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मंगलवार, 7 मई 2024

सेवा तत्वज्ञान की झलक

 



        हां, मैं इस कथन से सहमत हूं कि हमने तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को कितना आत्मसात किया है, वह हमारी सेवा कार्य से झलकता है। तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु हमें जीवन के अर्थ, उद्देश्य और हमारे रिश्ते को ईश्वर से समझने में मदद करते हैं। जब हम इन शिक्षाओं को आत्मसात करते हैं, तो हम दूसरों की सेवा करने के लिए अधिक प्रेरित और सक्षम होते हैं।

हमारे सेवा कार्य से पता चलता है कि हम कितने दयालु, करुणामय और समझदार हैं। यह हमें दूसरों के दर्द और पीड़ा को महसूस करने और उन्हें मदद करने की इच्छा देता है। जब हम दूसरों की सेवा करते हैं, तो हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करने में मदद करते हैं और अपने जीवन को अर्थ और उद्देश्य देते हैं।

बेशक, सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने का एकमात्र तरीका नहीं है। हम अपने विचारों, शब्दों और कार्यों के माध्यम से भी इन शिक्षाओं को प्रतिबिंबित कर सकते हैं। हालांकि, सेवा कार्य एक महत्वपूर्ण तरीका है कि हम दूसरों को दिखा सकते हैं कि हमने क्या सीखा है।

यहां कुछ उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने से जुड़ा हो सकता है:

  • एक व्यक्ति जो तत्वज्ञान को आत्मसात करता है कि सभी जीवन पवित्र है, वह दूसरों के साथ दयालु और करुणामय व्यवहार करेगा।
  • एक व्यक्ति जो सत्संग के माध्यम से दूसरों के अनुभवों से सीखता है, वह दूसरों की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकेगा और उनकी मदद करने के लिए अधिक प्रेरित होगा।
  • एक व्यक्ति जो ईश्वर में विश्वास करता है, वह दूसरों की सेवा को ईश्वर की इच्छा को पूरा करने के रूप में देखेगा।
  • एक व्यक्ति जो गुरु के मार्गदर्शन का पालन करता है, वह दूसरों की सेवा के लिए अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग करने के लिए अधिक इच्छुक होगा।

कुल मिलाकर, मैं मानता हूं कि सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। यह हमें दूसरों को दिखाने का एक तरीका है कि हमने क्या सीखा है और हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करने में मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

सोमवार, 6 मई 2024

चित्त और आत्मा: सत्य की खोज में अंतर्मन का सफर

 




आत्मा, हिन्दू धर्म की अगम्य सत्ता है। इसे व्यक्ति का अंतर्यात्मा कहा जाता है, जो कि शारीरिक और मानसिक संरचनाओं से पृथक है। यह नाशवान नहीं है और न तो यह उत्पन्न होता है और न ही मरता है। आत्मा अज्ञेय होने के कारण इसका वास्तविक स्वरूप मनुष्य के द्वारा समझा और अनुभव किया जाना कठिन है।


आत्मा का अंतर्मुखी स्वरूप उसकी अज्ञेयता के कारण लोगों के लिए अक्षरशः अदृश्य होता है। वेदान्त और योगदर्शन में, आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है, जो सर्वव्यापी, अज्ञेय, और अविकारी है। यह चेतना का निरंतर स्रोत है और सभी जीवों का आधार है।


अत: आत्मा सब को सदा प्राप्त है, इसमें कोई भेदभाव नहीं है। यह जीवन का आधार है, जिससे सभी संजीवी प्राणियों का संबंध है। परन्तु, मानव चित्त की माया में इसको समझना और अनुभव करना विशेष गंभीरता की जरूरत है।


चित्त का स्वभाव विचारों, भावनाओं, और इच्छाओं का धारण करना है। यह ज्ञान और अज्ञान का केन्द्र है, जो मनुष्य को उसके आत्मा से दूर कर देता है। माया की भ्रांति में, चित्त संसार के मोह में डूब जाता है और अपना स्वरूप भूल जाता है।


इस प्रकार, आत्मा को पहचानने की आवश्यकता है, जो मानव के स्वभाविक धर्म है। योग, ध्यान, और आत्मा की अध्ययन से मनुष्य अपने स्वरूप को पहचान सकता है और चित्त को नियंत्रित करके आत्मा से जुड़ सकता है। इससे मनुष्य अपने असली स्वरूप को समझता है और जीवन में उद्धारण की दिशा में आगे बढ़ता है।


आत्मा को समझना मानव जीवन का उद्धारण है। यह आत्म-संयम, सच्चे ध्यान, और निस्वार्थ भावना के माध्यम से संभव है। आत्मा का अनुभव करने से मनुष्य अपने चित्त को शांति, संतुलन, और आनंद में बदल सकता है और इस प्रकार समृद्ध और समर्पित जीवन जी सकता है।

शनिवार, 13 मई 2023

व्यक्ति आध्यत्मिक होने से क्या लाभ ?

 



व्यक्ति आध्यत्मिक होने से क्या लाभ?प्रथम लाभ   अमरता की प्राप्ति - मनुष्य जब आध्यत्मिक होता है वह अपना संमंध आत्मा परमात्मा से जोड़ता है,

और आत्मा अविनाशी है जरा मरण से रहित है यह भलीभांति समझ लेता है।

अतः स्वयं की अविनाशी स्वरुप का बोध होता है | और अमर हो जाता है |द्वितीय लाभ   चिरंतन  सुख और आनंद की प्राप्ति - जब मनुष्य स्वयं को अमर जान  लेता है उसी समय संसार का क्षणभंगुर स्वरूप को भी जान  लेता है |

वस्तु व्यक्ति परिस्थिति सभी अस्थायी जान कर उससे प्रभावित नहीं होता , 

उन सब का उपयोग कर सदा सुखी रहता है, ममता रहित हो कर समता में प्रतिष्टित होता है |

सारा संसार को स्वयं का लीला समझ कर सदा आनंद में रहता है|

जैसे की सागर में तरंग, फेन, बुलबुले  शोभायमान होते हैं |

ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आने वाला भी सुख  और शांति का प्रसाद पा लेता है |तृतीय लाभ   व्यक्ति सदा निर्भय रहता है , दुःख और कष्ट से रहित होता है- जब स्वयं अविनाशी और संसार क्षण भंगुर जान  लेता है

उसे फिर किस बात  का भय होगा ? अतः सदा निर्भय रहता है |

दुःख और कष्ट उसे प्रभावित नहीं कर पाते |चतुर्थ लाभ    संताप रहित हो जाता है - षड्विकार काम , क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन को और इन के कारणों को भलीभांति जान लेने  से

मन में यह विकार ताप उत्पन्न नहीं कर पाते और संताप रहित हो जाता है |

गुणों के प्रभाव से  विकार ग्रस्त हो भी जाए तो भी उसे शीघ्र ही उपराम हो जाता है | 

पंचम लाभ   वह सर्वज्ञ हो जाता है - 

सृष्टि का आधार स्वरुप परमात्मा को जान कर वह सर्वज्ञ हो जाता है |छठा लाभ   दैवी गुण संपन्न होता है - उद्यम ,साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम, दया, करुणा, क्षमाशील, विद्या , विनय, विवेक आदि गुणों से सु शोभित होता है |सातवां लाभ   वसुधैव कुतुम्वकम -

सारा श्रृष्टि को अपना स्वरुप जान  लेने से

वह सभी को पोषण करता है जैसे मनुष्य अपना  शरीर और परिवार का मनुष्य पालन पोषण और सुरक्षा करता है|



वस्तुवादी होने से क्या नुक्सान ? 

  • अपने को एक शरीर का पुतला मानता है और वह जरा व्याधि मृत्यु के भय  से प्रभावित रहता है |   स्वार्थी , भयातुर , कामातुर, क्रोधी, लोभी, मोहि, अशांत, रुग्ण, खिन्न , रहता है | पुत्र,परिवार, समाज, संसार सभी का शोषण करता है, संग्रही होताहै, सदा दुखी रहता है, पीड़ित रहता है | विलाशिता , भोगी आदि दुर्गुण से प्रभावित रहता है | अंततो गत्वा वह पुनः मनुष्य शरीर को प्राप्त न होकर तिर्यक योनी जैसे किट, पतंग, पशु, पक्षी, जलचर , पेड़ पौधे आदि शरीर पाकर दुःख कष्ट पीड़ा भोगता रहता है |


शुक्रवार, 5 मई 2023

संसार का गुड़ रहस्य


मानव जीवन बहुत दुर्लभ है वो भी भारत जैसे देश में अत्यंत दुर्लभ है। यहाँ जन्म लेने के लिए देवता लोग भी तरसते हैं । क्यों की स्वर्ग तथा अन्य लोक में केवल पुण्य फल का ही भोग भोगते हैं परंतु मानव जन्म में मनुष्य सभी देव, गन्धर्व, किन्नर और सभी लोकों के पूजनीय आत्मतत्त्व कहो, ब्रह्मतत्व कहो या फिर परमपद को प्राप्त कर सकता है। जो की अन्य किसी भी योनि में नहीं प्राप्त कर सकता है। इस लिए देवता लोग भी यहाँ जन्म लेने के लिए तरस ते हैं । 

पर हम संसार में इतने उलझे हुए हैं कि इतनी बड़ी कीमती जीवन हमे बोझ लग रहा है। हम से सरकता जा रहा है। हमे पता ही नहीं चल रहा है। जैसे वह भिकारी की कथा है। कि जीवन भर रास्ता किनारे गड़े हुए सोना की खजाना के ऊपर बैठ कर एक एक पैसा के लिए हात फैलाते फैलाते जीवन पूरा होगया जब गाड़ने के लिए खोदे तो सोना का खजाना निकाला। ऐसे ही हमारा उस सोने से भी कीमती जीवन व्यर्थ के सांसारिक चीजो को संभालने में खो देंगे और आत्मधन से वंचित रह जायेंगे। पता ही नहीं चल रहा है कि कैसे कल का बचपन, जवानी बीत गया और आगे की समय भी सरकता जा रहा है। चलो जबतक पता नहीं था तब तक तो ठीक है । अब जब पता चला तब तो संभल जाएं। नहीं तो व्यर्थ ही जीवन खोना पड़ेगा। यहाँ प्रकृति माता की बड़ी विचित्र लीला है। अब इस को समझें।

प्रकृति माता हमारे सभी जीवों के माता है। हमारे पालन पोषण में हमेशा ही अनादि काल से निमग्न है, आनंदित है। हमे इस शरीर रूपी कपड़ा पहना कर बेटा, बेटी, पोता, पोती, हाथी, घोड़ा, सोना, चाँदी आदि खिलौना दे रखा है। कि हम इस में ही खेलते  ही रहें । हम अच्छे खेलते हैं तो हमे राजा,मंत्री, ऑफीसर, धनी, पंडित, देवता, गन्धर्व के शरीर रूपी कपड़ा पहना कर अच्छा अच्छा खिलौना देता है। अगर हम कीचड़ खेलते हैं तो हमे अच्छा कपड़ा नहीं देती जैसे एक साधारण माँ भी करती है। फिर हमें ग़रीब ला चार रूपी साधारण कपड़ा देती है। और नरक, दरिद्र, बीमारी रूपी तालाब में डाल कर रगड़ रगड़ कर धोती है और टूटी फूटी खिलौना देती है या तो वो भी नहीं देती है। हम सुधर जाएँ ऐसी शिक्षा देती है। हम जब इस खिलौना खेल खेल कर ऊब जाते हैं उसी को ही पुकारते हैं तब हमें गुरु रूपी गोद में लेकर संत,भक्त,जोगी, तपि का शरीर रूपी कपड़ा पहना कर ज्ञान, भक्ति रूपी स्तनों से आनंद रूपी दुग्धामृत का पान कराती है। और उसकी गोद में सुलाती है । जिसको सभी ज्ञानी जन मुक्ति, शांति, निर्वाण आदि नाम से जानते हैं।

यही रहस्य को जानने से राजपुत्र सिद्धार्त गौतम बुद्ध बन गए और कोई विस्वामित्र,व्यास, वाल्मीकि,बनगए तो कोई भीमभोई । ऐसे कई हज़ार कई करोड़ लोग अनादि काल से प्रकृति माता के गोद में आकर गए हैं।
संत भक्त लोग यह भी बताकर गये हैं कि सभीलोग वही परम पद को पाने की अधिकारी हैं । सभी पा सकते हैं। बस उस रास्ते में पैर रखने की देर है। जो की हमको करना है कोई जबर्दस्ती हमे धकेल नहीं सकता अगर धकेलेगा तो भी हम चल नहीं सकते जबतक हमारा इच्छा नहीं होगी। इस में हम स्वतंत्र हैं। जो चल पड़ा वो सतभागी है। चलने के लिए सभी को कहीं जंगल में जाना नहीं है। किसी सड़क पे चलना नहीं है। अपना मन को ही किसी सद्गुरु के बताये अनुसार चलाना है। इस के लिए प्रारम्भ में कोई मंत्र तंत्र की आवश्यकता नहीं है। बस समय निकाल कर अकेले में घर में कहीं बैठ कर उसी को ही मन ही मन पुकारना है । 10 मिनिट से ले कर जितने अधिक हो सके।एक बार से ले कर दिन में दो ,पांच सात बार जैसे भाव आता है ऐसा ही पुकारे वो सभी भाषा समझता है। संसारी बिकार, राग द्वेष, झगड़ा, से जितने अपने को बचाएंगे उतना ही हमे अधिक लाभ होगा।

भगवान एक हैं जो जिस किसी रूप में भी पूजा करे तो भी उस तक पहुचेगा। इसके लिए कोई बंधन नहीं है। फिर भी पंचदेव(विष्णु, शिव, शक्ति, गणपति, सूर्य ) में से किसी को भी पूजना अपना हिन्दू संस्कृति में कहा गया है सभी कल्याणकारी हैं।

भगवान सर्वव्यापी है अर्थात यहाँ भी हैं। सर्व काल में हैं अर्थात अभी भी हैं । पूर्ण रूप में हैं अर्थात पूर्ण समर्थ के साथ हैं । और सर्व सुलभ हैं। वो कोई पैसा या और कोई चीजों से नहीं मिलते । बस मन से ही पुकारने की देर है। हम जब एक कदम उसके और चलते हैं तो वो हजार कदम अपने और दौड़ कर आता है जैसे एक माँ अपने छोटे बच्चे की तरफ आता है।