गुरुवार, 9 जुलाई 2026

श्रद्धा विहीन पुरुष की क्या स्थिति होती है ?

 

Q- शास्त्रों में वर्णित ये सभी मार्ग—चाहे वह निदिध्यासन हो, निष्काम कर्म हो या ईश्वर-प्रणिधान— सभी श्रद्धावान साधक के लिए हैं। यदि कोई व्यक्ति रजो-तमो गुण से अत्यधिक ग्रसित है और उसके भीतर श्रद्धा का अभाव है उसकी क्या स्थिति होती है ?  


     A- यह टिप्पणी आध्यात्मिक साधना के एक परम सत्य को उजागर करती है। शास्त्रों में वर्णित ये सभी मार्ग—चाहे वह निदिध्यासन हो, निष्काम कर्म हो या ईश्वर-प्रणिधान—केवल उन्हीं साधकों के लिए फलदायी होते हैं जो श्रद्धावान हैं।

यदि कोई व्यक्ति रजो-तमो गुण से अत्यधिक ग्रसित है और उसके भीतर श्रद्धा का अभाव है, तो तत्वज्ञान केवल बौद्धिक विलास (Intellectual Luxury) बनकर रह जाता है, वह कभी आत्म-साक्षात्कार में नहीं बदल सकता।

शास्त्रों में श्रद्धाविहीन और केवल रजो-तमो गुण में डूबे पुरुषों की स्थिति तथा उनके लिए निर्देशों को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है:

1. श्रद्धाविहीन व्यक्ति का संशय और पतन

भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में स्पष्ट घोषणा की है कि जिसके भीतर श्रद्धा नहीं है और जो केवल संशय में जीता है, उसका परमार्थ मार्ग में आगे बढ़ना असंभव है:

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयआत्मा विनश्यति ।

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ (भगवद्गीता - ४.४०)

  • अर्थ: जो विवेकहीन (अज्ञानी) है, श्रद्धाविहीन (अश्रद्दधानः) है और निरंतर संशय से घिरा रहता है, उसका आध्यात्मिक पतन हो जाता है। ऐसे संशययुक्त व्यक्ति के लिए न यह लोक (संसार) सुखदायी है, न परलोक और न ही उसे कोई आत्मिक सुख मिलता है।

  • निष्कर्ष: यदि बुद्धि में तत्वज्ञान आ भी गया, लेकिन गुरु-वाक्यों और शास्त्रों में अटूट श्रद्धा नहीं है, तो वह ज्ञान हृदय में टिकता नहीं और संशय की आग में जलकर नष्ट हो जाता है।

2. रजो-तमो गुण संयुक्त पुरुष की बुद्धि की स्थिति

जब साधक पर रजोगुण (चंचलता, कामनाएँ) और तमोगुण (अज्ञान, आलस्य, प्रमाद) हावी होते हैं, तो उसकी बुद्धि सत्य को ग्रहण करने में असमर्थ हो जाती है। विवेकचूड़ामणि में आदि शंकराचार्य जी कहते हैं कि रजो-तमो गुण के रहते परोक्ष ज्ञान अपरोक्ष (अनुभव) में नहीं बदल सकता:

बुद्धेस्तमोऽन्यान्मुखता कुभावना सदिग्रहा संशयभावना च ।

प्रमादआलस्यजडत्वनिद्राः प्रविशन्त्यविद्यावरणप्रभावात् ॥ (विवेकचूड़ामणि)

  • अर्थ: तमोगुण और रजोगुण के आवरण के कारण बुद्धि में विपरीत भावना (गलत धारणाएँ), संशय, प्रमाद (असावधानी), आलस्य और जड़ता आ जाती है।

  • जब तक साधक इन दोनों गुणों के वशीभूत रहता है, वह "मैं ब्रह्म हूँ" इस सत्य को जानने के बाद भी उसका अनुभव नहीं कर पाता क्योंकि उसका चित्त संसार के राग-द्वेष में ही भटका रहता है।

3. ऐसे 'श्रद्धाविहीन और रजो-तमो युक्त' साधक के लिए क्या निर्देश है?

शास्त्र कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को सीधे 'तत्व-चिंतन' या 'निदिध्यासन' में नहीं बैठना चाहिए, क्योंकि मलीन चित्त में ध्यान लगेगा ही नहीं। उसके लिए एक क्रमिक (Step-by-step) मार्ग बताया गया है:

क) 'सत्त्वगुण' की वृद्धि करना (गुण परिवर्तन):

साधक को सबसे पहले अपने आहार, विहार, संगति और विचारों को शुद्ध करके रजोगुण और तमोगुण को शांत करना होगा तथा सत्त्वगुण को बढ़ाना होगा। भगवद्गीता के 14वें अध्याय में कहा गया है कि सत्त्वगुण के बढ़ने पर ही ज्ञान का प्रकाश फैलता है:

सत्त्वात्संजायते ज्ञानं... (भगवद्गीता - १४.१७)

ख) प्राथमिक स्तर की साधना (प्रायश्चित और सेवा):

  • निष्काम सेवा (कर्मयोग): बिना किसी फल की इच्छा के समाज, संतों और असहायों की सेवा करना। इससे रजोगुण (अहंकार और कामना) गलता है।

  • कीर्तन और नाम-जप: यदि श्रद्धा कम भी हो, तो भी निरंतर नाम-जप करने से धीरे-धीरे अंतःकरण के पाप और कषाय नष्ट होते हैं, जिससे श्रद्धा का जन्म होता है।

  • सत्संगति: श्रद्धाहीन व्यक्ति के भीतर श्रद्धा केवल 'सत्संग' (ज्ञानियों और भक्तों की संगति) से ही जाग सकती है। अग्नि के पास बैठने पर जैसे ठंड स्वतः दूर हो जाती है, वैसे ही संतों के संग से रजो-तमो गुण शांत होने लगते हैं।

अंतिम निष्कर्ष:

गुरु और ईश्वर की कृपा ने तत्वज्ञान का बीज तो बो दिया है, लेकिन श्रद्धाविहीनता और रजो-तमो गुण उस भूमि (बुद्धि) को ऊसर (बंजर) बना रहे हैं। इसलिए ऐसे साधक को पहले चित्त-शुद्धि (सत्त्वगुण की वृद्धि) पर ध्यान देना चाहिए, तभी वह बीज अंकुरित होकर 'आत्म-साक्षात्कार' का वृक्ष बने|




 

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