मंगलवार, 15 अगस्त 2023

क्या ईश्वर हर जगह है?

 

हां वह सर्वव्यापी हैं, इसमें ज़रा भी संदेह नहीं हैं और पृथ्वी पर ऐसा कोई भी प्राणी जो चेतना युक्त चाहें वह आस्तिक अथवा

नास्तिक क्यों न हों उसकी अनुभूति जीवन में अवश्य करता है| पर यह बात दूसरी हैं की , वह उसे क्या नाम देता हैं।

आई ये इस प्रसंग से उसे समझते हैं |

15 नवंबर 1884 को इंग्लैंड में "जॉन ली" को एक महिला के कत्ल में दोषी मानते हुए कोर्ट ने फाँसी की सजा सुनाई। सजा सुनाई जाने पर जॉन ली कोर्ट में चिल्लाता रहा कि वो बेकसूर है, अगर कहीं भगवान है तो वो मेरी मदद ज़रूर करेंगे। 23 फरवरी 1885 यही वो दिन था जब जॉन को फाँसी की सजा दी जानी थी।


फांसी देने से पहले फांसी के फंदे, रस्सी और तख्त की मजबूती को जांचा तथा परखा गया, ताकि फांसी में किसी भी प्रकार की रुकावट ना आए। अब जॉन ली को फांसी के तख्त पर लाया गया। जल्लाद ने जॉन ली के चेहरे को काले कपड़े से ढक, गले में फांसी का फंदा डाल दिया। आदेश मिलते ही……


जल्लाद ने हेंडल को दबाया लेकिन तख्त नहीं खुला। बार-बार हैंडल दबाया गया, लेकिन तख्त नहीं खुल पाया। और फांसी एक दिन के लिए टाल दी गई । इसके बाद जांच शुरू हुई तथा आजमाइश के तौर पर जॉन ली के समान वजनी पुतले को फांसी पर लटकाया गया। तख्त खुल गया।


दूसरे दिन जॉन ली को फिर से फांसी के लिए लाया गया, और उस दिन भी तख्त नहीं खुला। जॉन खुशी से चिल्लाया कि, हे! ईश्वर आप सर्वत्र है। निसंदेह आप मेरे साथ है। फांसी एक बार फिर टल गई । पुतला फिर से लाया गया, लटकाया गया और तख्त खुल गया।।


तीसरी बार फिर से जॉन को फांसी के तख्त पर लाया गया। जल्लाद ने लिवर दबाया लेकिन तख्त आज भी नही खुला। यह देख जल्लाद भावुक होकर हमेशा के लिए वहां से चला गया। मौजूद कर्मचारी हक्केबक्के रह गए। फांसी फिर से टल गई।


केस अब हाई अथॉरिटी के हाथों में था। हर एक चीज की गहराई से जांच पड़ताल की गई कि आखिर एक शख्स का तीन-तीन बार फांसी से बच निकलना कैसे मुमकिन है ? इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था। लेकिन जांच में कुछ नही मिला। और मान लिया गया की लॉक के अटक जाने से ऐसे होता रहा होगा।


क्या जॉन ली को शूट किया जाना चाहिए ? जज ने हर पहलू पर पूरी गंभीरता से विचार किया । और माना कि जब-जब जॉन को फांसी दी गई होगी, तब-तब वह पल पल, हर पल मरा होगा। जज ने यह भी माना कि कानून ने जॉन को फांसी पर चढ़ाकर तीन तीन बार मारा है।


कानून भी ईश्वर के आगे नतमस्तक हो गया था। और जॉन ली को छोड़ दिया गया। जॉन ली को लगाए गए उस फंदे को हमेशा के लिए उतार दिया गया और म्यूजियम सुरक्षित रखा गया । ब्रिटिश कानून असफल रहा, क्योंकि उन्हें ईश्वर की ताकत और जॉन ली के बेकुसूर होने का आभास हो चुका था।


रिहा होने के बाद जॉन ली परिवार के साथ लंदन चला गया। अक्सर लोगों द्वारा सवाल पूछे जाने पर जॉन ली यही कहता था कि, फांसी के वक्त वह एक अद्भुत दिव्य प्रकाश(रोशनी) की अनुभूति करता था। यह प्रकाश काला कपड़ा हटने के बाद ही अदृश्य होता था। इसके बाद जॉन ली समाज सेवा और चैरिटी से जुड़ता चला गया। 80 वर्ष की आयु में जॉन ली का निधन हुआ।


जॉन ली के खिलाफ पुलिस को प्राप्त हुए वो सारे झूठे साक्ष्य जो जॉन ली को फांसी तक ले गये थे, उसके ही दोस्त जोनाथन के षड्यंत्र का हिस्सा थे। यह जॉन ली के गांव वालों का कहना था। जॉन ली की रिहाई वाले दिन ही उसके धोखेबाज दोस्त जोनाथन को लकवा मार गया था । महज 29 वर्ष की आयु में जोनाथन की मृत्यु हो गई ।। इसी तरह हर किसी का अलग अलग अनुभव होता ही है | इसीलिए ---


दुनिया माने या न माने आप क्या मानते हो ये बात मायने रखती है.


ईश्वर सर्व जगह है , पर ये बात हम बचपन से सुनते आ रहे है.


कण कण में भगवान - ये बात तो आप ने जरूर सुनी होगी.


ये विषय श्रद्धा का है. मानो तो है, न मानो तो नहीं है.


अध्यात्म विषय ये स्वयं के लिए है न की दूसरों के लिए.


ये सारी सृष्टि , ये निसर्ग जो नियमबद्ध रीति से काम करते आ रहा है, ये किसकी वजह से हो रहा है?


पृथ्वी एक ही दायरे में घूम रही है, सारे ग्रह तारे अपनी अपनी कक्षा में चलन कर रहे है, उसका कोई तो नियंता होगा?


हम किसी चित्र को देखते है तो हमें पता होता है की उसके पीछे किसी चित्रकार की मेहनत होती है.


निसर्ग का चित्र तो हर क्षण बदलता दिखायी देता है. कौन इसका चित्रकार है? ब्रह्माण्ड में जो क्षण क्षण में बदलाव आ रहा है,

वह किसके कारण है?


उसे ही सनातन संस्कृति में ईश्वर कहा गया है.|


अलग अलग  संस्कृतियों में उसे  अलग अलग  नाम से जाना जाता है.|



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