ब्रह्म-अभ्यास" का अर्थ है – ब्रह्म (परम सत्य, आत्मा, परमात्मा) में मन को स्थिर करना और उसी के चिंतन-मनन में निरंतर लगे रहना।
यह केवल बौद्धिक चर्चा नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव की ओर ले जाने वाला साधन है।
शास्त्रीय परिभाषा
उपनिषदों और अद्वैत वेदांत में "ब्रह्माभ्यास" को इस प्रकार समझाया गया है –
श्रवण (सुनना) – गुरु से यह सुनना कि "तू आत्मा है, ब्रह्म है, अमर है"।
मनन (विचार करना) – सुनी हुई बात पर गहराई से चिंतन करना, तर्क से उसे दृढ़ करना।
निदिध्यासन (गहन ध्यान करना) – उस सत्य पर बार-बार ध्यान करना, जैसे जप, ध्यान, मौन में आत्मस्वरूप में टिके रहना।
इसी निरंतर अभ्यास को ब्रह्म-अभ्यास कहा गया है।
उदाहरण से समझें
मान लीजिए कोई व्यक्ति बार-बार अपने को शरीर मानता है तो उसका आचरण शरीर-केन्द्रित होगा – भूख, प्यास, रोग-सुख-दुख में ही फँस जाएगा।
परंतु यदि वही बार-बार यह स्मरण करे –
"मैं नश्वर शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य आत्मा हूँ, जो ब्रह्म का ही अंश नहीं बल्कि वही ब्रह्म है"
तो धीरे-धीरे यह अभ्यास उसकी स्थायी दृष्टि बन जाएगा।
संतों के वचन
शंकराचार्य कहते हैं:
"अहं ब्रह्मास्मि" — इसका बार-बार अभ्यास करना ही ब्रह्म-अभ्यास है।
योगवशिष्ठ में कहा गया है:
"ब्रह्माभ्यास से ही जीव मोक्ष को प्राप्त करता है।"
संक्षेप में
👉 ब्रह्म-अभ्यास = आत्मा-ब्रह्म के ज्ञान में दृढ़ रहने का अभ्यास।
👉 यह केवल पढ़ने-सुनने तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन में जीना और अनुभव करना है कि –
"मैं चैतन्य, अविनाशी, ब्रह्म ही हूँ।
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