परमात्मा के बारे में कई भ्रांतियां हैं, जिनके कारण हम उसकी वास्तविकता को समझ नहीं पाते। कुछ प्रमुख भ्रांतियां इस प्रकार हैं:
परमात्मा कोई दूरस्थ स्थान पर है – हम मानते हैं कि परमात्मा आकाश, पाताल या किसी विशेष देश-विदेश में है, जबकि वह सर्वव्यापक और सदा हमारे भीतर बाहर ओतप्रोत है |
परमात्मा क्रिया-साध्य है – यह धारणा है कि परमात्मा को किसी विशेष साधना, यज्ञ, तप या कर्मकांड से प्राप्त किया जा सकता है, जबकि परमात्मा क्रिया से परे, सदा विद्यमान सत्ता है।
परमात्मा को एक विशेष रूप में बांधना – लोग परमात्मा को केवल किसी मूर्ति, व्यक्ति या विशेष आकार में देखने लगते हैं, जबकि वह निराकार, चेतन और सर्वशक्तिमान सत्ता है।
परमात्मा को व्यक्तिगत इच्छाओं को पूरा करने वाला मानना – कई लोग सोचते हैं कि परमात्मा उनकी इच्छाओं और स्वार्थ की पूर्ति के लिए है, जबकि वह सभी जीवों के लिए समान है और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाने वाला है।
परमात्मा को संसार की वस्तुओं की तरह नाशवान मानना – हम सोचते हैं कि जो कुछ उत्पन्न होता है, वह नष्ट भी होता है, लेकिन परमात्मा जन्म और मृत्यु से परे शाश्वत सत्ता है।
इन भ्रांतियों के कारण हम परमात्मा की वास्तविकता को समझने में चूक जाते हैं और उसे बाहरी चीजों में खोजते रहते हैं, जबकि वह हमारे भीतर ही है।
वास्तव में -
द्रष्टा कभी दृश्य नहीं हो सकता: जो दिखाई देता है, वह 'दृश्य' (Object) है; जो उसे देख रहा है, वह 'द्रष्टा' (Subject/साक्षी) है। परमात्मा कोई दृश्य वस्तु नहीं, बल्कि वह चेतना है जिससे सब दृश्य दिखाई देते हैं।
केन उपनिषद (1.5):"यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥"
(अर्थ: जिसे आँखों से नहीं देखा जा सकता, बल्कि जिससे आँखें देखती हैं—उसी को तू 'ब्रह्म' जान; संसार के सीमित रूपों की जो उपासना की जाती है, वह पूर्ण ब्रह्म नहीं है।)
श्री रामकृष्ण परमहंस का दृष्टांत:
जब श्री रामकृष्ण निर्विकल्प समाधि में लीन होने लगे, तो माँ काली का परम प्रिय सगुण रूप भी उनके सामने आ गया। गुरु तोतापुरी ने उनसे कहा कि जब तक कोई भी 'रूप' सामने है, तब तक द्वैत (संसार) बना हुआ है; अतः ज्ञान के खड्ग से उस अंतिम रूप को भी काटकर शुद्ध चेतना में स्थित होना पड़ा।
'नित्य-प्राप्त' की कभी उत्पत्ति नहीं होती: कर्म से केवल चार प्रकार के फल मिल सकते हैं:
उत्पाद्य (नया बनाना)
आप्य (कहीं जाकर प्राप्त करना)
संस्कार्य (शुद्ध/सुधार करना)
विकार्य (बदलना)
परमात्मा अजन्मा, सर्वव्यापी, नित्य-शुद्ध और अपरिवर्तनीय है। इसलिए वह किसी कर्म का 'परिणाम' नहीं हो सकता।
जो करने से मिलेगा, वह न करने से छूट जाएगा:
कर्म से मिलने वाली हर चीज़ सीमित, विनाशी और क्षणभंगुर होती है। यदि समाधि या परमात्मा किसी क्रिया से 'बनाया' जाए, तो क्रिया रुकते ही वह खो जाएगा।
मुण्डक उपनिषद (1.2.12):
"नास्त्यकृतः कृतेन"
(अर्थ: जो अकृत [नित्य/अनादि परमात्मा] है, वह किसी कृत [कर्म या क्रिया] द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता।)
कर्म की वास्तविक भूमिका: जप, तप और साधना परमात्मा को 'पैदा' करने के लिए नहीं, बल्कि चित्त की अशुद्धियों और विक्षेपों (अहंकार) को मिटाने के लिए हैं (चित्त-शुद्धि)। जैसे दर्पण पर जमी धूल हटाने से चेहरा दिखने लगता है, चेहरे को नया नहीं बनाया जाता।
'भूल' का रोचक दृष्टांत: कस्तूरी मृग और खोया हुआ हार
कस्तूरी मृग: हिरण अपनी नाभि से आ रही कस्तूरी की सुगंध को बाहर जंगल में खोजता दौड़ता है और थक कर गिर जाता है। उसे सुगंध पाने के लिए दौड़ना नहीं, बल्कि अपनी नाभि में झांकना था।
गले का हार: एक महिला अपने गले में पहने हार को पूरे कमरे में ढूँढ़ती है (कर्म/दौड़)। जब कोई बताता है कि "हार तो तुम्हारे गले में ही है", तो दौड़ समाप्त हो जाती है। वहाँ कोई नया हार 'मिला' नहीं, केवल 'अज्ञान का नाश' हुआ।
परमात्मा को पाना कोई नई चीज़ हासिल करना नहीं है, बल्कि अपनी उस अज्ञानता को छोड़ना है जिसके कारण हम स्वयं को परमात्मा से अलग मान बैठे हैं।
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