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शुक्रवार, 10 मई 2024

निर्गुण-निराकार परमात्मा का दर्शन





संत कबीर से किसी ने पूछाः

“हम निर्गुण-निराकार परमात्मा को तो नहीं देख सकते, फिर भी देखे बिना न रह जायें ऐसा कोई उपाय बताइये।”

कबीर जी ने कहाः

अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह।

लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह।।




    “परमात्मा को देखने के लिए ये चर्मचक्षु काम नहीं आते। फिर भी यदि तुम परमात्मा को देखना ही चाहते हो तो जिनके हृदय में परमात्माकार वृत्ति प्रकट हुई है, जिनके हृदय में समतारूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, जिनके हृदय में अद्वैतज्ञानरूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, ऐसे हृदय वाले किन्हीं महापुरुष को तुम देख सकते हो। उनको देखते ही तुम्हें परमात्मा की याद आ जायेगी। जिनके दिलों में ईश्वर निरावरण हुआ है, ऐसे संत-महापुरुषों को तुम देख सकते हो।”

साधु का ही देह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें तुम उस अलख पुरुष परमात्मा के दर्शन कर सकते हो। अतः यदि अलख पुरुष को देखना चाहते हो तो ऐसे किन्हीं परमात्मा के प्यारे संतों के दर्शन करने चाहिए।




शुद्ध हृदय से, ईमानदारी से उन महापुरुषों का चिंतन करके हृदय को धन्यवाद से भरते जाओगे तो तुम्हारे हृदय में परमात्मा प्रकट होने में देर नहीं लगेगी। परमात्म-प्राप्ति इतनी सरल होने पर भी लोग उसका फायदा तो नहीं उठाते हैं, वरन् संतों के बाह्य व्यवहार को देखकर अपनी क्षुद्र मति से उन्हें तौलने लगते हैं और अपनी ही हानि कर बैठते हैं।

धन्य है ऐसे शिष्यों को कि जो अलख पुरुष की आरसी के समान ब्रह्मवेत्ता संतों को श्रद्धा-भक्ति से निहारते हैं और उनके साथ अंत तक निभा पाते हैं। वे धनभागी हैं जो निंदा अथवा कुप्रचार के शिकार होकर अपनी शांति का घात नहीं करते। उन्हीं के लिए यह कथन फलित होता हैः

अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह। लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह।।

गुरुवार, 9 मई 2024

श्रेष्ठ साधक कैसे बनें ?


         मनुष्य आज इतनी-इतनी परेशानियों, समस्याओं और चिंताओं के बोझ से लदा रहता है कि कहाँ सत्संग सुने ?... कब सत्संग को विचारे ?... किस तरह जीवन में उतारे ?... लेकिन बिना सत्संग, जप, अनुष्ठान, सेवा, स्मरण के जीव की सद्गति सम्भव नहीं है । आज ये विचारणीय प्रश्न हैं कि कैसे उसे सांसारिक झंझटों के बीच परमात्म-शांति की अनुभूति हो ? कैसे वह अपने नित्यकर्म में संलग्न रहकर परमात्मा की आराधना से अंतःकरण को पावन करता रहे ?


यह सत्य है कि हम संसार में रहते हैं इसलिए संसार को छोड़ पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है किंतु यह भी तो उतना ही वजनदार सत्य है कि हमारा अमूल्य मनुष्य-जन्म संसार में उलझकर गँवाने के लिए तो कतई नहीं हुआ है । न जाने कितनी-कितनी माताओं के शरीर से, पिताओं के शरीर से गुजरकर, असहनीय यातनाओं को सह के हमने यह अनमोल मानव-शरीर पाया है । अपने सच्चे नाथ का साक्षात्कार करने का दुर्लभ अवसर पाया है । ऐसे सुखद संयोग के बाद भी हम लापरवाह रहे तो कैसे चलेगा ? जरा तो सोचिये कि परमात्मा को, गुरु को क्या मुँह दिखायेंगे ! अतः मनुष्य-जन्म की सार्थकता इसीमें है कि हम अपने सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार करके जीते-जी मुक्त हो जायें ।


जो परम तत्त्व को उपलब्ध होना चाहते हैं, उनके लिए कुछ युक्तियों से और प्रभु की कृपा से यह सहज हो जायेगा । आप एक श्रेष्ठ, सात्त्विक साधक बननेभर का लक्ष्य बना लें । एक उन्नत, जिज्ञासु साधक बननेभर का संकल्प आपको उस अनुभूति से सम्पदावान बना देगा, जो आपकी अपनी विरासत है । एक श्रेष्ठ साधक में कौन-से गुण होने चाहिए, इस बात को गम्भीरतापूर्वक समझ लें । यदि आप एक श्रेष्ठ साधक बनने का लक्ष्य अपने जीवन में रखते हैं तो आप परम तत्त्व के अधिकारी भी बन सकते हैं क्योंकि शुद्ध, सात्त्विक, श्रद्धासम्पन्न अंतःकरण में परमात्म-माधुर्य और ज्ञान स्फुरित होता है । आप थोड़ा चलेंगे तो ईश्वरीय सत्ता आपकी मदद करेगी, बिल्कुल पक्की बात है । ज्यों-ज्यों आप साधना के पथ पर एक-एक कदम आगे बढ़ाते चलेंगे, त्यों-त्यों आपमें उस आनंदस्वरूप को जानने की उत्सुकता बढ़ती जायेगी । उत्सुकता जब तीव्र होगी, लालसा जोर पकड़ेगी तो फिर आप उस यार (परमात्मा) से कहाँ दूर रह पायेंगे !


सर्वप्रथम परमात्म-सुख पाने का लक्ष्य निर्धारित करें । प्रतिदिन का नियम निश्चित करें । एक बार संकल्प ले लें कि ‘मुझे रोज इतनी मालाएँ करनी हैं । माह में इतने दिन मौन रहना है । इतने महीने में मुझे एक अनुष्ठान करना है । प्रतिदिन इतने समय सत्संग सुनना है । सत्शास्त्रों का मनन-अध्ययन करना है । इतना समय सेवा करनी है और व्यवहारकाल में रहते हुए भी मुझे निरंतर सुमिरन करना है ।’ ऐसे आप अंतर्यामी ईश्वर के साथ अनन्यरूप से जुड़ जायेंगे । आरम्भ में ५ मिनट भगवन्नाम लेना शुरू करो । फिर ६, ७, ८, ११ मिनट का नियम ले लो । ‘मैं जैसा-तैसा हूँ, तुम्हारा हूँ । तुम मेरे अंतरात्मा हो, सर्वव्यापक हो । दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं हो, पराये नहीं हो । मेरे अपने हो मेरे प्रभु ! मैं आपको नहीं जानता हूँ लेकिन आप तो मुझे जानते हो । ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ...’



   *     *     *     *     *




मंगलवार, 7 मई 2024

सेवा तत्वज्ञान की झलक

 



        हां, मैं इस कथन से सहमत हूं कि हमने तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को कितना आत्मसात किया है, वह हमारी सेवा कार्य से झलकता है। तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु हमें जीवन के अर्थ, उद्देश्य और हमारे रिश्ते को ईश्वर से समझने में मदद करते हैं। जब हम इन शिक्षाओं को आत्मसात करते हैं, तो हम दूसरों की सेवा करने के लिए अधिक प्रेरित और सक्षम होते हैं।

हमारे सेवा कार्य से पता चलता है कि हम कितने दयालु, करुणामय और समझदार हैं। यह हमें दूसरों के दर्द और पीड़ा को महसूस करने और उन्हें मदद करने की इच्छा देता है। जब हम दूसरों की सेवा करते हैं, तो हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करने में मदद करते हैं और अपने जीवन को अर्थ और उद्देश्य देते हैं।

बेशक, सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने का एकमात्र तरीका नहीं है। हम अपने विचारों, शब्दों और कार्यों के माध्यम से भी इन शिक्षाओं को प्रतिबिंबित कर सकते हैं। हालांकि, सेवा कार्य एक महत्वपूर्ण तरीका है कि हम दूसरों को दिखा सकते हैं कि हमने क्या सीखा है।

यहां कुछ उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने से जुड़ा हो सकता है:

  • एक व्यक्ति जो तत्वज्ञान को आत्मसात करता है कि सभी जीवन पवित्र है, वह दूसरों के साथ दयालु और करुणामय व्यवहार करेगा।
  • एक व्यक्ति जो सत्संग के माध्यम से दूसरों के अनुभवों से सीखता है, वह दूसरों की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकेगा और उनकी मदद करने के लिए अधिक प्रेरित होगा।
  • एक व्यक्ति जो ईश्वर में विश्वास करता है, वह दूसरों की सेवा को ईश्वर की इच्छा को पूरा करने के रूप में देखेगा।
  • एक व्यक्ति जो गुरु के मार्गदर्शन का पालन करता है, वह दूसरों की सेवा के लिए अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग करने के लिए अधिक इच्छुक होगा।

कुल मिलाकर, मैं मानता हूं कि सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। यह हमें दूसरों को दिखाने का एक तरीका है कि हमने क्या सीखा है और हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करने में मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

सोमवार, 6 मई 2024

चित्त और आत्मा: सत्य की खोज में अंतर्मन का सफर

 




आत्मा, हिन्दू धर्म की अगम्य सत्ता है। इसे व्यक्ति का अंतर्यात्मा कहा जाता है, जो कि शारीरिक और मानसिक संरचनाओं से पृथक है। यह नाशवान नहीं है और न तो यह उत्पन्न होता है और न ही मरता है। आत्मा अज्ञेय होने के कारण इसका वास्तविक स्वरूप मनुष्य के द्वारा समझा और अनुभव किया जाना कठिन है।


आत्मा का अंतर्मुखी स्वरूप उसकी अज्ञेयता के कारण लोगों के लिए अक्षरशः अदृश्य होता है। वेदान्त और योगदर्शन में, आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है, जो सर्वव्यापी, अज्ञेय, और अविकारी है। यह चेतना का निरंतर स्रोत है और सभी जीवों का आधार है।


अत: आत्मा सब को सदा प्राप्त है, इसमें कोई भेदभाव नहीं है। यह जीवन का आधार है, जिससे सभी संजीवी प्राणियों का संबंध है। परन्तु, मानव चित्त की माया में इसको समझना और अनुभव करना विशेष गंभीरता की जरूरत है।


चित्त का स्वभाव विचारों, भावनाओं, और इच्छाओं का धारण करना है। यह ज्ञान और अज्ञान का केन्द्र है, जो मनुष्य को उसके आत्मा से दूर कर देता है। माया की भ्रांति में, चित्त संसार के मोह में डूब जाता है और अपना स्वरूप भूल जाता है।


इस प्रकार, आत्मा को पहचानने की आवश्यकता है, जो मानव के स्वभाविक धर्म है। योग, ध्यान, और आत्मा की अध्ययन से मनुष्य अपने स्वरूप को पहचान सकता है और चित्त को नियंत्रित करके आत्मा से जुड़ सकता है। इससे मनुष्य अपने असली स्वरूप को समझता है और जीवन में उद्धारण की दिशा में आगे बढ़ता है।


आत्मा को समझना मानव जीवन का उद्धारण है। यह आत्म-संयम, सच्चे ध्यान, और निस्वार्थ भावना के माध्यम से संभव है। आत्मा का अनुभव करने से मनुष्य अपने चित्त को शांति, संतुलन, और आनंद में बदल सकता है और इस प्रकार समृद्ध और समर्पित जीवन जी सकता है।

शनिवार, 13 मई 2023

व्यक्ति आध्यत्मिक होने से क्या लाभ ?

 



व्यक्ति आध्यत्मिक होने से क्या लाभ?प्रथम लाभ   अमरता की प्राप्ति - मनुष्य जब आध्यत्मिक होता है वह अपना संमंध आत्मा परमात्मा से जोड़ता है,

और आत्मा अविनाशी है जरा मरण से रहित है यह भलीभांति समझ लेता है।

अतः स्वयं की अविनाशी स्वरुप का बोध होता है | और अमर हो जाता है |द्वितीय लाभ   चिरंतन  सुख और आनंद की प्राप्ति - जब मनुष्य स्वयं को अमर जान  लेता है उसी समय संसार का क्षणभंगुर स्वरूप को भी जान  लेता है |

वस्तु व्यक्ति परिस्थिति सभी अस्थायी जान कर उससे प्रभावित नहीं होता , 

उन सब का उपयोग कर सदा सुखी रहता है, ममता रहित हो कर समता में प्रतिष्टित होता है |

सारा संसार को स्वयं का लीला समझ कर सदा आनंद में रहता है|

जैसे की सागर में तरंग, फेन, बुलबुले  शोभायमान होते हैं |

ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आने वाला भी सुख  और शांति का प्रसाद पा लेता है |तृतीय लाभ   व्यक्ति सदा निर्भय रहता है , दुःख और कष्ट से रहित होता है- जब स्वयं अविनाशी और संसार क्षण भंगुर जान  लेता है

उसे फिर किस बात  का भय होगा ? अतः सदा निर्भय रहता है |

दुःख और कष्ट उसे प्रभावित नहीं कर पाते |चतुर्थ लाभ    संताप रहित हो जाता है - षड्विकार काम , क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन को और इन के कारणों को भलीभांति जान लेने  से

मन में यह विकार ताप उत्पन्न नहीं कर पाते और संताप रहित हो जाता है |

गुणों के प्रभाव से  विकार ग्रस्त हो भी जाए तो भी उसे शीघ्र ही उपराम हो जाता है | 

पंचम लाभ   वह सर्वज्ञ हो जाता है - 

सृष्टि का आधार स्वरुप परमात्मा को जान कर वह सर्वज्ञ हो जाता है |छठा लाभ   दैवी गुण संपन्न होता है - उद्यम ,साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम, दया, करुणा, क्षमाशील, विद्या , विनय, विवेक आदि गुणों से सु शोभित होता है |सातवां लाभ   वसुधैव कुतुम्वकम -

सारा श्रृष्टि को अपना स्वरुप जान  लेने से

वह सभी को पोषण करता है जैसे मनुष्य अपना  शरीर और परिवार का मनुष्य पालन पोषण और सुरक्षा करता है|



वस्तुवादी होने से क्या नुक्सान ? 

  • अपने को एक शरीर का पुतला मानता है और वह जरा व्याधि मृत्यु के भय  से प्रभावित रहता है |   स्वार्थी , भयातुर , कामातुर, क्रोधी, लोभी, मोहि, अशांत, रुग्ण, खिन्न , रहता है | पुत्र,परिवार, समाज, संसार सभी का शोषण करता है, संग्रही होताहै, सदा दुखी रहता है, पीड़ित रहता है | विलाशिता , भोगी आदि दुर्गुण से प्रभावित रहता है | अंततो गत्वा वह पुनः मनुष्य शरीर को प्राप्त न होकर तिर्यक योनी जैसे किट, पतंग, पशु, पक्षी, जलचर , पेड़ पौधे आदि शरीर पाकर दुःख कष्ट पीड़ा भोगता रहता है |


शुक्रवार, 5 मई 2023

संसार का गुड़ रहस्य


मानव जीवन बहुत दुर्लभ है वो भी भारत जैसे देश में अत्यंत दुर्लभ है। यहाँ जन्म लेने के लिए देवता लोग भी तरसते हैं । क्यों की स्वर्ग तथा अन्य लोक में केवल पुण्य फल का ही भोग भोगते हैं परंतु मानव जन्म में मनुष्य सभी देव, गन्धर्व, किन्नर और सभी लोकों के पूजनीय आत्मतत्त्व कहो, ब्रह्मतत्व कहो या फिर परमपद को प्राप्त कर सकता है। जो की अन्य किसी भी योनि में नहीं प्राप्त कर सकता है। इस लिए देवता लोग भी यहाँ जन्म लेने के लिए तरस ते हैं । 

पर हम संसार में इतने उलझे हुए हैं कि इतनी बड़ी कीमती जीवन हमे बोझ लग रहा है। हम से सरकता जा रहा है। हमे पता ही नहीं चल रहा है। जैसे वह भिकारी की कथा है। कि जीवन भर रास्ता किनारे गड़े हुए सोना की खजाना के ऊपर बैठ कर एक एक पैसा के लिए हात फैलाते फैलाते जीवन पूरा होगया जब गाड़ने के लिए खोदे तो सोना का खजाना निकाला। ऐसे ही हमारा उस सोने से भी कीमती जीवन व्यर्थ के सांसारिक चीजो को संभालने में खो देंगे और आत्मधन से वंचित रह जायेंगे। पता ही नहीं चल रहा है कि कैसे कल का बचपन, जवानी बीत गया और आगे की समय भी सरकता जा रहा है। चलो जबतक पता नहीं था तब तक तो ठीक है । अब जब पता चला तब तो संभल जाएं। नहीं तो व्यर्थ ही जीवन खोना पड़ेगा। यहाँ प्रकृति माता की बड़ी विचित्र लीला है। अब इस को समझें।

प्रकृति माता हमारे सभी जीवों के माता है। हमारे पालन पोषण में हमेशा ही अनादि काल से निमग्न है, आनंदित है। हमे इस शरीर रूपी कपड़ा पहना कर बेटा, बेटी, पोता, पोती, हाथी, घोड़ा, सोना, चाँदी आदि खिलौना दे रखा है। कि हम इस में ही खेलते  ही रहें । हम अच्छे खेलते हैं तो हमे राजा,मंत्री, ऑफीसर, धनी, पंडित, देवता, गन्धर्व के शरीर रूपी कपड़ा पहना कर अच्छा अच्छा खिलौना देता है। अगर हम कीचड़ खेलते हैं तो हमे अच्छा कपड़ा नहीं देती जैसे एक साधारण माँ भी करती है। फिर हमें ग़रीब ला चार रूपी साधारण कपड़ा देती है। और नरक, दरिद्र, बीमारी रूपी तालाब में डाल कर रगड़ रगड़ कर धोती है और टूटी फूटी खिलौना देती है या तो वो भी नहीं देती है। हम सुधर जाएँ ऐसी शिक्षा देती है। हम जब इस खिलौना खेल खेल कर ऊब जाते हैं उसी को ही पुकारते हैं तब हमें गुरु रूपी गोद में लेकर संत,भक्त,जोगी, तपि का शरीर रूपी कपड़ा पहना कर ज्ञान, भक्ति रूपी स्तनों से आनंद रूपी दुग्धामृत का पान कराती है। और उसकी गोद में सुलाती है । जिसको सभी ज्ञानी जन मुक्ति, शांति, निर्वाण आदि नाम से जानते हैं।

यही रहस्य को जानने से राजपुत्र सिद्धार्त गौतम बुद्ध बन गए और कोई विस्वामित्र,व्यास, वाल्मीकि,बनगए तो कोई भीमभोई । ऐसे कई हज़ार कई करोड़ लोग अनादि काल से प्रकृति माता के गोद में आकर गए हैं।
संत भक्त लोग यह भी बताकर गये हैं कि सभीलोग वही परम पद को पाने की अधिकारी हैं । सभी पा सकते हैं। बस उस रास्ते में पैर रखने की देर है। जो की हमको करना है कोई जबर्दस्ती हमे धकेल नहीं सकता अगर धकेलेगा तो भी हम चल नहीं सकते जबतक हमारा इच्छा नहीं होगी। इस में हम स्वतंत्र हैं। जो चल पड़ा वो सतभागी है। चलने के लिए सभी को कहीं जंगल में जाना नहीं है। किसी सड़क पे चलना नहीं है। अपना मन को ही किसी सद्गुरु के बताये अनुसार चलाना है। इस के लिए प्रारम्भ में कोई मंत्र तंत्र की आवश्यकता नहीं है। बस समय निकाल कर अकेले में घर में कहीं बैठ कर उसी को ही मन ही मन पुकारना है । 10 मिनिट से ले कर जितने अधिक हो सके।एक बार से ले कर दिन में दो ,पांच सात बार जैसे भाव आता है ऐसा ही पुकारे वो सभी भाषा समझता है। संसारी बिकार, राग द्वेष, झगड़ा, से जितने अपने को बचाएंगे उतना ही हमे अधिक लाभ होगा।

भगवान एक हैं जो जिस किसी रूप में भी पूजा करे तो भी उस तक पहुचेगा। इसके लिए कोई बंधन नहीं है। फिर भी पंचदेव(विष्णु, शिव, शक्ति, गणपति, सूर्य ) में से किसी को भी पूजना अपना हिन्दू संस्कृति में कहा गया है सभी कल्याणकारी हैं।

भगवान सर्वव्यापी है अर्थात यहाँ भी हैं। सर्व काल में हैं अर्थात अभी भी हैं । पूर्ण रूप में हैं अर्थात पूर्ण समर्थ के साथ हैं । और सर्व सुलभ हैं। वो कोई पैसा या और कोई चीजों से नहीं मिलते । बस मन से ही पुकारने की देर है। हम जब एक कदम उसके और चलते हैं तो वो हजार कदम अपने और दौड़ कर आता है जैसे एक माँ अपने छोटे बच्चे की तरफ आता है।


गुरुवार, 17 सितंबर 2015

मानव धर्म



   

        शास्त्रों में आया है कि सभी प्राणियों में मानव श्रेष्ठ है किन्तु केवल इतने से ही आप मान लो कि 'हाँ, हम वास्तव में मानव हैं एवं इतर (अन्य) प्राणियों से श्रेष्ठ हैं' – यह पर्याप्त नहीं है। इस श्रेष्ठता को सिद्ध करने की जवाबदारी भी मानव के ऊपर है। केवल दस्तावेज के बल पर कोई मनुष्य श्रेष्ठ नहीं हो जाता। उसे तो अपनी जीवन-शैली एवं रहन-सहन से साबित करना पड़ता हैः "मैं मानव हूँ, मानव कहलाने के लिए ये गुण मेरे जीवन में हैं और मानवता से पतित करने वाले इन-इन दुर्गुणों से मैं दूर रहता हूँ।"
यहाँ हम मानवता में जो दोष प्रविष्ट हो जाते हैं, उनकी चर्चा करेंगे।

'मनुस्मृति' कहती है कि मानवजीवन में दस दोष का पाप नहीं होने चाहिए – चार वाणी के पाप, तीन मान के पाप एवं तीन शरीर के पाप। अब क्रमानुसार देखें।

वाणी के चार पापः
1-परुष भाषण अर्थात् कठोर वाणीः कभी-भी कड़वी बात नहीं बोलनी चाहिए। किसी भी बात को मृदुता से, मधुरता से एवं अपने हृदय का प्रेम उसमें मिलाकर फिर कहना चाहिए। कठोर वाणी का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।
गुरु ने शिष्य को किसी घर के मालिक की तलाश करने के लिए भेजा। शिष्य जरा ऐसा ही था – अधूरे लक्षणवाला। उसने घर की महिला से पूछाः
"ए माई ! तेरा आदमी कहाँ है ?"
महिला क्रोधित हो गयी और उसने चेले को भगा दिया। फिर गुरुजी स्वयं गये एवं बोलेः
"माता जी ! आपके श्रीमान् पतिदेव कहाँ है ?"
उस महिला ने आदर के साथ उन्हें बिठाया एवं कहाः "पतिदेव अभी घर आयेंगे।"
दोनों ने एक ही बात पूछी किन्तु पूछने का ढंग अलग था। इस प्रकार कठोर बोलना यह वाणी का एक पाप है। वाणी का यह दोष मानवता से पतित करवाता है।

2-अनृत अर्थात् अपनी जानकारी से विपरीत बोलनाः हम जो जानते हैं वह न बोलें, मौन रहें तो चल सकता है किन्तु जो बोलें वह सत्य ही होना चाहिए, अपने ज्ञान के अनुसार ही होना चाहिए। अपने ज्ञान का कभी अनादर न करें, तिरस्कार न करें। जब हम किसी के सामने झूठ बोलते हैं तब उसे नहीं ठगते, वरन् अपने ज्ञान को ही ठगते हैं, अपने ज्ञान का ही अपमान करते हैं। इससे ज्ञान रूठ जाता है, नाराज हो जाता है। ज्ञान कहता है कि 'यह तो मेरे पर झूठ का परदा ढाँक देता है, मुझे दबा देता है तो इसके पास क्यों रहूँ ?' ज्ञान दब जाता है। इस प्रकार असत्य बोलना यह वाणी का पाप है।

3-पैशुन्य अर्थात् चुगली करनाः इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करना। क्या आप किसी के दूत हैं कि इस प्रकार संदेशवाहक का कार्य करते हैं ? चुगली करना आसुरी संपत्ति के अंतर्गत आता है। इससे कलह पैदा होता है, दुर्भावना जन्म लेती है। चुगली करना यह वाणी का तीसरा पाप है।

4-असम्बद्ध प्रलाप अर्थात् असंगत भाषणः प्रसंग के विपरीत बात करना। यदि शादी-विवाह की बात चल रही हो तो वहाँ मृत्यु की बात नहीं करनी चाहिए। यदि मृत्यु के प्रसंग की चर्चा चल रही हो तो वहाँ शादी-विवाह की बात नहीं करनी चाहिए।
इस प्रकार मानव की वाणी में कठोरता, असत्यता, चुगली एवं प्रसंग के विरुद्ध वाणी – ये चार दोष नहीं होने चाहिए। इन चार दोषों से युक्त वचन बोलने से बोलनेवाले को पाप लगता है।

मन के तीन पापः
परद्रव्येष्विभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम्।
वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम्।।

1-दूसरे के धन का चिंतन करनाः दूसरे के पास इतना सारा धन है ! उसे कैसे हड़प कर लें ? इसका चिन्तन न करें। वरन् स्वयं परिश्रम करें, द्रव्य उत्पन्न करें, आदान-प्रदान करें, विनिमय करें। दूसरे के धन की चिन्ता करते रहोगे तो मन जलने लगेगा। परिणामस्वरूप न जाने वह कैसा कुकर्म करवा दे ! दूसरे के धन-वैभव का चिंतन करना यह मानसिक पाप है, इससे बचना चाहिए

2-दूसरे के अनिष्ट का चिंतन करनाः ऐसा मत समझना कि केवल मन में ऐसा विचारने से कोई पाप नहीं लगता। नहीं, मन में दूसरे के नुक्सान का विचार करने से भी पाप लगता है क्योंकि मन में संकल्प होता है तब उसका मंथन भी होने भी लगता है। शरीर में भी वैसे ही रसायन बनने लगते हैं एवं वैसी ही क्रियाएँ भी होने लगती हैं। किसी के लिए अनिष्ट विचार आया तो समझो आपके मन में पाप का बीज बो दिया गया ! वह अंकुरित होकर धीरे-धीरे वृक्ष का रूप भी ले सकता है, आपको पापपरायण बना सकता है। अतः किसी को तकलीफ हो ऐसा मन में विचार तक नहीं करना चाहिए। यह मानसिक पाप है, इससे सावधानीपूर्वक बचना चाहिए।

3-वितथाभिनिवेशः जो बात हम नहीं जानते उसे सत्य मानकर चलना। ऐसी मान्यता बना लेना यह मन का तीसरा पाप है।
सत्य क्या है ? अबाधित्वं सत्यत्वं। जिसका कभी बाध न हो वह है सत्य। हम उस सत्य को नहीं जानते किंतु जानने का दावा करने लग जाते हैं। आत्मारामी संतों का अनुभव ही सचोट होता है, बाकी तो सब लोग मन-इन्द्रियों के जगत में अपने-अपने मत-पंथ-मजहब को महत्त्व देकर अपनी मान्यता पुष्ट करते हैं। सत्य मान्यताओं के आधार पर नहीं टिका होता परंतु जो तमाम मान्यताएँ मानता है उस मन को जहाँ से सत्तास्फूर्ति मिलती है वह है अबाधित सत्यस्वरूप आत्मदेव। उसी में महापुरुष विश्रांति पाये हुए होते हैं एवं उन महापुरुषों के वचन प्रमाणभूत माने जाते हैं जिन्हें शास्त्र 'आप्तवचन' कहते हैं।
जिस धर्म में ऐसे ब्रह्मवेत्ताओं का मार्गदर्शन नहीं लिया जाता, उस धर्म-संप्रदाय के लोग जड़ मान्यताओं में ही जकड़कर जिद्दी एवं जटिल हो जाते हैं। यह जिद और जटिलता मन का तीसरा दोष है। दूसरे को तुच्छ मानता, जिद्दी एवं जटिल रहना यह इस दोष के लक्षण हैं।


शरीर के तीन पापः
अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः।
परदारोपसेवा च शरीरं त्रिविधं स्मृतम्।।
'पराये हक का लेना, अवैधानिक हिंसा करना, पर-स्त्री का संग करना – ये तीन शारीरिक पाप कहे जाते हैं।'

1-लोभकृत पापः आपके पास जो भी चीज है, वह आपके हक की होनी चाहिए। पिता-पितामह की तरफ से वसीयत के रूप में मिली हो, अपने परिश्रम से न्यायपूर्वक प्राप्त की हो, खरीदी हो, किसी ने दी हो अथवा किसी राज्य पर विजय हासिल कर प्राप्त की हो तो भी ठीक है। किंतु किसी की वस्तु को उसकी अनुमति अथवा जानकारी के बिना ले लेना यह शारीरिक पाप है। जो वस्तु आपके हक की नहीं है, जो आपको दी भी नहीं गयी है ऐसी दूसरे की वस्तु को हड़प लेना यह लोभकृत पाप है।

2-क्रोधकृत पापः हिंसा चैवाविधानतः। जो धर्मानुसार एवं संविधानुसार नहीं है ऐसे कृत्य का आचरण यह शारीरिक पाप है। जिससे अपनी और अपने पड़ोसी की, दोनों की लौकिक, पारलौकिक एवं आध्यात्मिक उन्नति हो, उसमें रूकावट न आये ऐसा कर्म धर्म है और ऐसे धर्म को भंग करना यह पाप है।
हिंसा दो प्रकार की होती हैः कानूनी और गैर-कानूनी। जब जल्लाद किसी को फाँसी पर लटकाता है, सैनिक आक्रमणकारी शत्रुदेश के सैनिक पर बंदूक चलाता है तो यह कानूनी हिंसा अपराध नहीं मानी जाती, वरन् उसके लिए वेतन दिया जाता है। हमारे शास्त्रीय संविधान के विरुद्ध जो हिंसा है वह हमारे जीवन में नहीं होनी चाहिए। मानवता को सुदृढ़ बनाने कि लिए, सुरक्षित रखने के लिए और गौरवान्वित करने के लिए हमारे जीवन से, वाणी से, सकल्प से किसी को कष्ट न हो इसका ध्यान रखना चाहिए। हम जो करें, जो कुछ बोलें, जो कुछ लें, जो कुछ भोगें, उससे अन्य को तकलीफ न हो इसका यथासंभव ध्यान रखना चाहिए। यह मानवता का भूषण है।

3-कामकृत पापः पर-स्त्री के साथ संबंध यह कामकृत पाप है।
न ही दृशं अनावेश्यं लोके किंचन विद्यते।
पर स्त्री के साथ संबंध से बढ़कर शरीर को रोग देने वाला, मृत्यु देने वाला, आयुष्य घटाने वाला अन्य कोई दोष नहीं है। मानव की मर्यादा का यह उल्लंघन है। यह मर्यादा मानव की खास-विशेषता है। पशु, पक्षी, देवता अथवा दैत्यों में यह मर्यादा नहीं होती।
जैसे लोभ एक विकार है, क्रोध एक विकार है, वैसे ही काम भी एक विकार है। यह परंपरा से आता है। माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी के मन में भी यह था। इस प्राकृतिक प्रवाह को मर्यादित करने का उपाय अन्य किसी योनि में नहीं है। मनुष्य जीवन में ही उपाय है कि विवाह संस्कार के द्वारा माता-पिता, सास-ससुर एवं अग्नि को साक्षी बनाकर विवाह का संबंध जोड़ा जाता है। उस विवाह के बाद ही पति-पत्नी यज्ञ के अधिकारी होते हैं। 'पत्नी' शब्द का भी इसी अर्थ में उपयोग किया जाता है – 'त्युनो यज्ञसंयोग।' यज्ञ में, धर्मकार्य में जो सहधर्मिणी हो, सहभागिनी हो वह है पत्नी। यह पवित्र विवाह संस्कार धर्म की दृष्टि से मानव को सर्वोत्कृष्ट, संयमी एवं मर्यादित बनाता है। जिससे मानवता की सुरक्षा होती है उस आचार, विचार, विधि, संस्कार एवं मर्यादा का पालन मानव को अवश्य करना चाहिए। मर्यादा अर्थात् क्या ? 'मर्यि' अर्थात् मानव जिसे धर्मानुसार, ईश्वरीय संविधान के अनुसार आत्म-दृष्टि से, मानवता की दृष्टि से अपने जीवन में स्वीकार करे। जिसमें कोई मर्यादा नहीं है वह मर्यादाहीन जीवन मनुष्य जीवन नहीं, पशु जीवन कहलाता है।
यहाँ हमने मानवता को दूषित करने वाली चीजों की मीमांसा की। उनसे सावधानीपूर्वक बचना चाहिए। अब मनुष्यता को उज्जवल करने वाली बातों के विषय में विचार करेंगे। इन बातों को, मानवता की इन विशेषताओं को समझे। धर्म को कहीं से उधार नहीं लेना है अपितु वह हमारे ही अंदर स्थित है, उसे प्रगट करना पड़ता है। हीरे में चमक बाहर से नहीं भरनी पड़ती, किंतु हीरे को घिसकर उसके भीतर की चमक को प्रगट करना पड़ता है।


धर्म में चार बातें-
1-अनुशासनः धर्म में पहली बात यह है कि वह मनमाना नहीं होना चाहिए। शास्त्र एवं गुरु के अनुशासन के बिना जिसे अपने मन से ही धर्म मान लेते हैं वह धर्म अहंकार बढ़ाने वाला होता है एवं गलत मार्ग पर ले जाता है। अभिमान ऐसे ही गलत मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करता रहता है। मनमुख होकर स्वीकार किया गया धर्म सफलता मिलने पर अहंकार बढ़ाता है और असफलता मिलने पर दूसरों पर दोषारोपण की कुबुद्धि जगाता है।
धर्म में अनुशासन होना अत्यंत जरूरी है। वह अनुशासन चाहे शास्त्र का हो, सदगुरु का हो, माता-पिता का हो या अन्य किसी सुज्ञ हितैषी का हो लेकिन होना जरूर चाहिए। किसी के अनुशासन में कोई कार्य किया जाता है तो सफलता मिलने पर अधिमान नहीं आता और विफल होने पर दूसरों पर दोषारोपण की कुबुद्धि नहीं जगती।

2-आश्रयः धर्म में दूसरी बात है आश्रय की। ईश्वर का आश्रम लेकर जिस धर्म का आचरण करेंगे उससे हमारी क्रियाशक्ति बनी रहेगी, क्षीण नहीं होगी। किसी बड़े का आश्रय न हो तो मन में सफलता के विषय में शंका उठती है, कार्य पूर्ण होने में संदेह होता है। कार्य के परिणाम में संदेह उठने से निष्क्रियता आ जाती है, हमारी शक्ति क्षीण हो जाती है। अतः अनुशासन के साथ-साथ धर्म में ईश्वर एवं सदगुरु का आश्रय आवश्यक है।

3-संयमः धर्म में तीसरी बात आती है – अमर्यादित रूप से बढ़ती हुई वासना को रोकना अर्थात् संयम करना। जो लोग अपने जीवन में बिना किसी मर्यादा के वासना बढ़ा देते हैं, वे बड़े दुःखी हो जाते हैं। उदाहरण के लिये, किसी की वार्षिक आय एक लाख रूपये है। उसकी आय बढ़ी तो वासना बढ़ी और खर्च के रंग-ढंग भी बढ़े। वार्षिक व्यय तीन लाख तक पहुँचा जबकि आय डेढ़ लाख हो गयी थी। तीन लाख का व्यय डेढ़ लाख पर लाना कठिन हो गया। अतः आशा एवं इच्छा के पैर धीरे-धीरे पसारने चाहिए। एकाएक ऐसी आशा न करें जिससे आधा कार्य होने पर सुख मिलने की जगह आधा कार्य न होने का दुःख सताने लगे।

4-कर्म की उत्तमताः धर्म में चौथी महत्वपूर्ण बात हैः "मैं ही धर्म पूरा कर लूँगा।" ऐसा मानकर किसी धर्म का प्रारंभ न करें। "मैं ही करूँगा, मेरे भाई करेंगे, मेरी संतानें करेंगी। कोई उत्तम धर्मकार्य मेरे द्वारा पूर्ण हो जाय तो अच्छी बात है। वह कार्य किन्हीं अन्य लोगों के द्वारा पूर्ण हो तो भी एषणीय है।" कोई कार्य 'केवल मेरे लिए ही अच्छा है' ऐसा निर्णय करके ही न करें। 'जो कोई जब भी यह कार्य करेगा तो वह कार्य उसके लिए भी अच्छा ही होगा।' इस प्रकार कर्म के स्वरूप की उत्तमता का बोध होना चाहिए।
स्वर्ग से गंगाजी को धरती पर लाना था। राजा अंशुमान ने पुरुषार्थ किया, कार्य पूरा न हुआ। अंशुमान के पुत्र ने कार्य चालू रखा किन्तु उनका भी जीवन पूरा हो गया। गंगाजी को पृथ्वी पर लाना – यह उत्तम कार्य था तो तीसरी पीढ़ी में भगीरथ ने यह कार्य पूरा किया। यदि राजा अंशुमान विचारते कि 'यह कार्य मेरे जीवनकाल में पूर्ण हो जाय, ऐसा नहीं है' तो कार्य का प्रारंभ ही न हो पाता।

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमाना।
प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति।।

'कार्य में विघ्न आयेगा' ऐसे भय से कार्य का प्रारंभ ही न करना यह हीन पुरुष का लक्षण है। मध्यम पुरुष कार्य का प्रारंभ तो कर देता है किंतु बीच में विघ्न आने पर कार्य छोड़ देता है। उत्तम पुरुष का यह लक्षण है कि बार-बार विघ्न आये, आघात पड़े, घायल हो जाय फिर भी कार्य को अधूरा नहीं छोड़ता। उसकी दृष्टि में यदि कार्य उत्तम होता है तो बीच में आने वाले विघ्नों की वह कोई परवाह नहीं करता।
हम जो सत्कार्य करते हैं उससे हमें कुछ मिले – यह जरूरी नहीं है। किसी भी सत्कार्य का उद्देश्य हमारी आदतों को अच्छी बनाना है। हमारी आदते अच्छी बनें, स्वभाव शुद्ध, मधुर हो और उद्देश्य शुद्ध आत्मसुख पाने का हो। जीवन निर्मल बने इस उद्देश्य से ही सत्कार्य करने चाहिए।
किसी को पानी पिलायें, भोजन करायें एवं बदले में पच्चीस-पचास रूपये मिल जायें – यह अच्छे कार्य करने का फल नहीं है। अच्छे कार्य करने का फल यह है कि हमारी आदतें अच्छी बनें। कोई ईनाम मिले तभी सुखी होंगे क्या ?प्यासे को पानी एवं भूखे को भोजन देना यह कार्य क्या स्वयं ही इतना अच्छा नहीं है कि उस कार्य को करने मात्र से हमें सुख मिले ? है ही। उत्तम कार्य को करने के फलस्वरूप चित्त में जो प्रसन्नता होती है, निर्मलता का अनुभव होता है उससे उत्तम फल अन्य कोई नहीं है। यही चित्त का प्रसाद है, मन की निर्मलता है, अंतःकरण की शुद्धि है कि कार्य करने मात्र से प्रसन्न हो जायें। अतः जिस कार्य को करने से हमारा चित्त प्रसन्न हो, जो कार्य शास्त्रसम्मत हो, महापुरुषों द्वारा अनुमोदित हो वही कार्य धर्म कहलाता है। मनु महाराज कहते हैं-
यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात् परितोषोऽन्तरात्मनः।
तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।।

'जिससे अंतःकरण निर्मल हो, हृदय परितृप्त हो, उस कार्य को प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए, उससे विपरीत कार्य का त्याग करना चाहिए।'
जिस प्रकार सरोवर में जा मिलने वाला गंदा पानी ठहरकर निर्मल हो जाता है, उसकी तरंगे शांत हो जाती हैं ऐसे ही सत्कृत्य करते-करते हमारा मन निर्मल होने लगता है, शांत होने लगता है – यह सबसे बड़ा फल है। कार्य के बदले में दूसरा कुछ पाने की इच्छा रखना यह घाटे का धंधा करने के समान है।
तात्पर्य यह है कि कर्म में अनुशासन होना चाहिए – यह है बुद्धि के लिए आश्रय। कर्म में बड़ों का सहारा होना चाहिए – यह है श्रद्धा के लिए आश्रय। कर्म को अच्छे ढंग से पूर्ण करना चाहिए। हम जो-जो कार्य करें, उसका हमें सतोंष होना चाहिए।
मानव जीवन कर्म एवं ज्ञान के समन्वय से ही ठीक से चलता है। हम आँख से देखते हैं वह ज्ञान है, पैर से चलते हैं वह कर्म हैं। हम जितना-जितना आगे देखेंगे उतना-उतना चल सकेंगे। जैसे-जैसे चलते जायेंगे, वैसे-वैसे आगे दिखता जायेगा। इस प्रकार कर्म एवं ज्ञान के समन्वय से ही जीवन-रथ परम लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता रहता है। जीवन में केवल कर्म होगा तो जीवन यंत्रवत् बन जायेगा एवं केवल ज्ञान होगा तो जीवन में अकर्मण्यता आ जायेगी। अतः जीवन को यदि सही रूप से चलाना हो तो ज्ञान एवं कर्म का समन्वय करके चलाना चाहिए।



जीवन में इतनी भावुकता न आ जाय कि हम समझदारी से ही परे हो जायें ! जीवन में भावुकता भले रहे, प्रेम रहे, भक्ति रहे परंतु अति भावुकता, अति पक्षपात भले रहे, प्रेम रहे, भक्ति रहे परंतु अति भावुकता, अति पक्षपात न हो जिससे विवेक ही छूट जाय। विवेकशून्य होने से तो बड़ी हानि होती है। ऐसी बुद्धिहीन भावुकता तो पशुओं में भी दृष्टिगोचर होती है। अतः सदैव सावधानी एवं बुद्धिपूर्वक जीवन-सरिता का प्रवाह प्रवाहित होना चाहिए।