शनिवार, 11 मई 2024

सत्संग


सत्संग का अर्थ है 'सत्य की संगति' या यूं कहें की जो नश्वर संसार है उसके बदले जो अविनाशी तत्व है उस का संग। यह भारतीय दर्शन में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो आत्मिक उन्नति और दुखों से मुक्ति के लिए आवश्यक मानी जाती है। दुःख होता क्यों है? क्यों की, जो भी साथ है उस चीज वस्तु और सम्मंधो का छूटने का भय। और संसार की नियम यह है की, जो मिली हुई चीज है वह एक दिन छूटेगा ही। जो जन्म लिया है वो मरेगा भी। इस लिए जो कभी न छूटे वह है ईश्वर, किसी भी प्रकार उस का संग होना ही सत्संग है।

सत्संग का महत्व 
सत्संग का महत्व इस बात में है कि यह हमें सकारात्मक ऊर्जा और विचारों से भर देता है। जब हम अच्छे लोगों के साथ होते हैं, तो हमारे अंदर भी अच्छाई की भावना जागृत होती है। सत्संग में बैठकर, हम जीवन के उच्च आदर्शों और मूल्यों को समझ सकते हैं और उन्हें अपने जीवन में उतार सकते हैं।
दुखों से मुक्ति
दुखों से मुक्ति का मार्ग अक्सर आत्म-ज्ञान और आत्म-सुधार से होकर जाता है। सत्संग हमें इस दिशा में ले जाने में मदद करता है। जब हम अपने आपको अच्छे और सकारात्मक विचारों से घेरते हैं, तो हमारे अंदर के दुख और नकारात्मकता कम होने लगती है।
आत्मिक उन्नति
आत्मिक उन्नति के लिए सत्संग एक ऐसा माध्यम है जो हमें अपने आत्मा की गहराइयों से जोड़ता है। यह हमें अपने अंदर की शक्तियों को पहचानने और उन्हें विकसित करने का अवसर देता है।

सत्संग की उपस्थिति में जीवन
सत्संग की उपस्थिति में जीवन अधिक सार्थक और उद्देश्यपूर्ण हो जाता है। यह हमें जीवन के उच्च लक्ष्यों की ओर ले जाता है और हमें एक बेहतर इंसान बनाता है।
निष्कर्ष
सत्संग के माध्यम से हम अपने जीवन को एक नई दिशा और नई ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं। यह हमें न केवल दुखों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि हमें आत्मिक उन्नति की ओर भी ले जाता है। इसलिए, सत्संग को जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिए।

सत्संग के फायदे 
सत्संग के अनेक फायदे हैं, जो व्यक्ति के जीवन को सकारात्मक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाते हैं। यहाँ कुछ मुख्य फायदे दिए गए हैं:
1. चेतना में परिवर्तन:
 सत्संग में बैठने से व्यक्ति की चेतना में सकारात्मक परिवर्तन होता है, जिससे उत्साह और स्फूर्ति का अनुभव होता है।
2. भक्ति और आध्यात्मिक विकास: 
सत्संग के माध्यम से भक्ति और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा मिलता है, जिससे व्यक्ति अधिक भक्तिमय और आध्यात्मिक रूप से जागरूक होता है।
3. मानसिक शांति: 
सत्संग से मानसिक शांति मिलती है और व्यक्ति अपने जीवन में अधिक संतुलित और शांत रह पाता है।
4. सामाजिक संबंधों में सुधार: 
सत्संग के द्वारा व्यक्ति समाज में अच्छे संबंध बना पाता है और समाज के प्रति अधिक जागरूक होता है।
5. आत्म-सुधार:
 सत्संग से व्यक्ति आत्म-सुधार की ओर अग्रसर होता है। अपने अंदर झांकता है। अपने सद्गुण को बढ़ाता है और दुर्गुणों को नाश कर । परम सत्य की और अग्रसर होता है।
6. विवेक का विकास: 
सत्संग से विवेक जाग्रत होता है, जिससे व्यक्ति अच्छे और बुरे का भेद समझ पाता है और जीवन में सही निर्णय ले पाता है।
7. आत्म-ज्ञान: 
सत्संग से आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे व्यक्ति अपने असली स्वरूप को पहचान पाता है।
8. संसार के मोह से मुक्ति: 
सत्संग के माध्यम से व्यक्ति संसार के मोह-माया से दूर होकर आध्यात्मिक जीवन की ओर अग्रसर होता है।
9. साधना में सहायता: 
सत्संग से प्राप्त सात्त्विकता साधना में सहायक होती है और व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।
10. आनंद का अनुभव:
 सत्संग से व्यक्ति आनंदित रहता है और जीवन को पूर्णता से जी पाता है।
11. पापों का नाश: 
सत्संग से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और वह अधिक नैतिक और धार्मिक जीवन जी पाता है।
12. मानसिक समस्याओं की चिकित्सा
सत्संग मानसिक समस्याओं की चिकित्सा का कार्य करता है, जिससे व्यक्ति के मन में शांति और संतोष का अनुभव होता है।

ये लाभ व्यक्ति को एक संतुलित, सार्थक और आनंदमय जीवन जीने में सहायता करते हैं। सत्संग के इन लाभों को अपने जीवन में उतारकर व्यक्ति अपने आपको और अपने समाज को उत्थान की ओर ले जा सकता है।

सत्संग के विभिन्न प्रकार 

1. सतसंगति:
 इस प्रकार का सत्संग उस सभा या समूह की संगति है जहाँ परम सत्य की चर्चा होती है, जैसे कि ध्यान, प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन, और उनके अर्थों पर चर्चा¹।
2. गुरु की संगति
 यह सत्संग गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक के साथ होता है, जहाँ व्यक्ति गुरु से ज्ञान और मार्गदर्शन प्राप्त करता है।
3. सदाचारी व्यक्तियों की संगति: 
यह सत्संग उन व्यक्तियों के साथ होता है जो सत्य को सुनते, बोलते और आत्मसात करते हैं¹।
4. भक्ति और ज्ञान की संगति: 
इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और सदाचार का वर्णन करने वाले शास्त्रों का अध्ययन और मनन शामिल है।
5. कीर्तन और प्रवचन: 
धार्मिक कीर्तन, प्रवचन, या आध्यात्मिक ग्रंथों का वाचन भी सत्संग का एक रूप है।
6. तीर्थ और देवालय:
 तीर्थस्थानों में निवास या देवालयों में जाना भी सत्संग का ही एक भाग माना जाता है⁴।
7. भगवान के प्रेमी भक्तों का संग:
 यह सत्संग उन भक्तों के साथ होता है जो परमात्मा के प्रति अगाध प्रेम रखते हैं और उनकी भक्ति में लीन रहते हैं।
8. जीवनमुक्त पुरुषों का संग: 
इस प्रकार का सत्संग उन जीवनमुक्त संतों के साथ होता है जो आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके हैं और अपने ज्ञान को दूसरों तक पहुँचाते हैं।
9. दुखी होने पर प्रभु का स्मरण:
 जब व्यक्ति दुखी होता है और प्रभु का स्मरण करता है, जैसे कि द्रौपदी और गजेंद्र ने किया था, वह भी सत्संग का ही एक रूप है।
10. शास्त्रों का स्वाध्याय:
 भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और सदाचार का वर्णन करने वाले शास्त्रों का अध्ययन और मनन भी सत्संग का ही एक भाग है।

इन सभी प्रकारों का अपना-अपना महत्व है और ये सभी व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाने में सहायक होते हैं। सत्संग के इन प्रकारों के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को अधिक सार्थक और आनंदमय बना सकता है।

शुक्रवार, 10 मई 2024

निर्गुण-निराकार परमात्मा का दर्शन





संत कबीर से किसी ने पूछाः

“हम निर्गुण-निराकार परमात्मा को तो नहीं देख सकते, फिर भी देखे बिना न रह जायें ऐसा कोई उपाय बताइये।”

कबीर जी ने कहाः

अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह।

लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह।।




    “परमात्मा को देखने के लिए ये चर्मचक्षु काम नहीं आते। फिर भी यदि तुम परमात्मा को देखना ही चाहते हो तो जिनके हृदय में परमात्माकार वृत्ति प्रकट हुई है, जिनके हृदय में समतारूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, जिनके हृदय में अद्वैतज्ञानरूपी परमात्मा प्रकट हुए हैं, ऐसे हृदय वाले किन्हीं महापुरुष को तुम देख सकते हो। उनको देखते ही तुम्हें परमात्मा की याद आ जायेगी। जिनके दिलों में ईश्वर निरावरण हुआ है, ऐसे संत-महापुरुषों को तुम देख सकते हो।”

साधु का ही देह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें तुम उस अलख पुरुष परमात्मा के दर्शन कर सकते हो। अतः यदि अलख पुरुष को देखना चाहते हो तो ऐसे किन्हीं परमात्मा के प्यारे संतों के दर्शन करने चाहिए।




शुद्ध हृदय से, ईमानदारी से उन महापुरुषों का चिंतन करके हृदय को धन्यवाद से भरते जाओगे तो तुम्हारे हृदय में परमात्मा प्रकट होने में देर नहीं लगेगी। परमात्म-प्राप्ति इतनी सरल होने पर भी लोग उसका फायदा तो नहीं उठाते हैं, वरन् संतों के बाह्य व्यवहार को देखकर अपनी क्षुद्र मति से उन्हें तौलने लगते हैं और अपनी ही हानि कर बैठते हैं।

धन्य है ऐसे शिष्यों को कि जो अलख पुरुष की आरसी के समान ब्रह्मवेत्ता संतों को श्रद्धा-भक्ति से निहारते हैं और उनके साथ अंत तक निभा पाते हैं। वे धनभागी हैं जो निंदा अथवा कुप्रचार के शिकार होकर अपनी शांति का घात नहीं करते। उन्हीं के लिए यह कथन फलित होता हैः

अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह। लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लख लेह।।

ईश्वर प्राप्ति ही अक्षय है

"ईश्वर प्राप्ति ही अक्षय है, अन्य जो कुछ भी प्राप्त होगा सब कुछ क्षय है" यह एक प्राचीन भारतीय कहावत है जो धार्मिक और आध्यात्मिक तत्त्वों को व्यक्त करती है। इस कथन का अर्थ है कि ईश्वर का अनुभव करना ही अटल है, जबकि अन्य सारी वस्तुएं अनित्य हैं। 

धार्मिक दृष्टिकोण से, ईश्वर की प्राप्ति को सबसे उच्च ध्येय माना जाता है। यह एक ऊँचे स्तर की साधना है जो आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाती है। इस प्रकार, जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य ईश्वर का अनुभव होता है। इसमें कोई विनाश नहीं है और यह एक अविनाशी स्थिति है।

यहां एक व्यक्ति को सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर भी अर्थ मिलता है। अनित्यता के संदर्भ में, संबंधों, संपत्ति और संप्रदाय आदि सभी वस्तुओं की क्षय होती है। जीवन में विभिन्न प्रकार की संघर्ष और संघर्षों के बावजूद, ये सब अनित्य हैं और अंततः नष्ट हो जाते हैं। इसके बावजूद, विश्वासी व्यक्ति अपने जीवन को धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित करता है, जिससे वह अविनाशीता की ओर बढ़ता है।

इसके अतिरिक्त, यह कथन जीवन की अनित्यता और व्यक्तिगत सुख-दुःख के महत्व को भी समझाता है। अनित्यता का अनुभव करने के बाद, व्यक्ति समझता है कि सभी सुख और दुःख अस्थायी हैं। इसलिए, अपने जीवन को एक समय के लिए ही नहीं, बल्कि एक अध्यात्मिक समृद्धि के लिए भी समर्पित करना चाहिए। 

धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं में, अनंतता का अनुभव केवल ईश्वरीय सम्बन्ध के माध्यम से होता है। यह अंततः एक अविनाशी अनुभव है, जो संसारिक माया के प्रभाव से परे होता है। 

समाज में, यह विचार लोगों को अपने वास्तविक स्वार्थों के परे उच्चतम ध्येय की ओर प्रोत्साहित करता है। इसका अर्थ है कि संबंध, सम्पत्ति, और स्थिति आदि सभी क्षय हो जाते हैं, लेकिन धार्मिक और आध्यात्मिक समृद्धि अविनाशी है। 

गुरुवार, 9 मई 2024

श्रेष्ठ साधक कैसे बनें ?


         मनुष्य आज इतनी-इतनी परेशानियों, समस्याओं और चिंताओं के बोझ से लदा रहता है कि कहाँ सत्संग सुने ?... कब सत्संग को विचारे ?... किस तरह जीवन में उतारे ?... लेकिन बिना सत्संग, जप, अनुष्ठान, सेवा, स्मरण के जीव की सद्गति सम्भव नहीं है । आज ये विचारणीय प्रश्न हैं कि कैसे उसे सांसारिक झंझटों के बीच परमात्म-शांति की अनुभूति हो ? कैसे वह अपने नित्यकर्म में संलग्न रहकर परमात्मा की आराधना से अंतःकरण को पावन करता रहे ?


यह सत्य है कि हम संसार में रहते हैं इसलिए संसार को छोड़ पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है किंतु यह भी तो उतना ही वजनदार सत्य है कि हमारा अमूल्य मनुष्य-जन्म संसार में उलझकर गँवाने के लिए तो कतई नहीं हुआ है । न जाने कितनी-कितनी माताओं के शरीर से, पिताओं के शरीर से गुजरकर, असहनीय यातनाओं को सह के हमने यह अनमोल मानव-शरीर पाया है । अपने सच्चे नाथ का साक्षात्कार करने का दुर्लभ अवसर पाया है । ऐसे सुखद संयोग के बाद भी हम लापरवाह रहे तो कैसे चलेगा ? जरा तो सोचिये कि परमात्मा को, गुरु को क्या मुँह दिखायेंगे ! अतः मनुष्य-जन्म की सार्थकता इसीमें है कि हम अपने सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार करके जीते-जी मुक्त हो जायें ।


जो परम तत्त्व को उपलब्ध होना चाहते हैं, उनके लिए कुछ युक्तियों से और प्रभु की कृपा से यह सहज हो जायेगा । आप एक श्रेष्ठ, सात्त्विक साधक बननेभर का लक्ष्य बना लें । एक उन्नत, जिज्ञासु साधक बननेभर का संकल्प आपको उस अनुभूति से सम्पदावान बना देगा, जो आपकी अपनी विरासत है । एक श्रेष्ठ साधक में कौन-से गुण होने चाहिए, इस बात को गम्भीरतापूर्वक समझ लें । यदि आप एक श्रेष्ठ साधक बनने का लक्ष्य अपने जीवन में रखते हैं तो आप परम तत्त्व के अधिकारी भी बन सकते हैं क्योंकि शुद्ध, सात्त्विक, श्रद्धासम्पन्न अंतःकरण में परमात्म-माधुर्य और ज्ञान स्फुरित होता है । आप थोड़ा चलेंगे तो ईश्वरीय सत्ता आपकी मदद करेगी, बिल्कुल पक्की बात है । ज्यों-ज्यों आप साधना के पथ पर एक-एक कदम आगे बढ़ाते चलेंगे, त्यों-त्यों आपमें उस आनंदस्वरूप को जानने की उत्सुकता बढ़ती जायेगी । उत्सुकता जब तीव्र होगी, लालसा जोर पकड़ेगी तो फिर आप उस यार (परमात्मा) से कहाँ दूर रह पायेंगे !


सर्वप्रथम परमात्म-सुख पाने का लक्ष्य निर्धारित करें । प्रतिदिन का नियम निश्चित करें । एक बार संकल्प ले लें कि ‘मुझे रोज इतनी मालाएँ करनी हैं । माह में इतने दिन मौन रहना है । इतने महीने में मुझे एक अनुष्ठान करना है । प्रतिदिन इतने समय सत्संग सुनना है । सत्शास्त्रों का मनन-अध्ययन करना है । इतना समय सेवा करनी है और व्यवहारकाल में रहते हुए भी मुझे निरंतर सुमिरन करना है ।’ ऐसे आप अंतर्यामी ईश्वर के साथ अनन्यरूप से जुड़ जायेंगे । आरम्भ में ५ मिनट भगवन्नाम लेना शुरू करो । फिर ६, ७, ८, ११ मिनट का नियम ले लो । ‘मैं जैसा-तैसा हूँ, तुम्हारा हूँ । तुम मेरे अंतरात्मा हो, सर्वव्यापक हो । दूर नहीं, दुर्लभ नहीं, परे नहीं हो, पराये नहीं हो । मेरे अपने हो मेरे प्रभु ! मैं आपको नहीं जानता हूँ लेकिन आप तो मुझे जानते हो । ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ... ॐ...’



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बुधवार, 8 मई 2024

ईश्वर की नीति


 




"यह ईश्वरीय विधान है कि मार खाकर भी आदमी को सुधरना पड़ता है। डण्डे खाकर भी सुधरना पड़ता है और अगर मर गये तो नर्कों में जाकर या इतर योनियों में जाकर भी सुधार की प्रक्रिया तो चालू ही रहती है। आगे बढ़ो… आगे बढ़ो… आगे बढ़ो नहीं तो जन्मों और मरो… मरो और जन्मो…..। पुण्य क्या है? पाप क्या है?

 समझो, कोई बालक पाँच साल का है। वह पहली क्लास में है तो पुण्य है। बड़ा होने पर भी फिर-फिर से पहली क्लास में ही रहता है तो वह पाप हो जाता है। जिस अवस्था में तुम आए हो उस अवस्था के अनुरूप उचित व्यवहार करके उन्नत होते हो तो वह पुण्य है। इससे विपरीत करते हो तो तुम दैवी विधान का उल्लंघन करते हो। जिस समय जो शास्त्र-मर्यादा के अनुरूप कर्त्तव्य मिल जाय उस समय वह कर्त्तव्य अनासक्त भाव से ईश्वर की प्रसन्नता के निमित्त किया जाय तो वह पुण्य है। घर में महिला को भोजन बनाना है तो ‘मैं साक्षात मेरे नारायण को खिलाऊँगी‘ ऐसी भावना से बनाओगी तो भोजन बनाना पूजा हो जायगा। झाड़ू लगाना है तो ऐसे चाव से लगाओ और चूहे की नाई घर में भोजन बनाते रहो, कूप-मण्डूक बने रहो। सत्संग भी सुनो, साधना भी करो, जप भी करो, ध्यान भी करो, सेवा भी करो और अपना मकान या घर भी सँभालो। जब छोड़ना पड़े तब पूरे तैयार भी रहो छोड़ने के लिए। 


अपने आत्मदेव को ऐसा सँभालो। किसी वस्तु में, व्यक्ति में, पद में आसक्ति नहीं। सारा कासारा छोड़ना पड़े तो भी तैयार। इसी को बोलते हैं अनासक्ति योग। जीवन में त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। सब कुछ त्यागने की शक्ति होनी चाहिए। जिनके पास त्यागने की शक्ति होती है वे ही वास्तव में भोग सकते हैं। जिसके पास त्यागने की शक्ति नहीं है वह भोग भी नहीं सकता। त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। यश मिल गया तो यश के त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए, धन के त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए, सत्ता का त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। सत्ता भोगने की इच्छा है और सत्ता नहीं मिल रही है तो आदमी कितना दुःखी होता है! सत्ता मिल भी गई दो-पाँच साल के लिए और फिर चली गई। कुर्सी तोडो-पाँच साल की और कराहना जिन्दगी भर। यही है बाहरी सुख का हाल। विकारी सुख तो पाँच मिनट का और झंझट जिन्दगी भर का। सत्ता मिली तो सत्ता छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। दृश्य दिखा तो बार-बार दृश्य देखने की आसक्ति को छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। धन मिला तो धन का सदुपयोग करने के लिए धन छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। यहाँ तक कि अपना शरीर छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। जब मृत्यु आवे तो बैठे नहीं हरे। चलो, मृत्यु आयी तो आयी, हम तो वही हैं चिदघन चैतन्य, चिदाकाश स्वरूप…. सोऽहं… सोऽहम्। 

ऐसे त्यागी को मरने का भी मजा आता है और जीने का भी मजा आता है। पापी आदमी के प्राण नीचे के केंद्रों से निकलते हैं, गुदा, द्वार आदि से। मध्यम आदमी के प्राण नाभि आदि से निकलते हैं। कुछ लोगों के प्राण मुख, आँख, कण्ठ आदि से निकलते हैं। योगेश्वरों के प्राण निरुद्ध होकर तालू से निकलते हैं। आप जप करते हैं, ध्यान करते हैं तो आपके मन और प्राणों को ऊपर के केंद्रों में जीने की आदत पड़ जाती है। प्राण ऊपर के केंद्रों से निकलते हैं तो उन्नत हो जाते हैं। अगर काम-विकार में रहते हैं, भोग-भोगने में और खाने-पीने में रहते हैं और खाए पिए हुए पदार्थ छोड़ने के अंगों में ही आसक्ति है तो फिर वृक्ष आदि की योनि में जाओ जहाँ नीचे से ऊपर की ओर खींचने की प्रवृत्ति होती है। वृक्ष अपना भोग पदार्थ नीचे से उठाकर ऊपर ले जाते हैं। पशु आदि सामने से लेते हैं और पीछे फेंकते हैं। मनुष्य है जो भोग-पदार्थों को ऊपर से लेता है, नीचे को फेंकता है और स्वयं ऊपर उठ जाता है।

 अर्थात भोगों को नीचे गिराकर आप योग करो। आसक्ति को, पुरानी आदत को नीचे छोड़कर आप ऊपर उठो। यह है विधान का आदर। ईश्वरीय विधान चाहता है कि तुम ईश्वरीय स्वभाव में जग जाओ। बार-बार गर्भ में जाकर माताओं को पीड़ा मत दो, अपने को पीड़ा मत दो, समाज को पीड़ा मत दो। मुक्त हो जाओ। आपको जो बुद्धि मिली है उसका विकास करो। ईश्वरीय विधान तुमसे यह भी अपेक्षा करता है कि हर परिस्थिति में तुम सम रहने की कोशिश करो। आपमें और ईश्वर में क्या दूरी है, वह जरा खोज लो। आप ईश्वर से मिल लो। कब तक बिछड़े रहोगे? कितना सुंदर है ईश्वरीय विधान! उसमें प्राणिमात्र के हित के सिवाय और कुछ नहीं होता। विधान जितना-जितना व्यापक होता है उतना-उतना बहुजन हिताय होता है। 

अपने भाग्य के हम आप विधाता होते हैं। रेल की पटरियाँ बनीं, फिर रेल का भाग्य बन गया कि वह दूसरी जगह नहीं जा सकती। पटरियाँ उसका भाग्य हैं, गति कम या ज्यादा होना यह उसका पुरुषार्थ है। पटरियाँ जब बन रही थीं तब चाहे जिधर की बना सकते थे। पूर्व के जो संबंध आपने बना लिये, जो मान्यताएँ बना लीं, वे पटरियाँ आपने ही तो डाली। अब नयी जगह पर दूसरी पटरियाँ भी डाल सकते हो और पुरानी पटरियों का सदुपयोग भी कर सकते हो। “क्या करें महाराजश्री! अपने भाग्य में लिखा हो तभी संतों के द्वार जा सकते हैं।“ बात ठीक है। संतों के द्वार तक जाने की पटरियाँ तो बन गई हैं लेकिन कितनी गति से जाना यह आपके हाथ की बात है। पटरियाँ तो फिट हो गई हैं। अपनी जीवन की गाड़ी उस पर चलाते हो कि नहीं, यह भी देखना पड़ेगा। आपके आज का कर्म कल का प्रारब्ध बन जाता है। कल का अजीर्ण आज के उपवास से ठीक हो जाता है। कल का कर्जा आज चुका देने से मिट जाता है। कल की कमाई आज के भोग-विलास से नष्ट भी हो जाती है। मनुष्य के जीवन में उसके कर्मों के अनुसार उतार-चढ़ाव आते हैं। इसलिए दैवी विधान को दृष्टि समक्ष रखकर कर्म किए जाते हैं तो मजा आता है। पुरुषार्थ के साथ साथ दैवी विधान को भी ध्यान में रखना चाहिए।

 बड़ा आदमी वह होता है जो समय और परिस्थिति के अनुसार अपने आप को बदल लेता है। यदि परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदलता है, तो परिस्थितियाँ उसे बदल डालती हैं। जो अदान-प्रदान करता है, उसकी मूल्यवान निगाह का ध्यान रखता है, जिसके संपर्क में आता है, उसके संपर्क में आता है, उसका मनोबल वृद्धि करता है, उसकी प्रार्थना सुनता है, उसके कल्याण में तत्पर होता है, उसके निराशा दूर करता है, उसका भविष्य के नियम को बनाने वाला होता है। 

इसलिए ध्यान में रखिए कि आप क्या कर रहे हैं, आप क्या चाहते हैं, आपके मन का स्वास्थ्य कैसा है, क्या आप संतुष्ट हैं, क्या आप पूर्णता के साथ काम कर रहे हैं, क्या आप ईश्वर के साथ एकत्र जा रहे हैं, क्या आप परिस्थितियों का सामना कैसे कर रहे हैं, क्या आप उनसे डरते हैं, या स्वीकार कर रहे हैं, क्या आपके अधिकारी स्वयं से प्यार करते हैं, या उनकी उपाधियों को, आपके बाजु में आपके पुत्र, या आप उनके बाजु में, क्या आप विश्वासघात कर रहे हैं, या आप विश्वासघात के लिए तैयार हैं, क्या आप खुद को अपने परिवार से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, या आप अपने परिवार को अपने से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, आपके कर्म, आपकी सोच, आपके विचार, आपकी भावनाएं, आपकी आचरण, आपका असर और प्रभाव, आपकी सभी प्रकार की प्रतिक्रियाएँ। कैसा योग्य बन रहे हो। जिस योग्यता के लिए प्रयास कर रहे हो। उसके लिए आपका आत्मा आपका साथ दे। यह है दैवी विधान। यह है उन्नति का मार्ग। यह है विश्व की नीति। यह नीति तो ईश्वर की ही नीति है।"



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मंगलवार, 7 मई 2024

मरम्मत करो !



    
        


         एक साधक ने श्री रामकृष्णदेव से पूछा कि : “महाशय, मै इतना प्रभु नाम लेता हूँ, धर्म चर्चा करता हूँ, चिंतन-मनन करता हूँ, फिर भी समय-समय पर मेरे मन में कुभाव क्यों उठते है?”

     श्री रामकृष्णदेव साधक को समझाते हुए बोले : “एक आदमी ने एक कुत्ता पाला था। वह रात-दिन उसी को लेकर मग्न रहता, कभी उसे गोद में लेता तो कभी उसके मुँह में मुँह लगाकर बैठा रहेता था।
    
     उसके इस मूर्खतापूर्ण आचरण को देख एक दिन किसी जानकार व्यक्ति ने उसे यह समझाकर सावधान किया कि कुत्ते का इतना लाड-दुलार नहीं करना चाहिए, आखिर जानवर की ही जात ठहरी, न जाने किस दिन लाड करते समय काट खाए।

    इस बात ने उस आदमी के मन में घर कर लिया। उसने उसी समय कुत्ते को गोद में से फेंक दिया और मन में प्रतिज्ञा कर ली कि अब कभी कुत्ते को गोद में नहीं लेगा। पर भला कुत्ता यह कैसे समझे! वह तो मालिक को देखते ही दौड़कर उसकी गोद पर चढ़ने लगता। आखिर मालिक को कुछ दिनों तक उसे पीट-पीट कर भगाना पड़ा तब कही उसकी यह आदत छूटी।
     तुम लोग भी वास्तव मे ऐसे ही हो। जिस कुत्ते को तुम इतने दीर्घ – काल तक छाती से लगाते आये हो उससे अब अगर तुम छुटकारा पाना भी चाहो तो वह भला तुन्हें इतनी आसानी से कैसे छोड़ सकता है?

    अब से तुम उसका लाड करना छोड़ दो और अगर वह तुम्हारी गोद में चढाने आए तो उसकी अच्छी तरह से मरम्मत करो। ऐसा करने से कुछ ही दिनों के अन्दर तुम उससे पूरी तरह छुटकारा पा जाओगे।”


सेवा तत्वज्ञान की झलक

 



        हां, मैं इस कथन से सहमत हूं कि हमने तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को कितना आत्मसात किया है, वह हमारी सेवा कार्य से झलकता है। तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु हमें जीवन के अर्थ, उद्देश्य और हमारे रिश्ते को ईश्वर से समझने में मदद करते हैं। जब हम इन शिक्षाओं को आत्मसात करते हैं, तो हम दूसरों की सेवा करने के लिए अधिक प्रेरित और सक्षम होते हैं।

हमारे सेवा कार्य से पता चलता है कि हम कितने दयालु, करुणामय और समझदार हैं। यह हमें दूसरों के दर्द और पीड़ा को महसूस करने और उन्हें मदद करने की इच्छा देता है। जब हम दूसरों की सेवा करते हैं, तो हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करने में मदद करते हैं और अपने जीवन को अर्थ और उद्देश्य देते हैं।

बेशक, सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने का एकमात्र तरीका नहीं है। हम अपने विचारों, शब्दों और कार्यों के माध्यम से भी इन शिक्षाओं को प्रतिबिंबित कर सकते हैं। हालांकि, सेवा कार्य एक महत्वपूर्ण तरीका है कि हम दूसरों को दिखा सकते हैं कि हमने क्या सीखा है।

यहां कुछ उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने से जुड़ा हो सकता है:

  • एक व्यक्ति जो तत्वज्ञान को आत्मसात करता है कि सभी जीवन पवित्र है, वह दूसरों के साथ दयालु और करुणामय व्यवहार करेगा।
  • एक व्यक्ति जो सत्संग के माध्यम से दूसरों के अनुभवों से सीखता है, वह दूसरों की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकेगा और उनकी मदद करने के लिए अधिक प्रेरित होगा।
  • एक व्यक्ति जो ईश्वर में विश्वास करता है, वह दूसरों की सेवा को ईश्वर की इच्छा को पूरा करने के रूप में देखेगा।
  • एक व्यक्ति जो गुरु के मार्गदर्शन का पालन करता है, वह दूसरों की सेवा के लिए अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग करने के लिए अधिक इच्छुक होगा।

कुल मिलाकर, मैं मानता हूं कि सेवा कार्य तत्वज्ञान, सत्संग, ईश्वर और गुरु को आत्मसात करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। यह हमें दूसरों को दिखाने का एक तरीका है कि हमने क्या सीखा है और हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करने में मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।