उपवास का धार्मिक, आध्यात्मिक और वैदिक महत्व तीनों ही है। उपवास वासना से निवृति का अकाट्य साधन है। इन्द्रियों व मन पर विजय पाने के लिए जिताहार होनेकी आवश्यकता होती है। चूंकि अन्न में मादकता होती हैं। इसमें एक प्रकार का नशा होता है। जिससे भोजन के पश्चात, हम प्रायः आलस्य अनुभव करते हैं। पके हुए अन्न के नशे में एक प्रकार की पार्थिव तामस शक्ति होती है जो पार्थिव शरीर का संयोग पाकर दुगनी हो जाती हैं।
उपवास से न केवल शारीरिक विकृति दूर होती है वरन मन और आत्मा भी शुद्ध होती हैं।
कुछ लोग उपवास को नकारते हैं लेकिन उपवास भूख लगने पर समाप्त होने का नाम हैं। उपवास से मन प्रार्थना की और तीव्रता से जाता है अर्थात उपवास से मन ईश्वर की ओर होता है। लेकिन उपवास का शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक लाभ उठाने के लिए उसकी कला का ज्ञान भी आवश्यक है।
आपने स्वयं अनुभव किया होगा ज्वर होने पर डॉक्टर, वैद्य भोजन का निषेध कर देते है. पशु-पंक्षी रोगी होने पर स्वयं ही आहार बंद कर देते हैं और एक ओर विश्राम की मुद्रा में पड़े रहते है। इस प्रकार हमे पता चलता है कि उपवास में रोगरोधक शक्ति है। उपवास का नियम पालन हो तभी उसका अनुकूल परिणाम मिलता है लेकिन प्रतिकूल स्थिति में इससे शरीर को कष्ट हो जाता है. ऐसा देखने में आया है कि अल्पाहार करने से दुर्बलता आती है जबकि उपवास से नहीं।
धार्मिक दृष्टि से उपवास में भी अलग-अलग खान-पान का महत्व है. किसी में फलाहार है तो किसी में पानी तक मना है. किसी में केवल मिष्ठान खाया जाता है तो किसी में खट्टा का निषेध किया जाता है. वास्तव में यह सब नियम प्रकृति के संतुलन के लिए बनाए गये है. आयुर्विज्ञान में इसको वैज्ञानिक स्तर पर विभाजित किया गया हैं.
यह उपवास निम्न प्रकार से है –
प्रातःकालीन
सायंकालीन
रसोपवास
एकाहारोपवास
फलोपवास
दुग्धोपवास
मठोपवास
पूर्णोपवास
साप्ताहिक उपवास
लघु उपवास
कड़ा उपवास
दूर उपवास
व्यायाम उपवास
वास्तव में उपवास शरीर शुद्धि का एक सशक्त माध्यम है। स्वास्थ्य एवं धर्म दोनों ही दृष्टि से उपवास का एक विशेष महत्व है। शरीर को साधना अनुकूल स्वस्थ रखना भी धर्म है।
उपवास रखने के लाभ
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो उपवास करने के कई स्वास्थ लाभ है-
उपवास से एकाग्रता बढती है और किसी कार्य को एकाग्र होकर करने की शक्ति भी बढ़ती है.
उपवास शरीर को निरोग बनाता हैं।
उपवास के दौरान जो भी भोजन बचता है उसे किसी सतपात्र व्यक्ति को दान में दे। इससे आप सुख की अनुभूति करेंगे और यह एक पुण्य का कार्य है।
उपवास से शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता हैं जो हमारे कार्यो को सफ़ल बनाने में मदत करता है।
सावधानिया
यदि आप बीमार या कमजोर है तो उपवास न करें. ऐसी स्तिथि में वैद्य व डॉक्टर की सलाह से ही उपवास रखे।
शारीरिक रूप से कमजोर होने पर या चक्कर आने पर उपवास न रखे।
भगवान शिव ने पार्वती को बताए थे जीवन के ये 5 रहस्य, भगवान शिव ने देवी पार्वती को समय-समय पर कई ज्ञान की बातें बताई हैं।
जिनमें मनुष्य के सामाजिक जीवन से लेकर पारिवारिक और वैवाहिक जीवन की बातें शामिल हैं। भगवान शिव ने देवी पार्वती को 5 ऐसी बातें बताई थीं जो हर मनुष्य के लिए उपयोगी हैं, जिन्हें जानकर उनका पालन हर किसी को करना ही चाहिए-
1. क्या है सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा पाप
देवी पार्वती के पूछने पर भगवान शिव ने उन्हें मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धर्म और अधर्म मानी जाने वाली बात के बारे में बताया है। भगवान शंकर कहते है-
श्लोक- नास्ति सत्यात् परो नानृतात् पातकं परम्।।
अर्थात- मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धर्म है सत्य बोलना या सत्य का साथ देना और सबसे बड़ा अधर्म है असत्य बोलना या उसका साथ देना।
इसलिए हर किसी को अपने मन, अपनी बातें और अपने कामों से हमेशा उन्हीं को शामिल करना चाहिए, जिनमें सच्चाई हो, क्योंकि इससे बड़ा कोई धर्म है ही नहीं। असत्य कहना या किसी भी तरह से झूठ का साथ देना मनुष्य की बर्बादी का कारण बन सकता है।
2. काम करने के साथ इस एक और बात का रखें ध्यान
श्लोक- आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनुस्तु शुभाशुभे।
अर्थात- मनुष्य को अपने हर काम का साक्षी यानी गवाह खुद ही बनना चाहिए, चाहे फिर वह अच्छा काम करे या बुरा। उसे कभी भी ये नहीं सोचना चाहिए कि उसके कर्मों को कोई नहीं देख रहा है।
कई लोगों के मन में गलत काम करते समय यही भाव मन में होता है कि उन्हें कोई नहीं देख रहा और इसी वजह से वे बिना किसी भी डर के पाप कर्म करते जाते हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और ही होती है। मनुष्य अपने सभी कर्मों का साक्षी खुद ही होता है। अगर मनुष्य हमेशा यह एक भाव मन में रखेगा तो वह कोई भी पाप कर्म करने से खुद ही खुद को रोक लेगा।
3. कभी न करें ये तीन काम करने की इच्छा
श्लोक-मनसा कर्मणा वाचा न च काड्क्षेत पातकम्।
अर्थात- आगे भगवान शिव कहते है कि- किसी भी मनुष्य को मन, वाणी और कर्मों से पाप करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य जैसा काम करता है, उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है।
यानि मनुष्य को अपने मन में ऐसी कोई बात नहीं आने देना चाहिए, जो धर्म-ग्रंथों के अनुसार पाप मानी जाए। न अपने मुंह से कोई ऐसी बात निकालनी चाहिए और न ही ऐसा कोई काम करना चाहिए, जिससे दूसरों को कोई परेशानी या दुख पहुंचे। पाप कर्म करने से मनुष्य को न सिर्फ जीवित होते हुए इसके परिणाम भोगना पड़ते हैं बल्कि मरने के बाद नरक में भी यातनाएं झेलना पड़ती हैं।
4. सफल होने के लिए ध्यान रखें ये एक बात
संसार में हर मनुष्य को किसी न किसी मनुष्य, वस्तु या परिस्थित से आसक्ति यानि लगाव होता ही है। लगाव और मोह का ऐसा जाल होता है, जिससे छूट पाना बहुत ही मुश्किल होता है। इससे छुटकारा पाए बिना मनुष्य की सफलता मुमकिन नहीं होती, इसलिए भगवान शिव ने इससे बचने का एक उपाय बताया है।
श्लोक- दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते।
अनिष्टेनान्वितं पश्चेद् यथा क्षिप्रं विरज्यते।।
अर्थात- भगवान शिव कहते हैं कि- मनुष्य को जिस भी व्यक्ति या परिस्थित से लगाव हो रहा हो, जो कि उसकी सफलता में रुकावट बन रही हो, मनुष्य को उसमें दोष ढूंढ़ना शुरू कर देना चाहिए। सोचना चाहिए कि यह कुछ पल का लगाव हमारी सफलता का बाधक बन रहा है। ऐसा करने से धीरे-धीरे मनुष्य लगाव और मोह के जाल से छूट जाएगा और अपने सभी कामों में सफलता पाने लगेगा।
5. यह एक बात समझ लेंगे तो नहीं करना पड़ेगा दुखों का सामना
अर्थात- आगे भगवान शिव मनुष्यो को एक चेतावनी देते हुए कहते हैं कि- मनुष्य की तृष्णा यानि इच्छाओं से बड़ा कोई दुःख नहीं होता और इन्हें छोड़ देने से बड़ा कोई सुख नहीं है। मनुष्य का अपने मन पर वश नहीं होता। हर किसी के मन में कई अनावश्यक इच्छाएं होती हैं और यही इच्छाएं मनुष्य के दुःखों का कारण बनती हैं। जरुरी है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं में अंतर समझे और फिर अनावश्यक इच्छाओं का त्याग करके शांत मन से जीवन बिताएं।
हां वह सर्वव्यापी हैं, इसमें ज़रा भी संदेह नहीं हैं और पृथ्वी पर ऐसा कोई भी प्राणी जो चेतना युक्त चाहें वह आस्तिक अथवा
नास्तिक क्यों न हों उसकी अनुभूति जीवन में अवश्य करता है| पर यह बात दूसरी हैं की , वह उसे क्या नाम देता हैं।
आई ये इस प्रसंग से उसे समझते हैं |
15 नवंबर 1884 को इंग्लैंड में "जॉन ली" को एक महिला के कत्ल में दोषी मानते हुए कोर्ट ने फाँसी की सजा सुनाई। सजा सुनाई जाने पर जॉन ली कोर्ट में चिल्लाता रहा कि वो बेकसूर है, अगर कहीं भगवान है तो वो मेरी मदद ज़रूर करेंगे। 23 फरवरी 1885 यही वो दिन था जब जॉन को फाँसी की सजा दी जानी थी।
फांसी देने से पहले फांसी के फंदे, रस्सी और तख्त की मजबूती को जांचा तथा परखा गया, ताकि फांसी में किसी भी प्रकार की रुकावट ना आए। अब जॉन ली को फांसी के तख्त पर लाया गया। जल्लाद ने जॉन ली के चेहरे को काले कपड़े से ढक, गले में फांसी का फंदा डाल दिया। आदेश मिलते ही……
जल्लाद ने हेंडल को दबाया लेकिन तख्त नहीं खुला। बार-बार हैंडल दबाया गया, लेकिन तख्त नहीं खुल पाया। और फांसी एक दिन के लिए टाल दी गई । इसके बाद जांच शुरू हुई तथा आजमाइश के तौर पर जॉन ली के समान वजनी पुतले को फांसी पर लटकाया गया। तख्त खुल गया।
दूसरे दिन जॉन ली को फिर से फांसी के लिए लाया गया, और उस दिन भी तख्त नहीं खुला। जॉन खुशी से चिल्लाया कि, हे! ईश्वर आप सर्वत्र है। निसंदेह आप मेरे साथ है। फांसी एक बार फिर टल गई । पुतला फिर से लाया गया, लटकाया गया और तख्त खुल गया।।
तीसरी बार फिर से जॉन को फांसी के तख्त पर लाया गया। जल्लाद ने लिवर दबाया लेकिन तख्त आज भी नही खुला। यह देख जल्लाद भावुक होकर हमेशा के लिए वहां से चला गया। मौजूद कर्मचारी हक्केबक्के रह गए। फांसी फिर से टल गई।
केस अब हाई अथॉरिटी के हाथों में था। हर एक चीज की गहराई से जांच पड़ताल की गई कि आखिर एक शख्स का तीन-तीन बार फांसी से बच निकलना कैसे मुमकिन है ? इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था। लेकिन जांच में कुछ नही मिला। और मान लिया गया की लॉक के अटक जाने से ऐसे होता रहा होगा।
क्या जॉन ली को शूट किया जाना चाहिए ? जज ने हर पहलू पर पूरी गंभीरता से विचार किया । और माना कि जब-जब जॉन को फांसी दी गई होगी, तब-तब वह पल पल, हर पल मरा होगा। जज ने यह भी माना कि कानून ने जॉन को फांसी पर चढ़ाकर तीन तीन बार मारा है।
कानून भी ईश्वर के आगे नतमस्तक हो गया था। और जॉन ली को छोड़ दिया गया। जॉन ली को लगाए गए उस फंदे को हमेशा के लिए उतार दिया गया और म्यूजियम सुरक्षित रखा गया । ब्रिटिश कानून असफल रहा, क्योंकि उन्हें ईश्वर की ताकत और जॉन ली के बेकुसूर होने का आभास हो चुका था।
रिहा होने के बाद जॉन ली परिवार के साथ लंदन चला गया। अक्सर लोगों द्वारा सवाल पूछे जाने पर जॉन ली यही कहता था कि, फांसी के वक्त वह एक अद्भुत दिव्य प्रकाश(रोशनी) की अनुभूति करता था। यह प्रकाश काला कपड़ा हटने के बाद ही अदृश्य होता था। इसके बाद जॉन ली समाज सेवा और चैरिटी से जुड़ता चला गया। 80 वर्ष की आयु में जॉन ली का निधन हुआ।
जॉन ली के खिलाफ पुलिस को प्राप्त हुए वो सारे झूठे साक्ष्य जो जॉन ली को फांसी तक ले गये थे, उसके ही दोस्त जोनाथन के षड्यंत्र का हिस्सा थे। यह जॉन ली के गांव वालों का कहना था। जॉन ली की रिहाई वाले दिन ही उसके धोखेबाज दोस्त जोनाथन को लकवा मार गया था । महज 29 वर्ष की आयु में जोनाथन की मृत्यु हो गई ।। इसी तरह हर किसी का अलग अलग अनुभव होता ही है | इसीलिए ---
दुनिया माने या न माने आप क्या मानते हो ये बात मायने रखती है.
ईश्वर सर्व जगह है , पर ये बात हम बचपन से सुनते आ रहे है.
कण कण में भगवान - ये बात तो आप ने जरूर सुनी होगी.
ये विषय श्रद्धा का है. मानो तो है, न मानो तो नहीं है.
अध्यात्म विषय ये स्वयं के लिए है न की दूसरों के लिए.
ये सारी सृष्टि , ये निसर्ग जो नियमबद्ध रीति से काम करते आ रहा है, ये किसकी वजह से हो रहा है?
पृथ्वी एक ही दायरे में घूम रही है, सारे ग्रह तारे अपनी अपनी कक्षा में चलन कर रहे है, उसका कोई तो नियंता होगा?
हम किसी चित्र को देखते है तो हमें पता होता है की उसके पीछे किसी चित्रकार की मेहनत होती है.
निसर्ग का चित्र तो हर क्षण बदलता दिखायी देता है. कौन इसका चित्रकार है? ब्रह्माण्ड में जो क्षण क्षण में बदलाव आ रहा है,
वह किसके कारण है?
उसे ही सनातन संस्कृति में ईश्वर कहा गया है.|
अलग अलग संस्कृतियों में उसे अलग अलग नाम से जाना जाता है.|
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व्यक्ति आध्यत्मिक होने से क्या लाभ?प्रथम लाभ अमरता की प्राप्ति - मनुष्य जब आध्यत्मिक होता है वह अपना संमंध आत्मा परमात्मा से जोड़ता है,
और आत्मा अविनाशी है जरा मरण से रहित है यह भलीभांति समझ लेता है।
अतः स्वयं की अविनाशी स्वरुप का बोध होता है | और अमर हो जाता है |द्वितीय लाभ चिरंतन सुख और आनंद की प्राप्ति - जब मनुष्य स्वयं को अमर जान लेता है उसी समय संसार का क्षणभंगुर स्वरूप को भी जान लेता है |
वस्तु व्यक्ति परिस्थिति सभी अस्थायी जान कर उससे प्रभावित नहीं होता ,
उन सब का उपयोग कर सदा सुखी रहता है, ममता रहित हो कर समता में प्रतिष्टित होता है |
सारा संसार को स्वयं का लीला समझ कर सदा आनंद में रहता है|
जैसे की सागर में तरंग, फेन, बुलबुले शोभायमान होते हैं |
ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आने वाला भी सुख और शांति का प्रसाद पा लेता है |तृतीय लाभ व्यक्ति सदा निर्भय रहता है , दुःख और कष्ट से रहित होता है- जब स्वयं अविनाशी और संसार क्षण भंगुर जान लेता है
उसे फिर किस बात का भय होगा ? अतः सदा निर्भय रहता है |
दुःख और कष्ट उसे प्रभावित नहीं कर पाते |चतुर्थ लाभ संताप रहित हो जाता है - षड्विकार काम , क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन को और इन के कारणों को भलीभांति जान लेने से
मन में यह विकार ताप उत्पन्न नहीं कर पाते और संताप रहित हो जाता है |
गुणों के प्रभाव से विकार ग्रस्त हो भी जाए तो भी उसे शीघ्र ही उपराम हो जाता है |
पंचम लाभ वह सर्वज्ञ हो जाता है -
सृष्टि का आधार स्वरुप परमात्मा को जान कर वह सर्वज्ञ हो जाता है |छठा लाभ दैवी गुण संपन्न होता है - उद्यम ,साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति, पराक्रम, दया, करुणा, क्षमाशील, विद्या , विनय, विवेक आदि गुणों से सु शोभित होता है |सातवां लाभ वसुधैव कुतुम्वकम -
सारा श्रृष्टि को अपना स्वरुप जान लेने से
वह सभी को पोषण करता है जैसे मनुष्य अपना शरीर और परिवार का मनुष्य पालन पोषण और सुरक्षा करता है|
वस्तुवादी होने से क्या नुक्सान ?
अपने को एक शरीर का पुतला मानता है और वह जरा व्याधि मृत्यु के भय से प्रभावित रहता है | स्वार्थी , भयातुर , कामातुर, क्रोधी, लोभी, मोहि, अशांत, रुग्ण, खिन्न , रहता है | पुत्र,परिवार, समाज, संसार सभी का शोषण करता है, संग्रही होताहै, सदा दुखी रहता है, पीड़ित रहता है | विलाशिता , भोगी आदि दुर्गुण से प्रभावित रहता है | अंततो गत्वा वह पुनः मनुष्य शरीर को प्राप्त न होकर तिर्यक योनी जैसे किट, पतंग, पशु, पक्षी, जलचर , पेड़ पौधे आदि शरीर पाकर दुःख कष्ट पीड़ा भोगता रहता है |
मानव जीवन बहुत दुर्लभ है वो भी भारत जैसे देश में अत्यंत दुर्लभ है। यहाँ जन्म लेने के लिए देवता लोग भी तरसते हैं । क्यों की स्वर्ग तथा अन्य लोक में केवल पुण्य फल का ही भोग भोगते हैं परंतु मानव जन्म में मनुष्य सभी देव, गन्धर्व, किन्नर और सभी लोकों के पूजनीय आत्मतत्त्व कहो, ब्रह्मतत्व कहो या फिर परमपद को प्राप्त कर सकता है। जो की अन्य किसी भी योनि में नहीं प्राप्त कर सकता है। इस लिए देवता लोग भी यहाँ जन्म लेने के लिए तरस ते हैं ।
पर हम संसार में इतने उलझे हुए हैं कि इतनी बड़ी कीमती जीवन हमे बोझ लग रहा है। हम से सरकता जा रहा है। हमे पता ही नहीं चल रहा है। जैसे वह भिकारी की कथा है। कि जीवन भर रास्ता किनारे गड़े हुए सोना की खजाना के ऊपर बैठ कर एक एक पैसा के लिए हात फैलाते फैलाते जीवन पूरा होगया जब गाड़ने के लिए खोदे तो सोना का खजाना निकाला। ऐसे ही हमारा उस सोने से भी कीमती जीवन व्यर्थ के सांसारिक चीजो को संभालने में खो देंगे और आत्मधन से वंचित रह जायेंगे। पता ही नहीं चल रहा है कि कैसे कल का बचपन, जवानी बीत गया और आगे की समय भी सरकता जा रहा है। चलो जबतक पता नहीं था तब तक तो ठीक है । अब जब पता चला तब तो संभल जाएं। नहीं तो व्यर्थ ही जीवन खोना पड़ेगा। यहाँ प्रकृति माता की बड़ी विचित्र लीला है। अब इस को समझें।
प्रकृति माता हमारे सभी जीवों के माता है। हमारे पालन पोषण में हमेशा ही अनादि काल से निमग्न है, आनंदित है। हमे इस शरीर रूपी कपड़ा पहना कर बेटा, बेटी, पोता, पोती, हाथी, घोड़ा, सोना, चाँदी आदि खिलौना दे रखा है। कि हम इस में ही खेलते ही रहें । हम अच्छे खेलते हैं तो हमे राजा,मंत्री, ऑफीसर, धनी, पंडित, देवता, गन्धर्व के शरीर रूपी कपड़ा पहना कर अच्छा अच्छा खिलौना देता है। अगर हम कीचड़ खेलते हैं तो हमे अच्छा कपड़ा नहीं देती जैसे एक साधारण माँ भी करती है। फिर हमें ग़रीब ला चार रूपी साधारण कपड़ा देती है। और नरक, दरिद्र, बीमारी रूपी तालाब में डाल कर रगड़ रगड़ कर धोती है और टूटी फूटी खिलौना देती है या तो वो भी नहीं देती है। हम सुधर जाएँ ऐसी शिक्षा देती है। हम जब इस खिलौना खेल खेल कर ऊब जाते हैं उसी को ही पुकारते हैं तब हमें गुरु रूपी गोद में लेकर संत,भक्त,जोगी, तपि का शरीर रूपी कपड़ा पहना कर ज्ञान, भक्ति रूपी स्तनों से आनंद रूपी दुग्धामृत का पान कराती है। और उसकी गोद में सुलाती है । जिसको सभी ज्ञानी जन मुक्ति, शांति, निर्वाण आदि नाम से जानते हैं।
यही रहस्य को जानने से राजपुत्र सिद्धार्त गौतम बुद्ध बन गए और कोई विस्वामित्र,व्यास, वाल्मीकि,बनगए तो कोई भीमभोई । ऐसे कई हज़ार कई करोड़ लोग अनादि काल से प्रकृति माता के गोद में आकर गए हैं।
संत भक्त लोग यह भी बताकर गये हैं कि सभीलोग वही परम पद को पाने की अधिकारी हैं । सभी पा सकते हैं। बस उस रास्ते में पैर रखने की देर है। जो की हमको करना है कोई जबर्दस्ती हमे धकेल नहीं सकता अगर धकेलेगा तो भी हम चल नहीं सकते जबतक हमारा इच्छा नहीं होगी। इस में हम स्वतंत्र हैं। जो चल पड़ा वो सतभागी है। चलने के लिए सभी को कहीं जंगल में जाना नहीं है। किसी सड़क पे चलना नहीं है। अपना मन को ही किसी सद्गुरु के बताये अनुसार चलाना है। इस के लिए प्रारम्भ में कोई मंत्र तंत्र की आवश्यकता नहीं है। बस समय निकाल कर अकेले में घर में कहीं बैठ कर उसी को ही मन ही मन पुकारना है । 10 मिनिट से ले कर जितने अधिक हो सके।एक बार से ले कर दिन में दो ,पांच सात बार जैसे भाव आता है ऐसा ही पुकारे वो सभी भाषा समझता है। संसारी बिकार, राग द्वेष, झगड़ा, से जितने अपने को बचाएंगे उतना ही हमे अधिक लाभ होगा।
भगवान एक हैं जो जिस किसी रूप में भी पूजा करे तो भी उस तक पहुचेगा। इसके लिए कोई बंधन नहीं है। फिर भी पंचदेव(विष्णु, शिव, शक्ति, गणपति, सूर्य ) में से किसी को भी पूजना अपना हिन्दू संस्कृति में कहा गया है सभी कल्याणकारी हैं।
भगवान सर्वव्यापी है अर्थात यहाँ भी हैं। सर्व काल में हैं अर्थात अभी भी हैं । पूर्ण रूप में हैं अर्थात पूर्ण समर्थ के साथ हैं । और सर्व सुलभ हैं। वो कोई पैसा या और कोई चीजों से नहीं मिलते । बस मन से ही पुकारने की देर है। हम जब एक कदम उसके और चलते हैं तो वो हजार कदम अपने और दौड़ कर आता है जैसे एक माँ अपने छोटे बच्चे की तरफ आता है।
वास्तव में आप है कौन?मनुष्य में जो बुद्धि होता है,मन होता है, सुक्ष्म शरीर की क्षमताएं होती हैं ,वो पशु शरीर में नहीं होती ,लेकिन मनुष्य शरीर में जो 'मैं' है..आत्मा है वही उस पशु शरीर में है ,यह ज्ञान सुनने में तो थोड़ा कठिन लगेगा ,लेकिन यह सुना तो आपने हजार हजार यज्ञ कर लिये,हजार हजार तीर्थ कर लिए,हजार हजार तप कर लिए...ये ऐसा ज्ञान है।
...अपने प्यारे अर्जुन को भगवान सुना रहे हैं ,युद्ध के मैदान में ..
...देहधारी के इस मनुष्य शरीर में जैसे बालकपन,जवानी ,वृद्धावस्था होती है ऐसे ही देहांतर् की प्राप्ति हो जाती है ....जैसे यह तीन अवस्था आ जाती है, चार अवस्था आ जाती है ऐसे ही मृत्यु के बाद दूसरे शरीर की अवस्था आ जाती है, तो जो धीर है...इन अवस्थाओं को 'मैं' नहीं मानता..इस अवस्था वाले शरीर को 'मैं' नहीं मानता वो अपनी आत्मा में धीर है, वह धीर पुरुष फिर इनमें विचलित नहीं होता... अपने आप अवस्थाओं के बाप,
तो वह अवस्थाओं में विचलित नहीं होता तो गुणों में भी विचलित नहीं होता ..।
...प्रकासम् च प्रवृत्तिम् च मोहम् एव च पांडवा न सम् प्रवृत्तानि न निवृत्तानि आकांक्ष्यति....
प्रकाश मतलब सात्विकता आई सत्संग आया दान पुण्य आनंद आया ,प्रवृत्ति मतलब लेना-देना आपाधापी हुई ,मोह मतलब निद्रा आई ....लेकिन वह ज्ञानी न निद्रा की इच्छा करता है न आपाधापी की इच्छा करता है,वो स्वाभाविक आ रहा है जा रहा है... सृष्टि का क्रम है ,ज्ञानी किसी परिस्थिति की इच्छा, वासना,आकांक्षा नहीं करता ..इसीलिए बोलते हैं जीवनमुक्त ..वो जीते जी मुक्त है ,हम लोग इच्छा करते हैं धन मिल जाए सत्ता मिल जाए यह मिल जाए वह मिल जाए,मैं मरू नहीं ...मरू नहीं...नहीं करके सब मर रहे हैं ,बुड्ढा होउ नहीं ....सभी हो रहे हैं,मै बालक ही रहुं...फिर भी जवान हो जाते हैं, मैं जवान रहूं ....तो जवानी तो छूट जाती है ,फिर क्यों प्रपंच में रहना
मैं जो हूं वहां कुछ बदलाव नही,जहां बदलाव है वह मैं नहीं हूं ,मन तु ज्योति स्वरूप.....
मैं सब को जानने वाला ज्ञान स्वरूप आत्मा हूं ,इसको जानकर वो तो दृढ़ हो जाता है गुरुकृपा में...गुरु के अनुभव में टीक जाता है।
बाल्यकाल और जवानी में नींद से जितनी ताकत और स्फुर्ति मिलती है बुढ़ापे में उतनी नींद भी नहीं आती और उतनी स्फूर्ति भी नहीं आती ...तो मानना पड़ेगा कि कारण सरीर भी बदलता है ,स्थूल शरीर भी बदलता है, सूक्ष्म शरीर भी बदलता है ,फिर भी कोई है जो नहीं बदलता है ... जवानी में मुझे ज्यादा नींद आती थी ,बुढ़ापे में काक चेष्टा जैसी नींद आती है ,जवानी मे नींद के बाद ज्यादा स्फूर्ति आती थी बुढ़ापे में जरा ऐसे ही रहता है,मै बालक ही रहुं...फिर भी जवान हो जाते हैं, मैं जवान रहूं ....तो जवानी तो छूट जाती है ,फिर क्यों प्रपंच में रहना
मैं जो हूं वहां कुछ बदलाव नही,जहां बदलाव है वह मैं नहीं हूं ,मन तु ज्योति स्वरूप.....
मैं सब को जानने वाला ज्ञान स्वरूप आत्मा हूं ,इसको जानकर वो तो दृढ़ हो जाता है गुरुकृपा में...गुरु के अनुभव में टीक जाता है।
बाल्यकाल और जवानी में नींद से जितनी ताकत और स्फुर्ति मिलती है बुढ़ापे में उतनी नींद भी नहीं आती और उतनी स्फूर्ति भी नहीं आती ...तो मानना पड़ेगा कि कारण सरीर भी बदलता है ,स्थूल शरीर भी बदलता है, सूक्ष्म शरीर भी बदलता है ,फिर भी कोई है जो नहीं बदलता है ... जवानी में मुझे ज्यादा नींद आती थी ,बुढ़ापे में काक चेष्टा जैसी नींद आती है ,जवानी मे नींद के बाद ज्यादा स्फूर्ति आती थी बुढ़ापे में जरा ऐसे ही रहता है
तो उसको जानने वाला तू बुढ़ापे से अलग है न, ,जवानी से अलग है न..तो स्थूल शरीर बदला उसको भी तू जानता है, सुक्ष्म शरीर बदला उसको भी तू जानता है, क्योंकि रात को सपना आया ..आप जवान होते हैं तो जवान होने का सपना आता है ,तो सपना तो सूक्ष्म शरीर में आता है ,बुड्ढे हो तो बुड्ढा होने का सपना आता है,अब बालक हो तो बाल्यकाल का सपना आता है तो सपना सुक्ष्म शरीर में आता है ,तो सुक्ष्म शरीर बदलता है क्योंकि सपने बदलते हैं.... इसीलिए सूक्ष्म शरीर बदलता है,
..कारण शरीर बदलता है क्योंकि बचपन की नींद जवानी की नींद बुढ़ापे की नींद बदलती है...तो कारण शरीर भी बदलता है और यह शरीर तो बदलता ही है.. दिखता है ..तो आपकी तीनों शरीर बदलते हैं ,आप नहीं बदलते लेकिन बेवकूफी के कारण ऊंचा सत्संग ..ब्रह्मज्ञान का सत्संग नहीं मिला इसलिए मान बैठे हैं कि कोई उधर है ...ऐसा है वैसा है ,भक्ति भाव करते हैं लेकिन ह्रदय का अज्ञान नहीं मिटता ,जरा से दुख में दुखी हो जाते हैं ,जरा से सुख मे सुखी हो जाते हैं, जरा से मान में अहम भर जाता है,जरा से अपमान में वैर भर जाता है ..तो अहम और वैर सुक्ष्म में शरीर में होता है,राग देश सूक्ष्म शरीर में बुद्धि में होता है ...मान अपमान का सुख दुख सुक्ष्म में शरीर में होता है ,बीमारी तंदुरुस्ती स्थूल शरीर में होता है तो बीमारी तंदुरुस्ती आई उसको भी जाना और गई उसको भी जाना ,मान अपमान आया और गया उसको भी तुम जानते हो ..तो तुम स्थूल शरीर नहीं हो.. लाला.. लालियाँ...बिटिया तुम स्थूल शरीर नहीं हो ,देवीयाँ देवता तुम सुक्ष्म शरीर नहीं हो ,तुम कारण शरीर नहीं हो ...मरने के बाद भी जो नहीं मरता है वह तुम अमर आत्मा हो ,हमें अपने आप अवस्थाओं के बाप ...
धीरस्य तत्र न मोहती.... जो धीर है वह मोहित नहीं होता ...
गड़ोदिया सेठ थे ,उनकी बैंक चलती थी गड़ोदिया बैंक..राजस्थान में,उसमें मेरे पिताजी का खाता था और मैं पैसे निकलवाने भी गया था गड़ोदिया से मुझे पक्का याद है ...गया जी में गए , रात्रि को सोए तो एक सेठ हीरालाल नाई सपने में दिखा, बोला सेठ जी आप अपने कुटुंब का श्राद्ध कराने आए हो ,मैं आपके गांव का हूं, मैं भटक रहा हूं ,अन्नदाता कुछ कीजिए ...बोले अरे तू तो मोहन नाई है रे इधर कैसे ..बोले मैं मर गया हूं ..
सेठ सपने से जागा ,सुबह को ब्राह्मणों को बुलाकर जो कुछ अपने पिंडदान करने थे किये लेकिन.....लेकिन हमारे गांव का मोहन नाई उसके लिए भी हम पिंडदान करते हैं ..ऐसा भी किये...उसकी सद्गति के लिए प्रार्थना करके किए ,
...दूसरे दिन सेठ जी के सपने में फिर से नाई आया..बड़ा प्रसन्नचित ,सेठ जी आपने मेरी सद्गति कर दी ,इस पुण्य कर्म से आपका यश रहेगा, अब सेठ को पता ही नहीं कि बापु जी बोलेंगे और करोड़ों लोगों तक मेरा नाम जाएगा ,कईयों को पता नहीं गड़ोदिया भी कोई परिवार था गड़ोदिया भी कोई बैंक थी ....
...जय राम जी की ...
लेकिन मेरे को पूरा पक्का है रेवड़ी बाजार अहमदाबाद में गड़ोदिया ....