शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

संत करें आप समान -पूज्य बापू जी

संत करें आप समान -पूज्य बापू जी



आत्मकल्याण की चाहना से एक व्यक्ति ने जाकर किन्हीं संत से प्रार्थना कीः “मुझ पर अपनी कृपादृष्टि कीजिये नाथ !”उसकी श्रद्धा देखकर गुरु ने उसे मंत्र दे दिया और कहाः “बेटा !एक वर्ष तक भलीभाँति इस मंत्र का जप करना। बाद में स्नान करके पवित्र होकर मेरे पास आना।”


एक वर्ष पूरा हुआ। वह शिष्य स्नानादि करके पवित्र होकर गुरु के पास जा रहा था, तब गुरु की ही आज्ञा से एक महिला ने इस तरह झाड़ू लगायी कि धूल उस शिष्य पर पड़ी। अपने ऊपर धूल पड़ते देख वह शिष्य अत्यंत आगबबूला हो उठा एवं उस महिला को मारने दौड़ा। वह तो भाग गयी।वह पुनः गया नहाने के लिए और नहा-धोकर पवित्र हो के गुरु के पास आया। गुरु ने सारी बात तो पहले से जान ही ली थी।



गुरु ने कहाः “अभी तो तू साँप की तरह काटने दौड़ता है। अभी तेरे अंदर मंत्रजप का रस प्रकट नहीं हुआ। जा, फिर से एक वर्ष तक मंत्रजप कर फिर मेरे पास आना।”एक वर्ष बाद पुनः जब वह नहा धोकर पवित्र हो के आ रहा था,


तब उस महिला ने धूल तो क्या उड़ायी, उसके पैर से ही झाडू छुआ दी। झाड़ू छू जाने पर वह भड़क उठा किन्तु वह मारने न दौड़ा। फिर से नहा धो के गुरु चरणों में उपस्थित हुआ।गुरु ने कहाः “बेटा !अब तू साँप की तरह काटने तो नहीं दौड़ता लेकिन फुफकारता तो है। अभी भी तेरी वैर-वृत्ति गयी नहीं है। जा, पुनः एक वर्ष तक जप करके पवित्र हो के आना।”



तीसरा वर्ष पूरा हुआ। शिष्य नहा धोकर गुरु के पास आ रहा था। इस बार गुरु के संकेत के अनुसार उस महिला ने कचरे का टोकरा ही शिष्य पर उँडेल दिया। इस बार पूरा कचरा उँडेल देने पर भी वह न मारने दौड़ा, न क्रोधित हुआ क्योंकि इस बार जप करते-करते वह जपके अर्थ में तल्लीन हुआ था। उसके चित्त में शांति एवं तत्त्वज्ञान की कुछ झलकें आ चुकीं थी, वह निदिध्यासन की अवस्था में पहुँच गया था।वह बोलाः “हे माता ! तुझे परिश्रम हुआ होगा।मुझ देहाभिमानी के देह के अभिमान को तोड़ने के लिए तू हर बार साहस करती आयी है। मेरे भीतर के कचरे को निकालने के लिए माता !तूने बहुत परिश्रम किया।पहले यह बात मुझे समझ में न आती थी किंतु इस बार गुरुकृपा से समझ में आ रही है कि आदमी जब भीतर
से गंदा होता है, तब ही बाहर की गंदगी उसे भड़का देती है। नहीं तो देखा जाये, तो इस कचरे में भी तत्त्वरूप से तो वह परमात्मा ही है।”यह कहकर वह पुनः स्नान करके गुरु के पास गया। ज्यों ही वह गुरु को प्रणाम करने गया, त्यों ही गुरु ने उसे उठाकर अपनी छाती से लगा लिया और कहाः “बेटा ! क्या चाहिए ?”शिष्य सोचने लगा कि ‘जब सर्वत्र वही है, सबमें वही है तो चाह किसकी करूँ और चाह भी कौन करे ?’गुरु की करूणा कृपा बरस ही रही थी। गुरुकृपा तथा इस प्रकार के चिंतन से धीरे-धीरे वह शिष्य खोता गया…. खोता गया….. खोते-खोते वह ऐसा खो गया कि वह जिसको खोजता था वही हो गया। ठीक ही कहा हैः


पारस और संत में बड़ा अंतरहू जान।एक करे लोहे को कंचन, ज्ञानी आप समान।।

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स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2017, पृष्ठ संख्या 6 अंक 289 ॐ

रविवार, 18 मार्च 2018

सच्ची प्रार्थना









          महाभारत में आता है कि जब पांडव वनवास के लिए जा रहे थे, तब युधिष्ठिर अपने पुरोहित धौम्य मुनि के पास आकर बोले : ‘‘विप्रवर ! वेदों में पारंगत ब्राह्मण मेरे साथ वन में चल रहे हैं परंतु मैं इनका पालन-पोषण करने में असमर्थ हूँ । अब मुझे क्या करना चाहिए ?’’

          मुनि ने कहा : ‘‘तुम तपस्या का आश्रय लेकर ब्राह्मणों का भरण-पोषण करो ।’’

         युधिष्ठिर ने मुनि के बताये अनुसार अष्टोत्तरशतनामात्मक स्तोत्र द्वारा भगवान सूर्य का अनुष्ठान किया । प्रसन्न होकर सूर्यनारायण ने दर्शन दिये और बोले : ‘‘धर्मराज ! तुम जो कुछ चाहते हो वह सब तुम्हें प्राप्त होगा । मैं बारह वर्षों तक तुम्हें अन्न प्रदान करूँगा । यह ताँबे की बटलोई (भोजन पकाने का एक गोल तले का बर्तन) लो । इस पात्र द्वारा निकला भोजन तब तक अक्षय बना रहेगा, जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न करके परोसती रहेगी ।’’
धर्मराज उसीसे ब्राह्मणों को भोजन कराने लगे । सभीको भोजन कराने के बाद द्रौपदी भोजन करती थी । जब दुर्योधन ने सुना कि पांडव तो वन में भी भली प्रकार दान-पुण्य करते हुए आनंद से रह रहे हैं, तब उसने उनका अनिष्ट करने का विचार किया ।

           छल-कपट की विद्या में निपुण कर्ण और दुःशासन आदि के साथ वह भाँति-भाँति के उपायों से पांडवों को संकट में डालने की युक्तियाँ खोजने लगा । उसी समय परम क्रोधी दुर्वासा मुनि अपने शिष्यों को साथ लिये हुए आ पहुँचे । दुर्योधन ने स्वयं दास की तरह रात-दिन श्रद्धा से नहीं अपितु उनके शाप के डर से उनकी सेवा की ।
एक दिन मुनि प्रसन्न होकर बोले : ‘‘दुर्योधन ! तुम्हारे मन में जो इच्छा हो, वर माँग लो ।’’


          जो ईर्ष्या और द्वेष के शिकंजे में आ जाता है, उसका विवेक उसे साथ नहीं देता है । दुष्ट दुर्योधन ने कहा : ‘‘ब्रह्मन् ! जिस प्रकार आप मेरे अतिथि हुए उसी प्रकार पांडवों के भी अतिथि होइये । मेरी प्रार्थना से आप वहाँ ऐसे समय में जाइये जब द्रौपदी स्वयं भोजन कर चुकी हो ।’’
‘‘मैं वैसा ही करूँगा ।’’ मुनि चले गये ।

          कर्ण बोला : ‘‘सौभाग्य से हमारा काम बन गया । हमारे शत्रु विपत्ति के महासागर में डूब गये हैं ।’’
भूखे भोजन करके खुश होते हैं, मोर बादल गरजने से खुश होते हैं, सज्जन दूसरों की उन्नति देख के खुश होते हैं और दुष्ट व्यक्ति दूसरों को संकट में देखकर खुश होते हैं ।

           एक दिन पांडव व द्रौपदी भोजन से निवृत्त हो सुखपूर्वक बैठे थे, तभी अपने दस हजार शिष्यों से घिरे हुए दुर्वासा मुनि उस वन में आये ।

        युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, फिर विधिपूर्वक पूजा करके बोले : ‘‘भगवन् ! अपना नित्य नियम पूरा करके (भोजन के लिए) शीघ्र पधारिये ।’’ मुनि शिष्यों के साथ स्नान करने के लिए चले गये ।
इधर द्रौपदी को भोजन के लिए बड़ी चिंता हुई, उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था । फिर द्रौपदी को याद आया कि जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं और आशा की कोई किरण नहीं होती तो एकमात्र भगवान की प्रार्थना और उनका आश्रय ही हमें बचा सकता है । वह श्रीकृष्ण को सच्चे मन से पुकारने लगी । शुद्ध हृदय से की गयी सच्ची, भावपूर्ण प्रार्थना ईश्वर जरूर सुनते हैं । द्रौपदी की पुकार सुन भगवान तुरंत ही वहाँ आ गये । द्रौपदी ने सब समाचार कह सुनाया ।

           श्रीकृष्ण ने कहा : ‘‘कृष्णे ! इस समय बहुत भूख लगी है, पहले मुझे जल्दी भोजन कराओ फिर सारा प्रबंध करते रहना ।’’ उनकी बात सुनकर द्रौपदी को बड़ा संकोच हुआ ।

          ‘‘देव ! सूर्यनारायण की दी हुई बटलोई से तभी तक भोजन मिलता है, जब तक मैं भोजन न कर लूँ । आज तो मैं भी भोजन कर चुकी हूँ, अतः अब उसमें भोजन नहीं है ।’’


         ‘‘कृष्णे ! जल्दी जाओ और बटलोई लाकर मुझे दिखाओ ।’’ हठ करके द्रौपदी से बटलोई मँगवायी । पात्र में जरा-सा साग लगा हुआ था । श्रीकृष्ण ने उसे लेकर खा लिया और कहा : ‘‘इस साग से सम्पूर्ण विश्व के आत्मा यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान श्रीहरि तृप्त और संतुष्ट हों ।’’

          इधर मुनि लोगों को सहसा पूर्ण तृप्ति का अनुभव हुआ । बार-बार अन्नरस से युक्त डकारें आने लगीं । यह देख वे जल से बाहर निकले और दुर्वासा मुनि से बोले : ‘‘ब्रह्मर्षे ! इस समय इतनी तृप्ति हो रही है कि कंठ तक अन्न भरा हुआ जान पड़ता है । अब कैसे भोजन करेंगे ?’’

           दुर्वासा मुनि अपने शिष्योंसहित पांडवों से बिना मिले ही वहाँ से प्रस्थान कर गये ।
   (‘महाभारत’, वन पर्व से संक्षिप्त)


           जो लोग सदा धर्म में तत्पर रहते हैं, उनके जीवन में भी कष्ट और विघ्न तो आते हैं पर वे दुःखी और विचलित नहीं होते बल्कि भगवान की शरण व प्रार्थना का आश्रय लेते हैं । इससे उनके कष्ट दूर हो जाते हैं । ईर्ष्यालु एवं द्वेषी चित्त से तो किया-कराया भी चौपट हो जाता है जबकि सच्ची प्रार्थना से बिगड़ी हुई बाजी भी देर-सवेर सँवर जाती है ।




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शनिवार, 17 मार्च 2018

सच्चा सुख और परम सत्य कैसे मिले ?











(दूरदर्शन पर पूर्व में प्रसारित पूज्य बापूजी का पावन संदेश)



              प्रश्न : सच्चा सुख और सच्चा सत् क्या है ?

           पूज्य बापूजी : वस्तु, इन्द्रिय और मन की वृत्ति से जो सुखाभास होता है उसे मिथ्या सुख बोलते हैं । वस्तु, इन्द्रिय-सुख के न होने पर भी या मन के विषयों को न भोगते हुए भी मन परम शांतस्वरूप आत्मा में जो विश्रांति पाता है उसे सच्चा सुख बोलते हैं ।

             एक होता है सत्य, दूसरा होता है सत् । दो और दो चार सत्य है, यह सामाजिक सत्य है लेकिन दो और चार का साक्षी सत् है । ‘मुझे जंतु ने काटा है, मैं पीड़ित हो रहा हूँ, दुःखी हूँ’ - यह व्यवहारकाल में सत्य है लेकिन जहाँ से ‘मैं’पना उठता है, वहाँ यह दुःख नहीं पहुँच सकता है । यह दुःख इन्द्रियों को होता है, मन को होता है, शरीर को होता है, मुझ चैतन्य में नहीं आता है । जहाँ दुःख की पहुँच नहीं और सुख का आकर्षण नहीं वह सत् है और जो दुःख-सुख में प्रभावित होता है वह सामाजिक सत्य माना जाता है । तो प्रकृति की वस्तुओं को ‘मैं-मेरा’ मानकर सुखी-दुःखी होना यह व्यावहारिक सत्य है लेकिन इन सबको मिथ्या और परिवर्तनशील समझ के अपने साक्षीस्वरूप में जग जाना यह पारमार्थिक सत् है ।


          प्रस्तोता (होस्ट) : इन सब बातों से मैं यह समझ पाया कि संसार को, व्यक्तियों को, लोगों को शांति के लिए सब कुछ छोड़ देना चाहिए ।

    पूज्यश्री : नहीं-नहीं-नहीं... । सब कुछ छोड़ना नहीं है अपितु सब कुछ में जो सत्यबुद्धि की बेवकूफी घुसी है, उसे छोड़ना है । सब कुछ जो दिखता है वह परिवर्तनशील है लेकिन जिससे दिखता है वह सत् है । तो सत् को प्रेम करें और सत् के नाते सब कुछ का सदुपयोग करें । व्यक्ति सदुपयोग नहीं करेगा और सब कुछ छोड़ेगा तो सब कुछ कितना छोड़ पायेगा ? शरीर को तो नहीं छोड़ सकता है और शरीर है तो फिर सब कुछ चाहिए खाने को, पीने को, रहने को, देने को । लेकिन जो आसक्ति है उसे छोड़ सकते हैं ।


अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ।
(गीता : 5.15)


         अज्ञान से ज्ञान आवृत हो गया इसलिए हम लोग मोहित हो जाते हैं । उलटे ज्ञान को सच्चा मान लेते हैं । है तो बदलनेवाला लेकिन उसको चिपकाये रखते हैं । बचपन को कितना भी सँभाला लेकिन चला गया, जवानी को कितना भी थामा परंतु चली गयी, फिर बुढ़ापा आयेगा, कितना भी सुरक्षित रखो पर चला जायेगा । जो चला जानेवाला है उसका सदुपयोग करें, उसका बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय उपयोग करने से अशांति मिटेगी, शांति आयेगी और सत् में प्रवृत्ति कर लें कि ‘भाई ! दुःख आया और चला गया लेकिन कोई जाननेवाला तो है । सुख आया और चला गया, कोई जाननेवाला तो है । इन दोनों को जाननेवाला मैं कौन हूँ ?’- ऐसा अपने को प्रश्न करें रात को सोते समय और सुबह उठते समय । तो वह कौन है ? वह अपने-आप कृपा करके प्रकट होने के द्वार खोल देगा ।


प्रश्न : आपसे प्रेरणा पाकर करोड़ों श्रद्धालु अपने जीवन में ज्ञानज्योति जलाकर जीवन को सफल बना रहे हैं । अपने जीवन की आप ऐसी कोई प्रेरक बात बताइये जिससे उनके जीवन की ज्ञानज्योति और ज्यादा प्रकाशमान हो और उनके जीवन का मार्ग और ज्यादा खुले, साफ हो ।


       पूज्य बापूजी : लाभदायी एवं प्रेरक बातें तो बहुत सारी हैं । खुलेआम एक छोटी-सी कह देता हूँ । रात्रि को सोते समय हम कभी चिंता लेकर, थकान ले के नहीं सोते हैं । ‘जो दिनभर हुआ, वह जिसकी सत्ता से हुआ
उसको अर्पण ! मैं निश्चिंत नारायण की गोद में जा रहा हूँ ।’ ऐसे परमेश्वर का चिंतन करते-करते आनंद, निर्विषय आनंद आता है, फिर हम सोते हैं । रात्रि का आखिरी सेकंड सुबह का पहला सेकंड बन जाता है । सुबह जब उठते हैं तो उसी शांत आत्मा में, ईश्वर में विश्रांति पाते-पाते थोड़ा-सा माधुर्य का अनुभव करते-करते फिर उठते हैं । श्रीकृष्ण ऐसा करते थे यह बात शास्त्रों से मैंने जानी । ‘आज यह-यह शुभ करना है...’- ऐसा सुबह संकल्प कर लेते थे और अपने को प्रसन्न रखते थे । आम लोगों को प्रेरणा पानी है तो सुबह उठकर यह संकल्प करना चाहिए कि ‘आज कम-से-कम 4 आदमियों को हँसाऊँगा, दो आदमियों के आँसू पोंछूँगा ।’



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शुक्रवार, 16 मार्च 2018

प्रणव’ (ॐ) की महिमा





            सूतजी ने ऋषियों से कहा : ‘‘महर्षियो ! ‘प्र’ नाम है प्रकृति से उत्पन्न संसाररूपी महासागर का । प्रणव इससे पार करने के लिए (नव) नाव है । इसलिए इस ॐकार को ‘प्रणव’ की संज्ञा देते हैं । ॐकार अपना जप करनेवाले साधकों से कहता है - ‘प्र-प्रपंच, न-नहीं है, वः-तुम लोगों के लिए ।’ अतः इस भाव को लेकर भी ज्ञानी पुरुष ‘ॐ’ को ‘प्रणव’ नाम से जानते हैं । इसका दूसरा भाव है : ‘प्र-प्रकर्षेण, न-नयेत्, वः-युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणवः । अर्थात् यह तुम सब उपासकों को बलपूर्वक मोक्ष तक पहुँचा देगा ।’ इस अभिप्राय से भी ऋषि-मुनि इसे ‘प्रणव’ कहते हैं । अपना जप करनेवाले योगियों के तथा अपने मंत्र की पूजा करनेवाले उपासकों के समस्त कर्मों का नाश करके यह उन्हें दिव्य नूतन ज्ञान देता है, इसलिए भी इसका नाम प्रणव - प्र (कर्मक्षयपूर्वक) नव (नूतन ज्ञान देनेवाला) है ।
           उन मायारहित महेश्वर को ही नव अर्थात् नूतन कहते हैं । वे परमात्मा प्रधान रूप से नव अर्थात् शुद्धस्वरूप हैं, इसलिए ‘प्रणव’ कहलाते हैं । प्रणव साधक को नव अर्थात् नवीन (शिवस्वरूप) कर देता है, इसलिए भी विद्वान पुरुष इसे प्रणव के नाम से जानते हैं अथवा प्र - प्रमुख रूप से नव - दिव्य परमात्म-ज्ञान प्रकट करता है, इसलिए यह प्रणव है ।
           यद्यपि जीवन्मुक्त के लिए किसी साधन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह सिद्धरूप है, तथापि दूसरों की दृष्टि में जब तक उसका शरीर रहता है, तब तक उसके द्वारा प्रणव-जप की सहज साधना स्वतः होती रहती है । वह अपनी देह का विलय होने तक सूक्ष्म प्रणव मंत्र का जप और उसके अर्थभूत परमात्म-तत्त्व का अनुसंधान करता रहता है । जब शरीर नष्ट हो जाता है, तब वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूप शिव को प्राप्त कर लेता है - यह सुनिश्चित है । जो अर्थ का अनुसंधान न करके केवल मंत्र का जप करता है, उसे निश्चय ही योग की प्राप्ति होती है । जिसने इस मंत्र का ३६ करोड़ जप कर लिया हो, उसे अवश्य ही योग प्राप्त हो जाता है । ‘अ’ शिव है, ‘उ’ शक्ति है और ‘मकार’ इन दोनों की एकता है । यह त्रितत्त्वरूप है, ऐसा समझकर ‘ह्रस्व प्रणव’ का जप करना चाहिए । जो अपने समस्त पापों का क्षय करना चाहते हैं, उनके लिए इस ह्रस्व प्रणव का जप अत्यंत आवश्यक है ।
           वेद के आदि में और दोनों संध्याओं की उपासना के समय भी ॐकार का उच्चारण करना चाहिए ।’’
भगवान शिव ने भगवान ब्रह्माजी और भगवान विष्णु से कहा : ‘‘मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ॐकार के रूप में प्रसिद्ध है । वह महामंगलकारी मंत्र है । सबसे पहले मेरे मुख से ॐकार (ॐ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूप का बोध करानेवाला है । ॐकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ । यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है । प्रतिदिन ॐकार का निरंतर स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है ।
            मुनीश्वरो ! प्रतिदिन दस हजार प्रणवमंत्र का जप करें अथवा दोनों संध्याओं के समय एक-एक हजार प्रणव का जप किया करें । यह क्रम भी शिवपद की प्राप्ति करानेवाला है ।
            ‘ॐ’ इस मंत्र का प्रतिदिन मात्र एक हजार जप करने पर सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है ।
    प्रणव के ‘अ’, ‘उ’ और ‘म्’ इन तीनों अक्षरों से जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन होता है - इस बात को जानकर प्रणव (ॐ) का जप करना चाहिए । जपकाल में यह भावना करनी चाहिए कि ‘हम तीनों लोकों की सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, पालन करनेवाले विष्णु तथा संहार करनेवाले रुद्र जो स्वयंप्रकाश चिन्मय हैं, उनकी उपासना करते हैं । यह ब्रह्मस्वरूप ॐकार हमारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों को, मन की वृत्तियों को तथा बुद्धि की वृत्तियों को सदा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले धर्म एवं ज्ञान की ओर प्रेरित करे ।’ प्रणव के इस अर्थ का बुद्धि के द्वारा qचतन करता हुआ जो इसका जप करता है, वह निश्चय ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । अथवा अर्थानुसंधान के बिना भी प्रणव का नित्य जप करना चाहिए ।’’
    (‘शिव पुराण’ अंतर्गत विद्येश्वर संहिता से संकलित) 




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शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

नर से नारायण की और - स्वामी विवेकानन्द


सुविख्यात स्वामी विवेकानंद, समर्थ सद्गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के शरणागत होकर ही कृतार्थ हुए । वे भक्ति के विषय में कहते हैं : ‘गुरु की कृपा से मनुष्य में छिपी हुई अलौकिक शक्तियाँ विकसित होती हैं, उसे चैतन्य प्राप्त होता है तथा उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है और अंत में वह नर से नारायण हो जाता है । …सत्य-ज्ञान-आनंदस्वरूप सद्गुरु को संसार ईश्वर-तुल्य मानता है । शिष्य शुद्धचित्त, जिज्ञासु और परिश्रमी होना चाहिए । जब शिष्य अपने को ऐसा बना लेता है, तब श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, निष्पाप, दयालु और प्रबोधचतुर समर्थ सद्गुरु उसे मिलते हैं । …सद्गुरु शिष्य के नेत्रों में ज्ञानांजन लगाकर उसे दृष्टि देते हैं । ऐसे सद्गुरु बडे भाग्य से जब मिलें, तब अत्यंत नम्रता, विमल सद्भाव और दृढ विश्वास के साथ उनकी शरण लो, अपना सम्पूर्ण हृदय उन्हें अर्पण करो, उनके प्रति अपने चित्त में परम प्रेम धारण करो, उन्हें प्रत्यक्ष परमेश्वर समझो । इससे आप भक्ति एवं ज्ञान का समुद्र प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाओगे । …महात्मा, सिद्ध पुरुष ईश्वर के अवतार होते हैं । वे केवल स्पर्श से, एक कृपा-कटाक्ष से, केवल संकल्पमात्र से भी शिष्य को कृतार्थ कर देते हैं, पर्वत जैसे पापों का बोझ ढोनेवाले भ्रष्ट जीवन को भी अपनी दया से क्षणार्ध में पुण्यात्मा बनाते हैं । वे गुरुओं के गुरु हैं । मनुष्यरूप में प्रकट होनेवाले साक्षात् नारायण हैं । मनुष्य उन्हींके रूप में परमात्मा को देख सकता है । अलख पुरुष की आरसी, सद्गुरु का ही देह । लखा जो चाहे अलख को, इन्हींमें तू लख लेह ।। भगवान निर्गुण-निराकार हैं, पर हम लोग जब तक मनुष्य हैं (देहभाव में हैं), तब तक हमें उन्हें मनुष्यरूप में ही पूजना चाहिए । तुम चाहे जो कहो, चाहे जितना प्रयत्न करो, पर तुम्हें मनुष्यरूपी (सगुण) परमेश्वर का ही भजन करना होगा । निर्गुण-निराकार का चाहे कोई कितना ही पाण्डित्य बघारे, सगुण का तिरस्कार करे, अवतारों की निन्दा करे, सूर्य-चन्द्र, तारागणों को दिखाकर बुद्धिवाद से उन्हींमें देवत्व देखने को कहे – पर उसमें यथार्थ आत्मज्ञान कितना है, यह यदि तुम देखो तो वह केवल शून्य है । हम लोग मनुष्य हैं, परमात्मा हमसे सगुणरूप में सद्गुरु-रूप में ही मिलते हैं, इसमें कुछ भी संदेह नहीं । स्वामी विवेकानंदजी आगे कहते हैं : ‘भगवान से मिलने की इच्छा करनेवाले मुमुक्षु के नेत्र श्रीगुरु ही खोलते हैं । गुरु और शिष्य का सम्बन्ध पूर्वज और वंशज के सम्बन्ध जैसा ही है । श्रद्धा, सच्चाई, नम्रता, शरणागति और आदरभाव से शिष्य गुरु का मन मोह ले तो ही उसकी आध्यात्मिक उन्नति हो सकती है । विशेष रूप से ध्यान में रखने की बात यह है कि जहाँ गुरु-शिष्य का नाता अत्यंत प्रेम से युक्त होता है, वहीं प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति के महात्मा उत्पन्न होते हैं । स्वानुभूति ज्ञान की परम सीमा है, वह स्वानुभूति ग्रंथों से नहीं प्राप्त हो सकती । पृथ्वी का पर्यटन कर चाहे आप सारी भूमि पदाक्रांत कर डालें, हिमालय, काकेशस, आल्प्स पर्वत लाँघ जायें, समुद्र में गोता लगाकर उसकी गहराई में बैठ जायें, तिब्बत देश देख लें या गोबी (अफ्रीका) का मरुस्थल छान डालें, स्वानुभव का यथार्थ धर्म-रहस्य इन बातों से, श्रीगुरु के कृपा-प्रसाद के बिना त्रिकाल में भी ज्ञात नहीं होगा । इसलिए भगवान की कृपा से जब ऐसा भाग्योदय हो कि श्रीगुरु दर्शन दें, तब सर्वान्तःकरण से श्रीगुरु की शरण लो, उन्हें ऐसा समझो जैसे यही परब्रह्म हों, उनके बालक बनकर अनन्यभाव से उनकी सेवा करो, इससे आप धन्य होंगे । ऐसे परम प्रेम और आदर के साथ जो श्रीगुरु के शरणागत हुए, उन्हींको और केवल उन्हींको सच्चिदानंद प्रभु ने प्रसन्न होकर अपनी परम भक्ति दी है और अध्यात्म के अलौकिक चमत्कार दिखाये हैं ।

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

मानव धर्म



   

        शास्त्रों में आया है कि सभी प्राणियों में मानव श्रेष्ठ है किन्तु केवल इतने से ही आप मान लो कि 'हाँ, हम वास्तव में मानव हैं एवं इतर (अन्य) प्राणियों से श्रेष्ठ हैं' – यह पर्याप्त नहीं है। इस श्रेष्ठता को सिद्ध करने की जवाबदारी भी मानव के ऊपर है। केवल दस्तावेज के बल पर कोई मनुष्य श्रेष्ठ नहीं हो जाता। उसे तो अपनी जीवन-शैली एवं रहन-सहन से साबित करना पड़ता हैः "मैं मानव हूँ, मानव कहलाने के लिए ये गुण मेरे जीवन में हैं और मानवता से पतित करने वाले इन-इन दुर्गुणों से मैं दूर रहता हूँ।"
यहाँ हम मानवता में जो दोष प्रविष्ट हो जाते हैं, उनकी चर्चा करेंगे।

'मनुस्मृति' कहती है कि मानवजीवन में दस दोष का पाप नहीं होने चाहिए – चार वाणी के पाप, तीन मान के पाप एवं तीन शरीर के पाप। अब क्रमानुसार देखें।

वाणी के चार पापः
1-परुष भाषण अर्थात् कठोर वाणीः कभी-भी कड़वी बात नहीं बोलनी चाहिए। किसी भी बात को मृदुता से, मधुरता से एवं अपने हृदय का प्रेम उसमें मिलाकर फिर कहना चाहिए। कठोर वाणी का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।
गुरु ने शिष्य को किसी घर के मालिक की तलाश करने के लिए भेजा। शिष्य जरा ऐसा ही था – अधूरे लक्षणवाला। उसने घर की महिला से पूछाः
"ए माई ! तेरा आदमी कहाँ है ?"
महिला क्रोधित हो गयी और उसने चेले को भगा दिया। फिर गुरुजी स्वयं गये एवं बोलेः
"माता जी ! आपके श्रीमान् पतिदेव कहाँ है ?"
उस महिला ने आदर के साथ उन्हें बिठाया एवं कहाः "पतिदेव अभी घर आयेंगे।"
दोनों ने एक ही बात पूछी किन्तु पूछने का ढंग अलग था। इस प्रकार कठोर बोलना यह वाणी का एक पाप है। वाणी का यह दोष मानवता से पतित करवाता है।

2-अनृत अर्थात् अपनी जानकारी से विपरीत बोलनाः हम जो जानते हैं वह न बोलें, मौन रहें तो चल सकता है किन्तु जो बोलें वह सत्य ही होना चाहिए, अपने ज्ञान के अनुसार ही होना चाहिए। अपने ज्ञान का कभी अनादर न करें, तिरस्कार न करें। जब हम किसी के सामने झूठ बोलते हैं तब उसे नहीं ठगते, वरन् अपने ज्ञान को ही ठगते हैं, अपने ज्ञान का ही अपमान करते हैं। इससे ज्ञान रूठ जाता है, नाराज हो जाता है। ज्ञान कहता है कि 'यह तो मेरे पर झूठ का परदा ढाँक देता है, मुझे दबा देता है तो इसके पास क्यों रहूँ ?' ज्ञान दब जाता है। इस प्रकार असत्य बोलना यह वाणी का पाप है।

3-पैशुन्य अर्थात् चुगली करनाः इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करना। क्या आप किसी के दूत हैं कि इस प्रकार संदेशवाहक का कार्य करते हैं ? चुगली करना आसुरी संपत्ति के अंतर्गत आता है। इससे कलह पैदा होता है, दुर्भावना जन्म लेती है। चुगली करना यह वाणी का तीसरा पाप है।

4-असम्बद्ध प्रलाप अर्थात् असंगत भाषणः प्रसंग के विपरीत बात करना। यदि शादी-विवाह की बात चल रही हो तो वहाँ मृत्यु की बात नहीं करनी चाहिए। यदि मृत्यु के प्रसंग की चर्चा चल रही हो तो वहाँ शादी-विवाह की बात नहीं करनी चाहिए।
इस प्रकार मानव की वाणी में कठोरता, असत्यता, चुगली एवं प्रसंग के विरुद्ध वाणी – ये चार दोष नहीं होने चाहिए। इन चार दोषों से युक्त वचन बोलने से बोलनेवाले को पाप लगता है।

मन के तीन पापः
परद्रव्येष्विभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम्।
वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम्।।

1-दूसरे के धन का चिंतन करनाः दूसरे के पास इतना सारा धन है ! उसे कैसे हड़प कर लें ? इसका चिन्तन न करें। वरन् स्वयं परिश्रम करें, द्रव्य उत्पन्न करें, आदान-प्रदान करें, विनिमय करें। दूसरे के धन की चिन्ता करते रहोगे तो मन जलने लगेगा। परिणामस्वरूप न जाने वह कैसा कुकर्म करवा दे ! दूसरे के धन-वैभव का चिंतन करना यह मानसिक पाप है, इससे बचना चाहिए

2-दूसरे के अनिष्ट का चिंतन करनाः ऐसा मत समझना कि केवल मन में ऐसा विचारने से कोई पाप नहीं लगता। नहीं, मन में दूसरे के नुक्सान का विचार करने से भी पाप लगता है क्योंकि मन में संकल्प होता है तब उसका मंथन भी होने भी लगता है। शरीर में भी वैसे ही रसायन बनने लगते हैं एवं वैसी ही क्रियाएँ भी होने लगती हैं। किसी के लिए अनिष्ट विचार आया तो समझो आपके मन में पाप का बीज बो दिया गया ! वह अंकुरित होकर धीरे-धीरे वृक्ष का रूप भी ले सकता है, आपको पापपरायण बना सकता है। अतः किसी को तकलीफ हो ऐसा मन में विचार तक नहीं करना चाहिए। यह मानसिक पाप है, इससे सावधानीपूर्वक बचना चाहिए।

3-वितथाभिनिवेशः जो बात हम नहीं जानते उसे सत्य मानकर चलना। ऐसी मान्यता बना लेना यह मन का तीसरा पाप है।
सत्य क्या है ? अबाधित्वं सत्यत्वं। जिसका कभी बाध न हो वह है सत्य। हम उस सत्य को नहीं जानते किंतु जानने का दावा करने लग जाते हैं। आत्मारामी संतों का अनुभव ही सचोट होता है, बाकी तो सब लोग मन-इन्द्रियों के जगत में अपने-अपने मत-पंथ-मजहब को महत्त्व देकर अपनी मान्यता पुष्ट करते हैं। सत्य मान्यताओं के आधार पर नहीं टिका होता परंतु जो तमाम मान्यताएँ मानता है उस मन को जहाँ से सत्तास्फूर्ति मिलती है वह है अबाधित सत्यस्वरूप आत्मदेव। उसी में महापुरुष विश्रांति पाये हुए होते हैं एवं उन महापुरुषों के वचन प्रमाणभूत माने जाते हैं जिन्हें शास्त्र 'आप्तवचन' कहते हैं।
जिस धर्म में ऐसे ब्रह्मवेत्ताओं का मार्गदर्शन नहीं लिया जाता, उस धर्म-संप्रदाय के लोग जड़ मान्यताओं में ही जकड़कर जिद्दी एवं जटिल हो जाते हैं। यह जिद और जटिलता मन का तीसरा दोष है। दूसरे को तुच्छ मानता, जिद्दी एवं जटिल रहना यह इस दोष के लक्षण हैं।


शरीर के तीन पापः
अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः।
परदारोपसेवा च शरीरं त्रिविधं स्मृतम्।।
'पराये हक का लेना, अवैधानिक हिंसा करना, पर-स्त्री का संग करना – ये तीन शारीरिक पाप कहे जाते हैं।'

1-लोभकृत पापः आपके पास जो भी चीज है, वह आपके हक की होनी चाहिए। पिता-पितामह की तरफ से वसीयत के रूप में मिली हो, अपने परिश्रम से न्यायपूर्वक प्राप्त की हो, खरीदी हो, किसी ने दी हो अथवा किसी राज्य पर विजय हासिल कर प्राप्त की हो तो भी ठीक है। किंतु किसी की वस्तु को उसकी अनुमति अथवा जानकारी के बिना ले लेना यह शारीरिक पाप है। जो वस्तु आपके हक की नहीं है, जो आपको दी भी नहीं गयी है ऐसी दूसरे की वस्तु को हड़प लेना यह लोभकृत पाप है।

2-क्रोधकृत पापः हिंसा चैवाविधानतः। जो धर्मानुसार एवं संविधानुसार नहीं है ऐसे कृत्य का आचरण यह शारीरिक पाप है। जिससे अपनी और अपने पड़ोसी की, दोनों की लौकिक, पारलौकिक एवं आध्यात्मिक उन्नति हो, उसमें रूकावट न आये ऐसा कर्म धर्म है और ऐसे धर्म को भंग करना यह पाप है।
हिंसा दो प्रकार की होती हैः कानूनी और गैर-कानूनी। जब जल्लाद किसी को फाँसी पर लटकाता है, सैनिक आक्रमणकारी शत्रुदेश के सैनिक पर बंदूक चलाता है तो यह कानूनी हिंसा अपराध नहीं मानी जाती, वरन् उसके लिए वेतन दिया जाता है। हमारे शास्त्रीय संविधान के विरुद्ध जो हिंसा है वह हमारे जीवन में नहीं होनी चाहिए। मानवता को सुदृढ़ बनाने कि लिए, सुरक्षित रखने के लिए और गौरवान्वित करने के लिए हमारे जीवन से, वाणी से, सकल्प से किसी को कष्ट न हो इसका ध्यान रखना चाहिए। हम जो करें, जो कुछ बोलें, जो कुछ लें, जो कुछ भोगें, उससे अन्य को तकलीफ न हो इसका यथासंभव ध्यान रखना चाहिए। यह मानवता का भूषण है।

3-कामकृत पापः पर-स्त्री के साथ संबंध यह कामकृत पाप है।
न ही दृशं अनावेश्यं लोके किंचन विद्यते।
पर स्त्री के साथ संबंध से बढ़कर शरीर को रोग देने वाला, मृत्यु देने वाला, आयुष्य घटाने वाला अन्य कोई दोष नहीं है। मानव की मर्यादा का यह उल्लंघन है। यह मर्यादा मानव की खास-विशेषता है। पशु, पक्षी, देवता अथवा दैत्यों में यह मर्यादा नहीं होती।
जैसे लोभ एक विकार है, क्रोध एक विकार है, वैसे ही काम भी एक विकार है। यह परंपरा से आता है। माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी के मन में भी यह था। इस प्राकृतिक प्रवाह को मर्यादित करने का उपाय अन्य किसी योनि में नहीं है। मनुष्य जीवन में ही उपाय है कि विवाह संस्कार के द्वारा माता-पिता, सास-ससुर एवं अग्नि को साक्षी बनाकर विवाह का संबंध जोड़ा जाता है। उस विवाह के बाद ही पति-पत्नी यज्ञ के अधिकारी होते हैं। 'पत्नी' शब्द का भी इसी अर्थ में उपयोग किया जाता है – 'त्युनो यज्ञसंयोग।' यज्ञ में, धर्मकार्य में जो सहधर्मिणी हो, सहभागिनी हो वह है पत्नी। यह पवित्र विवाह संस्कार धर्म की दृष्टि से मानव को सर्वोत्कृष्ट, संयमी एवं मर्यादित बनाता है। जिससे मानवता की सुरक्षा होती है उस आचार, विचार, विधि, संस्कार एवं मर्यादा का पालन मानव को अवश्य करना चाहिए। मर्यादा अर्थात् क्या ? 'मर्यि' अर्थात् मानव जिसे धर्मानुसार, ईश्वरीय संविधान के अनुसार आत्म-दृष्टि से, मानवता की दृष्टि से अपने जीवन में स्वीकार करे। जिसमें कोई मर्यादा नहीं है वह मर्यादाहीन जीवन मनुष्य जीवन नहीं, पशु जीवन कहलाता है।
यहाँ हमने मानवता को दूषित करने वाली चीजों की मीमांसा की। उनसे सावधानीपूर्वक बचना चाहिए। अब मनुष्यता को उज्जवल करने वाली बातों के विषय में विचार करेंगे। इन बातों को, मानवता की इन विशेषताओं को समझे। धर्म को कहीं से उधार नहीं लेना है अपितु वह हमारे ही अंदर स्थित है, उसे प्रगट करना पड़ता है। हीरे में चमक बाहर से नहीं भरनी पड़ती, किंतु हीरे को घिसकर उसके भीतर की चमक को प्रगट करना पड़ता है।


धर्म में चार बातें-
1-अनुशासनः धर्म में पहली बात यह है कि वह मनमाना नहीं होना चाहिए। शास्त्र एवं गुरु के अनुशासन के बिना जिसे अपने मन से ही धर्म मान लेते हैं वह धर्म अहंकार बढ़ाने वाला होता है एवं गलत मार्ग पर ले जाता है। अभिमान ऐसे ही गलत मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करता रहता है। मनमुख होकर स्वीकार किया गया धर्म सफलता मिलने पर अहंकार बढ़ाता है और असफलता मिलने पर दूसरों पर दोषारोपण की कुबुद्धि जगाता है।
धर्म में अनुशासन होना अत्यंत जरूरी है। वह अनुशासन चाहे शास्त्र का हो, सदगुरु का हो, माता-पिता का हो या अन्य किसी सुज्ञ हितैषी का हो लेकिन होना जरूर चाहिए। किसी के अनुशासन में कोई कार्य किया जाता है तो सफलता मिलने पर अधिमान नहीं आता और विफल होने पर दूसरों पर दोषारोपण की कुबुद्धि नहीं जगती।

2-आश्रयः धर्म में दूसरी बात है आश्रय की। ईश्वर का आश्रम लेकर जिस धर्म का आचरण करेंगे उससे हमारी क्रियाशक्ति बनी रहेगी, क्षीण नहीं होगी। किसी बड़े का आश्रय न हो तो मन में सफलता के विषय में शंका उठती है, कार्य पूर्ण होने में संदेह होता है। कार्य के परिणाम में संदेह उठने से निष्क्रियता आ जाती है, हमारी शक्ति क्षीण हो जाती है। अतः अनुशासन के साथ-साथ धर्म में ईश्वर एवं सदगुरु का आश्रय आवश्यक है।

3-संयमः धर्म में तीसरी बात आती है – अमर्यादित रूप से बढ़ती हुई वासना को रोकना अर्थात् संयम करना। जो लोग अपने जीवन में बिना किसी मर्यादा के वासना बढ़ा देते हैं, वे बड़े दुःखी हो जाते हैं। उदाहरण के लिये, किसी की वार्षिक आय एक लाख रूपये है। उसकी आय बढ़ी तो वासना बढ़ी और खर्च के रंग-ढंग भी बढ़े। वार्षिक व्यय तीन लाख तक पहुँचा जबकि आय डेढ़ लाख हो गयी थी। तीन लाख का व्यय डेढ़ लाख पर लाना कठिन हो गया। अतः आशा एवं इच्छा के पैर धीरे-धीरे पसारने चाहिए। एकाएक ऐसी आशा न करें जिससे आधा कार्य होने पर सुख मिलने की जगह आधा कार्य न होने का दुःख सताने लगे।

4-कर्म की उत्तमताः धर्म में चौथी महत्वपूर्ण बात हैः "मैं ही धर्म पूरा कर लूँगा।" ऐसा मानकर किसी धर्म का प्रारंभ न करें। "मैं ही करूँगा, मेरे भाई करेंगे, मेरी संतानें करेंगी। कोई उत्तम धर्मकार्य मेरे द्वारा पूर्ण हो जाय तो अच्छी बात है। वह कार्य किन्हीं अन्य लोगों के द्वारा पूर्ण हो तो भी एषणीय है।" कोई कार्य 'केवल मेरे लिए ही अच्छा है' ऐसा निर्णय करके ही न करें। 'जो कोई जब भी यह कार्य करेगा तो वह कार्य उसके लिए भी अच्छा ही होगा।' इस प्रकार कर्म के स्वरूप की उत्तमता का बोध होना चाहिए।
स्वर्ग से गंगाजी को धरती पर लाना था। राजा अंशुमान ने पुरुषार्थ किया, कार्य पूरा न हुआ। अंशुमान के पुत्र ने कार्य चालू रखा किन्तु उनका भी जीवन पूरा हो गया। गंगाजी को पृथ्वी पर लाना – यह उत्तम कार्य था तो तीसरी पीढ़ी में भगीरथ ने यह कार्य पूरा किया। यदि राजा अंशुमान विचारते कि 'यह कार्य मेरे जीवनकाल में पूर्ण हो जाय, ऐसा नहीं है' तो कार्य का प्रारंभ ही न हो पाता।

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमाना।
प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति।।

'कार्य में विघ्न आयेगा' ऐसे भय से कार्य का प्रारंभ ही न करना यह हीन पुरुष का लक्षण है। मध्यम पुरुष कार्य का प्रारंभ तो कर देता है किंतु बीच में विघ्न आने पर कार्य छोड़ देता है। उत्तम पुरुष का यह लक्षण है कि बार-बार विघ्न आये, आघात पड़े, घायल हो जाय फिर भी कार्य को अधूरा नहीं छोड़ता। उसकी दृष्टि में यदि कार्य उत्तम होता है तो बीच में आने वाले विघ्नों की वह कोई परवाह नहीं करता।
हम जो सत्कार्य करते हैं उससे हमें कुछ मिले – यह जरूरी नहीं है। किसी भी सत्कार्य का उद्देश्य हमारी आदतों को अच्छी बनाना है। हमारी आदते अच्छी बनें, स्वभाव शुद्ध, मधुर हो और उद्देश्य शुद्ध आत्मसुख पाने का हो। जीवन निर्मल बने इस उद्देश्य से ही सत्कार्य करने चाहिए।
किसी को पानी पिलायें, भोजन करायें एवं बदले में पच्चीस-पचास रूपये मिल जायें – यह अच्छे कार्य करने का फल नहीं है। अच्छे कार्य करने का फल यह है कि हमारी आदतें अच्छी बनें। कोई ईनाम मिले तभी सुखी होंगे क्या ?प्यासे को पानी एवं भूखे को भोजन देना यह कार्य क्या स्वयं ही इतना अच्छा नहीं है कि उस कार्य को करने मात्र से हमें सुख मिले ? है ही। उत्तम कार्य को करने के फलस्वरूप चित्त में जो प्रसन्नता होती है, निर्मलता का अनुभव होता है उससे उत्तम फल अन्य कोई नहीं है। यही चित्त का प्रसाद है, मन की निर्मलता है, अंतःकरण की शुद्धि है कि कार्य करने मात्र से प्रसन्न हो जायें। अतः जिस कार्य को करने से हमारा चित्त प्रसन्न हो, जो कार्य शास्त्रसम्मत हो, महापुरुषों द्वारा अनुमोदित हो वही कार्य धर्म कहलाता है। मनु महाराज कहते हैं-
यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात् परितोषोऽन्तरात्मनः।
तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।।

'जिससे अंतःकरण निर्मल हो, हृदय परितृप्त हो, उस कार्य को प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए, उससे विपरीत कार्य का त्याग करना चाहिए।'
जिस प्रकार सरोवर में जा मिलने वाला गंदा पानी ठहरकर निर्मल हो जाता है, उसकी तरंगे शांत हो जाती हैं ऐसे ही सत्कृत्य करते-करते हमारा मन निर्मल होने लगता है, शांत होने लगता है – यह सबसे बड़ा फल है। कार्य के बदले में दूसरा कुछ पाने की इच्छा रखना यह घाटे का धंधा करने के समान है।
तात्पर्य यह है कि कर्म में अनुशासन होना चाहिए – यह है बुद्धि के लिए आश्रय। कर्म में बड़ों का सहारा होना चाहिए – यह है श्रद्धा के लिए आश्रय। कर्म को अच्छे ढंग से पूर्ण करना चाहिए। हम जो-जो कार्य करें, उसका हमें सतोंष होना चाहिए।
मानव जीवन कर्म एवं ज्ञान के समन्वय से ही ठीक से चलता है। हम आँख से देखते हैं वह ज्ञान है, पैर से चलते हैं वह कर्म हैं। हम जितना-जितना आगे देखेंगे उतना-उतना चल सकेंगे। जैसे-जैसे चलते जायेंगे, वैसे-वैसे आगे दिखता जायेगा। इस प्रकार कर्म एवं ज्ञान के समन्वय से ही जीवन-रथ परम लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता रहता है। जीवन में केवल कर्म होगा तो जीवन यंत्रवत् बन जायेगा एवं केवल ज्ञान होगा तो जीवन में अकर्मण्यता आ जायेगी। अतः जीवन को यदि सही रूप से चलाना हो तो ज्ञान एवं कर्म का समन्वय करके चलाना चाहिए।



जीवन में इतनी भावुकता न आ जाय कि हम समझदारी से ही परे हो जायें ! जीवन में भावुकता भले रहे, प्रेम रहे, भक्ति रहे परंतु अति भावुकता, अति पक्षपात भले रहे, प्रेम रहे, भक्ति रहे परंतु अति भावुकता, अति पक्षपात न हो जिससे विवेक ही छूट जाय। विवेकशून्य होने से तो बड़ी हानि होती है। ऐसी बुद्धिहीन भावुकता तो पशुओं में भी दृष्टिगोचर होती है। अतः सदैव सावधानी एवं बुद्धिपूर्वक जीवन-सरिता का प्रवाह प्रवाहित होना चाहिए।