शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

ज्ञान की सप्त भूमिकाएं

 




१ शुभेच्छा,

२ विचारना,

३ तनुमानसा,

४ सत्वापत्ति,

५ असंसक्ति,

६ पदार्थाभावनी

७ तुरीया


                        जो इनके। सार को प्राप्त हुआ वो फिर शोक नहीं करता। अब इसका अर्थ सुनो।

  •  जिसको यह विचार फुर आवे कि मैं महामूढ हूँ, मेरी बुद्धि सत्य में नहीं है संसार की ओर लगी है और ऐसे विचार के वैराग्य-पूर्ण सत्शास्त्र और सन्त जनों की सङ्गति की इच्छा करे तो इसका नाम शुभेच्छा है।

  •  सत्शास्त्रों को विचारना सन्तों की सङ्गति, विषयों से वैराग्य और सत्य मार्ग का अभ्यास करना, इनके सहित सत्य आचार में प्रवर्तना और सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जानकर त्याग करना इसका नाम विचारना है।

  •  विचार और शुभेच्छा सहित तत्त्व का अभ्यास करना और इन्द्रियों के विषयों से वैगग्य करना यह तीसरी भूमिका तनुमानसा है।

  •  इन तीन भूमिकों का अभ्यास करना, इन्द्रियों के विषय और जगत् से वैराग करना और श्रवण, मनन और निदिध्यासन से सत्य आत्मा में स्थित होनेका नाम सत्वापत्ति है।

  •  इससे सत्य आत्मा का अभ्यास होता है। ये चार भूमिका संयम का फल जो शुद्ध विभूति है उसमें प्रसंसक्त रहने का नाम असंसक्ति है। 

  • दृश्य का विस्मरण और भीतर से बाहर नाना प्रकार के पदार्थों के तुच्छ भासने का नाम पदार्थाभावनी है, यह छठी भूमिका है। 

  • हे रामचन्द्र! चिरपर्यन्त छठी भूमिका के अभ्यास के भेद कलना का अभाव हो जाता है और स्वरूप में दृढ़ परिणाम होता है। छः भूमिका जहाँ एकता को प्राप्त हों उसका नाम तुरीया है। 

  • यह जीवन्मुक्त की अवस्था है। जीवन्मुक्त तुरीयापद में स्थित है। 

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  • तीन भूमिका जगत् की जाग्रत अवस्था में हैं, 

  • चौथी तत्त्वज्ञानी की है;

  •  पाँची और छठी जीवन्मुक्त की अवस्था हैं 

  • और तुरीयातीतपद में विदेहमुक्त स्थित होता है।

  •  हे रामचन्द्र! जो पुरुष महाभाग्यवान है वह सप्तम भूमिका में स्थित होता है और वही आत्मारामी महापुरुष परमपद को प्राप्त होता है।

  •  हे रामचन्द्र! जो जीवन्मुक्त पुरुष हैं वे सुख-दुःख में मग्न नहीं होते और शान्तरूप होके अपने प्रकृत प्राचार को करते हैं, अथवा नहीं करते


श्रोत - श्री योग वाशिष्ठ महारामायण

.......................................... अधिक सविस्तार अध्ययन हेतु इस लिंक पर जाएँ |






मंगलवार, 6 सितंबर 2022

दिव्य श्रद्धा (Divya Shraddha )


        (ईश्वर को जो लोग बहुत जल्दी प्राप्त करना चाहते हैं, उन लोगो के लिए यह सत्संग बहुत आवश्यक हैं। यह सत्संग मानो एक mile stone है, एक पाठ्यक्रम सूची है, एक syllabus है। इसको आत्मसात करने हेतु तीव्र जिज्ञासा चाहिए।)

    साधन बढ़ने से शरीर में विद्युत का प्रमाण बढ़ता है ,शरीर तब तक भारी रहता है जब तक उसमें कफ और वायु की विपुलता रहती है ,कफ और वायु अधिक होता  है तो शरीर आलसी और भारी रहता है ,शरीर भारी तब तक रहता है जब तक कफ और वायु का प्रमाण अधिक है ...वात प्रकृति और कफ प्रकृति ।

    आसन स्थिर करने से ,एक ही आसन पर बैठने से शरीर में विद्युत प्रगट होती है जो कफ और वायु  को कंट्रोल करके शरीर को आरोग्यता देती है, शरीर में बिजली पैदा होती है वह आरोग्यता की रक्षा करती है,शरीर हल्का लगता है फुर्ती वाला लगता है ..
क्रीया करने से विद्युत खर्च होती है ,स्थिर आसन में बैठकर धारण करने से, ध्यान करने से विद्युत बढ़ती है ,बिजली बढ़ती है ...
विद्युत तत्व बढ़ने से शरीर निरोग रहता है मन स्फूर्ति  में रहता है ....
      

        संसार से वैराग्य होना कठिन है ,वैराग्य हो भी जाए तो कर्मकांड से मन उठना कठिन है ,कर्मकांड से उठ भी गए तो ध्यान में लगना मन का कठिन है ,ध्यान में लग गए तो तत्व ज्ञानी गुरु का मिलना कठिन है ,तत्व ज्ञानी गुरु मिल भी गए तो उनमें श्रद्धा होना कठिन है ,श्रद्धा हो भी  गई तो टिकना कठिन है ...क्यूँ की ?.....
        तामशी श्रद्धा होती है तो कदम कदम पर फरियाद करती है ,तामसी श्रद्धा में समर्पण नहीं होता है ,भ्रांति होती है समर्पण की ,तामसी श्रद्धा विरोध करती है ,राजसी श्रद्धा हिलती  रहती है और भाग जाती है ,किनारे लग जाती है ..और  सात्विक श्रद्धा होती है तो चाहे गुरु के तरफ से कैसी भी कसौटी हो ,किसी भी प्रकार की परीक्षा हो सात्विक भाव वाला  धन्यवाद से भर कर अहोभाव से भर कर स्वीकृति दे देगा ..
संसार से वैराग्य होना कठिन ,वैराग्य हो गया तो कर्मकांड छूटना कठीन,कर्मकांड छूट भी गया तो उपासना में मन लगना कठीन,उपासना में मन लग भी गया तो तत्व ज्ञानी ब्रह्म ज्ञानी गुरुओं का मिलना कठिन ,तत्व ज्ञानी गुरुओं का मिलना भी हो गया तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन ,क्योंकि प्राय: तामसी और राजसी श्रद्धा  वाले लोग बहुत होते हैं,तामसी श्रद्धा कदम कदम पर इंकार करेगी विरोध करेगी ,अपना अहम नहीं छोड़ेगी..
और श्रद्धेय के साथ ईष्ट के साथ गुरु के साथ विरोध करेगी तामसी श्रद्धा होगी तो ,राजसी श्रद्धा होगी तो जरा सी परीक्षा हुई तो राजसी श्रद्धा वाला किनारे हो जाएगा, भाग जाएगा ..
सात्विक श्रद्धा होगी तो श्रद्धेय की तरफ से हमारे उत्थान के लिए चाहे जो भी कसौटी हो चाहे कैसे भी साधन भजन के पद्धतियां हों, प्रयोग हो ,ब्यवहार हो  अगर सात्विक श्रद्धा है तो वह तत्ववेत्ता गुरुओं की तरफ से मिलने वाली तमाम साधना पद्धति अथवा विचार, व्यवहार जो भी है ..वो अहोभाव से वाह वाह, धन्यवाद ..उसे फरियाद नहीं होगी, उसे प्रतिक्रिया नहीं होगी ..
           सात्विक श्रद्धा हो गया तो फिर तत्व विचार में मन लग जाता है ,नहीं तो तत्व ज्ञानी गुरु मिलने के बाद भी तत्व ज्ञान  में मन लगना कठिन है ..
        आत्मसाक्षात्कारी गुरु मिल जाए ,और उसमें श्रद्धा हो जाए तो भी यह जरूरी नहीं कि सब लोग आत्मज्ञान के तरफ चल पड़े ...नहीं ,तामसी श्रद्धा वाला राजसी श्रद्धा वाला आत्मज्ञान के तरफ नहीं चल सकता ,वह तत्व ज्ञानी गुरुओं का सानिध्य पाकर अपनी इच्छा के अनुसार फायदा लेना चाहेगा ,लेकिन जो वास्तविक फायदा है ,जो तत्व ज्ञानी गुरु देना चाहते हैं उससे वह वंचित रह जाएगा ,सात्विक श्रद्धा वाला होता है वही तत्वज्ञान का अधिकारी माना जाता है ,वही तत्वज्ञान पर्यंत गुरु में अडीग श्रद्धा जैसे सांदीपक की थी ,भगवान विष्णु आए वरदान देने के लिए ..नहीं लिया ,भगवान शिव आए ..वरदान नहीं लिया ..
गुरु ने कोढी़ का रूप ले लिया, बुरी तरह परीक्षाएं ली ..पीट देते थे ,चांटा मार देते थे ..फिर भी वह गुरु के शरीर से निकलने वाला गंदा खून ,कोढ़ की बीमारी से आने वाली बदबू ,मवाद ..फिर भी सांदीपक का चित्त कभी उबता नहीं था ..
            ऐसे ही स्वामी विवेकानंद की रामकृष्ण देव में सात्विक श्रद्धा थी तो रामकृष्ण देव में अहोभाव बना रहता, और जब राजासी श्रद्धा हो जाती तो कभी हील जाती  ..ऐसे छह बार नरेंद्र की श्रद्धा हीली थी ..
            आत्म ज्ञानी गुरु मिलना कठिन है ,गुरु मिल जाए तो उनमें श्रद्धा टिकना सतत कठिन है क्योंकि श्रद्धा राजसी और तमाशी गुण से प्रभावित हो जाती है तो हिलती जाती है या विरोध कर लेती है ,इसलिए जीवन में सत्व गुण बढ़ाना चाहिए आहार की शुद्धी से, चिंतन की शुद्धि से सत्वगुण की रक्षा की जाती है ...
        अशुद्ध आहार ,अशुद्ध विचारों वाले व्यक्तियों का संग....लापरवाही रखने से श्रद्धा का घटना ,बढ़ना ,टूटना ,फुटना होता रहता है ,इसलिए साधक साध्य तक पहुंचने में उसे वर्षों गुजर जाते हैं..
कभी-कभी तो पूरा जन्म गुजर जाता है फिर भी साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं ,हकीकत में छह महीना अगर ठीक से साधना की जाए ,खाली 6 महीना ... 6 महीना अगर ठीक से साधना की जाए तो संसार की वस्तुएं और संसार आकर्षित होने लगता है ,सूक्ष्म जगत की कुंजियां हाथ में आने लगती हैं  ..6 महीना अगर सात्विक श्रद्धा से ठीक से साधन किया जाए,तो बहुत आदमी ऊंचे उठ जाता है ,रजोगुण तमोगुण से बचकर जब सतोगुण बढ़ता है तब तत्वज्ञानी गुरुओं के ज्ञान में  आदमी प्रविष्ट होता है ,तत्वज्ञान का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं रहती ..
अभ्यास तो भजन करने का है, श्रद्धा को सात्विक बनाने का है ..
        अभ्यास ,भजन का अभ्यास बढ़ने से ,सत्व गुण बढ़ने से विचार अपने आप उत्पन्न होता है ,महाराज ....ऐसा विचार उत्पन्न करने के लिए भी साधन भजन में सातत्य होना चाहिए और श्रद्धा की सुरक्षा में सतर्क होना चाहिए ..ईष्ट में ,भगवान में ,गुरु में श्रद्धा होनी चाहिए ।
        श्रद्धा हो गई तो तत्वज्ञान में गति होने में ,तत्वज्ञान तो कईयों को मिल जाता है लेकिन उस तत्वज्ञान में स्थिति नहीं करते ,और स्थिति  करते हैं तो ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न करने की खबर हम नहीं रख पाते ,ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न हो जाए तो साक्षात्कार होता है ।
        साक्षात्कार करने के बाद भी अगर उपासना तगड़ी नहीं किया और गुरु कृपा से हो गया साक्षात्कार तभी भी विक्षेप रहेगा ,मनोराज आने की संभावना है ,इसलिए साक्षात्कार के बाद भी ब्रह्म अभ्यास करने में लगे रहते हैं बुद्धिमान उच्च कोटि के साधक ।
        साक्षात्कार करने के बाद भी भजन में ,ब्रह्म अभ्यास में अथवा ब्रह्मानंद में लगे रहना ..यह  साक्षात्कारी की शोभा है ....
            जिन महापुरुषों को परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है ,वे भी ध्यान भजन में और शुद्धि में ध्यान रखते है, तो हम लापरवाही करते है तो अपनी पुण्यों की कब्र ही खोद दी  ..
            जीवन में जितना उत्साह होगा सतर्कता होंगी और जीवन दाता का मूल्य समझेंगे उतना यात्रा उच्च कोटि की होगी ..
            ब्रह्माकार वृत्ती होना होना यह भी ईश्वर की कृपा है
            सात्विक श्रद्धा होगी तब आदमी ईमानदारी से अपने अहम  को परमात्मा में अर्पित होगा ...
            तुलसीदास जी ने कहा ..यह फल साधन ते ना होइ....
            यह जो ब्रह्म ज्ञान का फल है,वो साधन से प्रकट नहीं होगा..साधन करते-करते सात्विक श्रद्धा तैयार होती है और सात्विक श्रद्धा ही अपने तत्व में ,ईष्ट में अपने आप को अर्पित करने को तैयार हो जाती है ,जैसे लोहा अग्नि की वाहवाही तो करें ,अग्नि के बखान तो करें, अग्नि को नमस्कार तो करे लेकिन तब तक लोहा अग्निमय  नहीं होता जब तक लोहा अपने आप को अग्नि में अर्पित नहीं कर देता ,लोहा अग्नि के भट्टे में अर्पित होते ही उसके रग रग मे अग्नि प्रविष्ट हो जाती है वह लोहा अग्नि का ही एक पुंज दिखता है.... ऐसे ही उस ब्रह्म स्वरूप में जिव अपने आपको जब तक अर्पित नहीं करता है तब तक भले भगवान के गीत गाए जाए ,गुरु के गीत गाए जाए..लाभ तो होगा लेकिन गुरुमय ,भगवतमय तब तक नहीं होगा जब तक अपने मैं को ईश्वर में, गुरु में अर्पित नहीं कर देता ..
..              ईश्वर और गुरू शब्द दो हैं बाकी एक ही तत्व होता है...मूर्ति से दो दिखते हैं ,मूर्तियां अलग-अलग है ,आकृति अलग अलग दिखती है बाकी ईश्वर और गुरु एक ही चीज है ,गुरु के ह्रदय में जो चैतन्य है ..चमका है ,वही ईश्वर के ह्रदय में प्रकट हुआ है ...
ईश्वर भी अगर परम कल्याण करना  चाहते हैं तो गुरु का रूप लेकर,उपदेशक का रूप लेकर भगवान कल्याण करेंगे ...परम कल्याण |
        संसार का आशीर्वाद तो भगवान ऐसे ही दे देंगे ,लेकिन जब साक्षात्कार करवाना होगा तो भगवान को भी आचार्य की गद्दी पर बैठना पड़ेगा ,आचार्य पद के ढंग से उपदेश देंगे भगवान जैसे श्री कृष्णा ने अर्जुन को उपदेश दिया ,श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया ...
            ..साधक भजन करते हैं ,भजन की तीव्रता से भाव मजबूत हो जाता है और भाव के बल से अपने भाव के अनुसार संसार में चमत्कार भी कर लेता है ,भाव की दृढता से..भाव पराकाष्ठा नहीं है ,भाव बदलते रहते हैं ..
..पराकाष्ठा है ब्रह्माकार वृत्ती को उत्पन्न कर के साक्षात्कार करना तो साधन भजन में उत्साह और जगत में नश्वर बुद्धि और ऊंचे लक्ष्य की  हमेशा स्मृति ..यह साधक को महान बना देगा ....
            ..अगर ऊंचे लक्ष्य का पता ही नहीं ,आत्म साक्षात्कार के लक्ष्य का पता ही नहीं ,ब्रह्माकार  वृत्ती  उत्पन्न कर के आवरण भंग करना और साक्षात्कार करके जीवन मुक्त होने का अगर जीवन में लक्ष्य नहीं है तो छोटी मोटी साधना में छोटी मोटी पद्धतियों में आदमी रुका ही रहेगा कोल्हू के बैल जैसा वही जिंदगी पूरी कर देगा ....
            ..मैंने अर्ज किया था न,- " कि संसार से वैराग्य होना कठिन है वैराग्य हुआ तो  फिर कर्मकांड से मन उठना कठिन है ,कर्मकांड से मन उठ गया तो उपासना में लगना कठिन है ,उपासना  में लग गया तभी भी  तत्वज्ञानी गुरुओं को खोजना कठिन है ,तत्वज्ञानी गुरु का मिलाप भी हो गया तो उन्हें श्रद्धा टिकना कठिन है,उनमें  श्रद्धा हो भी गई ..श्रद्धा तो हो जाती है ,लेकिन टिकी रहे ये बड़ा कठिन है और श्रद्धा टिकाई तभी भी तत्वज्ञान की और प्रीति होना कठिन है ,तत्वज्ञान हो गया तो उसमें स्थिति होना कठिन है स्थिति हो भी गई तो ब्रह्माकार वृत्ति करके आवरण भंग करके जीवनमुक्त पद पर पहुंचना परम पुरुषार्थ है" ,अगर सावधानी से 6 महीने तक आदमी ठीक ढंग से उपासना करे ठीक ढंग से तत्वज्ञानी गुरुओं के ज्ञान को विचारे तो उसके मन का संकल्प विकल्प कम होने लगता है संसार का आकर्षण कम होने लगता है और उसके चित्च में विश्रांति आने लगती है ,उससे संसार की सफलताएं आकर्षित होने लगती हैं, संसार आकर्षित होने लगता है ...
              संसार माना क्या जो सरकने वाली चीजें हैं ..इस संसार की जो भी चीजें हैं वह सरकने वाली हैं ..वे उस साधक से आकर्षित होने लगती हैं ,फिर उसे रोजी रोटी ,ये वो ...कुटुंब ,संबंधी समाज के लोगों को रिझाने के लिए नाक रगड़ना नहीं पड़ेगा वे लोग तो ऐसे ही रिझने को तैयार हो जाएंगे..खाली छह महीना ठीक ढंग से साधन मैं लगे तो सारी जिंदगी की मजदूरी से जो नहीं पाया वह 6 महीने में तो पाएगा लेकिन साधक के लिए वह भी तो तुत्छ हो जाता है ..उसका लक्ष्य ऊंचे में ऊंचा है आत्म साक्षात्कार |







शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

संत करें आप समान -पूज्य बापू जी

संत करें आप समान -पूज्य बापू जी



आत्मकल्याण की चाहना से एक व्यक्ति ने जाकर किन्हीं संत से प्रार्थना कीः “मुझ पर अपनी कृपादृष्टि कीजिये नाथ !”उसकी श्रद्धा देखकर गुरु ने उसे मंत्र दे दिया और कहाः “बेटा !एक वर्ष तक भलीभाँति इस मंत्र का जप करना। बाद में स्नान करके पवित्र होकर मेरे पास आना।”


एक वर्ष पूरा हुआ। वह शिष्य स्नानादि करके पवित्र होकर गुरु के पास जा रहा था, तब गुरु की ही आज्ञा से एक महिला ने इस तरह झाड़ू लगायी कि धूल उस शिष्य पर पड़ी। अपने ऊपर धूल पड़ते देख वह शिष्य अत्यंत आगबबूला हो उठा एवं उस महिला को मारने दौड़ा। वह तो भाग गयी।वह पुनः गया नहाने के लिए और नहा-धोकर पवित्र हो के गुरु के पास आया। गुरु ने सारी बात तो पहले से जान ही ली थी।



गुरु ने कहाः “अभी तो तू साँप की तरह काटने दौड़ता है। अभी तेरे अंदर मंत्रजप का रस प्रकट नहीं हुआ। जा, फिर से एक वर्ष तक मंत्रजप कर फिर मेरे पास आना।”एक वर्ष बाद पुनः जब वह नहा धोकर पवित्र हो के आ रहा था,


तब उस महिला ने धूल तो क्या उड़ायी, उसके पैर से ही झाडू छुआ दी। झाड़ू छू जाने पर वह भड़क उठा किन्तु वह मारने न दौड़ा। फिर से नहा धो के गुरु चरणों में उपस्थित हुआ।गुरु ने कहाः “बेटा !अब तू साँप की तरह काटने तो नहीं दौड़ता लेकिन फुफकारता तो है। अभी भी तेरी वैर-वृत्ति गयी नहीं है। जा, पुनः एक वर्ष तक जप करके पवित्र हो के आना।”



तीसरा वर्ष पूरा हुआ। शिष्य नहा धोकर गुरु के पास आ रहा था। इस बार गुरु के संकेत के अनुसार उस महिला ने कचरे का टोकरा ही शिष्य पर उँडेल दिया। इस बार पूरा कचरा उँडेल देने पर भी वह न मारने दौड़ा, न क्रोधित हुआ क्योंकि इस बार जप करते-करते वह जपके अर्थ में तल्लीन हुआ था। उसके चित्त में शांति एवं तत्त्वज्ञान की कुछ झलकें आ चुकीं थी, वह निदिध्यासन की अवस्था में पहुँच गया था।वह बोलाः “हे माता ! तुझे परिश्रम हुआ होगा।मुझ देहाभिमानी के देह के अभिमान को तोड़ने के लिए तू हर बार साहस करती आयी है। मेरे भीतर के कचरे को निकालने के लिए माता !तूने बहुत परिश्रम किया।पहले यह बात मुझे समझ में न आती थी किंतु इस बार गुरुकृपा से समझ में आ रही है कि आदमी जब भीतर
से गंदा होता है, तब ही बाहर की गंदगी उसे भड़का देती है। नहीं तो देखा जाये, तो इस कचरे में भी तत्त्वरूप से तो वह परमात्मा ही है।”यह कहकर वह पुनः स्नान करके गुरु के पास गया। ज्यों ही वह गुरु को प्रणाम करने गया, त्यों ही गुरु ने उसे उठाकर अपनी छाती से लगा लिया और कहाः “बेटा ! क्या चाहिए ?”शिष्य सोचने लगा कि ‘जब सर्वत्र वही है, सबमें वही है तो चाह किसकी करूँ और चाह भी कौन करे ?’गुरु की करूणा कृपा बरस ही रही थी। गुरुकृपा तथा इस प्रकार के चिंतन से धीरे-धीरे वह शिष्य खोता गया…. खोता गया….. खोते-खोते वह ऐसा खो गया कि वह जिसको खोजता था वही हो गया। ठीक ही कहा हैः


पारस और संत में बड़ा अंतरहू जान।एक करे लोहे को कंचन, ज्ञानी आप समान।।

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स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2017, पृष्ठ संख्या 6 अंक 289 ॐ

रविवार, 18 मार्च 2018

सच्ची प्रार्थना









          महाभारत में आता है कि जब पांडव वनवास के लिए जा रहे थे, तब युधिष्ठिर अपने पुरोहित धौम्य मुनि के पास आकर बोले : ‘‘विप्रवर ! वेदों में पारंगत ब्राह्मण मेरे साथ वन में चल रहे हैं परंतु मैं इनका पालन-पोषण करने में असमर्थ हूँ । अब मुझे क्या करना चाहिए ?’’

          मुनि ने कहा : ‘‘तुम तपस्या का आश्रय लेकर ब्राह्मणों का भरण-पोषण करो ।’’

         युधिष्ठिर ने मुनि के बताये अनुसार अष्टोत्तरशतनामात्मक स्तोत्र द्वारा भगवान सूर्य का अनुष्ठान किया । प्रसन्न होकर सूर्यनारायण ने दर्शन दिये और बोले : ‘‘धर्मराज ! तुम जो कुछ चाहते हो वह सब तुम्हें प्राप्त होगा । मैं बारह वर्षों तक तुम्हें अन्न प्रदान करूँगा । यह ताँबे की बटलोई (भोजन पकाने का एक गोल तले का बर्तन) लो । इस पात्र द्वारा निकला भोजन तब तक अक्षय बना रहेगा, जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न करके परोसती रहेगी ।’’
धर्मराज उसीसे ब्राह्मणों को भोजन कराने लगे । सभीको भोजन कराने के बाद द्रौपदी भोजन करती थी । जब दुर्योधन ने सुना कि पांडव तो वन में भी भली प्रकार दान-पुण्य करते हुए आनंद से रह रहे हैं, तब उसने उनका अनिष्ट करने का विचार किया ।

           छल-कपट की विद्या में निपुण कर्ण और दुःशासन आदि के साथ वह भाँति-भाँति के उपायों से पांडवों को संकट में डालने की युक्तियाँ खोजने लगा । उसी समय परम क्रोधी दुर्वासा मुनि अपने शिष्यों को साथ लिये हुए आ पहुँचे । दुर्योधन ने स्वयं दास की तरह रात-दिन श्रद्धा से नहीं अपितु उनके शाप के डर से उनकी सेवा की ।
एक दिन मुनि प्रसन्न होकर बोले : ‘‘दुर्योधन ! तुम्हारे मन में जो इच्छा हो, वर माँग लो ।’’


          जो ईर्ष्या और द्वेष के शिकंजे में आ जाता है, उसका विवेक उसे साथ नहीं देता है । दुष्ट दुर्योधन ने कहा : ‘‘ब्रह्मन् ! जिस प्रकार आप मेरे अतिथि हुए उसी प्रकार पांडवों के भी अतिथि होइये । मेरी प्रार्थना से आप वहाँ ऐसे समय में जाइये जब द्रौपदी स्वयं भोजन कर चुकी हो ।’’
‘‘मैं वैसा ही करूँगा ।’’ मुनि चले गये ।

          कर्ण बोला : ‘‘सौभाग्य से हमारा काम बन गया । हमारे शत्रु विपत्ति के महासागर में डूब गये हैं ।’’
भूखे भोजन करके खुश होते हैं, मोर बादल गरजने से खुश होते हैं, सज्जन दूसरों की उन्नति देख के खुश होते हैं और दुष्ट व्यक्ति दूसरों को संकट में देखकर खुश होते हैं ।

           एक दिन पांडव व द्रौपदी भोजन से निवृत्त हो सुखपूर्वक बैठे थे, तभी अपने दस हजार शिष्यों से घिरे हुए दुर्वासा मुनि उस वन में आये ।

        युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, फिर विधिपूर्वक पूजा करके बोले : ‘‘भगवन् ! अपना नित्य नियम पूरा करके (भोजन के लिए) शीघ्र पधारिये ।’’ मुनि शिष्यों के साथ स्नान करने के लिए चले गये ।
इधर द्रौपदी को भोजन के लिए बड़ी चिंता हुई, उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था । फिर द्रौपदी को याद आया कि जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं और आशा की कोई किरण नहीं होती तो एकमात्र भगवान की प्रार्थना और उनका आश्रय ही हमें बचा सकता है । वह श्रीकृष्ण को सच्चे मन से पुकारने लगी । शुद्ध हृदय से की गयी सच्ची, भावपूर्ण प्रार्थना ईश्वर जरूर सुनते हैं । द्रौपदी की पुकार सुन भगवान तुरंत ही वहाँ आ गये । द्रौपदी ने सब समाचार कह सुनाया ।

           श्रीकृष्ण ने कहा : ‘‘कृष्णे ! इस समय बहुत भूख लगी है, पहले मुझे जल्दी भोजन कराओ फिर सारा प्रबंध करते रहना ।’’ उनकी बात सुनकर द्रौपदी को बड़ा संकोच हुआ ।

          ‘‘देव ! सूर्यनारायण की दी हुई बटलोई से तभी तक भोजन मिलता है, जब तक मैं भोजन न कर लूँ । आज तो मैं भी भोजन कर चुकी हूँ, अतः अब उसमें भोजन नहीं है ।’’


         ‘‘कृष्णे ! जल्दी जाओ और बटलोई लाकर मुझे दिखाओ ।’’ हठ करके द्रौपदी से बटलोई मँगवायी । पात्र में जरा-सा साग लगा हुआ था । श्रीकृष्ण ने उसे लेकर खा लिया और कहा : ‘‘इस साग से सम्पूर्ण विश्व के आत्मा यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान श्रीहरि तृप्त और संतुष्ट हों ।’’

          इधर मुनि लोगों को सहसा पूर्ण तृप्ति का अनुभव हुआ । बार-बार अन्नरस से युक्त डकारें आने लगीं । यह देख वे जल से बाहर निकले और दुर्वासा मुनि से बोले : ‘‘ब्रह्मर्षे ! इस समय इतनी तृप्ति हो रही है कि कंठ तक अन्न भरा हुआ जान पड़ता है । अब कैसे भोजन करेंगे ?’’

           दुर्वासा मुनि अपने शिष्योंसहित पांडवों से बिना मिले ही वहाँ से प्रस्थान कर गये ।
   (‘महाभारत’, वन पर्व से संक्षिप्त)


           जो लोग सदा धर्म में तत्पर रहते हैं, उनके जीवन में भी कष्ट और विघ्न तो आते हैं पर वे दुःखी और विचलित नहीं होते बल्कि भगवान की शरण व प्रार्थना का आश्रय लेते हैं । इससे उनके कष्ट दूर हो जाते हैं । ईर्ष्यालु एवं द्वेषी चित्त से तो किया-कराया भी चौपट हो जाता है जबकि सच्ची प्रार्थना से बिगड़ी हुई बाजी भी देर-सवेर सँवर जाती है ।




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शनिवार, 17 मार्च 2018

सच्चा सुख और परम सत्य कैसे मिले ?











(दूरदर्शन पर पूर्व में प्रसारित पूज्य बापूजी का पावन संदेश)



              प्रश्न : सच्चा सुख और सच्चा सत् क्या है ?

           पूज्य बापूजी : वस्तु, इन्द्रिय और मन की वृत्ति से जो सुखाभास होता है उसे मिथ्या सुख बोलते हैं । वस्तु, इन्द्रिय-सुख के न होने पर भी या मन के विषयों को न भोगते हुए भी मन परम शांतस्वरूप आत्मा में जो विश्रांति पाता है उसे सच्चा सुख बोलते हैं ।

             एक होता है सत्य, दूसरा होता है सत् । दो और दो चार सत्य है, यह सामाजिक सत्य है लेकिन दो और चार का साक्षी सत् है । ‘मुझे जंतु ने काटा है, मैं पीड़ित हो रहा हूँ, दुःखी हूँ’ - यह व्यवहारकाल में सत्य है लेकिन जहाँ से ‘मैं’पना उठता है, वहाँ यह दुःख नहीं पहुँच सकता है । यह दुःख इन्द्रियों को होता है, मन को होता है, शरीर को होता है, मुझ चैतन्य में नहीं आता है । जहाँ दुःख की पहुँच नहीं और सुख का आकर्षण नहीं वह सत् है और जो दुःख-सुख में प्रभावित होता है वह सामाजिक सत्य माना जाता है । तो प्रकृति की वस्तुओं को ‘मैं-मेरा’ मानकर सुखी-दुःखी होना यह व्यावहारिक सत्य है लेकिन इन सबको मिथ्या और परिवर्तनशील समझ के अपने साक्षीस्वरूप में जग जाना यह पारमार्थिक सत् है ।


          प्रस्तोता (होस्ट) : इन सब बातों से मैं यह समझ पाया कि संसार को, व्यक्तियों को, लोगों को शांति के लिए सब कुछ छोड़ देना चाहिए ।

    पूज्यश्री : नहीं-नहीं-नहीं... । सब कुछ छोड़ना नहीं है अपितु सब कुछ में जो सत्यबुद्धि की बेवकूफी घुसी है, उसे छोड़ना है । सब कुछ जो दिखता है वह परिवर्तनशील है लेकिन जिससे दिखता है वह सत् है । तो सत् को प्रेम करें और सत् के नाते सब कुछ का सदुपयोग करें । व्यक्ति सदुपयोग नहीं करेगा और सब कुछ छोड़ेगा तो सब कुछ कितना छोड़ पायेगा ? शरीर को तो नहीं छोड़ सकता है और शरीर है तो फिर सब कुछ चाहिए खाने को, पीने को, रहने को, देने को । लेकिन जो आसक्ति है उसे छोड़ सकते हैं ।


अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ।
(गीता : 5.15)


         अज्ञान से ज्ञान आवृत हो गया इसलिए हम लोग मोहित हो जाते हैं । उलटे ज्ञान को सच्चा मान लेते हैं । है तो बदलनेवाला लेकिन उसको चिपकाये रखते हैं । बचपन को कितना भी सँभाला लेकिन चला गया, जवानी को कितना भी थामा परंतु चली गयी, फिर बुढ़ापा आयेगा, कितना भी सुरक्षित रखो पर चला जायेगा । जो चला जानेवाला है उसका सदुपयोग करें, उसका बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय उपयोग करने से अशांति मिटेगी, शांति आयेगी और सत् में प्रवृत्ति कर लें कि ‘भाई ! दुःख आया और चला गया लेकिन कोई जाननेवाला तो है । सुख आया और चला गया, कोई जाननेवाला तो है । इन दोनों को जाननेवाला मैं कौन हूँ ?’- ऐसा अपने को प्रश्न करें रात को सोते समय और सुबह उठते समय । तो वह कौन है ? वह अपने-आप कृपा करके प्रकट होने के द्वार खोल देगा ।


प्रश्न : आपसे प्रेरणा पाकर करोड़ों श्रद्धालु अपने जीवन में ज्ञानज्योति जलाकर जीवन को सफल बना रहे हैं । अपने जीवन की आप ऐसी कोई प्रेरक बात बताइये जिससे उनके जीवन की ज्ञानज्योति और ज्यादा प्रकाशमान हो और उनके जीवन का मार्ग और ज्यादा खुले, साफ हो ।


       पूज्य बापूजी : लाभदायी एवं प्रेरक बातें तो बहुत सारी हैं । खुलेआम एक छोटी-सी कह देता हूँ । रात्रि को सोते समय हम कभी चिंता लेकर, थकान ले के नहीं सोते हैं । ‘जो दिनभर हुआ, वह जिसकी सत्ता से हुआ
उसको अर्पण ! मैं निश्चिंत नारायण की गोद में जा रहा हूँ ।’ ऐसे परमेश्वर का चिंतन करते-करते आनंद, निर्विषय आनंद आता है, फिर हम सोते हैं । रात्रि का आखिरी सेकंड सुबह का पहला सेकंड बन जाता है । सुबह जब उठते हैं तो उसी शांत आत्मा में, ईश्वर में विश्रांति पाते-पाते थोड़ा-सा माधुर्य का अनुभव करते-करते फिर उठते हैं । श्रीकृष्ण ऐसा करते थे यह बात शास्त्रों से मैंने जानी । ‘आज यह-यह शुभ करना है...’- ऐसा सुबह संकल्प कर लेते थे और अपने को प्रसन्न रखते थे । आम लोगों को प्रेरणा पानी है तो सुबह उठकर यह संकल्प करना चाहिए कि ‘आज कम-से-कम 4 आदमियों को हँसाऊँगा, दो आदमियों के आँसू पोंछूँगा ।’



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शुक्रवार, 16 मार्च 2018

प्रणव’ (ॐ) की महिमा





            सूतजी ने ऋषियों से कहा : ‘‘महर्षियो ! ‘प्र’ नाम है प्रकृति से उत्पन्न संसाररूपी महासागर का । प्रणव इससे पार करने के लिए (नव) नाव है । इसलिए इस ॐकार को ‘प्रणव’ की संज्ञा देते हैं । ॐकार अपना जप करनेवाले साधकों से कहता है - ‘प्र-प्रपंच, न-नहीं है, वः-तुम लोगों के लिए ।’ अतः इस भाव को लेकर भी ज्ञानी पुरुष ‘ॐ’ को ‘प्रणव’ नाम से जानते हैं । इसका दूसरा भाव है : ‘प्र-प्रकर्षेण, न-नयेत्, वः-युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणवः । अर्थात् यह तुम सब उपासकों को बलपूर्वक मोक्ष तक पहुँचा देगा ।’ इस अभिप्राय से भी ऋषि-मुनि इसे ‘प्रणव’ कहते हैं । अपना जप करनेवाले योगियों के तथा अपने मंत्र की पूजा करनेवाले उपासकों के समस्त कर्मों का नाश करके यह उन्हें दिव्य नूतन ज्ञान देता है, इसलिए भी इसका नाम प्रणव - प्र (कर्मक्षयपूर्वक) नव (नूतन ज्ञान देनेवाला) है ।
           उन मायारहित महेश्वर को ही नव अर्थात् नूतन कहते हैं । वे परमात्मा प्रधान रूप से नव अर्थात् शुद्धस्वरूप हैं, इसलिए ‘प्रणव’ कहलाते हैं । प्रणव साधक को नव अर्थात् नवीन (शिवस्वरूप) कर देता है, इसलिए भी विद्वान पुरुष इसे प्रणव के नाम से जानते हैं अथवा प्र - प्रमुख रूप से नव - दिव्य परमात्म-ज्ञान प्रकट करता है, इसलिए यह प्रणव है ।
           यद्यपि जीवन्मुक्त के लिए किसी साधन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह सिद्धरूप है, तथापि दूसरों की दृष्टि में जब तक उसका शरीर रहता है, तब तक उसके द्वारा प्रणव-जप की सहज साधना स्वतः होती रहती है । वह अपनी देह का विलय होने तक सूक्ष्म प्रणव मंत्र का जप और उसके अर्थभूत परमात्म-तत्त्व का अनुसंधान करता रहता है । जब शरीर नष्ट हो जाता है, तब वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूप शिव को प्राप्त कर लेता है - यह सुनिश्चित है । जो अर्थ का अनुसंधान न करके केवल मंत्र का जप करता है, उसे निश्चय ही योग की प्राप्ति होती है । जिसने इस मंत्र का ३६ करोड़ जप कर लिया हो, उसे अवश्य ही योग प्राप्त हो जाता है । ‘अ’ शिव है, ‘उ’ शक्ति है और ‘मकार’ इन दोनों की एकता है । यह त्रितत्त्वरूप है, ऐसा समझकर ‘ह्रस्व प्रणव’ का जप करना चाहिए । जो अपने समस्त पापों का क्षय करना चाहते हैं, उनके लिए इस ह्रस्व प्रणव का जप अत्यंत आवश्यक है ।
           वेद के आदि में और दोनों संध्याओं की उपासना के समय भी ॐकार का उच्चारण करना चाहिए ।’’
भगवान शिव ने भगवान ब्रह्माजी और भगवान विष्णु से कहा : ‘‘मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ॐकार के रूप में प्रसिद्ध है । वह महामंगलकारी मंत्र है । सबसे पहले मेरे मुख से ॐकार (ॐ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूप का बोध करानेवाला है । ॐकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ । यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है । प्रतिदिन ॐकार का निरंतर स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है ।
            मुनीश्वरो ! प्रतिदिन दस हजार प्रणवमंत्र का जप करें अथवा दोनों संध्याओं के समय एक-एक हजार प्रणव का जप किया करें । यह क्रम भी शिवपद की प्राप्ति करानेवाला है ।
            ‘ॐ’ इस मंत्र का प्रतिदिन मात्र एक हजार जप करने पर सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है ।
    प्रणव के ‘अ’, ‘उ’ और ‘म्’ इन तीनों अक्षरों से जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन होता है - इस बात को जानकर प्रणव (ॐ) का जप करना चाहिए । जपकाल में यह भावना करनी चाहिए कि ‘हम तीनों लोकों की सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, पालन करनेवाले विष्णु तथा संहार करनेवाले रुद्र जो स्वयंप्रकाश चिन्मय हैं, उनकी उपासना करते हैं । यह ब्रह्मस्वरूप ॐकार हमारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों को, मन की वृत्तियों को तथा बुद्धि की वृत्तियों को सदा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले धर्म एवं ज्ञान की ओर प्रेरित करे ।’ प्रणव के इस अर्थ का बुद्धि के द्वारा qचतन करता हुआ जो इसका जप करता है, वह निश्चय ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । अथवा अर्थानुसंधान के बिना भी प्रणव का नित्य जप करना चाहिए ।’’
    (‘शिव पुराण’ अंतर्गत विद्येश्वर संहिता से संकलित) 




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शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

नर से नारायण की और - स्वामी विवेकानन्द


सुविख्यात स्वामी विवेकानंद, समर्थ सद्गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के शरणागत होकर ही कृतार्थ हुए । वे भक्ति के विषय में कहते हैं : ‘गुरु की कृपा से मनुष्य में छिपी हुई अलौकिक शक्तियाँ विकसित होती हैं, उसे चैतन्य प्राप्त होता है तथा उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है और अंत में वह नर से नारायण हो जाता है । …सत्य-ज्ञान-आनंदस्वरूप सद्गुरु को संसार ईश्वर-तुल्य मानता है । शिष्य शुद्धचित्त, जिज्ञासु और परिश्रमी होना चाहिए । जब शिष्य अपने को ऐसा बना लेता है, तब श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, निष्पाप, दयालु और प्रबोधचतुर समर्थ सद्गुरु उसे मिलते हैं । …सद्गुरु शिष्य के नेत्रों में ज्ञानांजन लगाकर उसे दृष्टि देते हैं । ऐसे सद्गुरु बडे भाग्य से जब मिलें, तब अत्यंत नम्रता, विमल सद्भाव और दृढ विश्वास के साथ उनकी शरण लो, अपना सम्पूर्ण हृदय उन्हें अर्पण करो, उनके प्रति अपने चित्त में परम प्रेम धारण करो, उन्हें प्रत्यक्ष परमेश्वर समझो । इससे आप भक्ति एवं ज्ञान का समुद्र प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाओगे । …महात्मा, सिद्ध पुरुष ईश्वर के अवतार होते हैं । वे केवल स्पर्श से, एक कृपा-कटाक्ष से, केवल संकल्पमात्र से भी शिष्य को कृतार्थ कर देते हैं, पर्वत जैसे पापों का बोझ ढोनेवाले भ्रष्ट जीवन को भी अपनी दया से क्षणार्ध में पुण्यात्मा बनाते हैं । वे गुरुओं के गुरु हैं । मनुष्यरूप में प्रकट होनेवाले साक्षात् नारायण हैं । मनुष्य उन्हींके रूप में परमात्मा को देख सकता है । अलख पुरुष की आरसी, सद्गुरु का ही देह । लखा जो चाहे अलख को, इन्हींमें तू लख लेह ।। भगवान निर्गुण-निराकार हैं, पर हम लोग जब तक मनुष्य हैं (देहभाव में हैं), तब तक हमें उन्हें मनुष्यरूप में ही पूजना चाहिए । तुम चाहे जो कहो, चाहे जितना प्रयत्न करो, पर तुम्हें मनुष्यरूपी (सगुण) परमेश्वर का ही भजन करना होगा । निर्गुण-निराकार का चाहे कोई कितना ही पाण्डित्य बघारे, सगुण का तिरस्कार करे, अवतारों की निन्दा करे, सूर्य-चन्द्र, तारागणों को दिखाकर बुद्धिवाद से उन्हींमें देवत्व देखने को कहे – पर उसमें यथार्थ आत्मज्ञान कितना है, यह यदि तुम देखो तो वह केवल शून्य है । हम लोग मनुष्य हैं, परमात्मा हमसे सगुणरूप में सद्गुरु-रूप में ही मिलते हैं, इसमें कुछ भी संदेह नहीं । स्वामी विवेकानंदजी आगे कहते हैं : ‘भगवान से मिलने की इच्छा करनेवाले मुमुक्षु के नेत्र श्रीगुरु ही खोलते हैं । गुरु और शिष्य का सम्बन्ध पूर्वज और वंशज के सम्बन्ध जैसा ही है । श्रद्धा, सच्चाई, नम्रता, शरणागति और आदरभाव से शिष्य गुरु का मन मोह ले तो ही उसकी आध्यात्मिक उन्नति हो सकती है । विशेष रूप से ध्यान में रखने की बात यह है कि जहाँ गुरु-शिष्य का नाता अत्यंत प्रेम से युक्त होता है, वहीं प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति के महात्मा उत्पन्न होते हैं । स्वानुभूति ज्ञान की परम सीमा है, वह स्वानुभूति ग्रंथों से नहीं प्राप्त हो सकती । पृथ्वी का पर्यटन कर चाहे आप सारी भूमि पदाक्रांत कर डालें, हिमालय, काकेशस, आल्प्स पर्वत लाँघ जायें, समुद्र में गोता लगाकर उसकी गहराई में बैठ जायें, तिब्बत देश देख लें या गोबी (अफ्रीका) का मरुस्थल छान डालें, स्वानुभव का यथार्थ धर्म-रहस्य इन बातों से, श्रीगुरु के कृपा-प्रसाद के बिना त्रिकाल में भी ज्ञात नहीं होगा । इसलिए भगवान की कृपा से जब ऐसा भाग्योदय हो कि श्रीगुरु दर्शन दें, तब सर्वान्तःकरण से श्रीगुरु की शरण लो, उन्हें ऐसा समझो जैसे यही परब्रह्म हों, उनके बालक बनकर अनन्यभाव से उनकी सेवा करो, इससे आप धन्य होंगे । ऐसे परम प्रेम और आदर के साथ जो श्रीगुरु के शरणागत हुए, उन्हींको और केवल उन्हींको सच्चिदानंद प्रभु ने प्रसन्न होकर अपनी परम भक्ति दी है और अध्यात्म के अलौकिक चमत्कार दिखाये हैं ।