वास्तव में आप है कौन?मनुष्य में जो बुद्धि होता है,मन होता है, सुक्ष्म शरीर की क्षमताएं होती हैं ,वो पशु शरीर में नहीं होती ,लेकिन मनुष्य शरीर में जो 'मैं' है..आत्मा है वही उस पशु शरीर में है ,यह ज्ञान सुनने में तो थोड़ा कठिन लगेगा ,लेकिन यह सुना तो आपने हजार हजार यज्ञ कर लिये,हजार हजार तीर्थ कर लिए,हजार हजार तप कर लिए...ये ऐसा ज्ञान है।
...अपने प्यारे अर्जुन को भगवान सुना रहे हैं ,युद्ध के मैदान में ..
... देहधारी के इस मनुष्य शरीर में जैसे बालकपन,जवानी ,वृद्धावस्था होती है ऐसे ही देहांतर् की प्राप्ति हो जाती है ....जैसे यह तीन अवस्था आ जाती है, चार अवस्था आ जाती है ऐसे ही मृत्यु के बाद दूसरे शरीर की अवस्था आ जाती है, तो जो धीर है...इन अवस्थाओं को 'मैं' नहीं मानता..इस अवस्था वाले शरीर को 'मैं' नहीं मानता वो अपनी आत्मा में धीर है, वह धीर पुरुष फिर इनमें विचलित नहीं होता... अपने आप अवस्थाओं के बाप,
तो वह अवस्थाओं में विचलित नहीं होता तो गुणों में भी विचलित नहीं होता ..।
...प्रकासम् च प्रवृत्तिम् च मोहम् एव च पांडवा न सम् प्रवृत्तानि न निवृत्तानि आकांक्ष्यति....
प्रकाश मतलब सात्विकता आई सत्संग आया दान पुण्य आनंद आया ,प्रवृत्ति मतलब लेना-देना आपाधापी हुई ,मोह मतलब निद्रा आई ....लेकिन वह ज्ञानी न निद्रा की इच्छा करता है न आपाधापी की इच्छा करता है,वो स्वाभाविक आ रहा है जा रहा है... सृष्टि का क्रम है ,ज्ञानी किसी परिस्थिति की इच्छा, वासना,आकांक्षा नहीं करता ..इसीलिए बोलते हैं जीवनमुक्त ..वो जीते जी मुक्त है ,हम लोग इच्छा करते हैं धन मिल जाए सत्ता मिल जाए यह मिल जाए वह मिल जाए,मैं मरू नहीं ...मरू नहीं...नहीं करके सब मर रहे हैं ,बुड्ढा होउ नहीं ....सभी हो रहे हैं,मै बालक ही रहुं...फिर भी जवान हो जाते हैं, मैं जवान रहूं ....तो जवानी तो छूट जाती है ,फिर क्यों प्रपंच में रहना
मैं जो हूं वहां कुछ बदलाव नही,जहां बदलाव है वह मैं नहीं हूं ,मन तु ज्योति स्वरूप.....
मैं सब को जानने वाला ज्ञान स्वरूप आत्मा हूं ,इसको जानकर वो तो दृढ़ हो जाता है गुरुकृपा में...गुरु के अनुभव में टीक जाता है।
बाल्यकाल और जवानी में नींद से जितनी ताकत और स्फुर्ति मिलती है बुढ़ापे में उतनी नींद भी नहीं आती और उतनी स्फूर्ति भी नहीं आती ...तो मानना पड़ेगा कि कारण सरीर भी बदलता है ,स्थूल शरीर भी बदलता है, सूक्ष्म शरीर भी बदलता है ,फिर भी कोई है जो नहीं बदलता है ... जवानी में मुझे ज्यादा नींद आती थी ,बुढ़ापे में काक चेष्टा जैसी नींद आती है ,जवानी मे नींद के बाद ज्यादा स्फूर्ति आती थी बुढ़ापे में जरा ऐसे ही रहता है,मै बालक ही रहुं...फिर भी जवान हो जाते हैं, मैं जवान रहूं ....तो जवानी तो छूट जाती है ,फिर क्यों प्रपंच में रहना
मैं जो हूं वहां कुछ बदलाव नही,जहां बदलाव है वह मैं नहीं हूं ,मन तु ज्योति स्वरूप.....
मैं सब को जानने वाला ज्ञान स्वरूप आत्मा हूं ,इसको जानकर वो तो दृढ़ हो जाता है गुरुकृपा में...गुरु के अनुभव में टीक जाता है।
बाल्यकाल और जवानी में नींद से जितनी ताकत और स्फुर्ति मिलती है बुढ़ापे में उतनी नींद भी नहीं आती और उतनी स्फूर्ति भी नहीं आती ...तो मानना पड़ेगा कि कारण सरीर भी बदलता है ,स्थूल शरीर भी बदलता है, सूक्ष्म शरीर भी बदलता है ,फिर भी कोई है जो नहीं बदलता है ... जवानी में मुझे ज्यादा नींद आती थी ,बुढ़ापे में काक चेष्टा जैसी नींद आती है ,जवानी मे नींद के बाद ज्यादा स्फूर्ति आती थी बुढ़ापे में जरा ऐसे ही रहता है
तो उसको जानने वाला तू बुढ़ापे से अलग है न, ,जवानी से अलग है न..तो स्थूल शरीर बदला उसको भी तू जानता है, सुक्ष्म शरीर बदला उसको भी तू जानता है, क्योंकि रात को सपना आया ..आप जवान होते हैं तो जवान होने का सपना आता है ,तो सपना तो सूक्ष्म शरीर में आता है ,बुड्ढे हो तो बुड्ढा होने का सपना आता है,अब बालक हो तो बाल्यकाल का सपना आता है तो सपना सुक्ष्म शरीर में आता है ,तो सुक्ष्म शरीर बदलता है क्योंकि सपने बदलते हैं.... इसीलिए सूक्ष्म शरीर बदलता है,
.. कारण शरीर बदलता है क्योंकि बचपन की नींद जवानी की नींद बुढ़ापे की नींद बदलती है...तो कारण शरीर भी बदलता है और यह शरीर तो बदलता ही है.. दिखता है ..तो आपकी तीनों शरीर बदलते हैं ,आप नहीं बदलते लेकिन बेवकूफी के कारण ऊंचा सत्संग ..ब्रह्मज्ञान का सत्संग नहीं मिला इसलिए मान बैठे हैं कि कोई उधर है ...ऐसा है वैसा है ,भक्ति भाव करते हैं लेकिन ह्रदय का अज्ञान नहीं मिटता ,जरा से दुख में दुखी हो जाते हैं ,जरा से सुख मे सुखी हो जाते हैं, जरा से मान में अहम भर जाता है,जरा से अपमान में वैर भर जाता है ..तो अहम और वैर सुक्ष्म में शरीर में होता है,राग देश सूक्ष्म शरीर में बुद्धि में होता है ...मान अपमान का सुख दुख सुक्ष्म में शरीर में होता है ,बीमारी तंदुरुस्ती स्थूल शरीर में होता है तो बीमारी तंदुरुस्ती आई उसको भी जाना और गई उसको भी जाना ,मान अपमान आया और गया उसको भी तुम जानते हो ..तो तुम स्थूल शरीर नहीं हो.. लाला.. लालियाँ...बिटिया तुम स्थूल शरीर नहीं हो ,देवीयाँ देवता तुम सुक्ष्म शरीर नहीं हो ,तुम कारण शरीर नहीं हो ...मरने के बाद भी जो नहीं मरता है वह तुम अमर आत्मा हो ,हमें अपने आप अवस्थाओं के बाप ...
धीरस्य तत्र न मोहती.... जो धीर है वह मोहित नहीं होता ...
गड़ोदिया सेठ थे ,उनकी बैंक चलती थी गड़ोदिया बैंक..राजस्थान में,उसमें मेरे पिताजी का खाता था और मैं पैसे निकलवाने भी गया था गड़ोदिया से मुझे पक्का याद है ...गया जी में गए , रात्रि को सोए तो एक सेठ हीरालाल नाई सपने में दिखा, बोला सेठ जी आप अपने कुटुंब का श्राद्ध कराने आए हो ,मैं आपके गांव का हूं, मैं भटक रहा हूं ,अन्नदाता कुछ कीजिए ...बोले अरे तू तो मोहन नाई है रे इधर कैसे ..बोले मैं मर गया हूं ..
सेठ सपने से जागा ,सुबह को ब्राह्मणों को बुलाकर जो कुछ अपने पिंडदान करने थे किये लेकिन.....लेकिन हमारे गांव का मोहन नाई उसके लिए भी हम पिंडदान करते हैं ..ऐसा भी किये...उसकी सद्गति के लिए प्रार्थना करके किए ,
...दूसरे दिन सेठ जी के सपने में फिर से नाई आया..बड़ा प्रसन्नचित ,सेठ जी आपने मेरी सद्गति कर दी ,इस पुण्य कर्म से आपका यश रहेगा, अब सेठ को पता ही नहीं कि बापु जी बोलेंगे और करोड़ों लोगों तक मेरा नाम जाएगा ,कईयों को पता नहीं गड़ोदिया भी कोई परिवार था गड़ोदिया भी कोई बैंक थी ....
...जय राम जी की ...
लेकिन मेरे को पूरा पक्का है रेवड़ी बाजार अहमदाबाद में गड़ोदिया ....
Contd..