रविवार, 18 मार्च 2018

सच्ची प्रार्थना









          महाभारत में आता है कि जब पांडव वनवास के लिए जा रहे थे, तब युधिष्ठिर अपने पुरोहित धौम्य मुनि के पास आकर बोले : ‘‘विप्रवर ! वेदों में पारंगत ब्राह्मण मेरे साथ वन में चल रहे हैं परंतु मैं इनका पालन-पोषण करने में असमर्थ हूँ । अब मुझे क्या करना चाहिए ?’’

          मुनि ने कहा : ‘‘तुम तपस्या का आश्रय लेकर ब्राह्मणों का भरण-पोषण करो ।’’

         युधिष्ठिर ने मुनि के बताये अनुसार अष्टोत्तरशतनामात्मक स्तोत्र द्वारा भगवान सूर्य का अनुष्ठान किया । प्रसन्न होकर सूर्यनारायण ने दर्शन दिये और बोले : ‘‘धर्मराज ! तुम जो कुछ चाहते हो वह सब तुम्हें प्राप्त होगा । मैं बारह वर्षों तक तुम्हें अन्न प्रदान करूँगा । यह ताँबे की बटलोई (भोजन पकाने का एक गोल तले का बर्तन) लो । इस पात्र द्वारा निकला भोजन तब तक अक्षय बना रहेगा, जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न करके परोसती रहेगी ।’’
धर्मराज उसीसे ब्राह्मणों को भोजन कराने लगे । सभीको भोजन कराने के बाद द्रौपदी भोजन करती थी । जब दुर्योधन ने सुना कि पांडव तो वन में भी भली प्रकार दान-पुण्य करते हुए आनंद से रह रहे हैं, तब उसने उनका अनिष्ट करने का विचार किया ।

           छल-कपट की विद्या में निपुण कर्ण और दुःशासन आदि के साथ वह भाँति-भाँति के उपायों से पांडवों को संकट में डालने की युक्तियाँ खोजने लगा । उसी समय परम क्रोधी दुर्वासा मुनि अपने शिष्यों को साथ लिये हुए आ पहुँचे । दुर्योधन ने स्वयं दास की तरह रात-दिन श्रद्धा से नहीं अपितु उनके शाप के डर से उनकी सेवा की ।
एक दिन मुनि प्रसन्न होकर बोले : ‘‘दुर्योधन ! तुम्हारे मन में जो इच्छा हो, वर माँग लो ।’’


          जो ईर्ष्या और द्वेष के शिकंजे में आ जाता है, उसका विवेक उसे साथ नहीं देता है । दुष्ट दुर्योधन ने कहा : ‘‘ब्रह्मन् ! जिस प्रकार आप मेरे अतिथि हुए उसी प्रकार पांडवों के भी अतिथि होइये । मेरी प्रार्थना से आप वहाँ ऐसे समय में जाइये जब द्रौपदी स्वयं भोजन कर चुकी हो ।’’
‘‘मैं वैसा ही करूँगा ।’’ मुनि चले गये ।

          कर्ण बोला : ‘‘सौभाग्य से हमारा काम बन गया । हमारे शत्रु विपत्ति के महासागर में डूब गये हैं ।’’
भूखे भोजन करके खुश होते हैं, मोर बादल गरजने से खुश होते हैं, सज्जन दूसरों की उन्नति देख के खुश होते हैं और दुष्ट व्यक्ति दूसरों को संकट में देखकर खुश होते हैं ।

           एक दिन पांडव व द्रौपदी भोजन से निवृत्त हो सुखपूर्वक बैठे थे, तभी अपने दस हजार शिष्यों से घिरे हुए दुर्वासा मुनि उस वन में आये ।

        युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, फिर विधिपूर्वक पूजा करके बोले : ‘‘भगवन् ! अपना नित्य नियम पूरा करके (भोजन के लिए) शीघ्र पधारिये ।’’ मुनि शिष्यों के साथ स्नान करने के लिए चले गये ।
इधर द्रौपदी को भोजन के लिए बड़ी चिंता हुई, उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था । फिर द्रौपदी को याद आया कि जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं और आशा की कोई किरण नहीं होती तो एकमात्र भगवान की प्रार्थना और उनका आश्रय ही हमें बचा सकता है । वह श्रीकृष्ण को सच्चे मन से पुकारने लगी । शुद्ध हृदय से की गयी सच्ची, भावपूर्ण प्रार्थना ईश्वर जरूर सुनते हैं । द्रौपदी की पुकार सुन भगवान तुरंत ही वहाँ आ गये । द्रौपदी ने सब समाचार कह सुनाया ।

           श्रीकृष्ण ने कहा : ‘‘कृष्णे ! इस समय बहुत भूख लगी है, पहले मुझे जल्दी भोजन कराओ फिर सारा प्रबंध करते रहना ।’’ उनकी बात सुनकर द्रौपदी को बड़ा संकोच हुआ ।

          ‘‘देव ! सूर्यनारायण की दी हुई बटलोई से तभी तक भोजन मिलता है, जब तक मैं भोजन न कर लूँ । आज तो मैं भी भोजन कर चुकी हूँ, अतः अब उसमें भोजन नहीं है ।’’


         ‘‘कृष्णे ! जल्दी जाओ और बटलोई लाकर मुझे दिखाओ ।’’ हठ करके द्रौपदी से बटलोई मँगवायी । पात्र में जरा-सा साग लगा हुआ था । श्रीकृष्ण ने उसे लेकर खा लिया और कहा : ‘‘इस साग से सम्पूर्ण विश्व के आत्मा यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान श्रीहरि तृप्त और संतुष्ट हों ।’’

          इधर मुनि लोगों को सहसा पूर्ण तृप्ति का अनुभव हुआ । बार-बार अन्नरस से युक्त डकारें आने लगीं । यह देख वे जल से बाहर निकले और दुर्वासा मुनि से बोले : ‘‘ब्रह्मर्षे ! इस समय इतनी तृप्ति हो रही है कि कंठ तक अन्न भरा हुआ जान पड़ता है । अब कैसे भोजन करेंगे ?’’

           दुर्वासा मुनि अपने शिष्योंसहित पांडवों से बिना मिले ही वहाँ से प्रस्थान कर गये ।
   (‘महाभारत’, वन पर्व से संक्षिप्त)


           जो लोग सदा धर्म में तत्पर रहते हैं, उनके जीवन में भी कष्ट और विघ्न तो आते हैं पर वे दुःखी और विचलित नहीं होते बल्कि भगवान की शरण व प्रार्थना का आश्रय लेते हैं । इससे उनके कष्ट दूर हो जाते हैं । ईर्ष्यालु एवं द्वेषी चित्त से तो किया-कराया भी चौपट हो जाता है जबकि सच्ची प्रार्थना से बिगड़ी हुई बाजी भी देर-सवेर सँवर जाती है ।




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शनिवार, 17 मार्च 2018

सच्चा सुख और परम सत्य कैसे मिले ?











(दूरदर्शन पर पूर्व में प्रसारित पूज्य बापूजी का पावन संदेश)



              प्रश्न : सच्चा सुख और सच्चा सत् क्या है ?

           पूज्य बापूजी : वस्तु, इन्द्रिय और मन की वृत्ति से जो सुखाभास होता है उसे मिथ्या सुख बोलते हैं । वस्तु, इन्द्रिय-सुख के न होने पर भी या मन के विषयों को न भोगते हुए भी मन परम शांतस्वरूप आत्मा में जो विश्रांति पाता है उसे सच्चा सुख बोलते हैं ।

             एक होता है सत्य, दूसरा होता है सत् । दो और दो चार सत्य है, यह सामाजिक सत्य है लेकिन दो और चार का साक्षी सत् है । ‘मुझे जंतु ने काटा है, मैं पीड़ित हो रहा हूँ, दुःखी हूँ’ - यह व्यवहारकाल में सत्य है लेकिन जहाँ से ‘मैं’पना उठता है, वहाँ यह दुःख नहीं पहुँच सकता है । यह दुःख इन्द्रियों को होता है, मन को होता है, शरीर को होता है, मुझ चैतन्य में नहीं आता है । जहाँ दुःख की पहुँच नहीं और सुख का आकर्षण नहीं वह सत् है और जो दुःख-सुख में प्रभावित होता है वह सामाजिक सत्य माना जाता है । तो प्रकृति की वस्तुओं को ‘मैं-मेरा’ मानकर सुखी-दुःखी होना यह व्यावहारिक सत्य है लेकिन इन सबको मिथ्या और परिवर्तनशील समझ के अपने साक्षीस्वरूप में जग जाना यह पारमार्थिक सत् है ।


          प्रस्तोता (होस्ट) : इन सब बातों से मैं यह समझ पाया कि संसार को, व्यक्तियों को, लोगों को शांति के लिए सब कुछ छोड़ देना चाहिए ।

    पूज्यश्री : नहीं-नहीं-नहीं... । सब कुछ छोड़ना नहीं है अपितु सब कुछ में जो सत्यबुद्धि की बेवकूफी घुसी है, उसे छोड़ना है । सब कुछ जो दिखता है वह परिवर्तनशील है लेकिन जिससे दिखता है वह सत् है । तो सत् को प्रेम करें और सत् के नाते सब कुछ का सदुपयोग करें । व्यक्ति सदुपयोग नहीं करेगा और सब कुछ छोड़ेगा तो सब कुछ कितना छोड़ पायेगा ? शरीर को तो नहीं छोड़ सकता है और शरीर है तो फिर सब कुछ चाहिए खाने को, पीने को, रहने को, देने को । लेकिन जो आसक्ति है उसे छोड़ सकते हैं ।


अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ।
(गीता : 5.15)


         अज्ञान से ज्ञान आवृत हो गया इसलिए हम लोग मोहित हो जाते हैं । उलटे ज्ञान को सच्चा मान लेते हैं । है तो बदलनेवाला लेकिन उसको चिपकाये रखते हैं । बचपन को कितना भी सँभाला लेकिन चला गया, जवानी को कितना भी थामा परंतु चली गयी, फिर बुढ़ापा आयेगा, कितना भी सुरक्षित रखो पर चला जायेगा । जो चला जानेवाला है उसका सदुपयोग करें, उसका बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय उपयोग करने से अशांति मिटेगी, शांति आयेगी और सत् में प्रवृत्ति कर लें कि ‘भाई ! दुःख आया और चला गया लेकिन कोई जाननेवाला तो है । सुख आया और चला गया, कोई जाननेवाला तो है । इन दोनों को जाननेवाला मैं कौन हूँ ?’- ऐसा अपने को प्रश्न करें रात को सोते समय और सुबह उठते समय । तो वह कौन है ? वह अपने-आप कृपा करके प्रकट होने के द्वार खोल देगा ।


प्रश्न : आपसे प्रेरणा पाकर करोड़ों श्रद्धालु अपने जीवन में ज्ञानज्योति जलाकर जीवन को सफल बना रहे हैं । अपने जीवन की आप ऐसी कोई प्रेरक बात बताइये जिससे उनके जीवन की ज्ञानज्योति और ज्यादा प्रकाशमान हो और उनके जीवन का मार्ग और ज्यादा खुले, साफ हो ।


       पूज्य बापूजी : लाभदायी एवं प्रेरक बातें तो बहुत सारी हैं । खुलेआम एक छोटी-सी कह देता हूँ । रात्रि को सोते समय हम कभी चिंता लेकर, थकान ले के नहीं सोते हैं । ‘जो दिनभर हुआ, वह जिसकी सत्ता से हुआ
उसको अर्पण ! मैं निश्चिंत नारायण की गोद में जा रहा हूँ ।’ ऐसे परमेश्वर का चिंतन करते-करते आनंद, निर्विषय आनंद आता है, फिर हम सोते हैं । रात्रि का आखिरी सेकंड सुबह का पहला सेकंड बन जाता है । सुबह जब उठते हैं तो उसी शांत आत्मा में, ईश्वर में विश्रांति पाते-पाते थोड़ा-सा माधुर्य का अनुभव करते-करते फिर उठते हैं । श्रीकृष्ण ऐसा करते थे यह बात शास्त्रों से मैंने जानी । ‘आज यह-यह शुभ करना है...’- ऐसा सुबह संकल्प कर लेते थे और अपने को प्रसन्न रखते थे । आम लोगों को प्रेरणा पानी है तो सुबह उठकर यह संकल्प करना चाहिए कि ‘आज कम-से-कम 4 आदमियों को हँसाऊँगा, दो आदमियों के आँसू पोंछूँगा ।’



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शुक्रवार, 16 मार्च 2018

प्रणव’ (ॐ) की महिमा





            सूतजी ने ऋषियों से कहा : ‘‘महर्षियो ! ‘प्र’ नाम है प्रकृति से उत्पन्न संसाररूपी महासागर का । प्रणव इससे पार करने के लिए (नव) नाव है । इसलिए इस ॐकार को ‘प्रणव’ की संज्ञा देते हैं । ॐकार अपना जप करनेवाले साधकों से कहता है - ‘प्र-प्रपंच, न-नहीं है, वः-तुम लोगों के लिए ।’ अतः इस भाव को लेकर भी ज्ञानी पुरुष ‘ॐ’ को ‘प्रणव’ नाम से जानते हैं । इसका दूसरा भाव है : ‘प्र-प्रकर्षेण, न-नयेत्, वः-युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणवः । अर्थात् यह तुम सब उपासकों को बलपूर्वक मोक्ष तक पहुँचा देगा ।’ इस अभिप्राय से भी ऋषि-मुनि इसे ‘प्रणव’ कहते हैं । अपना जप करनेवाले योगियों के तथा अपने मंत्र की पूजा करनेवाले उपासकों के समस्त कर्मों का नाश करके यह उन्हें दिव्य नूतन ज्ञान देता है, इसलिए भी इसका नाम प्रणव - प्र (कर्मक्षयपूर्वक) नव (नूतन ज्ञान देनेवाला) है ।
           उन मायारहित महेश्वर को ही नव अर्थात् नूतन कहते हैं । वे परमात्मा प्रधान रूप से नव अर्थात् शुद्धस्वरूप हैं, इसलिए ‘प्रणव’ कहलाते हैं । प्रणव साधक को नव अर्थात् नवीन (शिवस्वरूप) कर देता है, इसलिए भी विद्वान पुरुष इसे प्रणव के नाम से जानते हैं अथवा प्र - प्रमुख रूप से नव - दिव्य परमात्म-ज्ञान प्रकट करता है, इसलिए यह प्रणव है ।
           यद्यपि जीवन्मुक्त के लिए किसी साधन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह सिद्धरूप है, तथापि दूसरों की दृष्टि में जब तक उसका शरीर रहता है, तब तक उसके द्वारा प्रणव-जप की सहज साधना स्वतः होती रहती है । वह अपनी देह का विलय होने तक सूक्ष्म प्रणव मंत्र का जप और उसके अर्थभूत परमात्म-तत्त्व का अनुसंधान करता रहता है । जब शरीर नष्ट हो जाता है, तब वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूप शिव को प्राप्त कर लेता है - यह सुनिश्चित है । जो अर्थ का अनुसंधान न करके केवल मंत्र का जप करता है, उसे निश्चय ही योग की प्राप्ति होती है । जिसने इस मंत्र का ३६ करोड़ जप कर लिया हो, उसे अवश्य ही योग प्राप्त हो जाता है । ‘अ’ शिव है, ‘उ’ शक्ति है और ‘मकार’ इन दोनों की एकता है । यह त्रितत्त्वरूप है, ऐसा समझकर ‘ह्रस्व प्रणव’ का जप करना चाहिए । जो अपने समस्त पापों का क्षय करना चाहते हैं, उनके लिए इस ह्रस्व प्रणव का जप अत्यंत आवश्यक है ।
           वेद के आदि में और दोनों संध्याओं की उपासना के समय भी ॐकार का उच्चारण करना चाहिए ।’’
भगवान शिव ने भगवान ब्रह्माजी और भगवान विष्णु से कहा : ‘‘मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ॐकार के रूप में प्रसिद्ध है । वह महामंगलकारी मंत्र है । सबसे पहले मेरे मुख से ॐकार (ॐ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूप का बोध करानेवाला है । ॐकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ । यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है । प्रतिदिन ॐकार का निरंतर स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है ।
            मुनीश्वरो ! प्रतिदिन दस हजार प्रणवमंत्र का जप करें अथवा दोनों संध्याओं के समय एक-एक हजार प्रणव का जप किया करें । यह क्रम भी शिवपद की प्राप्ति करानेवाला है ।
            ‘ॐ’ इस मंत्र का प्रतिदिन मात्र एक हजार जप करने पर सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है ।
    प्रणव के ‘अ’, ‘उ’ और ‘म्’ इन तीनों अक्षरों से जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन होता है - इस बात को जानकर प्रणव (ॐ) का जप करना चाहिए । जपकाल में यह भावना करनी चाहिए कि ‘हम तीनों लोकों की सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, पालन करनेवाले विष्णु तथा संहार करनेवाले रुद्र जो स्वयंप्रकाश चिन्मय हैं, उनकी उपासना करते हैं । यह ब्रह्मस्वरूप ॐकार हमारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों को, मन की वृत्तियों को तथा बुद्धि की वृत्तियों को सदा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले धर्म एवं ज्ञान की ओर प्रेरित करे ।’ प्रणव के इस अर्थ का बुद्धि के द्वारा qचतन करता हुआ जो इसका जप करता है, वह निश्चय ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । अथवा अर्थानुसंधान के बिना भी प्रणव का नित्य जप करना चाहिए ।’’
    (‘शिव पुराण’ अंतर्गत विद्येश्वर संहिता से संकलित) 




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