गुरु कृपा से शांति की अनुभूति
लोग जब सत्संग में बैठते हैं तो वातावरण आध्यात्मिक हो जाता है। उस वातावरण में चित्त स्वाभाविक रूप से शांत होने लगता है। जब चित्त शांत होता है तो खुली आँखों से भी आनंद आने लगता है। लेकिन यदि चित्त अशांत है तो बंद आँखों से भी ध्यान में कुछ विशेष अनुभव नहीं होता।
जब भी ध्यान में सहज ही आनंद आने लगे तो समझना चाहिए कि अनजाने में चित्त शांत हो गया है। यह आनंद किसी कठिन परिश्रम से नहीं, बल्कि वातावरण के प्रभाव से, भगवान की कृपा से और संतों की करुणा से ही मिलता है। ऐसे क्षणों में आपका चित्त ध्यानस्थ होकर भीतर की ओर धारण हो जाता है।
ध्यान और आनंद का वास्तविक अनुभव
अक्सर लोग संतों के पास आकर कहते हैं –
“साईं, मेरे पर दया करो, मेरा ध्यान नहीं लगता।”
लेकिन उनके चेहरे पर ही साफ झलकता है कि उन्होंने ध्यान का अमृत चखा है। पूछने पर वे स्वीकारते हैं कि ध्यान में बहुत आनंद आता है, परंतु उन्हें लगता है कि उनका ध्यान स्थिर नहीं है।
अब प्रश्न यह है कि ध्यान का वास्तविक फल क्या है? – आनंद या दुख?
ईश्वर प्राप्ति का फल क्या है? – सुख या क्लेश?
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं –
मम दर्शन फल परम अनुपा।
जीव पावहिं निज सहज स्वरूपा।।
अर्थात भगवान कहते हैं कि मेरे दर्शन का फल अनुपम है। जीव अपना सहज स्वरूप प्राप्त कर लेता है और अपने आत्मस्वरूप का आनंद अनुभव करता है।
गुरु कृपा और आत्मज्ञान
बहुत लोग सोचते हैं कि जब तक गुरु दीक्षा न मिले, गुरु कान में मंत्र न दें, सिर पर हाथ न रखें, तब तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। लेकिन वास्तविकता यह है कि सद्गुरु तो बिना मांगे ही कृपा बरसाते हैं। वे खोजते रहते हैं कि लेने वाला कोई शिष्य मिले।
सच्चा गुरु कोई पंडितगुरु या व्यवसायी गुरु नहीं होता, जो दक्षिणा या वस्त्र, नारियल और पैसे लेकर ही कृपा बरसाए। ब्रह्मवेत्ता और आत्मसाक्षात्कारी पुरुष तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के गुरु होते हैं। वे अपने को गुरु कहलवाने की इच्छा तक नहीं रखते।
इसीलिए श्रीकृष्ण को जगद्गुरु कहा गया है –
“कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।”

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