शनिवार, 13 मई 2023

व्यक्ति आध्यत्मिक होने से क्या लाभ ?

 



व्यक्ति आध्यत्मिक होने से क्या लाभ?प्रथम लाभ   अमरता की प्राप्ति - मनुष्य जब आध्यत्मिक होता है वह अपना संमंध आत्मा परमात्मा से जोड़ता है,

और आत्मा अविनाशी है जरा मरण से रहित है यह भलीभांति समझ लेता है।

अतः स्वयं की अविनाशी स्वरुप का बोध होता है | और अमर हो जाता है |द्वितीय लाभ   चिरंतन  सुख और आनंद की प्राप्ति - जब मनुष्य स्वयं को अमर जान  लेता है उसी समय संसार का क्षणभंगुर स्वरूप को भी जान  लेता है |

वस्तु व्यक्ति परिस्थिति सभी अस्थायी जान कर उससे प्रभावित नहीं होता , 

उन सब का उपयोग कर सदा सुखी रहता है, ममता रहित हो कर समता में प्रतिष्टित होता है |

सारा संसार को स्वयं का लीला समझ कर सदा आनंद में रहता है|

जैसे की सागर में तरंग, फेन, बुलबुले  शोभायमान होते हैं |

ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आने वाला भी सुख  और शांति का प्रसाद पा लेता है |तृतीय लाभ   व्यक्ति सदा निर्भय रहता है , दुःख और कष्ट से रहित होता है- जब स्वयं अविनाशी और संसार क्षण भंगुर जान  लेता है

उसे फिर किस बात  का भय होगा ? अतः सदा निर्भय रहता है |

दुःख और कष्ट उसे प्रभावित नहीं कर पाते |चतुर्थ लाभ    संताप रहित हो जाता है - षड्विकार काम , क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन को और इन के कारणों को भलीभांति जान लेने  से

मन में यह विकार ताप उत्पन्न नहीं कर पाते और संताप रहित हो जाता है |

गुणों के प्रभाव से  विकार ग्रस्त हो भी जाए तो भी उसे शीघ्र ही उपराम हो जाता है | 

पंचम लाभ   वह सर्वज्ञ हो जाता है - 

सृष्टि का आधार स्वरुप परमात्मा को जान कर वह सर्वज्ञ हो जाता है |छठा लाभ   दैवी गुण संपन्न होता है - उद्यम ,साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम, दया, करुणा, क्षमाशील, विद्या , विनय, विवेक आदि गुणों से सु शोभित होता है |सातवां लाभ   वसुधैव कुतुम्वकम -

सारा श्रृष्टि को अपना स्वरुप जान  लेने से

वह सभी को पोषण करता है जैसे मनुष्य अपना  शरीर और परिवार का मनुष्य पालन पोषण और सुरक्षा करता है|



वस्तुवादी होने से क्या नुक्सान ? 

  • अपने को एक शरीर का पुतला मानता है और वह जरा व्याधि मृत्यु के भय  से प्रभावित रहता है |   स्वार्थी , भयातुर , कामातुर, क्रोधी, लोभी, मोहि, अशांत, रुग्ण, खिन्न , रहता है | पुत्र,परिवार, समाज, संसार सभी का शोषण करता है, संग्रही होताहै, सदा दुखी रहता है, पीड़ित रहता है | विलाशिता , भोगी आदि दुर्गुण से प्रभावित रहता है | अंततो गत्वा वह पुनः मनुष्य शरीर को प्राप्त न होकर तिर्यक योनी जैसे किट, पतंग, पशु, पक्षी, जलचर , पेड़ पौधे आदि शरीर पाकर दुःख कष्ट पीड़ा भोगता रहता है |


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