बुधवार, 15 मार्च 2023

वास्तव में आप है कौन?

     





वास्तव में आप है कौन?मनुष्य में जो बुद्धि होता है,मन होता है, सुक्ष्म शरीर की क्षमताएं होती हैं ,वो पशु शरीर में नहीं होती ,लेकिन मनुष्य शरीर में जो 'मैं' है..आत्मा है वही उस पशु शरीर में है ,यह ज्ञान सुनने में तो थोड़ा कठिन लगेगा ,लेकिन यह सुना तो आपने हजार हजार यज्ञ कर लिये,हजार हजार तीर्थ कर लिए,हजार हजार तप कर लिए...ये ऐसा ज्ञान है।    

    ...अपने प्यारे अर्जुन को भगवान सुना रहे हैं ,युद्ध के मैदान में ..

...    देहधारी के इस मनुष्य शरीर में जैसे  बालकपन,जवानी ,वृद्धावस्था  होती है ऐसे ही देहांतर् की प्राप्ति हो जाती है ....जैसे यह तीन अवस्था आ जाती है, चार अवस्था आ जाती है ऐसे ही मृत्यु के बाद दूसरे शरीर की अवस्था आ जाती है, तो जो धीर है...इन अवस्थाओं को 'मैं' नहीं मानता..इस अवस्था वाले शरीर को 'मैं' नहीं मानता वो अपनी आत्मा में धीर है, वह धीर पुरुष फिर इनमें विचलित नहीं होता...  अपने आप अवस्थाओं के बाप, 

    तो वह अवस्थाओं में विचलित नहीं होता तो गुणों में भी विचलित नहीं होता ..।

...प्रकासम् च प्रवृत्तिम् च मोहम् एव च पांडवा न सम् प्रवृत्तानि न निवृत्तानि आकांक्ष्यति....

    प्रकाश मतलब सात्विकता आई सत्संग आया दान पुण्य आनंद आया ,प्रवृत्ति मतलब लेना-देना आपाधापी हुई ,मोह मतलब निद्रा आई ....लेकिन वह ज्ञानी न निद्रा की इच्छा करता है न आपाधापी की इच्छा करता है,वो स्वाभाविक आ रहा है जा रहा है... सृष्टि का क्रम है ,ज्ञानी किसी परिस्थिति की इच्छा, वासना,आकांक्षा  नहीं करता ..इसीलिए बोलते हैं जीवनमुक्त ..वो जीते जी मुक्त है ,हम लोग इच्छा करते हैं धन मिल जाए सत्ता मिल जाए यह मिल जाए वह मिल जाए,मैं मरू नहीं  ...मरू नहीं...नहीं करके सब मर रहे हैं ,बुड्ढा होउ नहीं ....सभी हो रहे हैं,मै बालक ही रहुं...फिर भी जवान हो जाते हैं, मैं जवान रहूं ....तो जवानी तो छूट जाती है ,फिर क्यों प्रपंच में रहना

    मैं जो हूं वहां कुछ बदलाव नही,जहां बदलाव है वह मैं नहीं हूं ,मन तु ज्योति स्वरूप.....

    मैं सब को जानने वाला ज्ञान स्वरूप आत्मा हूं ,इसको जानकर वो तो दृढ़  हो जाता है गुरुकृपा में...गुरु के अनुभव में टीक जाता है।

    बाल्यकाल और जवानी में नींद  से जितनी ताकत और स्फुर्ति मिलती है बुढ़ापे में उतनी नींद भी नहीं आती और उतनी स्फूर्ति भी नहीं आती ...तो मानना पड़ेगा कि कारण सरीर भी  बदलता है ,स्थूल शरीर भी बदलता है, सूक्ष्म शरीर भी बदलता है ,फिर भी कोई है जो नहीं बदलता है ... जवानी में मुझे ज्यादा नींद आती थी ,बुढ़ापे में काक चेष्टा  जैसी नींद आती है ,जवानी मे नींद  के बाद ज्यादा स्फूर्ति आती थी बुढ़ापे में जरा ऐसे ही रहता है,मै बालक ही रहुं...फिर भी जवान हो जाते हैं, मैं जवान रहूं ....तो जवानी तो छूट जाती है ,फिर क्यों प्रपंच में रहना

    मैं जो हूं वहां कुछ बदलाव नही,जहां बदलाव है वह मैं नहीं हूं ,मन तु ज्योति स्वरूप.....

    मैं सब को जानने वाला ज्ञान स्वरूप आत्मा हूं ,इसको जानकर वो तो दृढ़  हो जाता है गुरुकृपा में...गुरु के अनुभव में टीक जाता है।

    बाल्यकाल और जवानी में नींद  से जितनी ताकत और स्फुर्ति मिलती है बुढ़ापे में उतनी नींद भी नहीं आती और उतनी स्फूर्ति भी नहीं आती ...तो मानना पड़ेगा कि कारण सरीर भी  बदलता है ,स्थूल शरीर भी बदलता है, सूक्ष्म शरीर भी बदलता है ,फिर भी कोई है जो नहीं बदलता है ... जवानी में मुझे ज्यादा नींद आती थी ,बुढ़ापे में काक चेष्टा  जैसी नींद आती है ,जवानी मे नींद  के बाद ज्यादा स्फूर्ति आती थी बुढ़ापे में जरा ऐसे ही रहता है


    तो उसको जानने वाला तू बुढ़ापे से अलग है न, ,जवानी से अलग है न..तो स्थूल शरीर बदला उसको भी तू जानता है, सुक्ष्म शरीर  बदला उसको भी तू जानता है, क्योंकि रात को सपना आया ..आप जवान होते हैं तो जवान होने का सपना आता है ,तो सपना तो सूक्ष्म शरीर में आता है ,बुड्ढे हो तो बुड्ढा होने का सपना आता है,अब बालक हो तो बाल्यकाल का सपना आता है तो सपना सुक्ष्म शरीर में आता है ,तो सुक्ष्म शरीर बदलता है क्योंकि सपने बदलते हैं.... इसीलिए सूक्ष्म शरीर बदलता है, 

 ..    कारण शरीर  बदलता है क्योंकि बचपन की नींद जवानी की नींद बुढ़ापे की नींद  बदलती है...तो कारण शरीर भी बदलता है और यह शरीर तो बदलता ही है.. दिखता है ..तो आपकी तीनों शरीर बदलते हैं ,आप नहीं बदलते लेकिन  बेवकूफी के कारण ऊंचा सत्संग  ..ब्रह्मज्ञान का सत्संग नहीं मिला इसलिए मान बैठे हैं कि कोई उधर है     ...ऐसा है वैसा है ,भक्ति भाव करते हैं लेकिन ह्रदय का अज्ञान नहीं मिटता ,जरा से दुख में दुखी हो जाते हैं ,जरा से सुख मे सुखी हो जाते हैं, जरा से मान में अहम भर जाता है,जरा से अपमान में वैर  भर जाता है ..तो अहम और वैर सुक्ष्म  में शरीर में होता है,राग देश सूक्ष्म शरीर में बुद्धि में होता है ...मान अपमान का सुख दुख सुक्ष्म  में शरीर में होता है ,बीमारी तंदुरुस्ती स्थूल शरीर में होता है तो बीमारी तंदुरुस्ती आई  उसको भी जाना और गई उसको भी जाना ,मान अपमान आया और गया उसको भी तुम जानते हो ..तो तुम स्थूल शरीर नहीं हो.. लाला.. लालियाँ...बिटिया तुम स्थूल शरीर नहीं हो ,देवीयाँ देवता तुम  सुक्ष्म शरीर नहीं हो ,तुम कारण शरीर  नहीं हो ...मरने के बाद भी जो नहीं मरता है वह तुम अमर आत्मा हो ,हमें अपने आप अवस्थाओं के बाप ...


    धीरस्य तत्र न मोहती.... जो धीर है वह मोहित नहीं होता ...

    गड़ोदिया सेठ थे ,उनकी बैंक चलती थी गड़ोदिया बैंक..राजस्थान में,उसमें मेरे पिताजी का खाता था और मैं पैसे निकलवाने भी गया था गड़ोदिया से  मुझे पक्का याद है ...गया जी में गए , रात्रि को सोए तो एक सेठ  हीरालाल नाई सपने में दिखा, बोला सेठ जी आप अपने कुटुंब का श्राद्ध कराने आए हो ,मैं आपके गांव का हूं, मैं भटक रहा हूं ,अन्नदाता कुछ कीजिए  ...बोले अरे तू तो मोहन नाई  है रे इधर कैसे ..बोले मैं मर गया हूं ..

सेठ सपने से जागा ,सुबह को ब्राह्मणों को बुलाकर जो कुछ अपने पिंडदान करने थे किये लेकिन.....लेकिन  हमारे गांव का मोहन नाई उसके लिए भी हम पिंडदान करते हैं ..ऐसा भी किये...उसकी सद्गति के लिए प्रार्थना करके किए ,

...दूसरे दिन सेठ जी के सपने में फिर से नाई आया..बड़ा प्रसन्नचित ,सेठ जी आपने मेरी सद्गति कर दी ,इस पुण्य कर्म से आपका यश रहेगा, अब सेठ को पता ही नहीं कि बापु जी बोलेंगे और करोड़ों लोगों तक मेरा नाम जाएगा ,कईयों को पता नहीं गड़ोदिया भी कोई परिवार था गड़ोदिया भी कोई बैंक थी ....

...जय राम जी की ...

लेकिन मेरे को पूरा पक्का है रेवड़ी बाजार अहमदाबाद में गड़ोदिया ....


Contd..

शनिवार, 26 नवंबर 2022

Apne rakshak aap part1




अपने रक्षक आप ( भाग 1)

अपने रक्षक आप (part1)

(बापूजी के दुर्लभ सत्संग में से एक)

NOTES

राम हनुमान जी का पत्थर तारने का प्रसंग

राम न सके राम गुन गाही...

राम भगत जगत जन चार प्रकार सुकृतिनो अनघ उदार

 इंद्रिय को स्वभाव नीचे गिरना

 स्त्री आकर्षण प्रसंग हाथी, प्रसंग 

 गिदूमल जज प्रसंग

पाप आंख से घुसती है

धर्म को धंधा न बनाएं 

अपना मान नहीं ईश्वर और गुरु का मान है 

पादरी और मैनेजर और फिल्म प्रसंग

गुरु के हृदय से हटा दिया और क्या सजा दें 

स्त्री और पुरुष प्रसंग

साधन करे और गलती न करे तो उत्थान 

माली और बगीचा प्रसंग 

सच्चा मित्र वही जो मित्र की गलती को सामने से कह दे

अपने आप की कर्म करो गुरु ईश्वर अपने कर्म आप करेंगे

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पाप पहले आँख से घुसता है फ़िर वाणी से पुष्ट होता हैं, और बार देखने-बोलने से और बढ़ता जाता हैं। 

धर्म और ईश्वर के आड़ में धंधा करने वाले खुद बदनाम होते है और संस्था भी, ऐसे लोग ईश्वर के साथ धोखा होता है। 

पादरी के फिल्म देखने की गुजारिश पर डाइरेक्टर का मना करना, थियेटर में एक ही दरवाज़ा है, दुनिया की नज़र से बच जाते लेकिन ईश्वर की नज़र से नहीं। 

जिसके आचरण से गुरु को दुख हुआ वो गुरु के ह्रदय से निकल जाता है, उसके लिए यही सजा हो जाती हैं। 

स्त्री की ओर एक बार क्षमा, दूसरी बार देखा तो अपराध और तीसरी बार देखा तो सजा है। 

एक बार देखने से क्या बिगड़ता है, उनका बिगड़ता ऐसा है कि सुधारने वाले थक जाते है। 

साधन थोड़ा ही करें और गलती ना करें तो भी बच जाते हैं, साधन भी खूब करें और गलतिया भी नहीं छोड़े उनके जीवन में उन्नति नहीं। 

कितना भी शरीर को खिलाये लेकिन आकर्षण नहीं छोड़ा तो शरीर कमजोर होगा। 

जितना साधना ऊँची होती हैं उतना गिरने का ख़तरा ज्यादा होता हैं, लापरवाही नहीं करें। 

एक दूसरे की गलती को पोषण मत करो उन्हे बचाओ गिरने से, तो ही सच्चे हितैषी हैं। 

जितना चरित्र गिरने से खतरा होता है उतना स्वस्थ्य, धन गिरने से भी नही होगा। 

हमें जो करना चाहिए वो कर डाले, परमात्मा को जो करना है वो कर देता है।


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सोमवार, 10 अक्टूबर 2022

सहजावस्था

 




भारत वर्ष संतों की भूमि है | नजाने कितने अपने जीवन ज्योति को जलाकर भावी पीढ़ी के ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग प्रसस्त कर गये हैं | इन में से यह एक प्रसिद्द पंक्ति है की -

“अभी, यहाँ, इसी वक्त जो सुखी नहीं है वो कहीं जाकर, कुछ पा कर, कुछ बन कर सुखी नहीं हो सकता |”
     यह बात कुछ समझ नहीं आता  |  क्यूँ की अपने सारे जीवन करने, पाने, लेने,देने में ही बिता रहे  हैं इसलिए ये बात समझ में नहीं आता | हम सोचते हैं की कुछ करने से सुख मिलेगा | तो करने वालों को देखो क्या वो सुखी हैं ? कर कर के मर रहे हैं | तो क्या करें , कुछ न करें ? नहीं नहीं होनें दें | जैसे एक बालक के अनायास प्रयास होते हैं | भूख लगी है तो स्वास्थ्य अनुकूल  खा लें , नींद आये तो सो ले | परन्तु अगर हम ऐसा चाहिए वेसा चाहिए में लगे रहेंगे तो सुख दुःख में उलझे रहेंगे  सहज जीवन की अनुभूति से बंचित रह जायेंगे |

बस हर काम में अन्दर से सहज रहने की कोशिश करे फिर प्रत्येक काम में आनंद आने लगेगा! ध्यान का अभ्यास इसके लिए अच्छा उपाए है, जब भी समय मिले कुछ देर के लिए आँखे बंद कर आराम से बिना कोई कल्पना किये ध्यान में बैठ जाए !

   भीतर से ठहर जाना ही सहजता है, बाहर भले पूरी तरह व्यस्त हो लेकिन अन्दर से शांत रहे,  जब भीतर से शांत होंगे तो मुश्किल से मुश्किल काम भी आसानी से कर सकते है लेकिन यदि अन्दर से अशांत है तो आसान काम में भी मुश्किल खड़ी कर देते है !
तो सहज जीवन कैसे  जिए - हाँ ये तो काम की बात है | इसके लिए सबसे आसान तरीका ये है | जैसा बनना चाहते हैं उसका संग करें, संग से ही रंग लायेगा | सौभाग्य है की हमारे देश में ऐसे जीवन की एक बहुत बड़ी श्रुंखला है | भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर आदि आदि | चलो … आप सोचेंगे की हम इतने बड़े हो नहीं सकते हैं, तो फिर अभी के हि देख लेते हैं | रामकृष्ण, विवेकानन्द, कवीर, मीरा, ज्ञानेश्वर, नामदेव, रमण महर्षि और भी कितने नाम लें | इन के राह पर चलने वाले कई प्रसिद्द, अप्रसिद्ध जीवन अब भी जी रहे हैं | सहज जीवन की झलक तो उनके जीवन में मिलेगा ही मिलेगा | अगर इन के जीवन में दोष दिख रहा है  तो समझ लो हमारे दुःख के दीन अब गये नहीं | सहज जीवन के तो बात क्या क्या करें ?

सहज  हमारी स्वाभाविक अवस्था है ! लेकिन हम दिनभर अनेक ऐसी बेकार की बातों में उलझे रहते है जिनका हमारी ज़िन्दगी में  कोई मतलब नहीं |

उदहारण - उसका क्या हुआ , इसका क्या हुआ, नफा, नुकसान, दुनिया दारी के सुचना इकठ्ठा करते करते थक जाते हैं फुर्सत नहीं मिलती, तो सहजता कैसे मिलेगा ? तो फिर आप बोलोगे की स्मार्ट कैसे रहें, अपडेट कैसे रहें | हाँ - यही तो बात है , अब तो बताओ इसे आप को मिलता क्या है ? सुख ? कभी नहीं - आप को तो ये डायबेटिक्स, हाई बिपि, लो बिपि टेंशन और भी नजाने क्या क्या दे जाते हैं | और अंत में तो पूछो ही मत सब छोड़ कर जय राम जी की सब स्वाहा | कहाँ से आया था कहाँ गया कोई पता नहीं |
यदि सहजता जीवन में उतर जाए तो मन शांत रहेगा और हम जीवन को जी पायेंगे अन्यथा हम जीवन काटते है जीते नहीं !

तिनोगुणों की प्रभाब




भारत देश के ऋषियों ने जो अदभुत खोजें की हैं, वैसी खोजें विश्व में कहीं भी नहीं हुई हैं। मनुष्य का स्वभाव तीन गुणों के प्रभाव से संचालित होता है। उनमें से रजो-तमोगुण मनुष्य को अत्यंत दुःखद अनुभव करवाकर उसके वर्तमान जीवन को निकृष्ट बना देता है और फिर वृक्ष, पशु, पक्षी जैसी तुच्छ योनियों में ले जाता है। सत्त्वगुण वर्तमान जीवन को दिव्य बनाता है और स्वर्ग एवं ब्रह्मलोक आदि उच्च लोकों में पहुँचाता है। इसमें भी यदि ब्रह्मवेत्ताओं का प्रत्यक्ष सान्निध्य एवं सत्संग मिले तो तीनो गुणों से पार अपने असली आनंदधन आत्मा को जानकर जीव जीवन्मुक्त हो सकता है।
चलो, अब रजो-तमोगुण के कुप्रभाव एवं सत्त्वगुण के सुप्रभाव को निहारें।

तमोगुण

तमोगुणी मानव वर्ग आलसी-प्रमादी होकर, गंदे विषय-विकारों का मन में संग्रह करके बैठे-बैठे या सोते-सोते भी इन्द्रियभोग के स्वप्न देखता रहता है। यदि कभी कर्मपरायण हों तो भी यह वर्ग हिंसा, द्वेष, मोह जैसे देहधर्म के कर्म में ही प्रवृत्त रहकर बंधनों में बँधता जाता है। मलिन आहार, अशुद्ध विचार और दुष्ट आचार का सेवन करते-करते तमोगुणी मानव पुतले को आलसी-प्रमादी रहते हुए ही देहभोग की भूख मिटाने की जितनी आवश्यकता होती है उतना ही कर्मपरायण रहने का उसका मन होता है।

रजोगुण

रजोगुणी मनुष्य प्रमादी नहीं, प्रवृत्तिपरायण होता है। उसकी कर्मपरंपरा की पृष्ठभूमि में आंतरिक हेतु रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, दंभ आदि सब भरा हुआ होता है। सत्ताधिकार की तीव्र लालसा और देहरक्षा के ही कर्म-विकर्मों के कंटकवृक्ष उसकी मनोभूमि में उगकर फूलते-फलते हैं। उसके लोभ की सीमा बढ़-बढ़कर रक्त-संबंधियों तक पहुँचती हैं। कभी उससे आगे बढ़कर जहाँ मान मिलता हो, वाहवाही या धन्यवाद की वर्षा होती है, ऐसे प्रसंगों में वह थोड़ा खर्च कर लेता है। ऐसे रजोगुणी मनुष्य का मन भी बहिर्मुख ही कहलाता है। ऐसा मन बड़प्पन के पीछे पागल होता है। उसका मन विषय-विलास की वस्तुओं को एकत्रित करने में लिप्त होकर अर्थ-संचय एवं विषय-संचय करने के खेल ही खेलता रहता है।

सत्त्वगुण

इन दोनों ही वर्गों के मनुष्यों का मन स्वच्छंदी, स्वार्थी, सत्ताप्रिय, अर्थप्रिय और मान चाहने वाला होता है और कभी-कभार छल-प्रपंच के समक्ष उसके अनुसार टक्कर लेने में भी सक्षम होने की योग्यता रखता है। ऐसे मन की दिशा इन्द्रियों के प्रति, इन्द्रियों के विषयों के प्रति और विषय भोगों के प्रति निवृत्त न होने पर भोगप्राप्ति के नित्य नवीन कर्मों को करने की योजना में प्रवृत्त हो जाती है। ऐसा मन विचार करके बुद्धि को शुद्ध नहीं करता अपितु बुद्धि को रजोगुण से रँगकर, अपनी वासनानुसार उसकी स्वीकृति लेकर – ‘मैं जो करता हूँ वह ठीक ही करता हूँ‘ ऐसी दंभयुक्त मान्यता खड़ी कर देता है।

ऐसे आसुरी भाव से आक्रान्त लोगों का अनुकरण आप मत करना। राजसी व्यक्तियों के रजोगुण से अनेक प्रकार की वासनाएँ उत्पन्न होती हैं अतः हे भाई ! सावधान रहना। रजो-तमोगुण की प्रधानता से ही समस्त पाप पनपते हैं। जैसे हँसिया, चाकू, छुरी, तलवार आदि भिन्न-भिन्न होते हुए भी उनकी धातु लोहा एक ही है ऐसे ही पाप के नाम भिन्न-भिन्न होने पर भी पाप की जड़ रजो-तमोगुण ही है।
संसार में बहुमत ऐसे वर्ग का ही है। ऐसा वर्ग प्रवृत्तिपरायण कहलाता है। इसके कर्म में मोक्षबुद्धि नहीं होती। अतः यदि इस वर्ग को स्वतंत्र रूप से व्यवहार करने दें तो समाज में ऐसी अव्यवस्था उठ खड़ी होती है जिसके फलस्वरूप सर्वत्र स्वार्थ और दंभरूपी बादल छा जाते हैं, कपट एवं प्रपंच की आँधी चलने लगती है तथा सर्वत्र दुःख और विपत्तियों के प्रहार होने से प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार उठती है। ये दो वर्ग ही यदि परस्पर टकराने लगे तो हिंसा, द्वेष, स्वार्थ और भोगबुद्धि के कर्मों में ही प्रजा लिप्त रहने लगती है और युद्ध की नौबत आ जाती है। प्रत्येक युग एवं प्रत्येक देश में ऐसे ही संहार होता रहता है।
यह उन्नति का मार्ग नहीं है। अवनति की ओर जाते मानव के लिए आत्मोन्नति के आनंद की ओर चलने के लिए बुद्धि के शोधन की, उसकी विचार शक्ति में विवेक के सूर्य का उदय करने की आवश्यकता है। मन एवं इन्द्रियों को विषयों के स्मरण, चिन्तन, प्राप्ति एवं भोग की जन्म-जन्मांतरों की जो आदत पड़ी हुई है, उनमें असारता का दर्शन होने पर मन उनसे विमुख होता है तब बुद्धि को अपने से भी परे आत्मा की ओर अभिमुख होने की रूचि एवं जिज्ञासा होती है, आत्सरस पीने का सौभाग्य प्राप्त होता है, संसार की मायाजाल से बचने का बल मिलता है।
जब बुद्धि को आत्मनिरीक्षण के लिए विचार करने की भोगमुक्त दशा प्राप्त होती है तब वह प्रत्येक कर्म में विवेक का उपयोग करती है। उस वक्त उसके अन्तःकरण में आत्मा का कुछ प्रकाश पड़ता है, जिससे विषयों का अंधकार कुछ अंश में क्षीण होता है। यह है नीचे से ऊपर जाने वाला तीसरा, आंतर में से प्रकट होने वाला स्वयंभू सुख की लालसावाला, बुद्धि के स्वयं के प्रकाश का भोक्ता – सत्त्वगुण। इस सत्त्वगुण की प्रकाशमय स्थिति के कारण बुद्धि का शोधन होता है। कर्म-अकर्म, धर्म अधर्म, नीति-अनीति, सार-असार, नित्य-अनित्य वगैरह को समझकर अलग करने एवं धर्म, नीति, सदाचार तथा नित्य वस्तु के प्रति चित्त की सहज स्वाभाविक अभिरूचि करने की शक्ति इसी से संप्राप्त होती है।
एक ओर मानवीय जीवन के आंतर प्रदेश में आत्मा (आनंदमय कोष) एवं बुद्धि (विज्ञानमय कोष) है तो दूसरी ओर प्राण (प्राणमय कोष) तथा शरीर (अन्नमय कोष) है। इन दोनों के बीच मन (मनोमय कोष) है। वह जब बहिर्मुख बनता है तब प्राण तथा शरीर द्वारा इन्द्रियाँ विषय-भोगों में लिप्त होकर वैसे ही धर्म-कर्म में प्रवृत्त रहती हैं। यही है मानवीय जीवन की तामसिक एवं राजसिक अवस्था की चक्राकार गति।
परंतु उसी मन (मनोमय कोष) को ऊर्ध्वमुख, अंतर्मुख अथवा आत्माभिमुख करना – यही है मानव जीवन का परम कल्याणकारी लक्ष्य। ऋषियों में परम आनंदमय आत्मा को ही लक्ष्य माना है क्योंकि मनुष्य के जीवनकाल की मीमांसाकरने पर यह बात स्पष्ट होती है कि उसकी सब भाग दौड़ होती है सुख के लिए, नित्य सुख के लिए। नित्य एवं निरावधि सुख की निरंतर आकांक्षा होने के बावजूद भी वह रजो-तमोगुण एवं इन्द्रियलोलुपता के अधीन होकर हमेशा बहिर्मुख ही रहता है। उसकी समस्त क्रियाएँ विषयप्राप्ति के लिए ही होती हैं। उसकी जीवन-संपदा, शारीरिक बल, संकल्पशक्ति आदि का जो भी उसका सर्वस्व माना जाता है वह सब जन्म मृत्यु के बीच में ही व्यर्थ नष्ट हो जाता है।
परंतु उसी मन(अंतःकरण) पर यदि सत्त्वगुण का प्रकाश पड़े तो उसे स्वधर्म-स्वर्म की, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की सूक्ष्म छानबीन करने का सूझता है। सुख-दुःख के द्वन्द्व में उसे नित्य सुख की दिशा सूझती है। दुराचार के तूफानी भँवर में से उसे शांत, गंभीर सत्त्वगुणी गंगा के प्रवाह में अवगाहन करने की समझ आने लगती है। विचार-सदविचार की कुशलता आती है। विचार, इच्छा, कर्म आदि में शुभ को पहचानने की सूझबूझ बढ़ती है। जिससे शुभेच्छा, शुभ विचार एवं शुभकर्म होने लगते हैं।
जन्म मरण जैसे द्वन्द्वों के स्वरूप अर्थात् संसार-चक्र एवं कर्म के रहस्य को समझाते हुए एवं उसी को अशुभ बताते हुए गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।
तरो कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।
‘वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभांति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात् कर्मबन्धन से मुक्त हो जाएगा।’
(गीताः 4.16)
धर्म के, पुण्य के नाम अलग-अलग हैं किन्तु उनका मूल है सत्त्व। सत्त्वगुणरूपी जड़ का सिंचन होने से जो विशाल वृक्ष होता है उसमें मीठे फल लगते हैं। वे ही फल आंतरिक सुख, स्वतंत्र सुख, मुक्तिदायी सुख का मार्ग खोल देते हैं। यह जीव गुणों के थपेड़े से बचकर ही अपने गुणातीत स्वरूप में स्थिर हो सकता है एवं आत्म-साक्षात्कार कर सकता है। जिसके ध्यान से ब्रह्माजी, भगवान विष्णु एवं साम्बसदाशिव भी सामर्थ्य एवं अनोखा आनंद पाते हैं उसी चैतन्यस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिए आपका जन्म हुआ है इसका निरंतर स्मरण रखना।
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रविवार, 9 अक्टूबर 2022

सब लोग किस को चाहते है?





जो व्यक्ति अच्छा व्यवहार करता है, ईमानदार है, सच्चा है तो उसे सब पसंद करते हैं । उसके पास बैठने में, उससे बात करने में हमें आनंद मिलता है । नम्रता, सहनशीलता, साहस, कार्य में लगन, आत्मविश्वास, विश्वासपात्रता, दयालुता, ईमानदारी, दृढ़ निश्चय, तत्परता, सत्यनिष्ठा इत्यादि अनेक उत्तम गुण हैं, जिनके मेल से मनुष्य का चरित्र बनता है । चरित्र का धन कोई साधारण धन नहीं है । इनमें से कुछ गुणों को भी पूरी तरह धारण करने से मनुष्य का जीवन सफल हो जाता है ।
चरित्र-निर्माण कब और कैसे ?
चरित्र-निर्माण का सबसे अच्छा समय है बचपन । उस समय अच्छी आदतें सीखना आसान होता है । ये आदतें जीवनभर काम आती हैं । बालकों को जो बातें बतायी या सिखायी जाती हैं, वे उनके मन पर पक्की हो जाती हैं । गुरुजनों का, सद्गुरु का सम्मान करने से और उनकी आज्ञा मानने से विद्या प्राप्त होती है । अर्जुन ने इसी प्रकार गुरु से धनुर्विद्या प्राप्त की थी । भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने गुरु वसिष्ठजी के आज्ञापालन से ही आत्मविद्या पायी थी ।
मनुष्य के जीवन की नींव है चरित्र । शब्दों में नहीं बल्कि व्यवहार में प्रकट होते हैं चरित्र के गुण । दिखावट-बनावट से मनुष्य कुछ समय के लिए भले ही किसीको धोखे में रख ले परंतु ज्यादा समय तक धोखे में नहीं रख सकता । लोग चरित्रवान व्यक्ति की बात का विश्वास करते हैं । उसे उपयोगी तथा हितकारी मानते हैं । चरित्रवान दूसरों को धोखा नहीं देता, किसीको नीचे गिराने की कोशिश नहीं करता । वह ऐसी बात का प्रण नहीं करता, जिसे वह पूरा न कर सके ।
उत्तम चरित्र क्या है ?
सच्चरित्रवान बनने के लिए मन, वाणी तथा शरीर से किसीको कष्ट मत दो । सच बात को भी प्रिय शब्दों में कहो । किसीकी चीज न चुराओ, निंदा न करो । मान की लालसा मत करो । स्नान से शरीर की तथा ईर्ष्या-द्वेष, वैर-विरोध छोड़ने से मन की शुद्धि होती है । सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख सहते हुए अपने कर्तव्य को करो । सत्साहित्य का अध्ययन करते रहो । इन्द्रियों और मन को वश में रखकर अपने स्वभाव को सरल बनाओ । दुःखियों की सेवा करो । पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘परमात्मा से दूर ले जानेवाली जो दुष्ट वासनाएँ हैं, वे सब दुश्चरित्र हैं । जब हम दुश्चरित्रों से दूर होते हैं तो हम सच्चरित्र होते हैं । सच्चरित्रता से पुण्य होते हैं और पुण्य से हमको सत्संग, संत के दर्शन और परमात्मा में रुचि होती है ।
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता ।’’ (संत तुलसीदासजी)
चरित्रवान के लक्षण 
चरित्रवान मनुष्य बहुत अधिक चतुर बनने का प्रयत्न नहीं करता । सीधा-सच्चा व्यक्ति लोगों को अधिक प्रिय होता है । चरित्रवान अपने कार्यों की बड़ाई करके दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयत्न नहीं करता । वह धैर्यवान तथा सहनशील होता है । वह दूसरों के मत को ध्यान एवं धैर्य से सुनता है । चाहे उसे दूसरे का मत ठीक न लगता हो फिर भी सुनने का धैर्य उसमें होता है । यदि वह किसीको उसकी भूल बताता है तो बड़ी नरमी से, तरीके से और उसके सुधार के लिए बताता है । चरित्रवान किसीका उत्साह भंग नहीं करता, वह किसीका दिल नहीं तोड़ता, वह सभीको नेक काम करने की सलाह देता है एवं उत्साहित करता है । वह स्वयं भी हिम्मत नहीं हारता । चरित्रवान मनुष्य सुख और दुःख में सम रहता है । विपत्ति के समय में वह सगे-संबंधियों या मित्रों को धोखा नहीं देता । ऐसी ही मित्रता श्रीकृष्ण ने सुदामा के प्रति निभायी थी । मित्रता निभाना भी सच्चरित्रता की निशानी है ।
चरित्र : मानव की एक श्रेष्ठ सम्पत्ति 
जो अपना कल्याण चाहता है उसे चरित्रवान बनना चाहिए । यदि हम चरित्रवान हैं, सत्कृत्य करते हैं तो हमारी बुद्धि सही निर्णय लेती है, हमें सन्मार्ग पर प्रेरित करती है । सन्मार्ग पर चलकर हम परमात्मप्राप्ति के लक्ष्य को आसानी से पा सकते हैं ।
चरित्र मानव की श्रेष्ठ सम्पत्ति है, दुनिया की समस्त सम्पदाओं में महान सम्पदा है । मानव-शरीर के पंचभूतों में विलीन होने के बाद भी जिसका अस्तित्व बना रहता है, वह है उसका चरित्र । चरित्रवान व्यक्ति ही समाज, राष्ट्र व विश्व-समुदाय का सही नेतृत्व और मार्गदर्शन कर सकता है । अपने सच्चारित्र्य व सत्कर्मों से ही मानव चिरआदरणीय हो जाता है । जब हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य सत्स्वरूप ईश्वर होता है तो सच्चरित्रता में हम दृढ़ होते जाते हैं । सच्चरित्रवान बनने के लिए अपना आदर्श ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों को बनाना चाहिए ।
जिसके पास सच्चरित्र नहीं है वह बाहर से भले बड़ा आदमी कहा जाय परंतु उसे अंदर की शांति नहीं मिलेगी एवं उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं होगा । जिसके पास धन, सत्ता कम है परंतु सच्चारित्र्य-बल है, उसे अभी चाहे कोई जानता, पहचानता या मानता न हो परंतु उसके हृदय में जो शांति रहेगी, आनंद रहेगा, ज्ञान रहेगा वह अद्भुत होगा और उसका भविष्य परब्रह्म-परमात्मा के साक्षात्कार से उज्ज्वल होगा ।
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शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

ज्ञान की सप्त भूमिकाएं

 




१ शुभेच्छा,

२ विचारना,

३ तनुमानसा,

४ सत्वापत्ति,

५ असंसक्ति,

६ पदार्थाभावनी

७ तुरीया


                        जो इनके। सार को प्राप्त हुआ वो फिर शोक नहीं करता। अब इसका अर्थ सुनो।

  •  जिसको यह विचार फुर आवे कि मैं महामूढ हूँ, मेरी बुद्धि सत्य में नहीं है संसार की ओर लगी है और ऐसे विचार के वैराग्य-पूर्ण सत्शास्त्र और सन्त जनों की सङ्गति की इच्छा करे तो इसका नाम शुभेच्छा है।

  •  सत्शास्त्रों को विचारना सन्तों की सङ्गति, विषयों से वैराग्य और सत्य मार्ग का अभ्यास करना, इनके सहित सत्य आचार में प्रवर्तना और सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जानकर त्याग करना इसका नाम विचारना है।

  •  विचार और शुभेच्छा सहित तत्त्व का अभ्यास करना और इन्द्रियों के विषयों से वैगग्य करना यह तीसरी भूमिका तनुमानसा है।

  •  इन तीन भूमिकों का अभ्यास करना, इन्द्रियों के विषय और जगत् से वैराग करना और श्रवण, मनन और निदिध्यासन से सत्य आत्मा में स्थित होनेका नाम सत्वापत्ति है।

  •  इससे सत्य आत्मा का अभ्यास होता है। ये चार भूमिका संयम का फल जो शुद्ध विभूति है उसमें प्रसंसक्त रहने का नाम असंसक्ति है। 

  • दृश्य का विस्मरण और भीतर से बाहर नाना प्रकार के पदार्थों के तुच्छ भासने का नाम पदार्थाभावनी है, यह छठी भूमिका है। 

  • हे रामचन्द्र! चिरपर्यन्त छठी भूमिका के अभ्यास के भेद कलना का अभाव हो जाता है और स्वरूप में दृढ़ परिणाम होता है। छः भूमिका जहाँ एकता को प्राप्त हों उसका नाम तुरीया है। 

  • यह जीवन्मुक्त की अवस्था है। जीवन्मुक्त तुरीयापद में स्थित है। 

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  • तीन भूमिका जगत् की जाग्रत अवस्था में हैं, 

  • चौथी तत्त्वज्ञानी की है;

  •  पाँची और छठी जीवन्मुक्त की अवस्था हैं 

  • और तुरीयातीतपद में विदेहमुक्त स्थित होता है।

  •  हे रामचन्द्र! जो पुरुष महाभाग्यवान है वह सप्तम भूमिका में स्थित होता है और वही आत्मारामी महापुरुष परमपद को प्राप्त होता है।

  •  हे रामचन्द्र! जो जीवन्मुक्त पुरुष हैं वे सुख-दुःख में मग्न नहीं होते और शान्तरूप होके अपने प्रकृत प्राचार को करते हैं, अथवा नहीं करते


श्रोत - श्री योग वाशिष्ठ महारामायण

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मंगलवार, 6 सितंबर 2022

दिव्य श्रद्धा (Divya Shraddha )


        (ईश्वर को जो लोग बहुत जल्दी प्राप्त करना चाहते हैं, उन लोगो के लिए यह सत्संग बहुत आवश्यक हैं। यह सत्संग मानो एक mile stone है, एक पाठ्यक्रम सूची है, एक syllabus है। इसको आत्मसात करने हेतु तीव्र जिज्ञासा चाहिए।)

    साधन बढ़ने से शरीर में विद्युत का प्रमाण बढ़ता है ,शरीर तब तक भारी रहता है जब तक उसमें कफ और वायु की विपुलता रहती है ,कफ और वायु अधिक होता  है तो शरीर आलसी और भारी रहता है ,शरीर भारी तब तक रहता है जब तक कफ और वायु का प्रमाण अधिक है ...वात प्रकृति और कफ प्रकृति ।

    आसन स्थिर करने से ,एक ही आसन पर बैठने से शरीर में विद्युत प्रगट होती है जो कफ और वायु  को कंट्रोल करके शरीर को आरोग्यता देती है, शरीर में बिजली पैदा होती है वह आरोग्यता की रक्षा करती है,शरीर हल्का लगता है फुर्ती वाला लगता है ..
क्रीया करने से विद्युत खर्च होती है ,स्थिर आसन में बैठकर धारण करने से, ध्यान करने से विद्युत बढ़ती है ,बिजली बढ़ती है ...
विद्युत तत्व बढ़ने से शरीर निरोग रहता है मन स्फूर्ति  में रहता है ....
      

        संसार से वैराग्य होना कठिन है ,वैराग्य हो भी जाए तो कर्मकांड से मन उठना कठिन है ,कर्मकांड से उठ भी गए तो ध्यान में लगना मन का कठिन है ,ध्यान में लग गए तो तत्व ज्ञानी गुरु का मिलना कठिन है ,तत्व ज्ञानी गुरु मिल भी गए तो उनमें श्रद्धा होना कठिन है ,श्रद्धा हो भी  गई तो टिकना कठिन है ...क्यूँ की ?.....
        तामशी श्रद्धा होती है तो कदम कदम पर फरियाद करती है ,तामसी श्रद्धा में समर्पण नहीं होता है ,भ्रांति होती है समर्पण की ,तामसी श्रद्धा विरोध करती है ,राजसी श्रद्धा हिलती  रहती है और भाग जाती है ,किनारे लग जाती है ..और  सात्विक श्रद्धा होती है तो चाहे गुरु के तरफ से कैसी भी कसौटी हो ,किसी भी प्रकार की परीक्षा हो सात्विक भाव वाला  धन्यवाद से भर कर अहोभाव से भर कर स्वीकृति दे देगा ..
संसार से वैराग्य होना कठिन ,वैराग्य हो गया तो कर्मकांड छूटना कठीन,कर्मकांड छूट भी गया तो उपासना में मन लगना कठीन,उपासना में मन लग भी गया तो तत्व ज्ञानी ब्रह्म ज्ञानी गुरुओं का मिलना कठिन ,तत्व ज्ञानी गुरुओं का मिलना भी हो गया तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन ,क्योंकि प्राय: तामसी और राजसी श्रद्धा  वाले लोग बहुत होते हैं,तामसी श्रद्धा कदम कदम पर इंकार करेगी विरोध करेगी ,अपना अहम नहीं छोड़ेगी..
और श्रद्धेय के साथ ईष्ट के साथ गुरु के साथ विरोध करेगी तामसी श्रद्धा होगी तो ,राजसी श्रद्धा होगी तो जरा सी परीक्षा हुई तो राजसी श्रद्धा वाला किनारे हो जाएगा, भाग जाएगा ..
सात्विक श्रद्धा होगी तो श्रद्धेय की तरफ से हमारे उत्थान के लिए चाहे जो भी कसौटी हो चाहे कैसे भी साधन भजन के पद्धतियां हों, प्रयोग हो ,ब्यवहार हो  अगर सात्विक श्रद्धा है तो वह तत्ववेत्ता गुरुओं की तरफ से मिलने वाली तमाम साधना पद्धति अथवा विचार, व्यवहार जो भी है ..वो अहोभाव से वाह वाह, धन्यवाद ..उसे फरियाद नहीं होगी, उसे प्रतिक्रिया नहीं होगी ..
           सात्विक श्रद्धा हो गया तो फिर तत्व विचार में मन लग जाता है ,नहीं तो तत्व ज्ञानी गुरु मिलने के बाद भी तत्व ज्ञान  में मन लगना कठिन है ..
        आत्मसाक्षात्कारी गुरु मिल जाए ,और उसमें श्रद्धा हो जाए तो भी यह जरूरी नहीं कि सब लोग आत्मज्ञान के तरफ चल पड़े ...नहीं ,तामसी श्रद्धा वाला राजसी श्रद्धा वाला आत्मज्ञान के तरफ नहीं चल सकता ,वह तत्व ज्ञानी गुरुओं का सानिध्य पाकर अपनी इच्छा के अनुसार फायदा लेना चाहेगा ,लेकिन जो वास्तविक फायदा है ,जो तत्व ज्ञानी गुरु देना चाहते हैं उससे वह वंचित रह जाएगा ,सात्विक श्रद्धा वाला होता है वही तत्वज्ञान का अधिकारी माना जाता है ,वही तत्वज्ञान पर्यंत गुरु में अडीग श्रद्धा जैसे सांदीपक की थी ,भगवान विष्णु आए वरदान देने के लिए ..नहीं लिया ,भगवान शिव आए ..वरदान नहीं लिया ..
गुरु ने कोढी़ का रूप ले लिया, बुरी तरह परीक्षाएं ली ..पीट देते थे ,चांटा मार देते थे ..फिर भी वह गुरु के शरीर से निकलने वाला गंदा खून ,कोढ़ की बीमारी से आने वाली बदबू ,मवाद ..फिर भी सांदीपक का चित्त कभी उबता नहीं था ..
            ऐसे ही स्वामी विवेकानंद की रामकृष्ण देव में सात्विक श्रद्धा थी तो रामकृष्ण देव में अहोभाव बना रहता, और जब राजासी श्रद्धा हो जाती तो कभी हील जाती  ..ऐसे छह बार नरेंद्र की श्रद्धा हीली थी ..
            आत्म ज्ञानी गुरु मिलना कठिन है ,गुरु मिल जाए तो उनमें श्रद्धा टिकना सतत कठिन है क्योंकि श्रद्धा राजसी और तमाशी गुण से प्रभावित हो जाती है तो हिलती जाती है या विरोध कर लेती है ,इसलिए जीवन में सत्व गुण बढ़ाना चाहिए आहार की शुद्धी से, चिंतन की शुद्धि से सत्वगुण की रक्षा की जाती है ...
        अशुद्ध आहार ,अशुद्ध विचारों वाले व्यक्तियों का संग....लापरवाही रखने से श्रद्धा का घटना ,बढ़ना ,टूटना ,फुटना होता रहता है ,इसलिए साधक साध्य तक पहुंचने में उसे वर्षों गुजर जाते हैं..
कभी-कभी तो पूरा जन्म गुजर जाता है फिर भी साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं ,हकीकत में छह महीना अगर ठीक से साधना की जाए ,खाली 6 महीना ... 6 महीना अगर ठीक से साधना की जाए तो संसार की वस्तुएं और संसार आकर्षित होने लगता है ,सूक्ष्म जगत की कुंजियां हाथ में आने लगती हैं  ..6 महीना अगर सात्विक श्रद्धा से ठीक से साधन किया जाए,तो बहुत आदमी ऊंचे उठ जाता है ,रजोगुण तमोगुण से बचकर जब सतोगुण बढ़ता है तब तत्वज्ञानी गुरुओं के ज्ञान में  आदमी प्रविष्ट होता है ,तत्वज्ञान का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं रहती ..
अभ्यास तो भजन करने का है, श्रद्धा को सात्विक बनाने का है ..
        अभ्यास ,भजन का अभ्यास बढ़ने से ,सत्व गुण बढ़ने से विचार अपने आप उत्पन्न होता है ,महाराज ....ऐसा विचार उत्पन्न करने के लिए भी साधन भजन में सातत्य होना चाहिए और श्रद्धा की सुरक्षा में सतर्क होना चाहिए ..ईष्ट में ,भगवान में ,गुरु में श्रद्धा होनी चाहिए ।
        श्रद्धा हो गई तो तत्वज्ञान में गति होने में ,तत्वज्ञान तो कईयों को मिल जाता है लेकिन उस तत्वज्ञान में स्थिति नहीं करते ,और स्थिति  करते हैं तो ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न करने की खबर हम नहीं रख पाते ,ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न हो जाए तो साक्षात्कार होता है ।
        साक्षात्कार करने के बाद भी अगर उपासना तगड़ी नहीं किया और गुरु कृपा से हो गया साक्षात्कार तभी भी विक्षेप रहेगा ,मनोराज आने की संभावना है ,इसलिए साक्षात्कार के बाद भी ब्रह्म अभ्यास करने में लगे रहते हैं बुद्धिमान उच्च कोटि के साधक ।
        साक्षात्कार करने के बाद भी भजन में ,ब्रह्म अभ्यास में अथवा ब्रह्मानंद में लगे रहना ..यह  साक्षात्कारी की शोभा है ....
            जिन महापुरुषों को परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है ,वे भी ध्यान भजन में और शुद्धि में ध्यान रखते है, तो हम लापरवाही करते है तो अपनी पुण्यों की कब्र ही खोद दी  ..
            जीवन में जितना उत्साह होगा सतर्कता होंगी और जीवन दाता का मूल्य समझेंगे उतना यात्रा उच्च कोटि की होगी ..
            ब्रह्माकार वृत्ती होना होना यह भी ईश्वर की कृपा है
            सात्विक श्रद्धा होगी तब आदमी ईमानदारी से अपने अहम  को परमात्मा में अर्पित होगा ...
            तुलसीदास जी ने कहा ..यह फल साधन ते ना होइ....
            यह जो ब्रह्म ज्ञान का फल है,वो साधन से प्रकट नहीं होगा..साधन करते-करते सात्विक श्रद्धा तैयार होती है और सात्विक श्रद्धा ही अपने तत्व में ,ईष्ट में अपने आप को अर्पित करने को तैयार हो जाती है ,जैसे लोहा अग्नि की वाहवाही तो करें ,अग्नि के बखान तो करें, अग्नि को नमस्कार तो करे लेकिन तब तक लोहा अग्निमय  नहीं होता जब तक लोहा अपने आप को अग्नि में अर्पित नहीं कर देता ,लोहा अग्नि के भट्टे में अर्पित होते ही उसके रग रग मे अग्नि प्रविष्ट हो जाती है वह लोहा अग्नि का ही एक पुंज दिखता है.... ऐसे ही उस ब्रह्म स्वरूप में जिव अपने आपको जब तक अर्पित नहीं करता है तब तक भले भगवान के गीत गाए जाए ,गुरु के गीत गाए जाए..लाभ तो होगा लेकिन गुरुमय ,भगवतमय तब तक नहीं होगा जब तक अपने मैं को ईश्वर में, गुरु में अर्पित नहीं कर देता ..
..              ईश्वर और गुरू शब्द दो हैं बाकी एक ही तत्व होता है...मूर्ति से दो दिखते हैं ,मूर्तियां अलग-अलग है ,आकृति अलग अलग दिखती है बाकी ईश्वर और गुरु एक ही चीज है ,गुरु के ह्रदय में जो चैतन्य है ..चमका है ,वही ईश्वर के ह्रदय में प्रकट हुआ है ...
ईश्वर भी अगर परम कल्याण करना  चाहते हैं तो गुरु का रूप लेकर,उपदेशक का रूप लेकर भगवान कल्याण करेंगे ...परम कल्याण |
        संसार का आशीर्वाद तो भगवान ऐसे ही दे देंगे ,लेकिन जब साक्षात्कार करवाना होगा तो भगवान को भी आचार्य की गद्दी पर बैठना पड़ेगा ,आचार्य पद के ढंग से उपदेश देंगे भगवान जैसे श्री कृष्णा ने अर्जुन को उपदेश दिया ,श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया ...
            ..साधक भजन करते हैं ,भजन की तीव्रता से भाव मजबूत हो जाता है और भाव के बल से अपने भाव के अनुसार संसार में चमत्कार भी कर लेता है ,भाव की दृढता से..भाव पराकाष्ठा नहीं है ,भाव बदलते रहते हैं ..
..पराकाष्ठा है ब्रह्माकार वृत्ती को उत्पन्न कर के साक्षात्कार करना तो साधन भजन में उत्साह और जगत में नश्वर बुद्धि और ऊंचे लक्ष्य की  हमेशा स्मृति ..यह साधक को महान बना देगा ....
            ..अगर ऊंचे लक्ष्य का पता ही नहीं ,आत्म साक्षात्कार के लक्ष्य का पता ही नहीं ,ब्रह्माकार  वृत्ती  उत्पन्न कर के आवरण भंग करना और साक्षात्कार करके जीवन मुक्त होने का अगर जीवन में लक्ष्य नहीं है तो छोटी मोटी साधना में छोटी मोटी पद्धतियों में आदमी रुका ही रहेगा कोल्हू के बैल जैसा वही जिंदगी पूरी कर देगा ....
            ..मैंने अर्ज किया था न,- " कि संसार से वैराग्य होना कठिन है वैराग्य हुआ तो  फिर कर्मकांड से मन उठना कठिन है ,कर्मकांड से मन उठ गया तो उपासना में लगना कठिन है ,उपासना  में लग गया तभी भी  तत्वज्ञानी गुरुओं को खोजना कठिन है ,तत्वज्ञानी गुरु का मिलाप भी हो गया तो उन्हें श्रद्धा टिकना कठिन है,उनमें  श्रद्धा हो भी गई ..श्रद्धा तो हो जाती है ,लेकिन टिकी रहे ये बड़ा कठिन है और श्रद्धा टिकाई तभी भी तत्वज्ञान की और प्रीति होना कठिन है ,तत्वज्ञान हो गया तो उसमें स्थिति होना कठिन है स्थिति हो भी गई तो ब्रह्माकार वृत्ति करके आवरण भंग करके जीवनमुक्त पद पर पहुंचना परम पुरुषार्थ है" ,अगर सावधानी से 6 महीने तक आदमी ठीक ढंग से उपासना करे ठीक ढंग से तत्वज्ञानी गुरुओं के ज्ञान को विचारे तो उसके मन का संकल्प विकल्प कम होने लगता है संसार का आकर्षण कम होने लगता है और उसके चित्च में विश्रांति आने लगती है ,उससे संसार की सफलताएं आकर्षित होने लगती हैं, संसार आकर्षित होने लगता है ...
              संसार माना क्या जो सरकने वाली चीजें हैं ..इस संसार की जो भी चीजें हैं वह सरकने वाली हैं ..वे उस साधक से आकर्षित होने लगती हैं ,फिर उसे रोजी रोटी ,ये वो ...कुटुंब ,संबंधी समाज के लोगों को रिझाने के लिए नाक रगड़ना नहीं पड़ेगा वे लोग तो ऐसे ही रिझने को तैयार हो जाएंगे..खाली छह महीना ठीक ढंग से साधन मैं लगे तो सारी जिंदगी की मजदूरी से जो नहीं पाया वह 6 महीने में तो पाएगा लेकिन साधक के लिए वह भी तो तुत्छ हो जाता है ..उसका लक्ष्य ऊंचे में ऊंचा है आत्म साक्षात्कार |