(ईश्वर को जो लोग बहुत जल्दी प्राप्त करना चाहते हैं, उन लोगो के लिए यह सत्संग बहुत आवश्यक हैं। यह सत्संग मानो एक mile stone है, एक पाठ्यक्रम सूची है, एक syllabus है। इसको आत्मसात करने हेतु तीव्र जिज्ञासा चाहिए।)
साधन बढ़ने से शरीर में विद्युत का प्रमाण बढ़ता है ,शरीर तब तक भारी रहता है जब तक उसमें कफ और वायु की विपुलता रहती है ,कफ और वायु अधिक होता है तो शरीर आलसी और भारी रहता है ,शरीर भारी तब तक रहता है जब तक कफ और वायु का प्रमाण अधिक है ...वात प्रकृति और कफ प्रकृति ।
आसन स्थिर करने से ,एक ही आसन पर बैठने से शरीर में विद्युत प्रगट होती है जो कफ और वायु को कंट्रोल करके शरीर को आरोग्यता देती है, शरीर में बिजली पैदा होती है वह आरोग्यता की रक्षा करती है,शरीर हल्का लगता है फुर्ती वाला लगता है ..
क्रीया करने से विद्युत खर्च होती है ,स्थिर आसन में बैठकर धारण करने से, ध्यान करने से विद्युत बढ़ती है ,बिजली बढ़ती है ...
विद्युत तत्व बढ़ने से शरीर निरोग रहता है मन स्फूर्ति में रहता है ....
संसार से वैराग्य होना कठिन है ,वैराग्य हो भी जाए तो कर्मकांड से मन उठना कठिन है ,कर्मकांड से उठ भी गए तो ध्यान में लगना मन का कठिन है ,ध्यान में लग गए तो तत्व ज्ञानी गुरु का मिलना कठिन है ,तत्व ज्ञानी गुरु मिल भी गए तो उनमें श्रद्धा होना कठिन है ,श्रद्धा हो भी गई तो टिकना कठिन है ...क्यूँ की ?.....
तामशी श्रद्धा होती है तो कदम कदम पर फरियाद करती है ,तामसी श्रद्धा में समर्पण नहीं होता है ,भ्रांति होती है समर्पण की ,तामसी श्रद्धा विरोध करती है ,राजसी श्रद्धा हिलती रहती है और भाग जाती है ,किनारे लग जाती है ..और सात्विक श्रद्धा होती है तो चाहे गुरु के तरफ से कैसी भी कसौटी हो ,किसी भी प्रकार की परीक्षा हो सात्विक भाव वाला धन्यवाद से भर कर अहोभाव से भर कर स्वीकृति दे देगा ..
संसार से वैराग्य होना कठिन ,वैराग्य हो गया तो कर्मकांड छूटना कठीन,कर्मकांड छूट भी गया तो उपासना में मन लगना कठीन,उपासना में मन लग भी गया तो तत्व ज्ञानी ब्रह्म ज्ञानी गुरुओं का मिलना कठिन ,तत्व ज्ञानी गुरुओं का मिलना भी हो गया तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन ,क्योंकि प्राय: तामसी और राजसी श्रद्धा वाले लोग बहुत होते हैं,तामसी श्रद्धा कदम कदम पर इंकार करेगी विरोध करेगी ,अपना अहम नहीं छोड़ेगी..
और श्रद्धेय के साथ ईष्ट के साथ गुरु के साथ विरोध करेगी तामसी श्रद्धा होगी तो ,राजसी श्रद्धा होगी तो जरा सी परीक्षा हुई तो राजसी श्रद्धा वाला किनारे हो जाएगा, भाग जाएगा ..
सात्विक श्रद्धा होगी तो श्रद्धेय की तरफ से हमारे उत्थान के लिए चाहे जो भी कसौटी हो चाहे कैसे भी साधन भजन के पद्धतियां हों, प्रयोग हो ,ब्यवहार हो अगर सात्विक श्रद्धा है तो वह तत्ववेत्ता गुरुओं की तरफ से मिलने वाली तमाम साधना पद्धति अथवा विचार, व्यवहार जो भी है ..वो अहोभाव से वाह वाह, धन्यवाद ..उसे फरियाद नहीं होगी, उसे प्रतिक्रिया नहीं होगी ..
सात्विक श्रद्धा हो गया तो फिर तत्व विचार में मन लग जाता है ,नहीं तो तत्व ज्ञानी गुरु मिलने के बाद भी तत्व ज्ञान में मन लगना कठिन है ..
आत्मसाक्षात्कारी गुरु मिल जाए ,और उसमें श्रद्धा हो जाए तो भी यह जरूरी नहीं कि सब लोग आत्मज्ञान के तरफ चल पड़े ...नहीं ,तामसी श्रद्धा वाला राजसी श्रद्धा वाला आत्मज्ञान के तरफ नहीं चल सकता ,वह तत्व ज्ञानी गुरुओं का सानिध्य पाकर अपनी इच्छा के अनुसार फायदा लेना चाहेगा ,लेकिन जो वास्तविक फायदा है ,जो तत्व ज्ञानी गुरु देना चाहते हैं उससे वह वंचित रह जाएगा ,सात्विक श्रद्धा वाला होता है वही तत्वज्ञान का अधिकारी माना जाता है ,वही तत्वज्ञान पर्यंत गुरु में अडीग श्रद्धा जैसे सांदीपक की थी ,भगवान विष्णु आए वरदान देने के लिए ..नहीं लिया ,भगवान शिव आए ..वरदान नहीं लिया ..
गुरु ने कोढी़ का रूप ले लिया, बुरी तरह परीक्षाएं ली ..पीट देते थे ,चांटा मार देते थे ..फिर भी वह गुरु के शरीर से निकलने वाला गंदा खून ,कोढ़ की बीमारी से आने वाली बदबू ,मवाद ..फिर भी सांदीपक का चित्त कभी उबता नहीं था ..
ऐसे ही स्वामी विवेकानंद की रामकृष्ण देव में सात्विक श्रद्धा थी तो रामकृष्ण देव में अहोभाव बना रहता, और जब राजासी श्रद्धा हो जाती तो कभी हील जाती ..ऐसे छह बार नरेंद्र की श्रद्धा हीली थी ..
आत्म ज्ञानी गुरु मिलना कठिन है ,गुरु मिल जाए तो उनमें श्रद्धा टिकना सतत कठिन है क्योंकि श्रद्धा राजसी और तमाशी गुण से प्रभावित हो जाती है तो हिलती जाती है या विरोध कर लेती है ,इसलिए जीवन में सत्व गुण बढ़ाना चाहिए आहार की शुद्धी से, चिंतन की शुद्धि से सत्वगुण की रक्षा की जाती है ...
अशुद्ध आहार ,अशुद्ध विचारों वाले व्यक्तियों का संग....लापरवाही रखने से श्रद्धा का घटना ,बढ़ना ,टूटना ,फुटना होता रहता है ,इसलिए साधक साध्य तक पहुंचने में उसे वर्षों गुजर जाते हैं..
कभी-कभी तो पूरा जन्म गुजर जाता है फिर भी साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं ,हकीकत में छह महीना अगर ठीक से साधना की जाए ,खाली 6 महीना ... 6 महीना अगर ठीक से साधना की जाए तो संसार की वस्तुएं और संसार आकर्षित होने लगता है ,सूक्ष्म जगत की कुंजियां हाथ में आने लगती हैं ..6 महीना अगर सात्विक श्रद्धा से ठीक से साधन किया जाए,तो बहुत आदमी ऊंचे उठ जाता है ,रजोगुण तमोगुण से बचकर जब सतोगुण बढ़ता है तब तत्वज्ञानी गुरुओं के ज्ञान में आदमी प्रविष्ट होता है ,तत्वज्ञान का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं रहती ..
अभ्यास तो भजन करने का है, श्रद्धा को सात्विक बनाने का है ..
अभ्यास ,भजन का अभ्यास बढ़ने से ,सत्व गुण बढ़ने से विचार अपने आप उत्पन्न होता है ,महाराज ....ऐसा विचार उत्पन्न करने के लिए भी साधन भजन में सातत्य होना चाहिए और श्रद्धा की सुरक्षा में सतर्क होना चाहिए ..ईष्ट में ,भगवान में ,गुरु में श्रद्धा होनी चाहिए ।
श्रद्धा हो गई तो तत्वज्ञान में गति होने में ,तत्वज्ञान तो कईयों को मिल जाता है लेकिन उस तत्वज्ञान में स्थिति नहीं करते ,और स्थिति करते हैं तो ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न करने की खबर हम नहीं रख पाते ,ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न हो जाए तो साक्षात्कार होता है ।
साक्षात्कार करने के बाद भी अगर उपासना तगड़ी नहीं किया और गुरु कृपा से हो गया साक्षात्कार तभी भी विक्षेप रहेगा ,मनोराज आने की संभावना है ,इसलिए साक्षात्कार के बाद भी ब्रह्म अभ्यास करने में लगे रहते हैं बुद्धिमान उच्च कोटि के साधक ।
साक्षात्कार करने के बाद भी भजन में ,ब्रह्म अभ्यास में अथवा ब्रह्मानंद में लगे रहना ..यह साक्षात्कारी की शोभा है ....
जिन महापुरुषों को परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है ,वे भी ध्यान भजन में और शुद्धि में ध्यान रखते है, तो हम लापरवाही करते है तो अपनी पुण्यों की कब्र ही खोद दी ..
जीवन में जितना उत्साह होगा सतर्कता होंगी और जीवन दाता का मूल्य समझेंगे उतना यात्रा उच्च कोटि की होगी ..
ब्रह्माकार वृत्ती होना होना यह भी ईश्वर की कृपा है
सात्विक श्रद्धा होगी तब आदमी ईमानदारी से अपने अहम को परमात्मा में अर्पित होगा ...
तुलसीदास जी ने कहा ..यह फल साधन ते ना होइ....
यह जो ब्रह्म ज्ञान का फल है,वो साधन से प्रकट नहीं होगा..साधन करते-करते सात्विक श्रद्धा तैयार होती है और सात्विक श्रद्धा ही अपने तत्व में ,ईष्ट में अपने आप को अर्पित करने को तैयार हो जाती है ,जैसे लोहा अग्नि की वाहवाही तो करें ,अग्नि के बखान तो करें, अग्नि को नमस्कार तो करे लेकिन तब तक लोहा अग्निमय नहीं होता जब तक लोहा अपने आप को अग्नि में अर्पित नहीं कर देता ,लोहा अग्नि के भट्टे में अर्पित होते ही उसके रग रग मे अग्नि प्रविष्ट हो जाती है वह लोहा अग्नि का ही एक पुंज दिखता है.... ऐसे ही उस ब्रह्म स्वरूप में जिव अपने आपको जब तक अर्पित नहीं करता है तब तक भले भगवान के गीत गाए जाए ,गुरु के गीत गाए जाए..लाभ तो होगा लेकिन गुरुमय ,भगवतमय तब तक नहीं होगा जब तक अपने मैं को ईश्वर में, गुरु में अर्पित नहीं कर देता ..
.. ईश्वर और गुरू शब्द दो हैं बाकी एक ही तत्व होता है...मूर्ति से दो दिखते हैं ,मूर्तियां अलग-अलग है ,आकृति अलग अलग दिखती है बाकी ईश्वर और गुरु एक ही चीज है ,गुरु के ह्रदय में जो चैतन्य है ..चमका है ,वही ईश्वर के ह्रदय में प्रकट हुआ है ...
ईश्वर भी अगर परम कल्याण करना चाहते हैं तो गुरु का रूप लेकर,उपदेशक का रूप लेकर भगवान कल्याण करेंगे ...परम कल्याण |
संसार का आशीर्वाद तो भगवान ऐसे ही दे देंगे ,लेकिन जब साक्षात्कार करवाना होगा तो भगवान को भी आचार्य की गद्दी पर बैठना पड़ेगा ,आचार्य पद के ढंग से उपदेश देंगे भगवान जैसे श्री कृष्णा ने अर्जुन को उपदेश दिया ,श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया ...
..साधक भजन करते हैं ,भजन की तीव्रता से भाव मजबूत हो जाता है और भाव के बल से अपने भाव के अनुसार संसार में चमत्कार भी कर लेता है ,भाव की दृढता से..भाव पराकाष्ठा नहीं है ,भाव बदलते रहते हैं ..
..पराकाष्ठा है ब्रह्माकार वृत्ती को उत्पन्न कर के साक्षात्कार करना तो साधन भजन में उत्साह और जगत में नश्वर बुद्धि और ऊंचे लक्ष्य की हमेशा स्मृति ..यह साधक को महान बना देगा ....
..अगर ऊंचे लक्ष्य का पता ही नहीं ,आत्म साक्षात्कार के लक्ष्य का पता ही नहीं ,ब्रह्माकार वृत्ती उत्पन्न कर के आवरण भंग करना और साक्षात्कार करके जीवन मुक्त होने का अगर जीवन में लक्ष्य नहीं है तो छोटी मोटी साधना में छोटी मोटी पद्धतियों में आदमी रुका ही रहेगा कोल्हू के बैल जैसा वही जिंदगी पूरी कर देगा ....
..मैंने अर्ज किया था न,- " कि संसार से वैराग्य होना कठिन है वैराग्य हुआ तो फिर कर्मकांड से मन उठना कठिन है ,कर्मकांड से मन उठ गया तो उपासना में लगना कठिन है ,उपासना में लग गया तभी भी तत्वज्ञानी गुरुओं को खोजना कठिन है ,तत्वज्ञानी गुरु का मिलाप भी हो गया तो उन्हें श्रद्धा टिकना कठिन है,उनमें श्रद्धा हो भी गई ..श्रद्धा तो हो जाती है ,लेकिन टिकी रहे ये बड़ा कठिन है और श्रद्धा टिकाई तभी भी तत्वज्ञान की और प्रीति होना कठिन है ,तत्वज्ञान हो गया तो उसमें स्थिति होना कठिन है स्थिति हो भी गई तो ब्रह्माकार वृत्ति करके आवरण भंग करके जीवनमुक्त पद पर पहुंचना परम पुरुषार्थ है" ,अगर सावधानी से 6 महीने तक आदमी ठीक ढंग से उपासना करे ठीक ढंग से तत्वज्ञानी गुरुओं के ज्ञान को विचारे तो उसके मन का संकल्प विकल्प कम होने लगता है संसार का आकर्षण कम होने लगता है और उसके चित्च में विश्रांति आने लगती है ,उससे संसार की सफलताएं आकर्षित होने लगती हैं, संसार आकर्षित होने लगता है ...
संसार माना क्या जो सरकने वाली चीजें हैं ..इस संसार की जो भी चीजें हैं वह सरकने वाली हैं ..वे उस साधक से आकर्षित होने लगती हैं ,फिर उसे रोजी रोटी ,ये वो ...कुटुंब ,संबंधी समाज के लोगों को रिझाने के लिए नाक रगड़ना नहीं पड़ेगा वे लोग तो ऐसे ही रिझने को तैयार हो जाएंगे..खाली छह महीना ठीक ढंग से साधन मैं लगे तो सारी जिंदगी की मजदूरी से जो नहीं पाया वह 6 महीने में तो पाएगा लेकिन साधक के लिए वह भी तो तुत्छ हो जाता है ..उसका लक्ष्य ऊंचे में ऊंचा है आत्म साक्षात्कार |