बुधवार, 10 सितंबर 2025

सत्संग और ध्यान में आनंद का रहस्य

 


 

    गुरु कृपा से शांति की अनुभूति

लोग जब सत्संग में बैठते हैं तो वातावरण आध्यात्मिक हो जाता है। उस वातावरण में चित्त स्वाभाविक रूप से शांत होने लगता है। जब चित्त शांत होता है तो खुली आँखों से भी आनंद आने लगता है। लेकिन यदि चित्त अशांत है तो बंद आँखों से भी ध्यान में कुछ विशेष अनुभव नहीं होता।

जब भी ध्यान में सहज ही आनंद आने लगे तो समझना चाहिए कि अनजाने में चित्त शांत हो गया है। यह आनंद किसी कठिन परिश्रम से नहीं, बल्कि वातावरण के प्रभाव से, भगवान की कृपा से और संतों की करुणा से ही मिलता है। ऐसे क्षणों में आपका चित्त ध्यानस्थ होकर भीतर की ओर धारण हो जाता है।

ध्यान और आनंद का वास्तविक अनुभव

अक्सर लोग संतों के पास आकर कहते हैं –
“साईं, मेरे पर दया करो, मेरा ध्यान नहीं लगता।”

लेकिन उनके चेहरे पर ही साफ झलकता है कि उन्होंने ध्यान का अमृत चखा है। पूछने पर वे स्वीकारते हैं कि ध्यान में बहुत आनंद आता है, परंतु उन्हें लगता है कि उनका ध्यान स्थिर नहीं है।

अब प्रश्न यह है कि ध्यान का वास्तविक फल क्या है? – आनंद या दुख?
ईश्वर प्राप्ति का फल क्या है? – सुख या क्लेश?

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं –

मम दर्शन फल परम अनुपा।
जीव पावहिं निज सहज स्वरूपा।।

अर्थात भगवान कहते हैं कि मेरे दर्शन का फल अनुपम है। जीव अपना सहज स्वरूप प्राप्त कर लेता है और अपने आत्मस्वरूप का आनंद अनुभव करता है।

गुरु कृपा और आत्मज्ञान

बहुत लोग सोचते हैं कि जब तक गुरु दीक्षा न मिले, गुरु कान में मंत्र न दें, सिर पर हाथ न रखें, तब तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। लेकिन वास्तविकता यह है कि सद्गुरु तो बिना मांगे ही कृपा बरसाते हैं। वे खोजते रहते हैं कि लेने वाला कोई शिष्य मिले।

सच्चा गुरु कोई पंडितगुरु या व्यवसायी गुरु नहीं होता, जो दक्षिणा या वस्त्र, नारियल और पैसे लेकर ही कृपा बरसाए। ब्रह्मवेत्ता और आत्मसाक्षात्कारी पुरुष तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के गुरु होते हैं। वे अपने को गुरु कहलवाने की इच्छा तक नहीं रखते।

इसीलिए श्रीकृष्ण को जगद्गुरु कहा गया है –
“कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।”

 



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मंगलवार, 9 सितंबर 2025

श्राद्ध: एक Spiritual Transaction

 

श्राद्ध

श्रद्धा से पितरों तक कैसे पहुँचती है हमारी अर्पण सामग्री?

आज की Digital Economy और Globalization ने हमें यह सिखा दिया है कि सीमाएँ केवल नक्शों पर होती हैं। 🌍
भारत का रुपया (₹) आसानी से अमेरिका का डॉलर ($), लंदन का पाउंड (£), जापान का येन (¥) या दुबई का दिरहम (د.إ) बन सकता है। Currency Exchange और Digital Payments ने इसे और भी सहज बना दिया है।

जब इंसानों द्वारा बनाई गई ये Human Governments इतनी क्षमता रखती हैं कि पैसों का Currency Conversion पल भर में हो जाता है, तो ज़रा सोचिए – क्या ईश्वर की सर्वशक्तिमान सरकार (Divine System) हमारे श्राद्ध में अर्पित अन्न, जल या सामग्री को पितरों के लिए योग्य रूप में पहुँचाने में सक्षम नहीं होगी?

Spiritual Currency और Divine Delivery

जिस तरह हम UPI Payment या Blockchain Transaction करते हैं और पैसे तुरंत Assured Delivery के साथ सही अकाउंट तक पहुँचते हैं,
उसी तरह श्रद्धा से किया गया श्राद्ध भी एक Spiritual Transaction है।

 हमारे द्वारा अर्पित वस्तुएँ – चाहे वह जल हो, अन्न हो, या दान हो – Universal Divine Network में प्रवेश करती हैं और पितरों के लिए उपयुक्त Spiritual Currency बनकर पहुँचती हैं।

     Tradition Meets Technology

आज हम Cloud Storage पर अपनी फाइल रखते हैं और दुनिया में कहीं भी उन्हें एक्सेस कर सकते हैं।
इसी तरह, श्राद्ध भी एक प्रकार की Spiritual Cloud Service है –
जहाँ हमारी श्रद्धा और प्रेम की तरंगें (Vibrations) पितरों तक पहुँचती हैं, और वे तृप्त होकर हमें आशीर्वाद देते हैं।

   Why Shraddh is Relevant in Modern Times?

  • यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि Spiritual Science है।

  • यह पितरों से जुड़ने का एक Emotional Connect है।

  • यह हमारी संस्कृति का Blockchain of Blessings है, जहाँ श्रद्धा की हर अर्पण ऊर्जा में बदलकर पितरों तक सुरक्षित पहुँचती है।

  • जैसे Digital Signature से ट्रांजैक्शन प्रमाणित होती है, वैसे ही हमारी श्रद्धा और निष्ठा इस लेन-देन की Authentication है।

श्राद्ध एक Spiritual Transaction है –
जिसमें हमारी श्रद्धा, प्रेम और आस्था Spiritual Currency बनकर पितरों तक पहुँचती है।
जैसे Global Payment Systems और Digital Economy पैसों को दुनिया भर में पहुँचाती है,
वैसे ही ईश्वर की दिव्य व्यवस्था हमारे अर्पण को रूपांतरित करके पितरों तक पहुँचाती है।

इसलिए श्राद्ध को अंधविश्वास न मानें, बल्कि इसे समझें –
यह एक Divine Assured Delivery System है, जो 100% Secure, Eternal और Universal है।


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शनिवार, 23 अगस्त 2025

ब्रह्म अभ्यास किसे कहते हैं?

 


ब्रह्म-अभ्यास" का अर्थ है – ब्रह्म (परम सत्य, आत्मा, परमात्मा) में मन को स्थिर करना और उसी के चिंतन-मनन में निरंतर लगे रहना।

 यह केवल बौद्धिक चर्चा नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव की ओर ले जाने वाला साधन है।
शास्त्रीय परिभाषा
उपनिषदों और अद्वैत वेदांत में "ब्रह्माभ्यास" को इस प्रकार समझाया गया है –
श्रवण (सुनना) – गुरु से यह सुनना कि "तू आत्मा है, ब्रह्म है, अमर है"।
मनन (विचार करना) – सुनी हुई बात पर गहराई से चिंतन करना, तर्क से उसे दृढ़ करना।
निदिध्यासन (गहन ध्यान करना) – उस सत्य पर बार-बार ध्यान करना, जैसे जप, ध्यान, मौन में आत्मस्वरूप में टिके रहना।
इसी निरंतर अभ्यास को ब्रह्म-अभ्यास कहा गया है।
उदाहरण से समझें
मान लीजिए कोई व्यक्ति बार-बार अपने को शरीर मानता है तो उसका आचरण शरीर-केन्द्रित होगा – भूख, प्यास, रोग-सुख-दुख में ही फँस जाएगा।
 परंतु यदि वही बार-बार यह स्मरण करे –
 "मैं नश्वर शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य आत्मा हूँ, जो ब्रह्म का ही अंश नहीं बल्कि वही ब्रह्म है"
 तो धीरे-धीरे यह अभ्यास उसकी स्थायी दृष्टि बन जाएगा।
संतों के वचन
शंकराचार्य कहते हैं:
 "अहं ब्रह्मास्मि" — इसका बार-बार अभ्यास करना ही ब्रह्म-अभ्यास है।
योगवशिष्ठ में कहा गया है:
 "ब्रह्माभ्यास से ही जीव मोक्ष को प्राप्त करता है।"
संक्षेप में
👉 ब्रह्म-अभ्यास = आत्मा-ब्रह्म के ज्ञान में दृढ़ रहने का अभ्यास।
 👉 यह केवल पढ़ने-सुनने तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन में जीना और अनुभव करना है कि –
 "मैं चैतन्य, अविनाशी, ब्रह्म ही हूँ।






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शनिवार, 1 जून 2024

बीमारी और चिंताओं से मुक्ति

 


  • शरीर में बीमारी  एवं मन में चिंताएं  कैसे उत्पन्न होती हैं?"

मन की इच्छा-वासनाओं  से चिंता उत्पन्न होती हैं एवं वात, पित्त, तथा कफ इन दोषों के असंतुलन से बीमारी  उत्पन्न होती है।"

हमारे शरीर में हजारों सामान्य वाहिनियाँ  हैं। उनमें अन्न रस आदि की अत्यंत अधिकता अथवा न्यूनता से सामान्य रोग होते हैं एवं सौ मुख्य वाहिनियाँ  है जिनमें विलासिता एवं अन्य मानसिक कारणों से मलिनता भरने से बड़े रोग होते हैं। चिंता  यह मन का रोग है  एवं बीमारी  तन का रोग है। यह जीव कभी चिंता  अर्थात् मन की चिंता, भय, शोक आदि से तो कभी बीमारी  से दुःख पाता रहता है। दुःख के रूपान्तरण को ही वह बेचारा सुख मान लेता है जिससे पुनः सुख के नाम पर दुःख ही भोगता रहता है।

तन की बीमारी  और मन की चिंता  कम-ज्यादा मात्रा में सभी को रहती है परंतु जो परम पुरुषार्थी चिंता -बीमारी  की जड़ को ढूँढकर उसे उखाड़ देता है उसकी चिंता -बीमारी  लंबे समय तक नहीं टिक सकती । अमुक वस्तु, अमुक स्थिति, अमुक धन, रूप-लावण्य, पद-प्रतिष्ठा वगैरह की इच्छा से मन में चिंता  आती है, मन चिंतित होता है। सामान्य चिंतित होता है तो सामान्य नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है और विशेष चिंतित होता है तो विशेष नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है। जीव जब अग्नि से पकाया हुआ भोजन ग्रहण करता है तब जठराग्नि उसे पुनः भीतर पकाती है एवं उसमें से बनने वाला रस रसवाहिनियों एवं रक्तवाहिनियाँ ग्रहण करती हैं तथा शरीररूपी यंत्र को चलाती हैं किन्तु जब मन में चिंता, भय, शोक होते हैं तब नाड़ियों में क्षोभ होता है जिससे नाड़ी-समूह अपनी कार्यक्षमता खो बैठता है। यही कारण है कि पशु अथवा दुर्बल मन के मनुष्यों को जब भय होता है तो उनकी वाहिनियाँ  अपनी कार्यक्षमता खो बैठती हैं एवं उनके मल-मूत्र का विसर्जन हो जाता है।

अंतःकरण में नश्वर वस्तुओं के राग को वासना कहते हैं। यह वासना ही आसक्ति एवं प्रियता का रूप धारण करके बंदर की तरह आठ प्रकार के सुखों की आशा, तृष्णा एवं ममता में कूदती रहती है। जीव अपने वास्तविक स्वरूप को न जानने के कारण इन चिंता यों का कई जन्मों से शिकार होता आया है।

कई बार प्रदोषकाल में किये गये भोजन, मैथुन आदि से, अशुद्ध अन्न, अपवित्र संपर्क से अथवा ऋतु के बदलने से बीमारी  उत्पन्न होती है। जो चिंता  का शिकार हो उसे बीमारीयाँ ज्यादा सताती हैं। कई बार पहले बीमारी  होती है फिर चिंता  होती है और कई बार चिंता  के कारण बीमारी  होती है। कइयों के जीवन में तो दोनों साथ ही डेरा डालकर बैठी होती हैं।

जो बीमारी याँ चिंता  के बिना उत्पन्न होते हैं उन्हें आयुर्वेदिक उपचार, होम्योपैथी, प्राकृतिक उपचार, मंत्र, आशीर्वाद, जप, ध्यान, प्राणायाम, योगासन आदि से दूर किया जा सकता है। चिंता  को ईश्वरार्पित कर्मों से, संत्संग से एवं साधु-समागम से कम किया जा सकता है। शरीर के रोगनिवारण के लिए तो अनेकों चिकित्सालय, औषधालय, डॉक्टर, हकीम, वैद्यादि की व्यवस्था मिल जाती है किन्तु मन के रोग को दूर करने के लिए ऐसी जगह बड़ी मुश्किल से कहीं-कहीं ही प्राप्त होती है। चिंता  एवं बीमारी  जिस अविद्या अर्थात् आत्मा के अज्ञान से उत्पन्न होती है उस अविद्या को निवृत्त करने का स्थल तो उससे भी दुर्लभ है, विरला है। शरीर की बीमारी  तो एक बार मिटती है तो पुनः हो जाती है, मन की चिंता  भी मिटकर पुनः हो जाती है किन्तु इन दोनों का कारण आत्म-अज्ञान यदि मिटता है तो यह जीव अपने शिव स्वभाव का अनुभव करके मुक्ति का आनंद पा सकता है। फिर उसे चिंता  नहीं सताती और बीमारी  भी बहुत नहीं होती। कभी प्रारब्ध वेग से शरीर में बीमारी  आ भी गयी हो तो वह उसके चित्त पर प्रभाव नही डाल पाती, जैसे कि रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि जैसे जीवन्मुक्त महापुरुषों के चित्त पर दर्दनाक रोग का भी प्रभाव न पड़ा।

शरीर की बीमारी  मिटाने के लिए जितनी सतर्कता जरूरी है उसकी चिंता  सतर्कता मन के रोग को निवृत्त करने की हो तो तन-मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। उससे भी कम मेहनत यदि चिंता -बीमारी  में फँसाने वाली अविद्या को मिटाने के लिए की जाय तो जीव सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

अज्ञान के कारण अपने मन-इन्द्रियों पर संयम नहीं रहता, फलस्वरूप चित्त भी रात-दिन राग-द्वेष से प्रेरित होकर 'यह मिला...... यह न मिला.....' करके मोहग्रस्त हो जाता है। अनेक इच्छाओं के उत्पन्न होने से, अविद्या से, चित्त को न जीतने से, अशुद्ध आहार के सेवन से, संध्याकाल एवं प्रदोषकाल में भोजन तथा मैथुन करने से, श्मशान आदि खराब स्थानों पर घूमने से, दुष्ट कर्मों का चिंतन करने से, दुर्जनों के संग से, विष, सर्प, सिंह आदि का भय होने से, नाड़ियों में अन्न-रस न पहुँचने अथवा अधिक पहुँचने से उत्पन्न कफ-पित्तादि दोषों से, प्राणों के व्याकुल होने से एवं इसी प्रकार के अन्य दोषों से शरीर में बीमारी याँ उत्पन्न होती हैं।

  •  चिंता  और बीमारी  किस तरह नष्ट हो सकती हैं - 

चिंता  दो प्रकार की होती हैः एक सामान्य एवं दूसरी जटिल। भूख-प्यास एवं स्त्री-पुत्रादि की इच्छा आदि से उत्पन्न चिंता  सामान्य मानी जाती है एवं जन्मादि विकार देने वाली वासनामय चिंता  जटिल कहलाती है। अन्न जल एवं स्त्री-पुत्रादि इच्छित वस्तु मिल जाने से सामान्य चिंता  नष्ट हो जाती है एवं चिंता यों के नष्ट हो जाने से मानसिक रोग भी नष्ट हो जाते हैं। जिस प्रकार रज्जु में अज्ञान से हुई सर्प की भ्रांति रज्जु के वास्तविक ज्ञान हुए बिना नहीं मिटती वैसे ही आत्मज्ञान के बिना जन्म-मरण को उत्पन्न करने वाली जटिल वासनामय चिंता  भी नहीं मिटती। जिस प्रकार वर्षा ऋतु की नदी किनारे के सभी वृक्षों को उखाड़ देती है वैसे ही यदि जन्म-मरण की जटिल चिंता  नष्ट हो जाय तो वह सब चिंता -बीमारी यों को जड़ मूल से उखाड़ फेंकती है।

कई बार चिंता  के द्वारा बीमारी  उत्पन्न होती है। कैसे ? चित्त यदि विषाद, चिंता, भय आदि से ग्रस्त हो तो उसका असर शरीर पर भी पड़ता है, परिणामस्वरूप शरीर में बीमारी याँ उत्पन्न हो जाती हैं।

इन्द्रियाणां मनोनाथः मननाथस्तु मारूतः।

इन्द्रियों का स्वामी मन है। मन का स्वामी प्राण है। प्राण यदि क्षुभित होते हैं तो वाहिनियाँ  अपनी कार्यक्षमता खो बैठती हैं, जिससे बीमारी याँ उत्पन्न होती हैं। ऐसी बीमारीयों को दूर करने में मंत्रजाप, साधुसेवा, पुण्यकर्म, तीर्थस्नान, प्राणायाम, ध्यान, सत्कृत्य आदि सहायक है। इनसे चिंता   दूर होती हैं एवं चिंता  के दूर होने से उनसे उत्पन्न बीमारीयां भी मिट जाती हैं।

शांत चित्त में सत्त्वगुण बढ़ने से तन एवं मन के रोग दूर होते हैं। सुख की लालसा एवं दुःख के भय से मन अपवित्र होता है। सुखस्वरूप परमात्मा का ध्यान किया जाय एवं दुःखहारी श्रीहरि की शरण सच्चे हृदय से ग्रहण की जाय तो चिंता  बीमारी  की चोटें ज्यादा नहीं लगतीं। प्रेम ईश्वर से करे एवं इच्छा संसार की रखे अथवा प्रेम संसार से करे एवं इच्छा ईश्वर की रखे ऐसा मनुष्य उलझ जाता है परंतु जो बुद्धिमान है वह ईश्वर-प्राप्ति की इच्छा से ही ईश्वर को प्रेम करता है। उसकी सांसारिक परिस्थितियाँ प्रारब्धवेग से चलती रहती हैं। लोकदृष्टि से सब प्रवृत्तियाँ करते हुए भी उसकी गौण एवं मुख्य दोनों वृत्तियाँ ईश्वर में ही रहती हैं। वह ईश्वर को ही प्रेम करता है एवं ईश्वर को ही चाहता है। ईश्वर नित्य है अतः उसे विनाश का भय नहीं होता। ईश्वर सदा अपने आत्मरूप है अतः उस विवेकी को वियोग का संदेह भी नहीं रहता। अतः आप भी ईश्वर की इच्छा करें एवं ईश्वर से ही प्रेम करें, इससे भय एवं संदेह निश्चिंतता एवं शुद्ध प्रेम में परिणत हो जायेंगे।

जैसे हाथी के पानी में गिरने पर क्षोभ के कारण पानी उछलता है, जैसे बाण से बिंधा हुआ हिरण मार्ग में गति करने लगते हैं। सब वाहिनियाँ  कफ-पित्तादि दोषों से भर जाने के कारण विषमता को प्राप्त होती हैं। प्राणों के द्वारा नाड़ीतंत्र के क्षुब्ध होने पर कई वाहिनियाँ  अन्न-रस से पूरी भर जाती हैं तो कई वाहिनियाँ  बिल्कुल खाली रह जाती हैं। प्राण की गति बदल जाने से या तो अन्न-रस बिगड़ जाता है या अन्न न पचने के कारण अजीर्ण हो जाता है अथवा अन्न-रस अत्यंत जीर्ण हो जाता है, सूख जाता है जिससे शरीर में विकार उत्पन्न होता है।

जैसे नदी का प्रवाह लकड़ी, तिनखों आदि को सागर की ओर ले जाता है वैसे ही प्राणवायु खाये गये आहार को रसरूप बनाकर भीतर अपने-अपने स्थानों में पहुँचा देती है। परंतु जो अन्न प्राणवायु की विषमता के कारण शरीर के भीतरी भाग में कहीं अटक जाता है वह स्वाभाविक रूप से कफ आदि धातुओं को बिगाड़कर बीमारी याँ उत्पन्न करता है।

इस प्रकार चिंता  से बीमारी याँ उत्पन्न होती हैं और चिंता  के मिट जाने पर बीमारीयाँ भी नष्ट हो जाती हैं।

 

जैसे हरड़े स्वभाव से ही जुलाब लगा देती है वैसे मंत्रादि के उच्चारण से, आरोग्य-मंत्र का श्रद्धा पूर्वक जप करने से चिंता -बीमारी याँ नष्ट हो जाती हैं। जैसे कसौटी पर कसने से स्वर्ण अपनी निर्मलता प्रगट कर देता है वैसे ही शुभकर्म या पुण्यकर्म करने से तथा सत्पुरुषों की सेवा करने से चित्त निर्मल हो जाता है। जैसे पूर्ण चंद्र का उदय होने से जगत में प्रकाश बढ़ता है वैसे ही चित्त शुद्ध होने से आरोग्य एवं आनंद बढ़ने लगता है। चित्त के शुद्ध रहने से प्राणवायु अपने क्रमानुसार ही संचार करती है एवं आहार को ठीक से पचा देती है जिससे नष्ट होती है।"

हमें यही दृष्टिगोचर होता है कि हम बाह्य उपचारों में ही अपने समय-शक्ति का ह्रास कर देते हैं फिर भी बीमारी यों से निवृत्त होकर आनंद एवं शांति प्राप्त नहीं कर पाते। जबकि चित्तशुद्धि के मार्ग से बीमारीयों के दूर होने पर आनंद एवं शांति प्राप्त होती है। देश के लोग यदि  इन उपायों को अमल में लायें तो कितनी श्रम-शक्ति बच जाय एवं मनुष्य आरोग्य एवं दीर्घायु प्राप्त कर सके !


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गुरुवार, 30 मई 2024

मन

 






आजमुझे किसीने पूछा की “मन मेरा बेचैन है में क्या करूँ ?“

मुझे लगा ये तो हर एक इन्सान के प्रश्न है , हर एक के जीवन में कभी कभी आता है , क्यूँ न इस के ऊपर एक लेख लिखा जाए जिसका आधार अपना अनुभव हो, शास्त्रोक्त हो और लाभकारी हो |

ऐसे तो “मन” के ऊपर बहुत सारे ग्रन्थ , रचनाएँ , और विडियो भी हैं | पर वही तथ्य हमें जीवन में असर डालती है, जो हमारे लायक हो अर्थात हमारे समस्या का निदान कर सके | उस प्रश्न कर्ता के साथ आप और हमारे बिच भी एक चर्चा हो जाये और सभी को लाभ भी मिले | इससे अधिक और क्या हो सकता है?

अभी इस विषय को शुरू करते हैं -

मनुष्य मात्र “मन” से परेशान हैं जो इसका उपयोग नहीं जानते, और जो जानते हैं वो मजे में हैं-

मनुष्य का मन एक ऐसी गुत्थी है, जिसे सुलझाना हर किसी के बस की बात नहीं। यह एक ऐसा चमत्कारी उपकरण है जो हमें अनंत संभावनाओं की ओर ले जा सकता है, लेकिन केवल तब जब हम इसे सही तरीके से उपयोग करना जानते हों।

मन की उलझनें और परेशानियाँ

जो लोग मन की शक्ति को नहीं पहचानते, वे अक्सर इसकी उलझनों में फंस जाते हैं। उनके लिए मन एक ऐसा भूलभुलैया बन जाता है, जिसमें वे बार-बार भटकते रहते हैं। नकारात्मक विचार, असंतोष, और अशांति उनके मन के साथी बन जाते हैं।

मन का सही उपयोग

दूसरी ओर, जो लोग मन की शक्ति को समझते हैं और उसका सही उपयोग करते हैं, वे जीवन के हर पल का आनंद उठाते हैं। वे अपने मन को सकारात्मक दिशा में ले जाने का कौशल जानते हैं। उनके लिए मन एक अनमोल खजाना है, जिसकी मदद से वे अपने सपनों को साकार करते हैं।

मन की महत्ता

मनुष्य का मन उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह हमारे विचारों, भावनाओं, और क्रियाओं को नियंत्रित करता है। जब हम इसे सही तरीके से पहचान लेते हैं, तो हम अपने जीवन को एक नई दिशा दे सकते हैं।

निष्कर्ष

अंत में, यह कहा जा सकता है कि मनुष्य का मन उसके जीवन का एक अनमोल रत्न है। जो इसका सही उपयोग जानते हैं, वे जीवन में सफलता और खुशियों की ओर अग्रसर होते हैं, जबकि जो इसे नहीं समझते, वे परेशानियों में उलझे रहते हैं। इसलिए, हमें अपने मन को समझना चाहिए और उसे सही |

मंगलवार, 28 मई 2024

सारा विश्व मेरा अविनाशी स्वरूप का अभीव्यक्ति

        



         सारा विश्व मेरा अविनाशी स्वरूप का अभीव्यक्ति है।  अत्यंत गहन और दार्शनिक है।  उद्धृत वाक्य “सारा विश्व मेरा अविनाशी स्वरूप का अभी व्यक्ति है” यह दर्शाता है कि   एक ऐसे विचार की ओर इशारा कर रहे हैं जो आत्मा और ब्रह्मांड के अविनाशी स्वरूप को समझने की कोशिश करता है। इस विचार को  शब्दों में परिभाषित कर एक विस्तृत विवेचना की मांग करता है, जिसमें आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का समावेश हो।

  इस विषय पर एक संक्षिप्त निबंध प्रस्तुत कर  , जो इस विचार को विस्तार से समझाने का प्रयास करेगा।   यह निबंध एक   विचार का प्रतिबिंब होगा और इसमें विभिन्न दार्शनिक और आध्यात्मिक विचारधाराओं के तत्व शामिल होंगे।

 

    अविनाशी स्वरूप: विश्व का अभिन्न अंग-


        जब हम विश्व को एक अविनाशी स्वरूप के रूप में देखते हैं, तो हम एक ऐसे दृष्टिकोण की ओर अग्रसर होते हैं जो समस्त जीवन को एक अखंड और अटूट शक्ति के रूप में मानता है। यह विचार विभिन्न दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराओं में पाया जाता है, जहाँ ब्रह्मांड को एक चेतना का प्रतिबिंब माना जाता है जो स्वयं में अविनाशी है।


    आध्यात्मिक दृष्टिकोण-


        आध्यात्मिकता में, अविनाशी स्वरूप को अक्सर आत्मा या ब्रह्म के रूप में वर्णित किया जाता है। यह वह शक्ति है जो न तो जन्म लेती है और न ही मृत्यु को प्राप्त होती है; यह निरंतर और अविचल है। इस दृष्टिकोण में, सारा विश्व इस अविनाशी शक्ति का एक व्यक्तित्व है, जो विभिन्न रूपों और आकारों में प्रकट होता है।


    दार्शनिक विचार-


        दार्शनिकों ने भी इस अविनाशी स्वरूप को विभिन्न तरीकों से समझाया है। कुछ ने इसे अनंत चेतना के रूप में देखा है, जबकि अन्य ने इसे विश्व की अंतर्निहित एकता के रूप में माना है। यह विचार कि सभी चीजें एक ही स्रोत से उत्पन्न होती हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाती हैं, विभिन्न दार्शनिक प्रणालियों में प्रमुख है।


    वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य-


        विज्ञान भी इस अविनाशी स्वरूप के विचार को अपने तरीके से समझता है। भौतिकी में, ऊर्जा का संरक्षण का नियम बताता है कि ऊर्जा न तो सृजित की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है; यह केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है। इसी तरह, ब्रह्मांड के अविनाशी स्वरूप को भी एक अनंत चक्र के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ सब कुछ निरंतर परिवर्तनशील है लेकिन फिर भी एक समग्रता में बना रहता है।



        इस प्रकार, अविनाशी स्वरूप का विचार हमें एक ऐसे दृष्टिकोण की ओर ले जाता है जो जीवन और ब्रह्मांड की एकता को स्वीकार करता है। यह हमें यह समझने की ओर प्रेरित करता है कि हम सभी एक ही अविनाशी शक्ति के अभिन्न अंग हैं, जो विभिन्न रूपों में प्रकट होती है और जिसका अस्तित्व सदैव बना रहता है।





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गुरुवार, 23 मई 2024

मनुष्य जन्म का उद्देश्य क्या है?

 




       भारत देश के ऋषियों ने जो अदभुत खोजें की हैं, वैसी खोजें विश्व में कहीं भी नहीं हुई हैं। मनुष्य का स्वभाव तीन गुणों के प्रभाव से संचालित होता है। उनमें से रजो-तमोगुण मनुष्य को अत्यंत दुःखद अनुभव करवाकर उसके वर्तमान जीवन को निकृष्ट बना देता है और फिर वृक्ष, पशु, पक्षी जैसी तुच्छ योनियों में ले जाता है। सत्त्वगुण वर्तमान जीवन को दिव्य बनाता है और स्वर्ग एवं ब्रह्मलोक आदि उच्च लोकों में पहुँचाता है। इसमें भी यदि ब्रह्मवेत्ताओं का प्रत्यक्ष सान्निध्य एवं सत्संग मिले तो तीनो गुणों से पार अपने असली आनंदधन आत्मा को जानकर जीव जीवन्मुक्त हो सकता है।


        चलो, अब रजो-तमोगुण के कुप्रभाव एवं सत्त्वगुण के सुप्रभाव को निहारें।

        तमोगुणी मानव वर्ग आलसी-प्रमादी होकर, गंदे विषय-विकारों का मन में संग्रह करके बैठे-बैठे या सोते-सोते भी इन्द्रियभोग के स्वप्न देखता रहता है। यदि कभी कर्मपरायण हों तो भी यह वर्ग हिंसा, द्वेष, मोह जैसे देहधर्म के कर्म में ही प्रवृत्त रहकर बंधनों में बँधता जाता है। मलिन आहार, अशुद्ध विचार और दुष्ट आचार का सेवन करते-करते तमोगुणी मानव पुतले को आलसी-प्रमादी रहते हुए ही देहभोग की भूख मिटाने की जितनी आवश्यकता होती है उतना ही कर्मपरायण रहने का उसका मन होता है।

        रजोगुणी मनुष्य प्रमादी नहीं, प्रवृत्तिपरायण होता है। उसकी कर्मपरंपरा की पृष्ठभूमि में आंतरिक हेतु रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, दंभ आदि सब भरा हुआ होता है। सत्ताधिकार की तीव्र लालसा और देहरक्षा के ही कर्म-विकर्मों के कंटकवृक्ष उसकी मनोभूमि में उगकर फूलते-फलते हैं। उसके लोभ की सीमा बढ़-बढ़कर रक्त-संबंधियों तक पहुँचती हैं। कभी उससे आगे बढ़कर जहाँ मान मिलता हो, वाहवाही या धन्यवाद की वर्षा होती है, ऐसे प्रसंगों में वह थोड़ा खर्च कर लेता है। ऐसे रजोगुणी मनुष्य का मन भी बहिर्मुख ही कहलाता है। ऐसा मन बड़प्पन के पीछे पागल होता है। उसका मन विषय-विलास की वस्तुओं को एकत्रित करने में लिप्त होकर अर्थ-संचय एवं विषय-संचय करने के खेल ही खेलता रहता है।

        इन दोनों ही वर्गों के मनुष्यों का मन स्वच्छंदी, स्वार्थी, सत्ताप्रिय, अर्थप्रिय और मान चाहने वाला होता है और कभी-कभार छल-प्रपंच के समक्ष उसके अनुसार टक्कर लेने में भी सक्षम होने की योग्यता रखता है। ऐसे मन की दिशा इन्द्रियों के प्रति, इन्द्रियों के विषयों के प्रति और विषय भोगों के प्रति निवृत्त न होने पर भोगप्राप्ति के नित्य नवीन कर्मों को करने की योजना में प्रवृत्त हो जाती है। ऐसा मन विचार करके बुद्धि को शुद्ध नहीं करता अपितु बुद्धि को रजोगुण से रँगकर, अपनी वासनानुसार उसकी स्वीकृति लेकर - 'मैं जो करता हूँ वह ठीक ही करता हूँ' ऐसी दंभयुक्त मान्यता खड़ी कर देता है।

        ऐसे आसुरी भाव से आक्रान्त लोगों का अनुकरण आप मत करना। राजसी व्यक्तियों के रजोगुण से अनेक प्रकार की वासनाएँ उत्पन्न होती हैं अतः हे भाई ! सावधान रहना। रजो-तमोगुण की प्रधानता से ही समस्त पाप पनपते हैं। जैसे हँसिया, चाकू, छुरी, तलवार आदि भिन्न-भिन्न होते हुए भी उनकी धातु लोहा एक ही है ऐसे ही पाप के नाम भिन्न-भिन्न होने पर भी पाप की जड़ रजो-तमोगुण ही है।

        संसार में बहुमत ऐसे वर्ग का ही है। ऐसा वर्ग प्रवृत्तिपरायण कहलाता है। इसके कर्म में मोक्षबुद्धि नहीं होती। अतः यदि इस वर्ग को स्वतंत्र रूप से व्यवहार करने दें तो समाज में ऐसी अव्यवस्था उठ खड़ी होती है जिसके फलस्वरूप सर्वत्र स्वार्थ और दंभरूपी बादल छा जाते हैं, कपट एवं प्रपंच की आँधी चलने लगती है तथा सर्वत्र दुःख और विपत्तियों के प्रहार होने से प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार उठती है। ये दो वर्ग ही यदि परस्पर टकराने लगे तो हिंसा, द्वेष, स्वार्थ और भोगबुद्धि के कर्मों में ही प्रजा लिप्त रहने लगती है और युद्ध की नौबत आ जाती है। प्रत्येक युग एवं प्रत्येक देश में ऐसे ही संहार होता रहता है।

य        ह उन्नति का मार्ग नहीं है। अवनति की ओर जाते मानव के लिए आत्मोन्नति के आनंद की ओर चलने के लिए बुद्धि के शोधन की, उसकी विचार शक्ति में विवेक के सूर्य का उदय करने की आवश्यकता है। मन एवं इन्द्रियों को विषयों के स्मरण, चिन्तन, प्राप्ति एवं भोग की जन्म-जन्मांतरों की जो आदत पड़ी हुई है, उनमें असारता का दर्शन होने पर मन उनसे विमुख होता है तब बुद्धि को अपने से भी परे आत्मा की ओर अभिमुख होने की रूचि एवं जिज्ञासा होती है, आत्सरस पीने का सौभाग्य प्राप्त होता है, संसार की मायाजाल से बचने का बल मिलता है।

        जब बुद्धि को आत्मनिरीक्षण के लिए विचार करने की भोगमुक्त दशा प्राप्त होती है तब वह प्रत्येक कर्म में विवेक का उपयोग करती है। उस वक्त उसके अन्तःकरण में आत्मा का कुछ प्रकाश पड़ता है, जिससे विषयों का अंधकार कुछ अंश में क्षीण होता है। यह है नीचे से ऊपर जाने वाला तीसरा, आंतर में से प्रकट होने वाला स्वयंभू सुख की लालसावाला, बुद्धि के स्वयं के प्रकाश का भोक्ता – सत्त्वगुण। इस सत्त्वगुण की प्रकाशमय स्थिति के कारण बुद्धि का शोधन होता है। कर्म-अकर्म, धर्म अधर्म, नीति-अनीति, सार-असार, नित्य-अनित्य वगैरह को समझकर अलग करने एवं धर्म, नीति, सदाचार तथा नित्य वस्तु के प्रति चित्त की सहज स्वाभाविक अभिरूचि करने की शक्ति इसी से संप्राप्त होती है।

        एक ओर मानवीय जीवन के आंतर प्रदेश में आत्मा (आनंदमय कोष) एवं बुद्धि (विज्ञानमय कोष) है तो दूसरी ओर प्राण (प्राणमय कोष) तथा शरीर (अन्नमय कोष) है। इन दोनों के बीच मन (मनोमय कोष) है। वह जब बहिर्मुख बनता है तब प्राण तथा शरीर द्वारा इन्द्रियाँ विषय-भोगों में लिप्त होकर वैसे ही धर्म-कर्म में प्रवृत्त रहती हैं। यही है मानवीय जीवन की तामसिक एवं राजसिक अवस्था की चक्राकार गति।

        परंतु उसी मन (मनोमय कोष) को ऊर्ध्वमुख, अंतर्मुख अथवा आत्माभिमुख करना – यही है मानव जीवन का परम कल्याणकारी लक्ष्य। ऋषियों में परम आनंदमय आत्मा को ही लक्ष्य माना है क्योंकि मनुष्य के जीवनकाल की मीमांसाकरने पर यह बात स्पष्ट होती है कि उसकी सब भाग दौड़ होती है सुख के लिए, नित्य सुख के लिए। नित्य एवं निरावधि सुख की निरंतर आकांक्षा होने के बावजूद भी वह रजो-तमोगुण एवं इन्द्रियलोलुपता के अधीन होकर हमेशा बहिर्मुख ही रहता है। उसकी समस्त क्रियाएँ विषयप्राप्ति के लिए ही होती हैं। उसकी जीवन-संपदा, शारीरिक बल, संकल्पशक्ति आदि का जो भी उसका सर्वस्व माना जाता है वह सब जन्म मृत्यु के बीच में ही व्यर्थ नष्ट हो जाता है।

        परंतु उसी मन(अंतःकरण) पर यदि सत्त्वगुण का प्रकाश पड़े तो उसे स्वधर्म-स्वर्म की, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की सूक्ष्म छानबीन करने का सूझता है। सुख-दुःख के द्वन्द्व में उसे नित्य सुख की दिशा सूझती है। दुराचार के तूफानी भँवर में से उसे शांत, गंभीर सत्त्वगुणी गंगा के प्रवाह में अवगाहन करने की समझ आने लगती है। विचार-सदविचार की कुशलता आती है। विचार, इच्छा, कर्म आदि में शुभ को पहचानने की सूझबूझ बढ़ती है। जिससे शुभेच्छा, शुभ विचार एवं शुभकर्म होने लगते हैं।

        जन्म मरण जैसे द्वन्द्वों के स्वरूप अर्थात् संसार-चक्र एवं कर्म के रहस्य को समझाते हुए एवं उसी को अशुभ बताते हुए गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।

तरो कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।

'वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभांति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात् कर्मबन्धन से मुक्त हो जाएगा।'

(गीताः 4.16)


            धर्म के, पुण्य के नाम अलग-अलग हैं किन्तु उनका मूल है सत्त्व। सत्त्वगुणरूपी जड़ का सिंचन होने से जो विशाल वृक्ष होता है उसमें मीठे फल लगते हैं। वे ही फल आंतरिक सुख, स्वतंत्र सुख, मुक्तिदायी सुख का मार्ग खोल देते हैं। यह जीव गुणों के थपेड़े से बचकर ही अपने गुणातीत स्वरूप में स्थिर हो सकता है एवं आत्म-साक्षात्कार कर सकता है। जिसके ध्यान से ब्रह्माजी, भगवान विष्णु एवं साम्बसदाशिव भी सामर्थ्य एवं अनोखा आनंद पाते हैं उसी चैतन्यस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिए आपका जन्म हुआ है इसका निरंतर स्मरण रखना।






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