है और स्वर्ग एवं ब्रह्मलोक आदि उच्च लोकों में पहुँचाता है। इसमें भी यदि ब्रह्मवेत्ताओं का प्रत्यक्ष सान्निध्य एवं सत्संग मिले तो तीनो गुणों से पार अपने असली आनंदधन आत्मा को जानकर जीव जीवन्मुक्त हो सकता है।
चलो, अब रजो-तमोगुण के कुप्रभाव एवं सत्त्वगुण के सुप्रभाव को निहारें।
तमोगुणी मानव वर्ग आलसी-प्रमादी होकर, गंदे विषय-विकारों का मन में संग्रह करके बैठे-बैठे या सोते-सोते भी इन्द्रियभोग के स्वप्न देखता रहता है। यदि कभी कर्मपरायण हों तो भी यह वर्ग हिंसा, द्वेष, मोह जैसे देहधर्म के कर्म में ही प्रवृत्त रहकर बंधनों में बँधता जाता है। मलिन आहार, अशुद्ध विचार और दुष्ट आचार का सेवन करते-करते तमोगुणी मानव पुतले को आलसी-प्रमादी रहते हुए ही देहभोग की भूख मिटाने की जितनी आवश्यकता होती है उतना ही कर्मपरायण रहने का उसका मन होता है।
रजोगुणी मनुष्य प्रमादी नहीं, प्रवृत्तिपरायण होता है। उसकी कर्मपरंपरा की पृष्ठभूमि में आंतरिक हेतु रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, दंभ आदि सब भरा हुआ होता है। सत्ताधिकार की तीव्र लालसा और देहरक्षा के ही कर्म-विकर्मों के कंटकवृक्ष उसकी मनोभूमि में उगकर फूलते-फलते हैं। उसके लोभ की सीमा बढ़-बढ़कर रक्त-संबंधियों तक पहुँचती हैं। कभी उससे आगे बढ़कर जहाँ मान मिलता हो, वाहवाही या धन्यवाद की वर्षा होती है, ऐसे प्रसंगों में वह थोड़ा खर्च कर लेता है। ऐसे रजोगुणी मनुष्य का मन भी बहिर्मुख ही कहलाता है। ऐसा मन बड़प्पन के पीछे पागल होता है। उसका मन विषय-विलास की वस्तुओं को एकत्रित करने में लिप्त होकर अर्थ-संचय एवं विषय-संचय करने के खेल ही खेलता रहता है।
इन दोनों ही वर्गों के मनुष्यों का मन स्वच्छंदी, स्वार्थी, सत्ताप्रिय, अर्थप्रिय और मान चाहने वाला होता है और कभी-कभार छल-प्रपंच के समक्ष उसके अनुसार टक्कर लेने में भी सक्षम होने की योग्यता रखता है। ऐसे मन की दिशा इन्द्रियों के प्रति, इन्द्रियों के विषयों के प्रति और विषय भोगों के प्रति निवृत्त न होने पर भोगप्राप्ति के नित्य नवीन कर्मों को करने की योजना में प्रवृत्त हो जाती है। ऐसा मन विचार करके बुद्धि को शुद्ध नहीं करता अपितु बुद्धि को रजोगुण से रँगकर, अपनी वासनानुसार उसकी स्वीकृति लेकर - 'मैं जो करता हूँ वह ठीक ही करता हूँ' ऐसी दंभयुक्त मान्यता खड़ी कर देता है।
ऐसे आसुरी भाव से आक्रान्त लोगों का अनुकरण आप मत करना। राजसी व्यक्तियों के रजोगुण से अनेक प्रकार की वासनाएँ उत्पन्न होती हैं अतः हे भाई ! सावधान रहना। रजो-तमोगुण की प्रधानता से ही समस्त पाप पनपते हैं। जैसे हँसिया, चाकू, छुरी, तलवार आदि भिन्न-भिन्न होते हुए भी उनकी धातु लोहा एक ही है ऐसे ही पाप के नाम भिन्न-भिन्न होने पर भी पाप की जड़ रजो-तमोगुण ही है।
संसार में बहुमत ऐसे वर्ग का ही है। ऐसा वर्ग प्रवृत्तिपरायण कहलाता है। इसके कर्म में मोक्षबुद्धि नहीं होती। अतः यदि इस वर्ग को स्वतंत्र रूप से व्यवहार करने दें तो समाज में ऐसी अव्यवस्था उठ खड़ी होती है जिसके फलस्वरूप सर्वत्र स्वार्थ और दंभरूपी बादल छा जाते हैं, कपट एवं प्रपंच की आँधी चलने लगती है तथा सर्वत्र दुःख और विपत्तियों के प्रहार होने से प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार उठती है। ये दो वर्ग ही यदि परस्पर टकराने लगे तो हिंसा, द्वेष, स्वार्थ और भोगबुद्धि के कर्मों में ही प्रजा लिप्त रहने लगती है और युद्ध की नौबत आ जाती है। प्रत्येक युग एवं प्रत्येक देश में ऐसे ही संहार होता रहता है।
य ह उन्नति का मार्ग नहीं है। अवनति की ओर जाते मानव के लिए आत्मोन्नति के आनंद की ओर चलने के लिए बुद्धि के शोधन की, उसकी विचार शक्ति में विवेक के सूर्य का उदय करने की आवश्यकता है। मन एवं इन्द्रियों को विषयों के स्मरण, चिन्तन, प्राप्ति एवं भोग की जन्म-जन्मांतरों की जो आदत पड़ी हुई है, उनमें असारता का दर्शन होने पर मन उनसे विमुख होता है तब बुद्धि को अपने से भी परे आत्मा की ओर अभिमुख होने की रूचि एवं जिज्ञासा होती है, आत्सरस पीने का सौभाग्य प्राप्त होता है, संसार की मायाजाल से बचने का बल मिलता है।
जब बुद्धि को आत्मनिरीक्षण के लिए विचार करने की भोगमुक्त दशा प्राप्त होती है तब वह प्रत्येक कर्म में विवेक का उपयोग करती है। उस वक्त उसके अन्तःकरण में आत्मा का कुछ प्रकाश पड़ता है, जिससे विषयों का अंधकार कुछ अंश में क्षीण होता है। यह है नीचे से ऊपर जाने वाला तीसरा, आंतर में से प्रकट होने वाला स्वयंभू सुख की लालसावाला, बुद्धि के स्वयं के प्रकाश का भोक्ता – सत्त्वगुण। इस सत्त्वगुण की प्रकाशमय स्थिति के कारण बुद्धि का शोधन होता है। कर्म-अकर्म, धर्म अधर्म, नीति-अनीति, सार-असार, नित्य-अनित्य वगैरह को समझकर अलग करने एवं धर्म, नीति, सदाचार तथा नित्य वस्तु के प्रति चित्त की सहज स्वाभाविक अभिरूचि करने की शक्ति इसी से संप्राप्त होती है।
एक ओर मानवीय जीवन के आंतर प्रदेश में आत्मा (आनंदमय कोष) एवं बुद्धि (विज्ञानमय कोष) है तो दूसरी ओर प्राण (प्राणमय कोष) तथा शरीर (अन्नमय कोष) है। इन दोनों के बीच मन (मनोमय कोष) है। वह जब बहिर्मुख बनता है तब प्राण तथा शरीर द्वारा इन्द्रियाँ विषय-भोगों में लिप्त होकर वैसे ही धर्म-कर्म में प्रवृत्त रहती हैं। यही है मानवीय जीवन की तामसिक एवं राजसिक अवस्था की चक्राकार गति।
परंतु उसी मन (मनोमय कोष) को ऊर्ध्वमुख, अंतर्मुख अथवा आत्माभिमुख करना – यही है मानव जीवन का परम कल्याणकारी लक्ष्य। ऋषियों में परम आनंदमय आत्मा को ही लक्ष्य माना है क्योंकि मनुष्य के जीवनकाल की मीमांसाकरने पर यह बात स्पष्ट होती है कि उसकी सब भाग दौड़ होती है सुख के लिए, नित्य सुख के लिए। नित्य एवं निरावधि सुख की निरंतर आकांक्षा होने के बावजूद भी वह रजो-तमोगुण एवं इन्द्रियलोलुपता के अधीन होकर हमेशा बहिर्मुख ही रहता है। उसकी समस्त क्रियाएँ विषयप्राप्ति के लिए ही होती हैं। उसकी जीवन-संपदा, शारीरिक बल, संकल्पशक्ति आदि का जो भी उसका सर्वस्व माना जाता है वह सब जन्म मृत्यु के बीच में ही व्यर्थ नष्ट हो जाता है।
परंतु उसी मन(अंतःकरण) पर यदि सत्त्वगुण का प्रकाश पड़े तो उसे स्वधर्म-स्वर्म की, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की सूक्ष्म छानबीन करने का सूझता है। सुख-दुःख के द्वन्द्व में उसे नित्य सुख की दिशा सूझती है। दुराचार के तूफानी भँवर में से उसे शांत, गंभीर सत्त्वगुणी गंगा के प्रवाह में अवगाहन करने की समझ आने लगती है। विचार-सदविचार की कुशलता आती है। विचार, इच्छा, कर्म आदि में शुभ को पहचानने की सूझबूझ बढ़ती है। जिससे शुभेच्छा, शुभ विचार एवं शुभकर्म होने लगते हैं।
जन्म मरण जैसे द्वन्द्वों के स्वरूप अर्थात् संसार-चक्र एवं कर्म के रहस्य को समझाते हुए एवं उसी को अशुभ बताते हुए गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।
तरो कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।
'वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभांति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात् कर्मबन्धन से मुक्त हो जाएगा।'
(गीताः 4.16)
धर्म के, पुण्य के नाम अलग-अलग हैं किन्तु उनका मूल है सत्त्व। सत्त्वगुणरूपी जड़ का सिंचन होने से जो विशाल वृक्ष होता है उसमें मीठे फल लगते हैं। वे ही फल आंतरिक सुख, स्वतंत्र सुख, मुक्तिदायी सुख का मार्ग खोल देते हैं। यह जीव गुणों के थपेड़े से बचकर ही अपने गुणातीत स्वरूप में स्थिर हो सकता है एवं आत्म-साक्षात्कार कर सकता है। जिसके ध्यान से ब्रह्माजी, भगवान विष्णु एवं साम्बसदाशिव भी सामर्थ्य एवं अनोखा आनंद पाते हैं उसी चैतन्यस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिए आपका जन्म हुआ है इसका निरंतर स्मरण रखना।
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बुधवार, 15 मई 2024
बुधवारी अष्टमी - BUDHVARI ASHTAMI
बुधवारी अष्टमी को किये गए जप, तप, मौन, दान व ध्यान का फल अक्षय होता है ।
मंत्र जप एवं शुभ संकल्प हेतु विशेष तिथि -
रविवारी सप्तमी
सोमवती अमावस्या
बुधवारी अष्टमी
– ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं। इनमें किया गया जप-ध्यान, स्नान , दान व श्राद्ध अक्षय होता है ।
(शिव पुराण, विद्यश्वर संहिताः अध्याय 10)
बुध अष्टमी व्रत की प्रक्रिया:-
इस दिन, भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं | और गंगाजल मिश्रित जल से निवृत्त होकर दैनिक पूजा संपन्न करते हैं। एक कलश में गंगाजल भरकर चौकी पर रखा जाता है और गणेशजी, शिवजी, मां पार्वती का आह्वान करते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है। बुध ग्रह की मूर्ति या चित्र स्थापित करके उसका पूजन किया जाता है। विभिन्न रंगों के पुष्पों और पांच प्रकार के हरे पत्ते, जैसे आम, अशोक, पीपल, बड़, केले और दूर्वा के साथ पूजन किया जाता है। बुध को मूंग के दाल के पकवानों का भोग लगाया जाता है और बुध के मंत्र 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:' की एक माला जाप की जाती है।
बुध अष्टमी का महत्व-
बुध अष्टमी का महत्व और इसकी पूजा की प्रक्रिया हिंदू धर्म में बहुत गहराई से निहित है। यह व्रत और पूजा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह व्यक्तिगत और आध्यात्मिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है।
आध्यात्मिक महत्व:-
बुध अष्टमी का व्रत और पूजा आध्यात्मिक शुद्धि और संतुलन के लिए की जाती है। यह व्यक्ति को उसके जीवन में आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने में मदद करती है।
ज्योतिषीय महत्व:-
ज्योतिष के अनुसार, बुध ग्रह बुद्धि, संचार, व्यापार, वाणी और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है। बुध अष्टमी का व्रत रखने से बुध ग्रह के दोषों का निवारण होता है और इससे जुड़े जीवन के क्षेत्रों में सुधार होता है।
सामाजिक महत्व:-
बुध अष्टमी का व्रत समाज में एकता और सामूहिक भावना को बढ़ावा देता है। इस दिन लोग सामूहिक रूप से पूजा और अनुष्ठान करते हैं, जिससे समाज में सामंजस्य और शांति की भावना बढ़ती है।
पारिवारिक महत्व:-
बुध अष्टमी के दिन परिवार के सदस्य एक साथ आते हैं और पूजा में भाग लेते हैं। यह परिवार के बीच संबंधों को मजबूत करता है और पारिवारिक सद्भाव को बढ़ाता है।
स्वास्थ्य महत्व:-
व्रत रखने से शारीरिक और मानसिक शुद्धि होती है। यह शरीर को आराम देने और आंतरिक शक्ति को बढ़ाने का एक अवसर प्रदान करता है।
इस प्रकार, बुध अष्टमी का महत्व विभिन्न पहलुओं में देखा जा सकता है और यह हमारे जीवन में एक सकारात्मक और संतुलित प्रभाव डालता है। यह व्रत और पूजा हमें आत्मिक शांति और संतोष की ओर ले जाती है और हमारे जीवन को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करती है।
बुध अष्टमी का वैज्ञानिक विश्लेषण -
बुध अष्टमी, जिसे हिंदू धर्म में बुधवार को पड़ने वाली अष्टमी तिथि के रूप में मनाया जाता है, इसका वैज्ञानिक विश्लेषण करने पर हमें इसके धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व के साथ-साथ इसके मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभावों को भी समझने का अवसर मिलता है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण:-
ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को बुद्धि, संचार, व्यापार, वाणी और शिक्षा का कारक माना जाता है। बुध अष्टमी के दिन विशेष पूजा और व्रत करने से माना जाता है कि बुध ग्रह के दोषों का निवारण होता है और इससे जुड़े जीवन के क्षेत्रों में सुधार होता है।
मनोवैज्ञानिक पहलू:-
व्रत और पूजा की प्रक्रिया में शामिल ध्यान और मंत्रोच्चारण से मन की एकाग्रता और शांति मिलती है। यह तनाव को कम करने और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक होता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव:-
बुध अष्टमी के दिन समाज में एकता और सामूहिकता की भावना को बढ़ावा मिलता है। लोग एक साथ आकर पूजा करते हैं, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं और सामाजिक सद्भाव बढ़ता है।
स्वास्थ्य संबंधी लाभ:-
व्रत रखने से शरीर को आराम मिलता है और पाचन तंत्र को सुधारने में मदद मिलती है। यह शरीर को डिटॉक्सीफाई करने और ऊर्जा के स्तर को बढ़ाने में भी सहायक होता है।
इस प्रकार, बुध अष्टमी का वैज्ञानिक विश्लेषण हमें इसके विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करता है और यह दिखाता है कि कैसे प्राचीन परंपराएं और अनुष्ठान आधुनिक जीवन में भी प्रासंगिक और लाभकारी हो सकते हैं।
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शनिवार, 11 मई 2024
सत्संग
शुक्रवार, 10 मई 2024
निर्गुण-निराकार परमात्मा का दर्शन
संत कबीर से किसी ने पूछाः
“हम निर्गुण-निराकार परमात्मा को तो नहीं देख सकते, फिर भी देखे बिना न रह जायें ऐसा कोई उपाय बताइये।”
कबीर जी ने कहाः
“परमात्मा को देखने के लिए ये चर्मचक्षु काम नहीं आते। फिर भी यदि तुम परमात्मा को देखना ही चाहते हो तो जिनके हृदय में परमात्माकार वृत्ति प्रकट हुई है, जिनके हृदय में समतारूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, जिनके हृदय में अद्वैतज्ञानरूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, ऐसे हृदय वाले किन्हीं महापुरुष को तुम देख सकते हो। उनको देखते ही तुम्हें परमात्मा की याद आ जायेगी। जिनके दिलों में ईश्वर निरावरण हुआ है, ऐसे संत-महापुरुषों को तुम देख सकते हो।”
साधु का ही देह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें तुम उस अलख पुरुष परमात्मा के दर्शन कर सकते हो। अतः यदि अलख पुरुष को देखना चाहते हो तो ऐसे किन्हीं परमात्मा के प्यारे संतों के दर्शन करने चाहिए।
शुद्ध हृदय से, ईमानदारी से उन महापुरुषों का चिंतन करके हृदय को धन्यवाद से भरते जाओगे तो तुम्हारे हृदय में परमात्मा प्रकट होने में देर नहीं लगेगी। परमात्म-प्राप्ति इतनी सरल होने पर भी लोग उसका फायदा तो नहीं उठाते हैं, वरन् संतों के बाह्य व्यवहार को देखकर अपनी क्षुद्र मति से उन्हें तौलने लगते हैं और अपनी ही हानि कर बैठते हैं।
धन्य है ऐसे शिष्यों को कि जो अलख पुरुष की आरसी के समान ब्रह्मवेत्ता संतों को श्रद्धा-भक्ति से निहारते हैं और उनके साथ अंत तक निभा पाते हैं। वे धनभागी हैं जो निंदा अथवा कुप्रचार के शिकार होकर अपनी शांति का घात नहीं करते। उन्हीं के लिए यह कथन फलित होता हैः
ईश्वर प्राप्ति ही अक्षय है
गुरुवार, 9 मई 2024
श्रेष्ठ साधक कैसे बनें ?
मनुष्य आज इतनी-इतनी परेशानियों, समस्याओं और चिंताओं के बोझ से लदा रहता है कि कहाँ सत्संग सुने ?... कब सत्संग को विचारे ?... किस तरह जीवन में उतारे ?... लेकिन बिना सत्संग, जप, अनुष्ठान, सेवा, स्मरण के जीव की सद्गति सम्भव नहीं है । आज ये विचारणीय प्रश्न हैं कि कैसे उसे सांसारिक झंझटों के बीच परमात्म-शांति की अनुभूति हो ? कैसे वह अपने नित्यकर्म में संलग्न रहकर परमात्मा की आराधना से अंतःकरण को पावन करता रहे ?
यह सत्य है कि हम संसार में रहते हैं इसलिए संसार को छोड़ पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है किंतु यह भी तो उतना ही वजनदार सत्य है कि हमारा अमूल्य मनुष्य-जन्म संसार में उलझकर गँवाने के लिए तो कतई नहीं हुआ है । न जाने कितनी-कितनी माताओं के शरीर से, पिताओं के शरीर से गुजरकर, असहनीय यातनाओं को सह के हमने यह अनमोल मानव-शरीर पाया है । अपने सच्चे नाथ का साक्षात्कार करने का दुर्लभ अवसर पाया है । ऐसे सुखद संयोग के बाद भी हम लापरवाह रहे तो कैसे चलेगा ? जरा तो सोचिये कि परमात्मा को, गुरु को क्या मुँह दिखायेंगे ! अतः मनुष्य-जन्म की सार्थकता इसीमें है कि हम अपने सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार करके जीते-जी मुक्त हो जायें ।
जो परम तत्त्व को उपलब्ध होना चाहते हैं, उनके लिए कुछ युक्तियों से और प्रभु की कृपा से यह सहज हो जायेगा । आप एक श्रेष्ठ, सात्त्विक साधक बननेभर का लक्ष्य बना लें । एक उन्नत, जिज्ञासु साधक बननेभर का संकल्प आपको उस अनुभूति से सम्पदावान बना देगा, जो आपकी अपनी विरासत है । एक श्रेष्ठ साधक में कौन-से गुण होने चाहिए, इस बात को गम्भीरतापूर्वक समझ लें । यदि आप एक श्रेष्ठ साधक बनने का लक्ष्य अपने जीवन में रखते हैं तो आप परम तत्त्व के अधिकारी भी बन सकते हैं क्योंकि शुद्ध, सात्त्विक, श्रद्धासम्पन्न अंतःकरण में परमात्म-माधुर्य और ज्ञान स्फुरित होता है । आप थोड़ा चलेंगे तो ईश्वरीय सत्ता आपकी मदद करेगी, बिल्कुल पक्की बात है । ज्यों-ज्यों आप साधना के पथ पर एक-एक कदम आगे बढ़ाते चलेंगे, त्यों-त्यों आपमें उस आनंदस्वरूप को जानने की उत्सुकता बढ़ती जायेगी । उत्सुकता जब तीव्र होगी, लालसा जोर पकड़ेगी तो फिर आप उस यार (परमात्मा) से कहाँ दूर रह पायेंगे !
सर्वप्रथम परमात्म-सुख पाने का लक्ष्य निर्धारित करें । प्रतिदिन का नियम निश्चित करें । एक बार संकल्प ले लें कि ‘मुझे रोज इतनी मालाएँ करनी हैं । माह में इतने दिन मौन रहना है । इतने महीने में मुझे एक अनुष्ठान करना है । प्रतिदिन इतने समय सत्संग सुनना है । सत्शास्त्रों का मनन-अध्ययन करना है । इतना समय सेवा करनी है और व्यवहारकाल में रहते हुए भी मुझे निरंतर सुमिरन करना है ।’ ऐसे आप अंतर्यामी ईश्वर के साथ अनन्यरूप से जुड़ जायेंगे । आरम्भ में ५ मिनट भगवन्नाम लेना शुरू करो । फिर ६, ७, ८, ११ मिनट का नियम ले लो । ‘मैं जैसा-तैसा हूँ, तुम्हारा हूँ । तुम मेरे अंतरात्मा हो, सर्वव्यापक हो । दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं हो, पराये नहीं हो । मेरे अपने हो मेरे प्रभु ! मैं आपको नहीं जानता हूँ लेकिन आप तो मुझे जानते हो । ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ...’
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बुधवार, 8 मई 2024
ईश्वर की नीति
"यह ईश्वरीय विधान है कि मार खाकर भी आदमी को सुधरना पड़ता है। डण्डे खाकर भी सुधरना पड़ता है और अगर मर गये तो नर्कों में जाकर या इतर योनियों में जाकर भी सुधार की प्रक्रिया तो चालू ही रहती है। आगे बढ़ो… आगे बढ़ो… आगे बढ़ो नहीं तो जन्मों और मरो… मरो और जन्मो…..। पुण्य क्या है? पाप क्या है?
समझो, कोई बालक पाँच साल का है। वह पहली क्लास में है तो पुण्य है। बड़ा होने पर भी फिर-फिर से पहली क्लास में ही रहता है तो वह पाप हो जाता है। जिस अवस्था में तुम आए हो उस अवस्था के अनुरूप उचित व्यवहार करके उन्नत होते हो तो वह पुण्य है। इससे विपरीत करते हो तो तुम दैवी विधान का उल्लंघन करते हो। जिस समय जो शास्त्र-मर्यादा के अनुरूप कर्त्तव्य मिल जाय उस समय वह कर्त्तव्य अनासक्त भाव से ईश्वर की प्रसन्नता के निमित्त किया जाय तो वह पुण्य है। घर में महिला को भोजन बनाना है तो ‘मैं साक्षात मेरे नारायण को खिलाऊँगी‘ ऐसी भावना से बनाओगी तो भोजन बनाना पूजा हो जायगा। झाड़ू लगाना है तो ऐसे चाव से लगाओ और चूहे की नाई घर में भोजन बनाते रहो, कूप-मण्डूक बने रहो। सत्संग भी सुनो, साधना भी करो, जप भी करो, ध्यान भी करो, सेवा भी करो और अपना मकान या घर भी सँभालो। जब छोड़ना पड़े तब पूरे तैयार भी रहो छोड़ने के लिए।
अपने आत्मदेव को ऐसा सँभालो। किसी वस्तु में, व्यक्ति में, पद में आसक्ति नहीं। सारा कासारा छोड़ना पड़े तो भी तैयार। इसी को बोलते हैं अनासक्ति योग। जीवन में त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। सब कुछ त्यागने की शक्ति होनी चाहिए। जिनके पास त्यागने की शक्ति होती है वे ही वास्तव में भोग सकते हैं। जिसके पास त्यागने की शक्ति नहीं है वह भोग भी नहीं सकता। त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। यश मिल गया तो यश के त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए, धन के त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए, सत्ता का त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। सत्ता भोगने की इच्छा है और सत्ता नहीं मिल रही है तो आदमी कितना दुःखी होता है! सत्ता मिल भी गई दो-पाँच साल के लिए और फिर चली गई। कुर्सी तोडो-पाँच साल की और कराहना जिन्दगी भर। यही है बाहरी सुख का हाल। विकारी सुख तो पाँच मिनट का और झंझट जिन्दगी भर का। सत्ता मिली तो सत्ता छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। दृश्य दिखा तो बार-बार दृश्य देखने की आसक्ति को छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। धन मिला तो धन का सदुपयोग करने के लिए धन छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। यहाँ तक कि अपना शरीर छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। जब मृत्यु आवे तो बैठे नहीं हरे। चलो, मृत्यु आयी तो आयी, हम तो वही हैं चिदघन चैतन्य, चिदाकाश स्वरूप…. सोऽहं… सोऽहम्।
ऐसे त्यागी को मरने का भी मजा आता है और जीने का भी मजा आता है। पापी आदमी के प्राण नीचे के केंद्रों से निकलते हैं, गुदा, द्वार आदि से। मध्यम आदमी के प्राण नाभि आदि से निकलते हैं। कुछ लोगों के प्राण मुख, आँख, कण्ठ आदि से निकलते हैं। योगेश्वरों के प्राण निरुद्ध होकर तालू से निकलते हैं। आप जप करते हैं, ध्यान करते हैं तो आपके मन और प्राणों को ऊपर के केंद्रों में जीने की आदत पड़ जाती है। प्राण ऊपर के केंद्रों से निकलते हैं तो उन्नत हो जाते हैं। अगर काम-विकार में रहते हैं, भोग-भोगने में और खाने-पीने में रहते हैं और खाए पिए हुए पदार्थ छोड़ने के अंगों में ही आसक्ति है तो फिर वृक्ष आदि की योनि में जाओ जहाँ नीचे से ऊपर की ओर खींचने की प्रवृत्ति होती है। वृक्ष अपना भोग पदार्थ नीचे से उठाकर ऊपर ले जाते हैं। पशु आदि सामने से लेते हैं और पीछे फेंकते हैं। मनुष्य है जो भोग-पदार्थों को ऊपर से लेता है, नीचे को फेंकता है और स्वयं ऊपर उठ जाता है।
अर्थात भोगों को नीचे गिराकर आप योग करो। आसक्ति को, पुरानी आदत को नीचे छोड़कर आप ऊपर उठो। यह है विधान का आदर। ईश्वरीय विधान चाहता है कि तुम ईश्वरीय स्वभाव में जग जाओ। बार-बार गर्भ में जाकर माताओं को पीड़ा मत दो, अपने को पीड़ा मत दो, समाज को पीड़ा मत दो। मुक्त हो जाओ। आपको जो बुद्धि मिली है उसका विकास करो। ईश्वरीय विधान तुमसे यह भी अपेक्षा करता है कि हर परिस्थिति में तुम सम रहने की कोशिश करो। आपमें और ईश्वर में क्या दूरी है, वह जरा खोज लो। आप ईश्वर से मिल लो। कब तक बिछड़े रहोगे? कितना सुंदर है ईश्वरीय विधान! उसमें प्राणिमात्र के हित के सिवाय और कुछ नहीं होता। विधान जितना-जितना व्यापक होता है उतना-उतना बहुजन हिताय होता है।
अपने भाग्य के हम आप विधाता होते हैं। रेल की पटरियाँ बनीं, फिर रेल का भाग्य बन गया कि वह दूसरी जगह नहीं जा सकती। पटरियाँ उसका भाग्य हैं, गति कम या ज्यादा होना यह उसका पुरुषार्थ है। पटरियाँ जब बन रही थीं तब चाहे जिधर की बना सकते थे। पूर्व के जो संबंध आपने बना लिये, जो मान्यताएँ बना लीं, वे पटरियाँ आपने ही तो डाली। अब नयी जगह पर दूसरी पटरियाँ भी डाल सकते हो और पुरानी पटरियों का सदुपयोग भी कर सकते हो। “क्या करें महाराजश्री! अपने भाग्य में लिखा हो तभी संतों के द्वार जा सकते हैं।“ बात ठीक है। संतों के द्वार तक जाने की पटरियाँ तो बन गई हैं लेकिन कितनी गति से जाना यह आपके हाथ की बात है। पटरियाँ तो फिट हो गई हैं। अपनी जीवन की गाड़ी उस पर चलाते हो कि नहीं, यह भी देखना पड़ेगा। आपके आज का कर्म कल का प्रारब्ध बन जाता है। कल का अजीर्ण आज के उपवास से ठीक हो जाता है। कल का कर्जा आज चुका देने से मिट जाता है। कल की कमाई आज के भोग-विलास से नष्ट भी हो जाती है। मनुष्य के जीवन में उसके कर्मों के अनुसार उतार-चढ़ाव आते हैं। इसलिए दैवी विधान को दृष्टि समक्ष रखकर कर्म किए जाते हैं तो मजा आता है। पुरुषार्थ के साथ साथ दैवी विधान को भी ध्यान में रखना चाहिए।
बड़ा आदमी वह होता है जो समय और परिस्थिति के अनुसार अपने आप को बदल लेता है। यदि परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदलता है, तो परिस्थितियाँ उसे बदल डालती हैं। जो अदान-प्रदान करता है, उसकी मूल्यवान निगाह का ध्यान रखता है, जिसके संपर्क में आता है, उसके संपर्क में आता है, उसका मनोबल वृद्धि करता है, उसकी प्रार्थना सुनता है, उसके कल्याण में तत्पर होता है, उसके निराशा दूर करता है, उसका भविष्य के नियम को बनाने वाला होता है।
इसलिए ध्यान में रखिए कि आप क्या कर रहे हैं, आप क्या चाहते हैं, आपके मन का स्वास्थ्य कैसा है, क्या आप संतुष्ट हैं, क्या आप पूर्णता के साथ काम कर रहे हैं, क्या आप ईश्वर के साथ एकत्र जा रहे हैं, क्या आप परिस्थितियों का सामना कैसे कर रहे हैं, क्या आप उनसे डरते हैं, या स्वीकार कर रहे हैं, क्या आपके अधिकारी स्वयं से प्यार करते हैं, या उनकी उपाधियों को, आपके बाजु में आपके पुत्र, या आप उनके बाजु में, क्या आप विश्वासघात कर रहे हैं, या आप विश्वासघात के लिए तैयार हैं, क्या आप खुद को अपने परिवार से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, या आप अपने परिवार को अपने से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, आपके कर्म, आपकी सोच, आपके विचार, आपकी भावनाएं, आपकी आचरण, आपका असर और प्रभाव, आपकी सभी प्रकार की प्रतिक्रियाएँ। कैसा योग्य बन रहे हो। जिस योग्यता के लिए प्रयास कर रहे हो। उसके लिए आपका आत्मा आपका साथ दे। यह है दैवी विधान। यह है उन्नति का मार्ग। यह है विश्व की नीति। यह नीति तो ईश्वर की ही नीति है।"
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मंगलवार, 7 मई 2024
मरम्मत करो !
इस बात ने उस आदमी के मन में घर कर लिया। उसने उसी समय कुत्ते को गोद में से फेंक दिया और मन में प्रतिज्ञा कर ली कि अब कभी कुत्ते को गोद में नहीं लेगा। पर भला कुत्ता यह कैसे समझे! वह तो मालिक को देखते ही दौड़कर उसकी गोद पर चढ़ने लगता। आखिर मालिक को कुछ दिनों तक उसे पीट-पीट कर भगाना पड़ा तब कही उसकी यह आदत छूटी।
तुम लोग भी वास्तव मे ऐसे ही हो। जिस कुत्ते को तुम इतने दीर्घ – काल तक छाती से लगाते आये हो उससे अब अगर तुम छुटकारा पाना भी चाहो तो वह भला तुन्हें इतनी आसानी से कैसे छोड़ सकता है?
अब से तुम उसका लाड करना छोड़ दो और अगर वह तुम्हारी गोद में चढाने आए तो उसकी अच्छी तरह से मरम्मत करो। ऐसा करने से कुछ ही दिनों के अन्दर तुम उससे पूरी तरह छुटकारा पा जाओगे।”
सेवा तत्वज्ञान की झलक
हां, मैं इस कथन से सहमत हूं कि हमने तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को कितना आत्मसात किया है, वह हमारी सेवा कार्य से झलकता है। तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु हमें जीवन के अर्थ, उद्देश्य और हमारे रिश्ते को ईश्वर से समझने में मदद करते हैं। जब हम इन शिक्षाओं को आत्मसात करते हैं, तो हम दूसरों की सेवा करने के लिए अधिक प्रेरित और सक्षम होते हैं।
हमारे सेवा कार्य से पता चलता है कि हम कितने दयालु, करुणामय और समझदार हैं। यह हमें दूसरों के दर्द और पीड़ा को महसूस करने और उन्हें मदद करने की इच्छा देता है। जब हम दूसरों की सेवा करते हैं, तो हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करने में मदद करते हैं और अपने जीवन को अर्थ और उद्देश्य देते हैं।
बेशक, सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने का एकमात्र तरीका नहीं है। हम अपने विचारों, शब्दों और कार्यों के माध्यम से भी इन शिक्षाओं को प्रतिबिंबित कर सकते हैं। हालांकि, सेवा कार्य एक महत्वपूर्ण तरीका है कि हम दूसरों को दिखा सकते हैं कि हमने क्या सीखा है।
यहां कुछ उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने से जुड़ा हो सकता है:
- एक व्यक्ति जो तत्वज्ञान को आत्मसात करता है कि सभी जीवन पवित्र है, वह दूसरों के साथ दयालु और करुणामय व्यवहार करेगा।
- एक व्यक्ति जो सत्संग के माध्यम से दूसरों के अनुभवों से सीखता है, वह दूसरों की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकेगा और उनकी मदद करने के लिए अधिक प्रेरित होगा।
- एक व्यक्ति जो ईश्वर में विश्वास करता है, वह दूसरों की सेवा को ईश्वर की इच्छा को पूरा करने के रूप में देखेगा।
- एक व्यक्ति जो गुरु के मार्गदर्शन का पालन करता है, वह दूसरों की सेवा के लिए अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग करने के लिए अधिक इच्छुक होगा।
कुल मिलाकर, मैं मानता हूं कि सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। यह हमें दूसरों को दिखाने का एक तरीका है कि हमने क्या सीखा है और हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करने में मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
सोमवार, 6 मई 2024
केवल अच्छी बात जान लेना जरूरी नहीं : आचरण में लाना जरूरी
ज्ञान और शिक्षा की प्राप्ति मात्र ही हमारी शिक्षा का अंत नहीं है, बल्कि इसे अपने आचरण में समाहित करना हमारे व्यक्तित्व के रूप में अभिव्यक्ति देता है। अच्छे विचारों को वास्तविकता में परिणत करने की कला हमें एक समर्थ, संवेदनशील और समझदार व्यक्ति बनाती है।
यह आचरण की प्रक्रिया हमें अपने अंदर के सकारात्मक गुणों को विकसित करने में मदद करती है, जो हमें आत्म-समर्पण, संवेदनशीलता और सहयोगी बनाते हैं।
समाज में इस तरह के सकारात्मक आचरण की भूमिका निरंतर बढ़ रही है। एक सकारात्मक सोच और आदर्श आचरण का प्रचार और प्रसार हमारे समाज को एक सशक्त, समर्थ और संवेदनशील समाज के रूप में पुनर्गठित करता है।
इसलिए, हमें न केवल अच्छी बातों को जानने की आवश्यकता है, बल्कि हमें इन आचरणों को अपने जीवन का हिस्सा बनाने की भी आवश्यकता है। अपने आचरण में अच्छे विचारों को व्यक्त करने से हम स्वयं को न केवल समृद्ध बनाते हैं, बल्कि हमारे आस-पास के समाज को भी सकारात्मक दिशा में प्रेरित करते हैं।
चित्त और आत्मा: सत्य की खोज में अंतर्मन का सफर
आत्मा, हिन्दू धर्म की अगम्य सत्ता है। इसे व्यक्ति का अंतर्यात्मा कहा जाता है, जो कि शारीरिक और मानसिक संरचनाओं से पृथक है। यह नाशवान नहीं है और न तो यह उत्पन्न होता है और न ही मरता है। आत्मा अज्ञेय होने के कारण इसका वास्तविक स्वरूप मनुष्य के द्वारा समझा और अनुभव किया जाना कठिन है।
आत्मा का अंतर्मुखी स्वरूप उसकी अज्ञेयता के कारण लोगों के लिए अक्षरशः अदृश्य होता है। वेदान्त और योगदर्शन में, आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है, जो सर्वव्यापी, अज्ञेय, और अविकारी है। यह चेतना का निरंतर स्रोत है और सभी जीवों का आधार है।
अत: आत्मा सब को सदा प्राप्त है, इसमें कोई भेदभाव नहीं है। यह जीवन का आधार है, जिससे सभी संजीवी प्राणियों का संबंध है। परन्तु, मानव चित्त की माया में इसको समझना और अनुभव करना विशेष गंभीरता की जरूरत है।
चित्त का स्वभाव विचारों, भावनाओं, और इच्छाओं का धारण करना है। यह ज्ञान और अज्ञान का केन्द्र है, जो मनुष्य को उसके आत्मा से दूर कर देता है। माया की भ्रांति में, चित्त संसार के मोह में डूब जाता है और अपना स्वरूप भूल जाता है।
इस प्रकार, आत्मा को पहचानने की आवश्यकता है, जो मानव के स्वभाविक धर्म है। योग, ध्यान, और आत्मा की अध्ययन से मनुष्य अपने स्वरूप को पहचान सकता है और चित्त को नियंत्रित करके आत्मा से जुड़ सकता है। इससे मनुष्य अपने असली स्वरूप को समझता है और जीवन में उद्धारण की दिशा में आगे बढ़ता है।
आत्मा को समझना मानव जीवन का उद्धारण है। यह आत्म-संयम, सच्चे ध्यान, और निस्वार्थ भावना के माध्यम से संभव है। आत्मा का अनुभव करने से मनुष्य अपने चित्त को शांति, संतुलन, और आनंद में बदल सकता है और इस प्रकार समृद्ध और समर्पित जीवन जी सकता है।








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