सुविख्यात स्वामी विवेकानंद, समर्थ सद्गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के शरणागत होकर ही कृतार्थ हुए । वे भक्ति के विषय में कहते हैं : ‘गुरु की कृपा से मनुष्य में छिपी हुई अलौकिक शक्तियाँ विकसित होती हैं, उसे चैतन्य प्राप्त होता है तथा उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है और अंत में वह नर से नारायण हो जाता है । …सत्य-ज्ञान-आनंदस्वरूप सद्गुरु को संसार ईश्वर-तुल्य मानता है । शिष्य शुद्धचित्त, जिज्ञासु और परिश्रमी होना चाहिए । जब शिष्य अपने को ऐसा बना लेता है, तब श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, निष्पाप, दयालु और प्रबोधचतुर समर्थ सद्गुरु उसे मिलते हैं । …सद्गुरु शिष्य के नेत्रों में ज्ञानांजन लगाकर उसे दृष्टि देते हैं । ऐसे सद्गुरु बडे भाग्य से जब मिलें, तब अत्यंत नम्रता, विमल सद्भाव और दृढ विश्वास के साथ उनकी शरण लो, अपना सम्पूर्ण हृदय उन्हें अर्पण करो, उनके प्रति अपने चित्त में परम प्रेम धारण करो, उन्हें प्रत्यक्ष परमेश्वर समझो । इससे आप भक्ति एवं ज्ञान का समुद्र प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाओगे । …महात्मा, सिद्ध पुरुष ईश्वर के अवतार होते हैं । वे केवल स्पर्श से, एक कृपा-कटाक्ष से, केवल संकल्पमात्र से भी शिष्य को कृतार्थ कर देते हैं, पर्वत जैसे पापों का बोझ ढोनेवाले भ्रष्ट जीवन को भी अपनी दया से क्षणार्ध में पुण्यात्मा बनाते हैं । वे गुरुओं के गुरु हैं । मनुष्यरूप में प्रकट होनेवाले साक्षात् नारायण हैं । मनुष्य उन्हींके रूप में परमात्मा को देख सकता है । अलख पुरुष की आरसी, सद्गुरु का ही देह । लखा जो चाहे अलख को, इन्हींमें तू लख लेह ।। भगवान निर्गुण-निराकार हैं, पर हम लोग जब तक मनुष्य हैं (देहभाव में हैं), तब तक हमें उन्हें मनुष्यरूप में ही पूजना चाहिए । तुम चाहे जो कहो, चाहे जितना प्रयत्न करो, पर तुम्हें मनुष्यरूपी (सगुण) परमेश्वर का ही भजन करना होगा । निर्गुण-निराकार का चाहे कोई कितना ही पाण्डित्य बघारे, सगुण का तिरस्कार करे, अवतारों की निन्दा करे, सूर्य-चन्द्र, तारागणों को दिखाकर बुद्धिवाद से उन्हींमें देवत्व देखने को कहे – पर उसमें यथार्थ आत्मज्ञान कितना है, यह यदि तुम देखो तो वह केवल शून्य है । हम लोग मनुष्य हैं, परमात्मा हमसे सगुणरूप में सद्गुरु-रूप में ही मिलते हैं, इसमें कुछ भी संदेह नहीं । स्वामी विवेकानंदजी आगे कहते हैं : ‘भगवान से मिलने की इच्छा करनेवाले मुमुक्षु के नेत्र श्रीगुरु ही खोलते हैं । गुरु और शिष्य का सम्बन्ध पूर्वज और वंशज के सम्बन्ध जैसा ही है । श्रद्धा, सच्चाई, नम्रता, शरणागति और आदरभाव से शिष्य गुरु का मन मोह ले तो ही उसकी आध्यात्मिक उन्नति हो सकती है । विशेष रूप से ध्यान में रखने की बात यह है कि जहाँ गुरु-शिष्य का नाता अत्यंत प्रेम से युक्त होता है, वहीं प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति के महात्मा उत्पन्न होते हैं । स्वानुभूति ज्ञान की परम सीमा है, वह स्वानुभूति ग्रंथों से नहीं प्राप्त हो सकती । पृथ्वी का पर्यटन कर चाहे आप सारी भूमि पदाक्रांत कर डालें, हिमालय, काकेशस, आल्प्स पर्वत लाँघ जायें, समुद्र में गोता लगाकर उसकी गहराई में बैठ जायें, तिब्बत देश देख लें या गोबी (अफ्रीका) का मरुस्थल छान डालें, स्वानुभव का यथार्थ धर्म-रहस्य इन बातों से, श्रीगुरु के कृपा-प्रसाद के बिना त्रिकाल में भी ज्ञात नहीं होगा । इसलिए भगवान की कृपा से जब ऐसा भाग्योदय हो कि श्रीगुरु दर्शन दें, तब सर्वान्तःकरण से श्रीगुरु की शरण लो, उन्हें ऐसा समझो जैसे यही परब्रह्म हों, उनके बालक बनकर अनन्यभाव से उनकी सेवा करो, इससे आप धन्य होंगे । ऐसे परम प्रेम और आदर के साथ जो श्रीगुरु के शरणागत हुए, उन्हींको और केवल उन्हींको सच्चिदानंद प्रभु ने प्रसन्न होकर अपनी परम भक्ति दी है और अध्यात्म के अलौकिक चमत्कार दिखाये हैं ।
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