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गुरुवार, 23 मई 2024

मनुष्य जन्म का उद्देश्य क्या है?

 




       भारत देश के ऋषियों ने जो अदभुत खोजें की हैं, वैसी खोजें विश्व में कहीं भी नहीं हुई हैं। मनुष्य का स्वभाव तीन गुणों के प्रभाव से संचालित होता है। उनमें से रजो-तमोगुण मनुष्य को अत्यंत दुःखद अनुभव करवाकर उसके वर्तमान जीवन को निकृष्ट बना देता है और फिर वृक्ष, पशु, पक्षी जैसी तुच्छ योनियों में ले जाता है। सत्त्वगुण वर्तमान जीवन को दिव्य बनाता है और स्वर्ग एवं ब्रह्मलोक आदि उच्च लोकों में पहुँचाता है। इसमें भी यदि ब्रह्मवेत्ताओं का प्रत्यक्ष सान्निध्य एवं सत्संग मिले तो तीनो गुणों से पार अपने असली आनंदधन आत्मा को जानकर जीव जीवन्मुक्त हो सकता है।


        चलो, अब रजो-तमोगुण के कुप्रभाव एवं सत्त्वगुण के सुप्रभाव को निहारें।

        तमोगुणी मानव वर्ग आलसी-प्रमादी होकर, गंदे विषय-विकारों का मन में संग्रह करके बैठे-बैठे या सोते-सोते भी इन्द्रियभोग के स्वप्न देखता रहता है। यदि कभी कर्मपरायण हों तो भी यह वर्ग हिंसा, द्वेष, मोह जैसे देहधर्म के कर्म में ही प्रवृत्त रहकर बंधनों में बँधता जाता है। मलिन आहार, अशुद्ध विचार और दुष्ट आचार का सेवन करते-करते तमोगुणी मानव पुतले को आलसी-प्रमादी रहते हुए ही देहभोग की भूख मिटाने की जितनी आवश्यकता होती है उतना ही कर्मपरायण रहने का उसका मन होता है।

        रजोगुणी मनुष्य प्रमादी नहीं, प्रवृत्तिपरायण होता है। उसकी कर्मपरंपरा की पृष्ठभूमि में आंतरिक हेतु रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, दंभ आदि सब भरा हुआ होता है। सत्ताधिकार की तीव्र लालसा और देहरक्षा के ही कर्म-विकर्मों के कंटकवृक्ष उसकी मनोभूमि में उगकर फूलते-फलते हैं। उसके लोभ की सीमा बढ़-बढ़कर रक्त-संबंधियों तक पहुँचती हैं। कभी उससे आगे बढ़कर जहाँ मान मिलता हो, वाहवाही या धन्यवाद की वर्षा होती है, ऐसे प्रसंगों में वह थोड़ा खर्च कर लेता है। ऐसे रजोगुणी मनुष्य का मन भी बहिर्मुख ही कहलाता है। ऐसा मन बड़प्पन के पीछे पागल होता है। उसका मन विषय-विलास की वस्तुओं को एकत्रित करने में लिप्त होकर अर्थ-संचय एवं विषय-संचय करने के खेल ही खेलता रहता है।

        इन दोनों ही वर्गों के मनुष्यों का मन स्वच्छंदी, स्वार्थी, सत्ताप्रिय, अर्थप्रिय और मान चाहने वाला होता है और कभी-कभार छल-प्रपंच के समक्ष उसके अनुसार टक्कर लेने में भी सक्षम होने की योग्यता रखता है। ऐसे मन की दिशा इन्द्रियों के प्रति, इन्द्रियों के विषयों के प्रति और विषय भोगों के प्रति निवृत्त न होने पर भोगप्राप्ति के नित्य नवीन कर्मों को करने की योजना में प्रवृत्त हो जाती है। ऐसा मन विचार करके बुद्धि को शुद्ध नहीं करता अपितु बुद्धि को रजोगुण से रँगकर, अपनी वासनानुसार उसकी स्वीकृति लेकर - 'मैं जो करता हूँ वह ठीक ही करता हूँ' ऐसी दंभयुक्त मान्यता खड़ी कर देता है।

        ऐसे आसुरी भाव से आक्रान्त लोगों का अनुकरण आप मत करना। राजसी व्यक्तियों के रजोगुण से अनेक प्रकार की वासनाएँ उत्पन्न होती हैं अतः हे भाई ! सावधान रहना। रजो-तमोगुण की प्रधानता से ही समस्त पाप पनपते हैं। जैसे हँसिया, चाकू, छुरी, तलवार आदि भिन्न-भिन्न होते हुए भी उनकी धातु लोहा एक ही है ऐसे ही पाप के नाम भिन्न-भिन्न होने पर भी पाप की जड़ रजो-तमोगुण ही है।

        संसार में बहुमत ऐसे वर्ग का ही है। ऐसा वर्ग प्रवृत्तिपरायण कहलाता है। इसके कर्म में मोक्षबुद्धि नहीं होती। अतः यदि इस वर्ग को स्वतंत्र रूप से व्यवहार करने दें तो समाज में ऐसी अव्यवस्था उठ खड़ी होती है जिसके फलस्वरूप सर्वत्र स्वार्थ और दंभरूपी बादल छा जाते हैं, कपट एवं प्रपंच की आँधी चलने लगती है तथा सर्वत्र दुःख और विपत्तियों के प्रहार होने से प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार उठती है। ये दो वर्ग ही यदि परस्पर टकराने लगे तो हिंसा, द्वेष, स्वार्थ और भोगबुद्धि के कर्मों में ही प्रजा लिप्त रहने लगती है और युद्ध की नौबत आ जाती है। प्रत्येक युग एवं प्रत्येक देश में ऐसे ही संहार होता रहता है।

य        ह उन्नति का मार्ग नहीं है। अवनति की ओर जाते मानव के लिए आत्मोन्नति के आनंद की ओर चलने के लिए बुद्धि के शोधन की, उसकी विचार शक्ति में विवेक के सूर्य का उदय करने की आवश्यकता है। मन एवं इन्द्रियों को विषयों के स्मरण, चिन्तन, प्राप्ति एवं भोग की जन्म-जन्मांतरों की जो आदत पड़ी हुई है, उनमें असारता का दर्शन होने पर मन उनसे विमुख होता है तब बुद्धि को अपने से भी परे आत्मा की ओर अभिमुख होने की रूचि एवं जिज्ञासा होती है, आत्सरस पीने का सौभाग्य प्राप्त होता है, संसार की मायाजाल से बचने का बल मिलता है।

        जब बुद्धि को आत्मनिरीक्षण के लिए विचार करने की भोगमुक्त दशा प्राप्त होती है तब वह प्रत्येक कर्म में विवेक का उपयोग करती है। उस वक्त उसके अन्तःकरण में आत्मा का कुछ प्रकाश पड़ता है, जिससे विषयों का अंधकार कुछ अंश में क्षीण होता है। यह है नीचे से ऊपर जाने वाला तीसरा, आंतर में से प्रकट होने वाला स्वयंभू सुख की लालसावाला, बुद्धि के स्वयं के प्रकाश का भोक्ता – सत्त्वगुण। इस सत्त्वगुण की प्रकाशमय स्थिति के कारण बुद्धि का शोधन होता है। कर्म-अकर्म, धर्म अधर्म, नीति-अनीति, सार-असार, नित्य-अनित्य वगैरह को समझकर अलग करने एवं धर्म, नीति, सदाचार तथा नित्य वस्तु के प्रति चित्त की सहज स्वाभाविक अभिरूचि करने की शक्ति इसी से संप्राप्त होती है।

        एक ओर मानवीय जीवन के आंतर प्रदेश में आत्मा (आनंदमय कोष) एवं बुद्धि (विज्ञानमय कोष) है तो दूसरी ओर प्राण (प्राणमय कोष) तथा शरीर (अन्नमय कोष) है। इन दोनों के बीच मन (मनोमय कोष) है। वह जब बहिर्मुख बनता है तब प्राण तथा शरीर द्वारा इन्द्रियाँ विषय-भोगों में लिप्त होकर वैसे ही धर्म-कर्म में प्रवृत्त रहती हैं। यही है मानवीय जीवन की तामसिक एवं राजसिक अवस्था की चक्राकार गति।

        परंतु उसी मन (मनोमय कोष) को ऊर्ध्वमुख, अंतर्मुख अथवा आत्माभिमुख करना – यही है मानव जीवन का परम कल्याणकारी लक्ष्य। ऋषियों में परम आनंदमय आत्मा को ही लक्ष्य माना है क्योंकि मनुष्य के जीवनकाल की मीमांसाकरने पर यह बात स्पष्ट होती है कि उसकी सब भाग दौड़ होती है सुख के लिए, नित्य सुख के लिए। नित्य एवं निरावधि सुख की निरंतर आकांक्षा होने के बावजूद भी वह रजो-तमोगुण एवं इन्द्रियलोलुपता के अधीन होकर हमेशा बहिर्मुख ही रहता है। उसकी समस्त क्रियाएँ विषयप्राप्ति के लिए ही होती हैं। उसकी जीवन-संपदा, शारीरिक बल, संकल्पशक्ति आदि का जो भी उसका सर्वस्व माना जाता है वह सब जन्म मृत्यु के बीच में ही व्यर्थ नष्ट हो जाता है।

        परंतु उसी मन(अंतःकरण) पर यदि सत्त्वगुण का प्रकाश पड़े तो उसे स्वधर्म-स्वर्म की, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की सूक्ष्म छानबीन करने का सूझता है। सुख-दुःख के द्वन्द्व में उसे नित्य सुख की दिशा सूझती है। दुराचार के तूफानी भँवर में से उसे शांत, गंभीर सत्त्वगुणी गंगा के प्रवाह में अवगाहन करने की समझ आने लगती है। विचार-सदविचार की कुशलता आती है। विचार, इच्छा, कर्म आदि में शुभ को पहचानने की सूझबूझ बढ़ती है। जिससे शुभेच्छा, शुभ विचार एवं शुभकर्म होने लगते हैं।

        जन्म मरण जैसे द्वन्द्वों के स्वरूप अर्थात् संसार-चक्र एवं कर्म के रहस्य को समझाते हुए एवं उसी को अशुभ बताते हुए गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।

तरो कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।

'वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभांति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात् कर्मबन्धन से मुक्त हो जाएगा।'

(गीताः 4.16)


            धर्म के, पुण्य के नाम अलग-अलग हैं किन्तु उनका मूल है सत्त्व। सत्त्वगुणरूपी जड़ का सिंचन होने से जो विशाल वृक्ष होता है उसमें मीठे फल लगते हैं। वे ही फल आंतरिक सुख, स्वतंत्र सुख, मुक्तिदायी सुख का मार्ग खोल देते हैं। यह जीव गुणों के थपेड़े से बचकर ही अपने गुणातीत स्वरूप में स्थिर हो सकता है एवं आत्म-साक्षात्कार कर सकता है। जिसके ध्यान से ब्रह्माजी, भगवान विष्णु एवं साम्बसदाशिव भी सामर्थ्य एवं अनोखा आनंद पाते हैं उसी चैतन्यस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिए आपका जन्म हुआ है इसका निरंतर स्मरण रखना।






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शुक्रवार, 10 मई 2024

निर्गुण-निराकार परमात्मा का दर्शन





संत कबीर से किसी ने पूछाः

“हम निर्गुण-निराकार परमात्मा को तो नहीं देख सकते, फिर भी देखे बिना न रह जायें ऐसा कोई उपाय बताइये।”

कबीर जी ने कहाः

अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह।

लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह।।




    “परमात्मा को देखने के लिए ये चर्मचक्षु काम नहीं आते। फिर भी यदि तुम परमात्मा को देखना ही चाहते हो तो जिनके हृदय में परमात्माकार वृत्ति प्रकट हुई है, जिनके हृदय में समतारूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, जिनके हृदय में अद्वैतज्ञानरूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, ऐसे हृदय वाले किन्हीं महापुरुष को तुम देख सकते हो। उनको देखते ही तुम्हें परमात्मा की याद आ जायेगी। जिनके दिलों में ईश्वर निरावरण हुआ है, ऐसे संत-महापुरुषों को तुम देख सकते हो।”

साधु का ही देह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें तुम उस अलख पुरुष परमात्मा के दर्शन कर सकते हो। अतः यदि अलख पुरुष को देखना चाहते हो तो ऐसे किन्हीं परमात्मा के प्यारे संतों के दर्शन करने चाहिए।




शुद्ध हृदय से, ईमानदारी से उन महापुरुषों का चिंतन करके हृदय को धन्यवाद से भरते जाओगे तो तुम्हारे हृदय में परमात्मा प्रकट होने में देर नहीं लगेगी। परमात्म-प्राप्ति इतनी सरल होने पर भी लोग उसका फायदा तो नहीं उठाते हैं, वरन् संतों के बाह्य व्यवहार को देखकर अपनी क्षुद्र मति से उन्हें तौलने लगते हैं और अपनी ही हानि कर बैठते हैं।

धन्य है ऐसे शिष्यों को कि जो अलख पुरुष की आरसी के समान ब्रह्मवेत्ता संतों को श्रद्धा-भक्ति से निहारते हैं और उनके साथ अंत तक निभा पाते हैं। वे धनभागी हैं जो निंदा अथवा कुप्रचार के शिकार होकर अपनी शांति का घात नहीं करते। उन्हीं के लिए यह कथन फलित होता हैः

अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह। लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह।।

गुरुवार, 9 मई 2024

श्रेष्ठ साधक कैसे बनें ?


         मनुष्य आज इतनी-इतनी परेशानियों, समस्याओं और चिंताओं के बोझ से लदा रहता है कि कहाँ सत्संग सुने ?... कब सत्संग को विचारे ?... किस तरह जीवन में उतारे ?... लेकिन बिना सत्संग, जप, अनुष्ठान, सेवा, स्मरण के जीव की सद्गति सम्भव नहीं है । आज ये विचारणीय प्रश्न हैं कि कैसे उसे सांसारिक झंझटों के बीच परमात्म-शांति की अनुभूति हो ? कैसे वह अपने नित्यकर्म में संलग्न रहकर परमात्मा की आराधना से अंतःकरण को पावन करता रहे ?


यह सत्य है कि हम संसार में रहते हैं इसलिए संसार को छोड़ पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है किंतु यह भी तो उतना ही वजनदार सत्य है कि हमारा अमूल्य मनुष्य-जन्म संसार में उलझकर गँवाने के लिए तो कतई नहीं हुआ है । न जाने कितनी-कितनी माताओं के शरीर से, पिताओं के शरीर से गुजरकर, असहनीय यातनाओं को सह के हमने यह अनमोल मानव-शरीर पाया है । अपने सच्चे नाथ का साक्षात्कार करने का दुर्लभ अवसर पाया है । ऐसे सुखद संयोग के बाद भी हम लापरवाह रहे तो कैसे चलेगा ? जरा तो सोचिये कि परमात्मा को, गुरु को क्या मुँह दिखायेंगे ! अतः मनुष्य-जन्म की सार्थकता इसीमें है कि हम अपने सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार करके जीते-जी मुक्त हो जायें ।


जो परम तत्त्व को उपलब्ध होना चाहते हैं, उनके लिए कुछ युक्तियों से और प्रभु की कृपा से यह सहज हो जायेगा । आप एक श्रेष्ठ, सात्त्विक साधक बननेभर का लक्ष्य बना लें । एक उन्नत, जिज्ञासु साधक बननेभर का संकल्प आपको उस अनुभूति से सम्पदावान बना देगा, जो आपकी अपनी विरासत है । एक श्रेष्ठ साधक में कौन-से गुण होने चाहिए, इस बात को गम्भीरतापूर्वक समझ लें । यदि आप एक श्रेष्ठ साधक बनने का लक्ष्य अपने जीवन में रखते हैं तो आप परम तत्त्व के अधिकारी भी बन सकते हैं क्योंकि शुद्ध, सात्त्विक, श्रद्धासम्पन्न अंतःकरण में परमात्म-माधुर्य और ज्ञान स्फुरित होता है । आप थोड़ा चलेंगे तो ईश्वरीय सत्ता आपकी मदद करेगी, बिल्कुल पक्की बात है । ज्यों-ज्यों आप साधना के पथ पर एक-एक कदम आगे बढ़ाते चलेंगे, त्यों-त्यों आपमें उस आनंदस्वरूप को जानने की उत्सुकता बढ़ती जायेगी । उत्सुकता जब तीव्र होगी, लालसा जोर पकड़ेगी तो फिर आप उस यार (परमात्मा) से कहाँ दूर रह पायेंगे !


सर्वप्रथम परमात्म-सुख पाने का लक्ष्य निर्धारित करें । प्रतिदिन का नियम निश्चित करें । एक बार संकल्प ले लें कि ‘मुझे रोज इतनी मालाएँ करनी हैं । माह में इतने दिन मौन रहना है । इतने महीने में मुझे एक अनुष्ठान करना है । प्रतिदिन इतने समय सत्संग सुनना है । सत्शास्त्रों का मनन-अध्ययन करना है । इतना समय सेवा करनी है और व्यवहारकाल में रहते हुए भी मुझे निरंतर सुमिरन करना है ।’ ऐसे आप अंतर्यामी ईश्वर के साथ अनन्यरूप से जुड़ जायेंगे । आरम्भ में ५ मिनट भगवन्नाम लेना शुरू करो । फिर ६, ७, ८, ११ मिनट का नियम ले लो । ‘मैं जैसा-तैसा हूँ, तुम्हारा हूँ । तुम मेरे अंतरात्मा हो, सर्वव्यापक हो । दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं हो, पराये नहीं हो । मेरे अपने हो मेरे प्रभु ! मैं आपको नहीं जानता हूँ लेकिन आप तो मुझे जानते हो । ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ...’



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सोमवार, 6 मई 2024

चित्त और आत्मा: सत्य की खोज में अंतर्मन का सफर

 




आत्मा, हिन्दू धर्म की अगम्य सत्ता है। इसे व्यक्ति का अंतर्यात्मा कहा जाता है, जो कि शारीरिक और मानसिक संरचनाओं से पृथक है। यह नाशवान नहीं है और न तो यह उत्पन्न होता है और न ही मरता है। आत्मा अज्ञेय होने के कारण इसका वास्तविक स्वरूप मनुष्य के द्वारा समझा और अनुभव किया जाना कठिन है।


आत्मा का अंतर्मुखी स्वरूप उसकी अज्ञेयता के कारण लोगों के लिए अक्षरशः अदृश्य होता है। वेदान्त और योगदर्शन में, आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है, जो सर्वव्यापी, अज्ञेय, और अविकारी है। यह चेतना का निरंतर स्रोत है और सभी जीवों का आधार है।


अत: आत्मा सब को सदा प्राप्त है, इसमें कोई भेदभाव नहीं है। यह जीवन का आधार है, जिससे सभी संजीवी प्राणियों का संबंध है। परन्तु, मानव चित्त की माया में इसको समझना और अनुभव करना विशेष गंभीरता की जरूरत है।


चित्त का स्वभाव विचारों, भावनाओं, और इच्छाओं का धारण करना है। यह ज्ञान और अज्ञान का केन्द्र है, जो मनुष्य को उसके आत्मा से दूर कर देता है। माया की भ्रांति में, चित्त संसार के मोह में डूब जाता है और अपना स्वरूप भूल जाता है।


इस प्रकार, आत्मा को पहचानने की आवश्यकता है, जो मानव के स्वभाविक धर्म है। योग, ध्यान, और आत्मा की अध्ययन से मनुष्य अपने स्वरूप को पहचान सकता है और चित्त को नियंत्रित करके आत्मा से जुड़ सकता है। इससे मनुष्य अपने असली स्वरूप को समझता है और जीवन में उद्धारण की दिशा में आगे बढ़ता है।


आत्मा को समझना मानव जीवन का उद्धारण है। यह आत्म-संयम, सच्चे ध्यान, और निस्वार्थ भावना के माध्यम से संभव है। आत्मा का अनुभव करने से मनुष्य अपने चित्त को शांति, संतुलन, और आनंद में बदल सकता है और इस प्रकार समृद्ध और समर्पित जीवन जी सकता है।

शनिवार, 13 मई 2023

व्यक्ति आध्यत्मिक होने से क्या लाभ ?

 



व्यक्ति आध्यत्मिक होने से क्या लाभ?प्रथम लाभ   अमरता की प्राप्ति - मनुष्य जब आध्यत्मिक होता है वह अपना संमंध आत्मा परमात्मा से जोड़ता है,

और आत्मा अविनाशी है जरा मरण से रहित है यह भलीभांति समझ लेता है।

अतः स्वयं की अविनाशी स्वरुप का बोध होता है | और अमर हो जाता है |द्वितीय लाभ   चिरंतन  सुख और आनंद की प्राप्ति - जब मनुष्य स्वयं को अमर जान  लेता है उसी समय संसार का क्षणभंगुर स्वरूप को भी जान  लेता है |

वस्तु व्यक्ति परिस्थिति सभी अस्थायी जान कर उससे प्रभावित नहीं होता , 

उन सब का उपयोग कर सदा सुखी रहता है, ममता रहित हो कर समता में प्रतिष्टित होता है |

सारा संसार को स्वयं का लीला समझ कर सदा आनंद में रहता है|

जैसे की सागर में तरंग, फेन, बुलबुले  शोभायमान होते हैं |

ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आने वाला भी सुख  और शांति का प्रसाद पा लेता है |तृतीय लाभ   व्यक्ति सदा निर्भय रहता है , दुःख और कष्ट से रहित होता है- जब स्वयं अविनाशी और संसार क्षण भंगुर जान  लेता है

उसे फिर किस बात  का भय होगा ? अतः सदा निर्भय रहता है |

दुःख और कष्ट उसे प्रभावित नहीं कर पाते |चतुर्थ लाभ    संताप रहित हो जाता है - षड्विकार काम , क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन को और इन के कारणों को भलीभांति जान लेने  से

मन में यह विकार ताप उत्पन्न नहीं कर पाते और संताप रहित हो जाता है |

गुणों के प्रभाव से  विकार ग्रस्त हो भी जाए तो भी उसे शीघ्र ही उपराम हो जाता है | 

पंचम लाभ   वह सर्वज्ञ हो जाता है - 

सृष्टि का आधार स्वरुप परमात्मा को जान कर वह सर्वज्ञ हो जाता है |छठा लाभ   दैवी गुण संपन्न होता है - उद्यम ,साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम, दया, करुणा, क्षमाशील, विद्या , विनय, विवेक आदि गुणों से सु शोभित होता है |सातवां लाभ   वसुधैव कुतुम्वकम -

सारा श्रृष्टि को अपना स्वरुप जान  लेने से

वह सभी को पोषण करता है जैसे मनुष्य अपना  शरीर और परिवार का मनुष्य पालन पोषण और सुरक्षा करता है|



वस्तुवादी होने से क्या नुक्सान ? 

  • अपने को एक शरीर का पुतला मानता है और वह जरा व्याधि मृत्यु के भय  से प्रभावित रहता है |   स्वार्थी , भयातुर , कामातुर, क्रोधी, लोभी, मोहि, अशांत, रुग्ण, खिन्न , रहता है | पुत्र,परिवार, समाज, संसार सभी का शोषण करता है, संग्रही होताहै, सदा दुखी रहता है, पीड़ित रहता है | विलाशिता , भोगी आदि दुर्गुण से प्रभावित रहता है | अंततो गत्वा वह पुनः मनुष्य शरीर को प्राप्त न होकर तिर्यक योनी जैसे किट, पतंग, पशु, पक्षी, जलचर , पेड़ पौधे आदि शरीर पाकर दुःख कष्ट पीड़ा भोगता रहता है |


बुधवार, 15 मार्च 2023

वास्तव में आप है कौन?

     





वास्तव में आप है कौन?मनुष्य में जो बुद्धि होता है,मन होता है, सुक्ष्म शरीर की क्षमताएं होती हैं ,वो पशु शरीर में नहीं होती ,लेकिन मनुष्य शरीर में जो 'मैं' है..आत्मा है वही उस पशु शरीर में है ,यह ज्ञान सुनने में तो थोड़ा कठिन लगेगा ,लेकिन यह सुना तो आपने हजार हजार यज्ञ कर लिये,हजार हजार तीर्थ कर लिए,हजार हजार तप कर लिए...ये ऐसा ज्ञान है।    

    ...अपने प्यारे अर्जुन को भगवान सुना रहे हैं ,युद्ध के मैदान में ..

...    देहधारी के इस मनुष्य शरीर में जैसे  बालकपन,जवानी ,वृद्धावस्था  होती है ऐसे ही देहांतर् की प्राप्ति हो जाती है ....जैसे यह तीन अवस्था आ जाती है, चार अवस्था आ जाती है ऐसे ही मृत्यु के बाद दूसरे शरीर की अवस्था आ जाती है, तो जो धीर है...इन अवस्थाओं को 'मैं' नहीं मानता..इस अवस्था वाले शरीर को 'मैं' नहीं मानता वो अपनी आत्मा में धीर है, वह धीर पुरुष फिर इनमें विचलित नहीं होता...  अपने आप अवस्थाओं के बाप, 

    तो वह अवस्थाओं में विचलित नहीं होता तो गुणों में भी विचलित नहीं होता ..।

...प्रकासम् च प्रवृत्तिम् च मोहम् एव च पांडवा न सम् प्रवृत्तानि न निवृत्तानि आकांक्ष्यति....

    प्रकाश मतलब सात्विकता आई सत्संग आया दान पुण्य आनंद आया ,प्रवृत्ति मतलब लेना-देना आपाधापी हुई ,मोह मतलब निद्रा आई ....लेकिन वह ज्ञानी न निद्रा की इच्छा करता है न आपाधापी की इच्छा करता है,वो स्वाभाविक आ रहा है जा रहा है... सृष्टि का क्रम है ,ज्ञानी किसी परिस्थिति की इच्छा, वासना,आकांक्षा  नहीं करता ..इसीलिए बोलते हैं जीवनमुक्त ..वो जीते जी मुक्त है ,हम लोग इच्छा करते हैं धन मिल जाए सत्ता मिल जाए यह मिल जाए वह मिल जाए,मैं मरू नहीं  ...मरू नहीं...नहीं करके सब मर रहे हैं ,बुड्ढा होउ नहीं ....सभी हो रहे हैं,मै बालक ही रहुं...फिर भी जवान हो जाते हैं, मैं जवान रहूं ....तो जवानी तो छूट जाती है ,फिर क्यों प्रपंच में रहना

    मैं जो हूं वहां कुछ बदलाव नही,जहां बदलाव है वह मैं नहीं हूं ,मन तु ज्योति स्वरूप.....

    मैं सब को जानने वाला ज्ञान स्वरूप आत्मा हूं ,इसको जानकर वो तो दृढ़  हो जाता है गुरुकृपा में...गुरु के अनुभव में टीक जाता है।

    बाल्यकाल और जवानी में नींद  से जितनी ताकत और स्फुर्ति मिलती है बुढ़ापे में उतनी नींद भी नहीं आती और उतनी स्फूर्ति भी नहीं आती ...तो मानना पड़ेगा कि कारण सरीर भी  बदलता है ,स्थूल शरीर भी बदलता है, सूक्ष्म शरीर भी बदलता है ,फिर भी कोई है जो नहीं बदलता है ... जवानी में मुझे ज्यादा नींद आती थी ,बुढ़ापे में काक चेष्टा  जैसी नींद आती है ,जवानी मे नींद  के बाद ज्यादा स्फूर्ति आती थी बुढ़ापे में जरा ऐसे ही रहता है,मै बालक ही रहुं...फिर भी जवान हो जाते हैं, मैं जवान रहूं ....तो जवानी तो छूट जाती है ,फिर क्यों प्रपंच में रहना

    मैं जो हूं वहां कुछ बदलाव नही,जहां बदलाव है वह मैं नहीं हूं ,मन तु ज्योति स्वरूप.....

    मैं सब को जानने वाला ज्ञान स्वरूप आत्मा हूं ,इसको जानकर वो तो दृढ़  हो जाता है गुरुकृपा में...गुरु के अनुभव में टीक जाता है।

    बाल्यकाल और जवानी में नींद  से जितनी ताकत और स्फुर्ति मिलती है बुढ़ापे में उतनी नींद भी नहीं आती और उतनी स्फूर्ति भी नहीं आती ...तो मानना पड़ेगा कि कारण सरीर भी  बदलता है ,स्थूल शरीर भी बदलता है, सूक्ष्म शरीर भी बदलता है ,फिर भी कोई है जो नहीं बदलता है ... जवानी में मुझे ज्यादा नींद आती थी ,बुढ़ापे में काक चेष्टा  जैसी नींद आती है ,जवानी मे नींद  के बाद ज्यादा स्फूर्ति आती थी बुढ़ापे में जरा ऐसे ही रहता है


    तो उसको जानने वाला तू बुढ़ापे से अलग है न, ,जवानी से अलग है न..तो स्थूल शरीर बदला उसको भी तू जानता है, सुक्ष्म शरीर  बदला उसको भी तू जानता है, क्योंकि रात को सपना आया ..आप जवान होते हैं तो जवान होने का सपना आता है ,तो सपना तो सूक्ष्म शरीर में आता है ,बुड्ढे हो तो बुड्ढा होने का सपना आता है,अब बालक हो तो बाल्यकाल का सपना आता है तो सपना सुक्ष्म शरीर में आता है ,तो सुक्ष्म शरीर बदलता है क्योंकि सपने बदलते हैं.... इसीलिए सूक्ष्म शरीर बदलता है, 

 ..    कारण शरीर  बदलता है क्योंकि बचपन की नींद जवानी की नींद बुढ़ापे की नींद  बदलती है...तो कारण शरीर भी बदलता है और यह शरीर तो बदलता ही है.. दिखता है ..तो आपकी तीनों शरीर बदलते हैं ,आप नहीं बदलते लेकिन  बेवकूफी के कारण ऊंचा सत्संग  ..ब्रह्मज्ञान का सत्संग नहीं मिला इसलिए मान बैठे हैं कि कोई उधर है     ...ऐसा है वैसा है ,भक्ति भाव करते हैं लेकिन ह्रदय का अज्ञान नहीं मिटता ,जरा से दुख में दुखी हो जाते हैं ,जरा से सुख मे सुखी हो जाते हैं, जरा से मान में अहम भर जाता है,जरा से अपमान में वैर  भर जाता है ..तो अहम और वैर सुक्ष्म  में शरीर में होता है,राग देश सूक्ष्म शरीर में बुद्धि में होता है ...मान अपमान का सुख दुख सुक्ष्म  में शरीर में होता है ,बीमारी तंदुरुस्ती स्थूल शरीर में होता है तो बीमारी तंदुरुस्ती आई  उसको भी जाना और गई उसको भी जाना ,मान अपमान आया और गया उसको भी तुम जानते हो ..तो तुम स्थूल शरीर नहीं हो.. लाला.. लालियाँ...बिटिया तुम स्थूल शरीर नहीं हो ,देवीयाँ देवता तुम  सुक्ष्म शरीर नहीं हो ,तुम कारण शरीर  नहीं हो ...मरने के बाद भी जो नहीं मरता है वह तुम अमर आत्मा हो ,हमें अपने आप अवस्थाओं के बाप ...


    धीरस्य तत्र न मोहती.... जो धीर है वह मोहित नहीं होता ...

    गड़ोदिया सेठ थे ,उनकी बैंक चलती थी गड़ोदिया बैंक..राजस्थान में,उसमें मेरे पिताजी का खाता था और मैं पैसे निकलवाने भी गया था गड़ोदिया से  मुझे पक्का याद है ...गया जी में गए , रात्रि को सोए तो एक सेठ  हीरालाल नाई सपने में दिखा, बोला सेठ जी आप अपने कुटुंब का श्राद्ध कराने आए हो ,मैं आपके गांव का हूं, मैं भटक रहा हूं ,अन्नदाता कुछ कीजिए  ...बोले अरे तू तो मोहन नाई  है रे इधर कैसे ..बोले मैं मर गया हूं ..

सेठ सपने से जागा ,सुबह को ब्राह्मणों को बुलाकर जो कुछ अपने पिंडदान करने थे किये लेकिन.....लेकिन  हमारे गांव का मोहन नाई उसके लिए भी हम पिंडदान करते हैं ..ऐसा भी किये...उसकी सद्गति के लिए प्रार्थना करके किए ,

...दूसरे दिन सेठ जी के सपने में फिर से नाई आया..बड़ा प्रसन्नचित ,सेठ जी आपने मेरी सद्गति कर दी ,इस पुण्य कर्म से आपका यश रहेगा, अब सेठ को पता ही नहीं कि बापु जी बोलेंगे और करोड़ों लोगों तक मेरा नाम जाएगा ,कईयों को पता नहीं गड़ोदिया भी कोई परिवार था गड़ोदिया भी कोई बैंक थी ....

...जय राम जी की ...

लेकिन मेरे को पूरा पक्का है रेवड़ी बाजार अहमदाबाद में गड़ोदिया ....


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मंगलवार, 6 सितंबर 2022

दिव्य श्रद्धा (Divya Shraddha )


        (ईश्वर को जो लोग बहुत जल्दी प्राप्त करना चाहते हैं, उन लोगो के लिए यह सत्संग बहुत आवश्यक हैं। यह सत्संग मानो एक mile stone है, एक पाठ्यक्रम सूची है, एक syllabus है। इसको आत्मसात करने हेतु तीव्र जिज्ञासा चाहिए।)

    साधन बढ़ने से शरीर में विद्युत का प्रमाण बढ़ता है ,शरीर तब तक भारी रहता है जब तक उसमें कफ और वायु की विपुलता रहती है ,कफ और वायु अधिक होता  है तो शरीर आलसी और भारी रहता है ,शरीर भारी तब तक रहता है जब तक कफ और वायु का प्रमाण अधिक है ...वात प्रकृति और कफ प्रकृति ।

    आसन स्थिर करने से ,एक ही आसन पर बैठने से शरीर में विद्युत प्रगट होती है जो कफ और वायु  को कंट्रोल करके शरीर को आरोग्यता देती है, शरीर में बिजली पैदा होती है वह आरोग्यता की रक्षा करती है,शरीर हल्का लगता है फुर्ती वाला लगता है ..
क्रीया करने से विद्युत खर्च होती है ,स्थिर आसन में बैठकर धारण करने से, ध्यान करने से विद्युत बढ़ती है ,बिजली बढ़ती है ...
विद्युत तत्व बढ़ने से शरीर निरोग रहता है मन स्फूर्ति  में रहता है ....
      

        संसार से वैराग्य होना कठिन है ,वैराग्य हो भी जाए तो कर्मकांड से मन उठना कठिन है ,कर्मकांड से उठ भी गए तो ध्यान में लगना मन का कठिन है ,ध्यान में लग गए तो तत्व ज्ञानी गुरु का मिलना कठिन है ,तत्व ज्ञानी गुरु मिल भी गए तो उनमें श्रद्धा होना कठिन है ,श्रद्धा हो भी  गई तो टिकना कठिन है ...क्यूँ की ?.....
        तामशी श्रद्धा होती है तो कदम कदम पर फरियाद करती है ,तामसी श्रद्धा में समर्पण नहीं होता है ,भ्रांति होती है समर्पण की ,तामसी श्रद्धा विरोध करती है ,राजसी श्रद्धा हिलती  रहती है और भाग जाती है ,किनारे लग जाती है ..और  सात्विक श्रद्धा होती है तो चाहे गुरु के तरफ से कैसी भी कसौटी हो ,किसी भी प्रकार की परीक्षा हो सात्विक भाव वाला  धन्यवाद से भर कर अहोभाव से भर कर स्वीकृति दे देगा ..
संसार से वैराग्य होना कठिन ,वैराग्य हो गया तो कर्मकांड छूटना कठीन,कर्मकांड छूट भी गया तो उपासना में मन लगना कठीन,उपासना में मन लग भी गया तो तत्व ज्ञानी ब्रह्म ज्ञानी गुरुओं का मिलना कठिन ,तत्व ज्ञानी गुरुओं का मिलना भी हो गया तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन ,क्योंकि प्राय: तामसी और राजसी श्रद्धा  वाले लोग बहुत होते हैं,तामसी श्रद्धा कदम कदम पर इंकार करेगी विरोध करेगी ,अपना अहम नहीं छोड़ेगी..
और श्रद्धेय के साथ ईष्ट के साथ गुरु के साथ विरोध करेगी तामसी श्रद्धा होगी तो ,राजसी श्रद्धा होगी तो जरा सी परीक्षा हुई तो राजसी श्रद्धा वाला किनारे हो जाएगा, भाग जाएगा ..
सात्विक श्रद्धा होगी तो श्रद्धेय की तरफ से हमारे उत्थान के लिए चाहे जो भी कसौटी हो चाहे कैसे भी साधन भजन के पद्धतियां हों, प्रयोग हो ,ब्यवहार हो  अगर सात्विक श्रद्धा है तो वह तत्ववेत्ता गुरुओं की तरफ से मिलने वाली तमाम साधना पद्धति अथवा विचार, व्यवहार जो भी है ..वो अहोभाव से वाह वाह, धन्यवाद ..उसे फरियाद नहीं होगी, उसे प्रतिक्रिया नहीं होगी ..
           सात्विक श्रद्धा हो गया तो फिर तत्व विचार में मन लग जाता है ,नहीं तो तत्व ज्ञानी गुरु मिलने के बाद भी तत्व ज्ञान  में मन लगना कठिन है ..
        आत्मसाक्षात्कारी गुरु मिल जाए ,और उसमें श्रद्धा हो जाए तो भी यह जरूरी नहीं कि सब लोग आत्मज्ञान के तरफ चल पड़े ...नहीं ,तामसी श्रद्धा वाला राजसी श्रद्धा वाला आत्मज्ञान के तरफ नहीं चल सकता ,वह तत्व ज्ञानी गुरुओं का सानिध्य पाकर अपनी इच्छा के अनुसार फायदा लेना चाहेगा ,लेकिन जो वास्तविक फायदा है ,जो तत्व ज्ञानी गुरु देना चाहते हैं उससे वह वंचित रह जाएगा ,सात्विक श्रद्धा वाला होता है वही तत्वज्ञान का अधिकारी माना जाता है ,वही तत्वज्ञान पर्यंत गुरु में अडीग श्रद्धा जैसे सांदीपक की थी ,भगवान विष्णु आए वरदान देने के लिए ..नहीं लिया ,भगवान शिव आए ..वरदान नहीं लिया ..
गुरु ने कोढी़ का रूप ले लिया, बुरी तरह परीक्षाएं ली ..पीट देते थे ,चांटा मार देते थे ..फिर भी वह गुरु के शरीर से निकलने वाला गंदा खून ,कोढ़ की बीमारी से आने वाली बदबू ,मवाद ..फिर भी सांदीपक का चित्त कभी उबता नहीं था ..
            ऐसे ही स्वामी विवेकानंद की रामकृष्ण देव में सात्विक श्रद्धा थी तो रामकृष्ण देव में अहोभाव बना रहता, और जब राजासी श्रद्धा हो जाती तो कभी हील जाती  ..ऐसे छह बार नरेंद्र की श्रद्धा हीली थी ..
            आत्म ज्ञानी गुरु मिलना कठिन है ,गुरु मिल जाए तो उनमें श्रद्धा टिकना सतत कठिन है क्योंकि श्रद्धा राजसी और तमाशी गुण से प्रभावित हो जाती है तो हिलती जाती है या विरोध कर लेती है ,इसलिए जीवन में सत्व गुण बढ़ाना चाहिए आहार की शुद्धी से, चिंतन की शुद्धि से सत्वगुण की रक्षा की जाती है ...
        अशुद्ध आहार ,अशुद्ध विचारों वाले व्यक्तियों का संग....लापरवाही रखने से श्रद्धा का घटना ,बढ़ना ,टूटना ,फुटना होता रहता है ,इसलिए साधक साध्य तक पहुंचने में उसे वर्षों गुजर जाते हैं..
कभी-कभी तो पूरा जन्म गुजर जाता है फिर भी साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं ,हकीकत में छह महीना अगर ठीक से साधना की जाए ,खाली 6 महीना ... 6 महीना अगर ठीक से साधना की जाए तो संसार की वस्तुएं और संसार आकर्षित होने लगता है ,सूक्ष्म जगत की कुंजियां हाथ में आने लगती हैं  ..6 महीना अगर सात्विक श्रद्धा से ठीक से साधन किया जाए,तो बहुत आदमी ऊंचे उठ जाता है ,रजोगुण तमोगुण से बचकर जब सतोगुण बढ़ता है तब तत्वज्ञानी गुरुओं के ज्ञान में  आदमी प्रविष्ट होता है ,तत्वज्ञान का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं रहती ..
अभ्यास तो भजन करने का है, श्रद्धा को सात्विक बनाने का है ..
        अभ्यास ,भजन का अभ्यास बढ़ने से ,सत्व गुण बढ़ने से विचार अपने आप उत्पन्न होता है ,महाराज ....ऐसा विचार उत्पन्न करने के लिए भी साधन भजन में सातत्य होना चाहिए और श्रद्धा की सुरक्षा में सतर्क होना चाहिए ..ईष्ट में ,भगवान में ,गुरु में श्रद्धा होनी चाहिए ।
        श्रद्धा हो गई तो तत्वज्ञान में गति होने में ,तत्वज्ञान तो कईयों को मिल जाता है लेकिन उस तत्वज्ञान में स्थिति नहीं करते ,और स्थिति  करते हैं तो ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न करने की खबर हम नहीं रख पाते ,ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न हो जाए तो साक्षात्कार होता है ।
        साक्षात्कार करने के बाद भी अगर उपासना तगड़ी नहीं किया और गुरु कृपा से हो गया साक्षात्कार तभी भी विक्षेप रहेगा ,मनोराज आने की संभावना है ,इसलिए साक्षात्कार के बाद भी ब्रह्म अभ्यास करने में लगे रहते हैं बुद्धिमान उच्च कोटि के साधक ।
        साक्षात्कार करने के बाद भी भजन में ,ब्रह्म अभ्यास में अथवा ब्रह्मानंद में लगे रहना ..यह  साक्षात्कारी की शोभा है ....
            जिन महापुरुषों को परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है ,वे भी ध्यान भजन में और शुद्धि में ध्यान रखते है, तो हम लापरवाही करते है तो अपनी पुण्यों की कब्र ही खोद दी  ..
            जीवन में जितना उत्साह होगा सतर्कता होंगी और जीवन दाता का मूल्य समझेंगे उतना यात्रा उच्च कोटि की होगी ..
            ब्रह्माकार वृत्ती होना होना यह भी ईश्वर की कृपा है
            सात्विक श्रद्धा होगी तब आदमी ईमानदारी से अपने अहम  को परमात्मा में अर्पित होगा ...
            तुलसीदास जी ने कहा ..यह फल साधन ते ना होइ....
            यह जो ब्रह्म ज्ञान का फल है,वो साधन से प्रकट नहीं होगा..साधन करते-करते सात्विक श्रद्धा तैयार होती है और सात्विक श्रद्धा ही अपने तत्व में ,ईष्ट में अपने आप को अर्पित करने को तैयार हो जाती है ,जैसे लोहा अग्नि की वाहवाही तो करें ,अग्नि के बखान तो करें, अग्नि को नमस्कार तो करे लेकिन तब तक लोहा अग्निमय  नहीं होता जब तक लोहा अपने आप को अग्नि में अर्पित नहीं कर देता ,लोहा अग्नि के भट्टे में अर्पित होते ही उसके रग रग मे अग्नि प्रविष्ट हो जाती है वह लोहा अग्नि का ही एक पुंज दिखता है.... ऐसे ही उस ब्रह्म स्वरूप में जिव अपने आपको जब तक अर्पित नहीं करता है तब तक भले भगवान के गीत गाए जाए ,गुरु के गीत गाए जाए..लाभ तो होगा लेकिन गुरुमय ,भगवतमय तब तक नहीं होगा जब तक अपने मैं को ईश्वर में, गुरु में अर्पित नहीं कर देता ..
..              ईश्वर और गुरू शब्द दो हैं बाकी एक ही तत्व होता है...मूर्ति से दो दिखते हैं ,मूर्तियां अलग-अलग है ,आकृति अलग अलग दिखती है बाकी ईश्वर और गुरु एक ही चीज है ,गुरु के ह्रदय में जो चैतन्य है ..चमका है ,वही ईश्वर के ह्रदय में प्रकट हुआ है ...
ईश्वर भी अगर परम कल्याण करना  चाहते हैं तो गुरु का रूप लेकर,उपदेशक का रूप लेकर भगवान कल्याण करेंगे ...परम कल्याण |
        संसार का आशीर्वाद तो भगवान ऐसे ही दे देंगे ,लेकिन जब साक्षात्कार करवाना होगा तो भगवान को भी आचार्य की गद्दी पर बैठना पड़ेगा ,आचार्य पद के ढंग से उपदेश देंगे भगवान जैसे श्री कृष्णा ने अर्जुन को उपदेश दिया ,श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया ...
            ..साधक भजन करते हैं ,भजन की तीव्रता से भाव मजबूत हो जाता है और भाव के बल से अपने भाव के अनुसार संसार में चमत्कार भी कर लेता है ,भाव की दृढता से..भाव पराकाष्ठा नहीं है ,भाव बदलते रहते हैं ..
..पराकाष्ठा है ब्रह्माकार वृत्ती को उत्पन्न कर के साक्षात्कार करना तो साधन भजन में उत्साह और जगत में नश्वर बुद्धि और ऊंचे लक्ष्य की  हमेशा स्मृति ..यह साधक को महान बना देगा ....
            ..अगर ऊंचे लक्ष्य का पता ही नहीं ,आत्म साक्षात्कार के लक्ष्य का पता ही नहीं ,ब्रह्माकार  वृत्ती  उत्पन्न कर के आवरण भंग करना और साक्षात्कार करके जीवन मुक्त होने का अगर जीवन में लक्ष्य नहीं है तो छोटी मोटी साधना में छोटी मोटी पद्धतियों में आदमी रुका ही रहेगा कोल्हू के बैल जैसा वही जिंदगी पूरी कर देगा ....
            ..मैंने अर्ज किया था न,- " कि संसार से वैराग्य होना कठिन है वैराग्य हुआ तो  फिर कर्मकांड से मन उठना कठिन है ,कर्मकांड से मन उठ गया तो उपासना में लगना कठिन है ,उपासना  में लग गया तभी भी  तत्वज्ञानी गुरुओं को खोजना कठिन है ,तत्वज्ञानी गुरु का मिलाप भी हो गया तो उन्हें श्रद्धा टिकना कठिन है,उनमें  श्रद्धा हो भी गई ..श्रद्धा तो हो जाती है ,लेकिन टिकी रहे ये बड़ा कठिन है और श्रद्धा टिकाई तभी भी तत्वज्ञान की और प्रीति होना कठिन है ,तत्वज्ञान हो गया तो उसमें स्थिति होना कठिन है स्थिति हो भी गई तो ब्रह्माकार वृत्ति करके आवरण भंग करके जीवनमुक्त पद पर पहुंचना परम पुरुषार्थ है" ,अगर सावधानी से 6 महीने तक आदमी ठीक ढंग से उपासना करे ठीक ढंग से तत्वज्ञानी गुरुओं के ज्ञान को विचारे तो उसके मन का संकल्प विकल्प कम होने लगता है संसार का आकर्षण कम होने लगता है और उसके चित्च में विश्रांति आने लगती है ,उससे संसार की सफलताएं आकर्षित होने लगती हैं, संसार आकर्षित होने लगता है ...
              संसार माना क्या जो सरकने वाली चीजें हैं ..इस संसार की जो भी चीजें हैं वह सरकने वाली हैं ..वे उस साधक से आकर्षित होने लगती हैं ,फिर उसे रोजी रोटी ,ये वो ...कुटुंब ,संबंधी समाज के लोगों को रिझाने के लिए नाक रगड़ना नहीं पड़ेगा वे लोग तो ऐसे ही रिझने को तैयार हो जाएंगे..खाली छह महीना ठीक ढंग से साधन मैं लगे तो सारी जिंदगी की मजदूरी से जो नहीं पाया वह 6 महीने में तो पाएगा लेकिन साधक के लिए वह भी तो तुत्छ हो जाता है ..उसका लक्ष्य ऊंचे में ऊंचा है आत्म साक्षात्कार |







शुक्रवार, 16 मार्च 2018

प्रणव’ (ॐ) की महिमा





            सूतजी ने ऋषियों से कहा : ‘‘महर्षियो ! ‘प्र’ नाम है प्रकृति से उत्पन्न संसाररूपी महासागर का । प्रणव इससे पार करने के लिए (नव) नाव है । इसलिए इस ॐकार को ‘प्रणव’ की संज्ञा देते हैं । ॐकार अपना जप करनेवाले साधकों से कहता है - ‘प्र-प्रपंच, न-नहीं है, वः-तुम लोगों के लिए ।’ अतः इस भाव को लेकर भी ज्ञानी पुरुष ‘ॐ’ को ‘प्रणव’ नाम से जानते हैं । इसका दूसरा भाव है : ‘प्र-प्रकर्षेण, न-नयेत्, वः-युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणवः । अर्थात् यह तुम सब उपासकों को बलपूर्वक मोक्ष तक पहुँचा देगा ।’ इस अभिप्राय से भी ऋषि-मुनि इसे ‘प्रणव’ कहते हैं । अपना जप करनेवाले योगियों के तथा अपने मंत्र की पूजा करनेवाले उपासकों के समस्त कर्मों का नाश करके यह उन्हें दिव्य नूतन ज्ञान देता है, इसलिए भी इसका नाम प्रणव - प्र (कर्मक्षयपूर्वक) नव (नूतन ज्ञान देनेवाला) है ।
           उन मायारहित महेश्वर को ही नव अर्थात् नूतन कहते हैं । वे परमात्मा प्रधान रूप से नव अर्थात् शुद्धस्वरूप हैं, इसलिए ‘प्रणव’ कहलाते हैं । प्रणव साधक को नव अर्थात् नवीन (शिवस्वरूप) कर देता है, इसलिए भी विद्वान पुरुष इसे प्रणव के नाम से जानते हैं अथवा प्र - प्रमुख रूप से नव - दिव्य परमात्म-ज्ञान प्रकट करता है, इसलिए यह प्रणव है ।
           यद्यपि जीवन्मुक्त के लिए किसी साधन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह सिद्धरूप है, तथापि दूसरों की दृष्टि में जब तक उसका शरीर रहता है, तब तक उसके द्वारा प्रणव-जप की सहज साधना स्वतः होती रहती है । वह अपनी देह का विलय होने तक सूक्ष्म प्रणव मंत्र का जप और उसके अर्थभूत परमात्म-तत्त्व का अनुसंधान करता रहता है । जब शरीर नष्ट हो जाता है, तब वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूप शिव को प्राप्त कर लेता है - यह सुनिश्चित है । जो अर्थ का अनुसंधान न करके केवल मंत्र का जप करता है, उसे निश्चय ही योग की प्राप्ति होती है । जिसने इस मंत्र का ३६ करोड़ जप कर लिया हो, उसे अवश्य ही योग प्राप्त हो जाता है । ‘अ’ शिव है, ‘उ’ शक्ति है और ‘मकार’ इन दोनों की एकता है । यह त्रितत्त्वरूप है, ऐसा समझकर ‘ह्रस्व प्रणव’ का जप करना चाहिए । जो अपने समस्त पापों का क्षय करना चाहते हैं, उनके लिए इस ह्रस्व प्रणव का जप अत्यंत आवश्यक है ।
           वेद के आदि में और दोनों संध्याओं की उपासना के समय भी ॐकार का उच्चारण करना चाहिए ।’’
भगवान शिव ने भगवान ब्रह्माजी और भगवान विष्णु से कहा : ‘‘मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ॐकार के रूप में प्रसिद्ध है । वह महामंगलकारी मंत्र है । सबसे पहले मेरे मुख से ॐकार (ॐ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूप का बोध करानेवाला है । ॐकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ । यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है । प्रतिदिन ॐकार का निरंतर स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है ।
            मुनीश्वरो ! प्रतिदिन दस हजार प्रणवमंत्र का जप करें अथवा दोनों संध्याओं के समय एक-एक हजार प्रणव का जप किया करें । यह क्रम भी शिवपद की प्राप्ति करानेवाला है ।
            ‘ॐ’ इस मंत्र का प्रतिदिन मात्र एक हजार जप करने पर सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है ।
    प्रणव के ‘अ’, ‘उ’ और ‘म्’ इन तीनों अक्षरों से जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन होता है - इस बात को जानकर प्रणव (ॐ) का जप करना चाहिए । जपकाल में यह भावना करनी चाहिए कि ‘हम तीनों लोकों की सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, पालन करनेवाले विष्णु तथा संहार करनेवाले रुद्र जो स्वयंप्रकाश चिन्मय हैं, उनकी उपासना करते हैं । यह ब्रह्मस्वरूप ॐकार हमारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों को, मन की वृत्तियों को तथा बुद्धि की वृत्तियों को सदा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले धर्म एवं ज्ञान की ओर प्रेरित करे ।’ प्रणव के इस अर्थ का बुद्धि के द्वारा qचतन करता हुआ जो इसका जप करता है, वह निश्चय ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । अथवा अर्थानुसंधान के बिना भी प्रणव का नित्य जप करना चाहिए ।’’
    (‘शिव पुराण’ अंतर्गत विद्येश्वर संहिता से संकलित) 




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